Saturday, June 4, 2016

जलियांवाला बाग को देखो.. यहीं चली थी गोलियां

दो शताब्दी के गुलामी की दास्तान में जलियांवाला बाग कांड ब्रितानिया जुल्म की सबसे बड़ी घटना है। आग उगलती तोपों ने एक हजार जिंदगियां ले लीं। जान बचाने के लिए इधर उधर भाग रहे लोगों में से 120 लोग तो कुएं में गिरकर शहीद हो गए। यह शहीदी कुआं आज भी जलियांवाला बाग में उस घटना की याद दिलाता है।

वह 13 अप्रैल 1919 का दिन था। उस दिन वैशाखी का त्योहार था। दो बड़े क्रांतिकारियों सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी के कारण लोगों में गुस्सा था। वे उनकी रिहाई के लिए बैठक करने के लिए जलियांवाला बाग में जुटे थे। बाग में करीब 5000 लोग जुटे थे। बाग कुछ ऐसा है कि चारों तरफ आवासीय क्षेत्र है। बीच में छोटा सा बाग। बाग में प्रवेश के लिए एक संकरी गली। ब्रिगेडियर रेजीनाल्ड डायर इसी गली से तोंपे लेकर पहुंच गया। शाम हो रही थी। लोगों को कोई चेतावनी नहीं दी गई। अचानक फायर का आदेश हुआ। और तोपें आग उगलने लगी। लोग बदहवास भागने लगे। पर भाग कर जाते कहां। बाहर निकलने के रास्ते पर तो फौज थी। डायर 90 सैनिकों को लेकर बाग में घुसा था।  महज 10 मिनट में 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं।

कितने शहीद हुए  - अमृतसर के जिलाधिकारी के कार्यालय में 484 शहीदों की सूची है। पर वास्तविक शहीदों की संख्या इससे ज्यादा है। कहा जाता है कि 1000 लोग शहीद हुए और 2000 लोग घायल हुए। बाग में लगी पट्टिका पर लिखा  है कि 120 लाशें तो सिर्फ कुएं से निकाली गईं। मदन मोहन मालवीय शहीदों की संख्या 1300 तो स्वामी श्रद्धानंद 1500 बताते हैं।

जलियांवाला बाग के मूल स्वरूप को बरकरार रखा गया है। अभी भी आप वह गली देख सकते हैं जिससे जनरल डायर की अगुवाई में तोप समेत फौज घुसी थी। कई दीवारों पर गोलियों के निशान संरक्षित करके रखे गए हैं। पार्क के बीच में एक स्मारक बनाया गया है उन तमाम शहीदों की याद में जिनमें कई के नाम भी नहीं मालूम। पार्क में एक अमर ज्योति भी जलती रहती है। पार्क में कई जगह हरी हरी घास को काटकर फौजियों की शक्ल दी गई है। छात्र, बच्चे, बूढ़े, जवान हर तरह के लोग जलियांवाला बाग पहुंचते हैं और स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से रूबरु होते हैं।
इसी गली से पहुंची थी ब्रिटिश फौज।

ऊधम सिंह ने बदला लियाजनरल डायर ने हंट कमीशन के सामने माना कि वह बैठक कर रहे लोगों को मारने के इरादे से वहीं पहुंचा था। वह तोपें लेकर भी गया था। पर संकरी गलियों में तोपें अंदर नहीं जा सकीं। ब्रिटिश सरकार ने डायर को दोषी मानते हुए उसे पदावनत करके लंदन वापस भेज दिया। डायर की मौत 1927 में हो गई। पंजाब के महान शहीद उधर सिंह ने 13 मार्च 1940 को इस कांड का बदला लेते हुए लंदन के कैक्सटन हॉल में इस घटना के समय पंजाब के ले. गवर्नर रहे ले. माइकल ओडायर को मार डाला। ऊधम सिंह इस बड़े नरसंहार के लिए माइकल ओडायर को साजिशकर्ता मानते थे। जलियांवाला बाग कांड के समय उधर सिंह 19 साल के थे। 31 जुलाई 1940 को ऊधम सिंह को फांसी दे दी गई। ऊधम सिंह का जन्म 26 दिसंबर 1899 को सुनाम में हुआ था। नन्ही उम्र में माता पिता के निधन के बाद इस महान शहीद का बचपन अनाथालय में गुजरा था।

आजादी के संघर्ष का स्मारक - 1951 में भारत सरकार ने जलियांवाला बाग को स्मारक बनाने का फैसला लिया। अमृतसर की जनता ने चंदा इकट्टा करके इस बाग को इसके मालिकों से 5 लाख 65 हजार में खरीदा। धीरे धीरे बाग का सौंदर्यीकरण किया गया। अब हजारों लोग हर रोज बाग को देखने देश और दुनिया से पहुंचते हैं।


कैसे पहुंचे – जलियांवाला बाग अमृतसर रेलवे स्टेशन से दो किलोमीटर और बस स्टैंड से महज एक किलोमीटर है। यह स्वर्णमंदिर से महज 200 मीटर की दूरी पर है। प्रवेश के लिए कोई टिकट नहीं है। स्मारक सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला रहता है।  
-vidyutp@gmail.com

( JALIYANWALA BAG, UDHAM SINGH, AMRITSAR, SUNAM ) 

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