Sunday, August 21, 2016

मनमोहक रॉस द्वीप का सफर ((17 ))

रॉस द्वीप पोर्ट ब्लेयर से सबसे नजदीक का द्वीप है जहां आप फेरी से जा सकते हैं। वैसे तो यहां स्पीड बोट से भी जाया जा सकता है। छोटा सा रॉस द्वीप कई सारी कहानियां समेटे हुए है। किसी जमाने में यह अंदमान की राजधानी हुआ करता था। अब नौ सेना के अधीन है। रॉस द्वीप पर जाने के लिए किसी परमिट की जरूरत नहीं पड़ती है। आप बुधवार को छोड़कर यहां हर रोज घूमने जा सकते हैं। अबरडीन बाजार या सेल्युलर जेल के पास स्थित राजीव गांधी वाटर स्पोर्टस कांप्लेक्स से सुबह के समय रॉस द्वीप के लिए फेरी सेवाएं चलती हैं। हालांकि अबरडीन जेट्टी से रॉस की दूरी सिर्फ 800 मीटर है और 15 मिनट का रास्ता पर दोपहर 12 बजे के बाद यहां नहीं जा सकते। सुबह कई कंपनियों की बोट जेट्टि यहां से रॉस के लिए रवाना होती हैं। सिर्फ रॉस जाना हो तो आने जाने का किराया 100 रुपये है। लेकिन रॉस के साथ नार्थ बे का पैकेज हो तो किराया 350 रुपये से 550 रुपये तक हो सकता है। आप एजेंट के बजाय सीधे काउंटर से जाकर टिकट लें तो किराया किफायती हो सकता है।

तो चलिए चलते हैं रॉस के सफर पर। मैं एमवी सी क्रूज नामक जहाज फेरी में सवार हूं। इसकी क्षमता 44 लोगों की है। समंदर के हर सफर में लाइफ जैकेट पहनना जरूरी है। हमारे फेरी ने रॉस द्वीप घूमने के लिए कुल एक घंटे 15 मिनट का समय दिया है। रॉस द्वीप पर आपको उतरने पर नेवी के काउंटर से प्रवेश टिकट लेना पड़ता है। 30 रुपये का प्रवेश टिकट और 30 रुपये कैमरे के लिए। यह टिकट एक डिजिटल कार्ड के रूप में होता है जो वापसी में जमा करना पड़ता है।

रॉस के प्रवेश द्वार पर ही जापानी बंकर दिखाई देता है जो अंदमान मे तीन साल जापानी कब्जे की कहानी बयां करता है। रॉस द्वीप का नाम डेनियल रॉस के नाम पर पड़ा। यह अंदमान में ब्रिटिश अधिकारियों का पहला पड़ाव था। पर अब रॉस में सिर्फ खंडहर बचे हैं जिन्हें नौसेना ने खूबसूरती से बचा रखा है। सुंदरता ऐसी है कि हरे भरे नारियल के पेड़ों की कतार के बीच रॉस हिरण, मोर, खरगोश बेफिक्र होकर घूमते नजर आते हैं। आबोहवा अत्यंत सुहानी है। वातावरण में प्रकृति का संगीत अनवरत सुनाई देता है। इस संगीत के साथ समंदर की लहरें सुर में सुर मिलाती प्रतीत होती हैं।

रॉस में आप जापानी बंकर, प्रेसबेटेरियन चर्च, पानी गर्म करने वाला हमाम, स्विमिंग पुल, अधिकारियों का क्लब, कब्रिस्तान, तालाब के अलावा फेयरर बीच देख सकते हैं। द्वीप का कुल क्षेत्रफल 600 वर्ग मीटर है। रॉस को अंदमानी भाषा में चोंग एकी बूड नाम से जाना जाता था। पर जलीय पर्यवेक्षक डेनियल रॉस के नाम पर यह रॉस आईलैंड कहलाने लगा। आर्चीबाल्ड ब्लेयर ने इस द्वीप पर 1789 में कदम रखा था। भौगोलिक स्थित के कारण ब्रिटिश अधिकारियों ने इसे अपना आवास बनाया। इसे पेरिस ऑफ इस्ट कहा गया। यहां गिरिजाघर, आवासीय घर, दुकानें, अस्पताल, स्विमिंग पुल, मिनरल वाटर प्लांट, हमाम, क्लब आदि का निर्माण कराया गया। 

करीब 500 लोगों की आबादी किसी जमाने में रॉस द्वीप पर रहती थी। इसमें ब्रिटिश अधिकारी, फौजी और भारतीय व्यापारी भी शामिल थे। पर 26 जनवरी 1941 को आए एक भीषण भूकंप ने रॉस द्वीप पर काफी नुकसान पहुंचाया। इससे द्वीप में दरारें आईं और कई बड़े भवन ध्वस्त हो गए। 23 मार्च 1942 को जापानी सेना ने रॉस पर हमला बोला। तब ब्रिटिश सेना ने उनके सामने सरेंडर कर दिया। 1945 में एक बार फिर रॉस ब्रिटिश सेना के कब्जे में आ गया। जब 1947 में देश आजाद हुआ और रॉस भी आजाद भारत का हिस्सा बन गया।
-vidyutp@gmail.com

(ANDAMAN, ROSS ISLAND, INDIAN NAVY , LIGHT AND SOUND SHOW ) 
रॉस द्वीप का एक विहंगम नजारा। 

 ( अगली कड़ी में पढिए - राॉस द्वीप का अदभुत सौंदर्य -  ये रॉस है या रास  ) 

अंदमान की यात्रा को पहली कड़ी से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।  




2 comments:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 'कजली का शौर्य और ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

    ReplyDelete