Wednesday, August 10, 2016

साढ़े तीन साल जापान के कब्जे में रहा अंदमान ((10))

अंदमान निकोबार द्वीप समूह जापान के कब्जे में रहा। तीन साल से अधिक। 22 मार्च 1942 से 7 अक्तूबर 1945 तक अंदमान जापान के कब्जे में रहा। इस दौरान जापानी सेना ने अंदमान पर बहुत अत्याचार किया। जापान की कई स्मृतियां अंदमान में देखी जा सकती हैं। चाथम शॉ मिल के परिसर में जापानी बंकर बना हुआ है। इसी तरह का दूसरा जापानी बंकर रॉस द्वीप पर भी देखा जा सकता है।

जापानियों ने जासूसी के शक में तमाम स्थानीय निवासियों पर काफी जुल्म ढाए। जापान को ये शक होता था कि स्थानीय लोग ब्रिटिश सेना के लिए जासूसी कर रहे हैं। कई पढ़े लिखे लोगों को जेल में डाल दिया गया तो कई लोगों को खुले में मार डाला गया। काफी लोगों को बोट में बिठाकर नील द्वीप या हैवलाक द्वीप ले जाकर समंदर में कूदने के ले मजबूर कर दिया जाता था।
बमबारी के समय चाथम द्वीप 

हांफ्रीगंज के 44 शहीद  - दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना अंदमान के जापानी ठिकानों पर लगातार हवाई हमले भी कर रही थी। इसमें अंदमानवासियों की जान जा रही थी। वह बड़ा ही मुश्किल दौर था। पोर्ट ब्लेयर से 15 किलोमीटर दूर हांफ्रीगंज में शहीद वेदी है जहां पर एक साथ 44 लोगों को 30 जनवरी 1944 को जापानी सेना ने गोलियों से भून डाला था। वहीं एक ही गड्ढे में 44 लोगों को दफना दिया गया।

जापान के कब्जे के दौरान सुभाष चंद्र बोस पोर्ट ब्लेयर आए थे। उन्होंने सेल्युलर जेल का दौरा किया था और यहां तिरंगा झंडा भी लहराया था। पर सुभाषचंद्र बोस को उन कैदियों से नहीं मिलने दिया गया जो जेल में अनियमितता को लेकर सत्याग्रह कर रहे थे। इससे वह कैदियों पर हो रहे जुल्म की दास्तां नहीं जान सके। 

मुंशी रामसेवक ( गया, बिहार निवासी) 
जापानी सेना के अत्याचार की कई कहानियां समेटे हुए चाथम का आरा मिल। 15 अगस्त 1943 को ब्रिटिश सेना के बम बरसाने से चाथम द्वीप पूरी तरह तबाह हो गया। चाथम आरा घर के पूर्व मुंशी रामसेवक जी एक साक्षात्कार में जापानी सेना के अत्याचार के उस दौर को याद करते हैं। 
रामसेवक जी के पिता वैद्यनाथ बिहार के गया से कैदी के तौर पर आए थे। बाद में उन्हें ब्रुक्शाबाद बस्ती में बसाया गया। यह बस्ती एक अंग्रेज ब्रुक्स के नाम पर बनी थी। पोर्ट ब्लेयर की ज्यादातर बस्तियां ब्रिटिश अधिकारियों के नाम पर है। जैसे डेलानीपुर डेलानी नामक अधिकारी के नाम पर। रामसेवक जी का बचपन अबरडीन बाजार इलाके में गुजरा। 16 साल की उम्र से उन्होंने चाथम शॉ मिल में नौकरी शुरू की।
चाथम शॉ मिल में यूपी, बिहार, पंजाब के कैदी काम किया करते थे। शॉ मिल के मैनेजर लिल्ली साहब के नाम पर एक लिल्लीपुर नामक बस्ती हैडो में बनी है। किसी उत्तर भारत से आए लोग यहां अपनी संस्कृति भी लेकर आए थे। किसी जमाने में यहां आल्हा, कजरी और लोकगीतों की जबरदस्त महफिल जमती थी।
जापानी वार बंकर, चाथम शॉ मिल के अंदर। 

चाथम आरा मिल पर बमबारी - 15 अगस्त 1943 का दिन रविवार था। संयोग से उस दिन रक्षा बंधन भी था। सीमेंट से भरा जापानी जहाज चिंटोमारू चाथम जेट्टि में खड़ा था। उसे मजदूर लगाकर खाली कराया जा रहा था। सबसे पहले कुछ बम जहाज पर ही गिरे। लोग भागने लगे। दूसरा बम यार्ड आफिस पर और तीसरा बम मेन गेट पर गिरा। किसी का पैर किसी का हाथ किसी का सिर कट कर गिरा। लोग कराहने लगे। रामसेवक जी ने पूरा मंजर देखा और तेजी से भाग कर चाथम पुल से दूसरी तरफ जाकर अपनी जान बचाई। उस दिन मिल में कर्मचारियों को छुट्टी के दिन काम पर बुलाया गया था। पर इसमें से दर्जनों लोग ब्रिटिश बमबारी में मारे गए।


7 अक्तूबर 1945 को अंदमान फिर से ब्रिटिश सम्राज्य के अधीन आ गया। पर 1947 में देश आजाद होने के बाद जब अंग्रेज जाने लगे तब दुर्गा प्रसाद जी को चाथम शॉ मिल का प्रभार सौंपा गया। चाथम पर हुई बमों की बारिश के दौरान दुर्गा प्रसाद जी ने बहुत सूझ बूझ से काम लेकर चाथम को बरबाद होने से बचाया था।  7 जनवरी 1900 को जन्मे दुर्गा प्रसाद सिंह चाथम शॉ मिल में लंबे समय तक मुख्य वन अधिकारी के तौर पर रहे। 30 मई 1973 को उनका निधन हो गया।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य  -vidyutp@gmail.com

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