Sunday, July 24, 2016

लंगट सिंह कॉलेज के वे दिन

वह 1987 का साल था जब मुझे हाई स्कूल यानी दसवीं पास करने के बाद कॉलेज में नामांकन लेना था। तब बिहार में 11वीं यानी इंटर से कॉलेज में पढ़ाई होने लगती थी। नंबर के आधार पर हमारा नामांकन मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कॉलेज में हो गया। यह बिहार विश्वविद्यालय का सबसे अच्छा और बिहार के दूसरे नंबर के कॉलेज में गिना जाता था। अगर भवन की भव्यता की बात करें तो बिहार में शायद कोई दूसरा कॉलेज इसके मुकाबले नहीं ठहरता। लंगट सिंह कॉलेज की मुजफ्फरपुर शहर के छाता चौक और कलमबाग चौक के बीच स्थित है। उसके बगल में खबड़ा मुहल्ला है। लंगट सिंह कॉलेज के ठीक पीछे बिहार विश्वविद्यालय का परिसर है। लंगट सिंह कॉलेज की लाल रंग की इमारत अपने विरासत की दास्तां मूक रहकर भी बयां करती है। कॉलेज के प्रशासनिक भवन के एक तरफ ड्यूक हॉस्टल है तो दूसरी तरफ लंगट्स हॉस्टल। मुख्य भवन के बायीं तरफ कला संकाय का भवन है तो पीछे की तरफ विज्ञान संकाय  के विभाग। हमारा विषय था बॉटनी, जूलोजी, केमिस्ट्री और फिजिक्स। सभी विषयों की कक्षाएं अलग-अलग कमरों में लगती थी। हम गांव के स्कूल से निकल कर आए थे तो ये क्लास रूम हमलोगों को बड़े भव्य लगते थे। 
पुराने दिन पुराने दोस्त पीछे छूट गए... अमिय कुमार और आदर्श निर्मल
हमारी केमिस्ट्री की लैब इतनी बड़ी थी कि वहां सभी छात्रों को एक एक अलमारी अलॉट कर दी गई थी, जिसमें हम प्रयोग में काम आने वाले 20 किस्म के सामान ताला बंद करके रखते थे। पर केमिस्ट्री में साल्ट एनालिसिस मुश्किल काम था। इसकी प्रायोगिक परीक्षा में लैब का चपरासी हमें थोड़ी दक्षिणा लेकर क्ल दे देता था। फिर हम रिजल्ट में वही साल्ट बता देते थे। कमेस्ट्री में हमारे टीचर थे मोहम्मद मोउनुद्दीन, राम बालक चौधरी, नित्यानंद शर्मा, जीवछ चौधरी जैसे लोग। हमारे एक फिजिक्स के शिक्षक थे जो हमें पढ़ाने के साथ साथ साथ नैतिक शिक्षा देते थे। खास तौर पर गांव से आए छात्रों को आगाह करते थे देखना मजफ्फरपुर की हवा न लग जाए। सिनेमा कम देखो सिलेबस पर ध्यान ज्यादा दो।

विज्ञान संकाय के हर विभाग के बीच में विशाल आंगन हुआ करता है लंगट सिंह कॉलेज में। तो हिंदी और अंगरेजी की पढ़ाई के लिए हमें कला संकाय में जाना पड़ता था। हमारे हिंदी के शिक्षक थे नंद किशोर नंदन और कृष्ण जीवन भट्ट। भट्ट जी बड़ी लच्छेदार हिंदी और आलांकारिक हिंदी बोलते थे। उनका व्यक्तित्व भी यादगार था। एक बार नंदन जी अपनी क्लास में हमारी शैतानियों से परेशान होकर भारी नाराज हो गए। तब गुस्से में आकर बोले कि तुम लोग नंद किशोर नंदन से पढ़ने लायक नहीं हो। तब हमें काफी दुख हुआ। हमारी अंगरेजी के एक शिक्षक थीं पार्वती सिन्हा, उनका भी ज्ञान उच्च कोटि का था। हमें उनकी क्लास खूब पसंद आती थी। खैर ...विज्ञान संकाय में हमारे यहां कई योग्य शिक्षक थे। हमें भौतिकी पढ़ाने वाले में एक थे हजारी लाल साह जिनसे में उनके घर पर ट्यूशन पढ़ने भी जाता था।
एलएस कॉलेज  परिसर में लगी लंगट सिंह की प्रतिमा 

कुछ और बातें लंगट सिंह कॉलेज की। जब इस कालेज की स्थापना हुई तो इसका नाम गवर्नमेंट भूमिहार ब्राह्मण कॉलेज था। बाद में इसका नाम कॉलेज के सबसे बड़े दानकर्ता लंगट सिंह के नाम पर लंगट सिंह कॉलेज कर दिया गया। मुजफ्फरपुर शहर में भूमिहार बिरादरी के लोगों की बहुलता है। हमारे समय में कॉलेज में भी 50 फीसदी से ज्यादा शिक्षक भूमिहार ही थे। एक बार मैं विद्या विहार परिसर में आयोजित ब्रह्मर्षि सम्मेलन में चला गया। वहां मंच से वक्ताओं ने आवाज उठाई कि लंगट सिंह कॉलेज में लंगट बाबू की एक प्रतिमा लगाई जानी चाहिए। अब कॉलेज में संस्थापक लंगट सिंह की प्रतिमा लगाई जा चुकी है। 

हमारे समय में भूमिहार फैक्टर परिसर में हर जगह हावी दिखता था। हालांकि विज्ञान संकाय में पढ़ने लिखने का वातावरण था, हमारे समय में पर कला संकाय और बिहार यूनीवर्सिटी का माहौल अच्छा नहीं था। उस जमाने में हॉस्टल में सिर्फ दंबग छात्र ही रह सकते थे। सीधे-सादे लड़के हॉस्टल में जाने से बचते थे। हॉस्टल में मेस का तो कोई रिवाज ही नहीं था। हम अपने कॉलेज में किसी अच्छी कैंटीन को मिस करते थे। हमारी आईएससी बायोलाजी की क्लास में कुल 120 छात्र थे जिसमें कुल पांच छात्राएं थीं, जो सभी कालेज के शिक्षकों की पुत्रियां थीं। एलएस कॉलेज में पढ़ाई के दौरान कई अच्छे दोस्त बने। विष्णु वैभव, विभु वैभव दो भाई। मिथिलेश गुप्ता, आशुतोष गुप्ता। राजेश कुमार, मुरारी कुमार जैसे लोग अब भी संपर्क में हैं। हमारे एक सहपाठी प्रभात 1990 में बीएचयू मेडिकल क्वालिफाई कर गए थे, वे हमें दुबारा पांच साल बीएचयू में पढ़ाई के दौरान मिलते थे। कई नाम अब भी याद हैं जेहन में पर पता नहीं वे कहां हैं।
एलएस कॉलेज के दिन थे वो... 1988



लंगट सिंह कॉलेज की स्थापना 3 जुलाई 1899 को हुई थी। तब यह कॉलेज कलकत्ता विश्वविद्यालय से संबद्ध हुआ करता था। 1915 में इसे सरकारी कॉलेज के तौर पर स्वीकार किया गया। 1917 में बिहार में पहला विश्वविद्यालय बना पटना विश्वविद्यालय तब यह कॉलेज उसका हिस्सा बन गया। 1952 में मुजफ्फरपुर में बिहार विश्वविद्यालय बना, तब लंगट सिंह कॉलेज उसका हिस्सा बन गया।
कई नामचीन लोगों ने पढ़ाया 
देश के कई बड़े नाम लंगट सिंह कॉलेज से जुड़े हैं। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद यहां शिक्षक रह चुके हैं। आचार्य जेबी कृपलानी, एचआर मलकानी, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर इस कालेज से संबद्ध रह चुके हैं।
जब बापू आए एलएस कालेज में 
 1917 में अपनी पहली चंपारण यात्रा के क्रम में महात्मा गांधी 11अप्रैल 1917 के कॉलेज कैंपस में जेबी कृपलानी और एचआर मलकानी के साथ रुके थे। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद, जे बी कृपलानी, वाईजे तारपोरवाला, डब्लू ओ स्मिथ और एचआर घोषाल यहां इतिहास के शिक्षक थे। नई पीढ़ी में तमाम लोग इस कॉलेज से निकल कर ऊंचे मुकाम पर पहुंचे हैं। हमारे वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम ने भी एलएस कॉलेज में पढ़ाई की है।
 - विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com



( LANGAT SINGH COLLEGE, MUZAFFARPUR, BIHAR, DUKE HOSTEL  ) 

2 comments:

  1. पहले गवर्नमेंट भूमिहार ब्राह्मण कॉलेज और बाद में कॉलेज के सबसे बड़े दानकर्ता लंगट सिंह के नाम पर लंगट सिंह कॉलेज ..बड़ा ही दिलचस्प है .....
    ऐसे संस्मरण पढ़कर स्कूल-कॉलेज के दिन की बहुत सी यादें ताज़ी होने लगती है
    बहुत सुन्दर

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