Wednesday, June 29, 2016

मन मोह लेती है मनाली की फिजां

 मनाली देश के बेहतरीन हिल स्टेशन में शामिल है। मुझसे अगर कोई किसी एक हिल स्टेशन को पहला नंबर देने को कहे तो मैं मनाली का ही नाम लूंगा। क्यों तो इसके कई कारण हैं। मनाली में घूमने को लेकर काफी विविधताएं हैं। बलखाती व्यास नदी, घने देवदार के जंगल, हिंडिबा देवी का मंदिर, वशिष्ठ में गर्म जल का स्रोत, पास में नग्गर का किला। तो दूसरी तरफ रोहतांग दर्रा। जब इतना सब कुछ देखने लायक तो सबसे बड़ी बात यह है कि यहां पांच दिन भी रहो तो बोर नहीं हो सकते। वह जुलाई की दोपहर थी। हम हिमाचल रोडवेज की बस से मनाली पहुंचे थे। हमें एक होटल की तलाश थी। साल 2001 में आनलाइन बुकिंग का चलन नहीं था। बस स्टैंड पर कई होटल के एजेंट मंडरा रहे थे। एक होम स्टे वाले भी अपना कार्ड दिखा रहे थे। हमारे बस के सहयात्री ने एक होटल का नाम सुझाया था। हम उस होटल तक पहुंचे पर हमें वह थोड़ा महंगा लगा।


हमने आगे तलाश शुरू की। हम होटल ल्हासा पहुंचे। यहां फेमिली रुम मिल गया। बड़े रियायती दरों पर। तो हम अगले तीन दिन यहीं जमे रहे। वैसे मनाली में ठहरने के लिए एक धर्मशाला भी है। यहां आप सबसे रियायती दरों पर रह सकते हैं। यह बस स्टैंड के पास ही गली में है। इसी धर्मशाला में एक भोजनालय है जहां आप वाजिब दरों पर सुबह का नास्ता और दोपहर का खाना और रात का खाना खा सकते हैं।  वैसे मनाली के ज्यादा तर होटलों में खाने पीने की दरें प्रशासन ने तय कर रखी हैं। इसलिए खाने पीने मे ठगी नहीं दिखाई देती।
अगर आप पहाड़ों पर सर्दी के हिसाब से अपने जरूर की चीजें लेकर नहीं आए हैं तो मॉल रोड से शापिंग कर सकते हैं। हमलोग स्वेटर आदि लेकर नहीं पहुंचे थे। इसलिए शाम को माल रोड से सबसे लिए सरदी से बचाव के लिए स्वेटर खरीदना पड़ा।
मनाली ऐसा हिल स्टेशन है जहां सबसे ज्यादा रहने के विकल्प हैं। यहां करीब 400 होटल हैं। कोई भी मौसम हो रहने के लिए कमरे मिल जाते हैं। मनाली मसूरी और लैंसडाउन जैसे हिल स्टेशन से सस्ता भी है। मनाली के शहर के साथ साथ व्यास नदी बहती है। शहर के आसपास देवदार के घने जंगल हैं।

समुद्र तल से लगभग 1950 मीटर की ऊंचाई पर स्थित मनाली शहर का नाम महर्षि मनु के नाम पर पड़ा है। यह हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले का हिस्सा है। कुल्लू शहर से मनाली की दूरी 40 किलोमीटर है। मनाली की आबादी लदभग 30 हजार के आसपास है। सालों भर यहां मौसम सुहाना रहता है, इसलिए सैलानी भी हर मौसम में आते हैं। गर्मियों में मई जून में अधिकतम तापमान 33 से 35 तक चला जाता है पर रातें हमेशा ठंडी होती हैं। होटलों में पंखे की जरूरत तो कभी नहीं पड़ती। हां सर्दियों में न्यूनतम तापमान माइनस 2 डिग्री तक चला जाता है। दिसंबर जनवरी फरवरी के महीने में यहां अच्छी बर्फ पड़ती है। इस दौरान मनाली का सौंदर्य और भी निखर जाता है। 

कैसे पहुंचे – दिल्ली से मनाली के लिए सीधी बस सेवा है। वैसे आप अंबाला सेउना मार्ग पर कीरतपुर साहिब तक रेल से जाने के बाद वाया बिलासपुर मंडी, कुल्लू होते हुए मनाली पहुंच सकते हैं। अगर आप शिमला में हैं तो वहां से सीधे शिमला – मंडी- कुल्लू होते हुए बस या टैक्सी से मनाली पहुंच सकते हैं। नजदीकी एयरपोर्ट कुल्लू के पास भुंतर एयरपोर्ट हैं। यहां तक दिल्ली से नियमित विमान सेवाएं भी हैं।
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(MANALI, HIMACHAL, KULLU, VYAS RIVER, HIDIMBA DEVI )





Monday, June 27, 2016

चंबा से वापसी वाया कमेरा लेक

तीन दिनों के चंबा प्रवास के बाद वापसी की यात्रा भी काफी मनोरम रही। हमारा होटल चंबा बस स्टैंड से पांच किलोमीटर आगे परेल में था। इसलिए हमें बस पकड़ने के लिए बस स्टैंड जाने की कोई जरूरत नहीं थी। टाइम टेबल देख लिया था। दोपहर 11.30 बजे चलने वाली बस 20 मिनट बाद हमारे होटल के सामने से गुजरने वाली थी। होटल छोड़ने के समय हमारी मुलाकात होटल रायल ड्रीम्स के प्रोपराइटर हितेश कुकरेजा जी से हो गई। उनसे पहले फोन पर कई बार बात हुई थी। वे हमसे मिल कर बड़े खुश हुए। हम सारा सामान लेकर होटल के सामने खड़े हो गए। थोड़ी देर में हिमाचल रोडवेज की मनाली जाने वाली बस आई। भीड़ नहीं थी। आसानी से मनचाही जगह मिल गई। 
रावी नदी पर चंबा बनीखेत मार्ग पर बना जलाशय

रावी नदी के साथ चल रही सड़क पर हमारी बस आगे बढ़ रही थी। चंबा शहर पीछे छूटता जा रहा था। वह शहर हमें किसी सपने जैसा लग रहा था, जहां हमने तीन दिन गुजारे थे। दस किलोमीटर चलने पर चनेड़ नामक छोटा सा कस्बा आया। इसके बाद शुरू हो जाता है रावी नदी पर बने विशाल जलाशय का नजारा। सर्पीले वलय खाती सडक पर बस आगे बढ़ रही है। एक तरफ ऊंचा पहाड़ है तो दूसरी तरफ रावी नदी। नदी का जल काफी नीचे गहराई में दिखाई दे रहा था। हमने खिड़की के पास वाली जगह ली और कैमरा क्लिक करता गया। जितनी तस्वीरें ले सकता था लेता रहा। ऐसा लग रहा था मानो इन सारे खूबसूरत नजारों को  कैद कर लूं। कहीं कहीं नदी के उस पार सड़क नजर आती है। रावी नदी पर बने कमेरा जलाशय में एक स्थल है जहां पर सैलानियों के लिए जलाशय में बोटिंग की सुविधा उपलब्ध है।
रावी नदी पर जलाशय के किनारे लेक व्यू ढाबा। 

कमेरा लेक के पास आता है द्रड्डा नामक कस्बा। यह 1500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां पर एक पुलिस चौकी है। हाईवे पर कहीं कहीं हमें ढाबे भी नजर आते हैं। इसी मार्ग पर एक लेक व्यू ढाबा नजर आता है। द्रड्डा के बाद आता है परिहार। और परिहार के बाद गाडियार। थोड़ा आगे चलने पर गोली नामक कस्बा आता है। गोली  बनीखेत और चंबा के बीच छोटा सा कस्बा है गोली। यहां से प्रसिद्ध भलेई माता का मंदिर 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। गोली में अच्छा खासा बाजार और बैंकों की शाखाएं नजर आती हैं।
यहां से भलेई देवी के लिए रास्ता बदलता है....
इसके बाद आता है देवी देहरा नामक  बस स्टाप।  देवी देहरा से आगे बढ़े पर हम पहुंचते हैं बाथरी।  – बाथरी से बनीखेत की दूरी 7 किलोमीटर है। बाथरी बनीखेत के बीच सुकडाई बाई नामक एक गांव आता है। चंबा से बनीखेत के बीच की दूरी 47 किलोमीटर है। 

बनीखेत में सारी बसे 10 से 20 मिनट रुकती हैं। पर हमारी बस बनखेत से चलकर डलहौजी जाती है। डलहौजी में थोड़ी देर रुकने के बाद फिर बनीखेत आती है। इसके बाद आगे के सफर पर रवाना हो जाती है। सुबह 11.30 बजे चंबा से चलने वाली ये बस अगले दिन सुबह 5 बजे मनाली पहुंच जाती है। बनीखेत के बाद आने वाला नैनीखड्ड में तीखे मोड़ और गहरी खाई है। पंजाब के दुनेरा में पहुंचने तक पूरा रास्ता पहाड़ी है। पहाड़ों पर बस हो या कार ड्राइविंग के लिए काफी कुशलता और धैर्य चाहिए। हमने पठानकोट पहुंचने के बाद अपने ड्राईवर महोदय को मन ही मन धन्यवाद कहा।
रावी नदी पर बने जलाशय का एक और नजारा 

चंबा से मनाली जाने वाली बस। 
पठानकोट से हमारी ट्रेन धौलाधार एक्सप्रेस रात को 11.20 बजे थी। इस बीच मैं अपने पुराने मित्र शिवबरन तिवारी से मिलने पहुंचा। वे यहां दैनिक भास्कर में हैं। अनादि अपने दोस्त से मिलना चाहते थे जो ट्रांसफर होने के बाद पठानकोट आ गया है। उनकी भी मुराद पूरी हो गई। धौलाधार एक्सप्रेस अपने नियत समय पर खुली। पर हमारी बर्थ ए 2 कोच में है तो माधवी की ए 3 में। हम ट्रेन में अलग अलग हो गए। पूरे कोच में दिल्ली के एक निजी स्कूल के 12वीं कक्षा के छात्र छात्राएं हैं जो चंबा भ्रमण करके लौट रहे हैं।
ये लोग सारी रात ट्रेन में हंगामा करते रहे। सोने का तो सवाल ही नहीं उठता। सुबह का सूरत उगा तो हमारी ट्रेन लुधियाना, धूरी, संगरूर, जाखल जैसे स्टेशनों को छोड़ती हुई जय जयवंती नाम स्टेशन से आगे बढ़ रही थी। नाम मजेदार है ना। इसी नाम का एक शास्त्रीय संगीत में राग भी है। अब बस इतना ही। फिर चलेंगे किसी और यात्रा पर।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य – vidyutp@gmail.com
(CHAMBA, RAVI RIVER, BANIKHET, PATHANKOT, HIMACHAL ROADWAYS ) 
हरियाणा में है जयजयवंती रेलवे स्टेशन 



Sunday, June 26, 2016

चंबा का शॉल, रुमाल और जूतियां

चंबा रुमाल पर राधाकृष्ण । ( सौ - होटल रायल ड्रिम्स) 
चंबा अपने शॉल, रूमाल और जूतियों के लिए जाना जाता है। अगर आप चंबा से कुछ खरीद कर ले जाना चाहते हैं तो इनमें से कुछ चुन सकते हैं। सबसे पहले बात चंबा के रुमाल की। चंबा का रुमाल वास्तव में कोई जेब में रखने वाला रूमाल नहीं होता। वास्तव में यह शानदार कढ़ाई की हुई वाल पेटिंग होती है।
चंबा के रुमाल को स्थानीय कलकार कई दिनों तक मेहनत करके तैयार करते हैं। इसे तैयार करने में 10 से दिन से दो महीने तक भी लग सकते हैं।  यह रुमाल के आकार और उसकी डिजाइन पर निर्भर करता है। जाहिर है इतना श्रम साध्य कार्य है और कला का उत्कृष्ट नमूना है तो इसकी कीमत भी ज्यादा हो गई। पर सैकड़ों साल से चंबा का रूमाल बुनने का काम क्षेत्र में चला आ रहा है। वास्तव में हिमाचल के बहुत से इलाकों के रोजी रोजगार का साधन लघु और कुटीर उद्योगों पर आधारित रहा है। इसलिए चंबा के ग्रामीण क्षेत्र में कलाकार रुमाल को अदभुत तरीके से बनाते हैं। इन रूमालों पर कृष्ण की पूरी रासलीला का अंकन देखा जा सकता है। कई रूमालों में विवाह संबंधी दृश्य का अंकन देखा जा सकता है। 

किसी जमाने में इन रुमालों का लेन देन शादी के दिनों में अधिक रहा है। इसलिए इन पर विवाह के दृश्यों का अंकन किया जाता है। इसके अलावा चंबा रुमाल में समुद्र मंथन, राधाकृष्ण, दशावतार के चित्र देखे जा सकते हैं।
अठारहवीं सदी में चंबा रुमाल का काम शबाब पर था। राजा उमेद सिंह ( 1748- 1764) ने चंबा रुमाल बनाने वाले कलाकारों को संरक्षण दिया। 

 साल 1911 में हुए दिल्ली दरबार में चंबा के राजा भूरी सिंह ने ब्रिटेन के राजा को चंबा के रुमाल की कलाकृतियां तोहफे में दी थीं।  1965 में पहली बार चंबा रुमाल बनाने वाली कलाकार माहेश्वरी देवी को राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया।  हालांकि नई पीढी में लड़कियां चंबा का रुमाल बनाने की कला में कम रुचि दिखा रही हैं।

हिमाचल में कुल्लू का शॉल तो प्रसिद्ध है ही पर चंबा के शॉल भी कुल्लू के शॉल की तरह की सुंदर होते हैं। ऊनी धागे से बनने वाले ये शॉल काफी गर्म होते हैं। खादी ग्रामोद्योग भंडार की दुकानों में चंबा के शॉल 400 रुपये और उसके अधिक कीमत पर खरीदे जा सकते हैं। हमने चंबा के बाजार में कलाकारों को खड्डी पर शॉल बनाते हुए देखा।

चंबा के चप्पल और जूतियां -  चंबा शहर में घूमते हुए आप चंबा की बनी हुई जूतियां खरीद सकते हैं। ये जूतियां महिलाओं के लिए खासतौर पर बनाई जाती हैं। अपनी सुंदरता और आरामदेह बनावट के लिए मशहूर इन जूतियों की कीमत 250 रुपये से शुरू होती है।

चंबा शहर के मुख्य बाजार में जूूतियों की कुछ दुकानें हैं। आप इन दुकानों में खरीददारी करते समय थोड़ा बहुत मोल भाव भी कर सकते हैं। पर अगर चंबा आए हैं तो एक दो जोड़ी जूतियां लेकर जरूर जाएं। 

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Saturday, June 25, 2016

मां चामुंडा के चरणों में बसा है चंबा शहर

चामुंडा मंदिर के बारे में कहा जाता है कि चंबा नगर बसने से पहले भी विद्यमान था। वर्तमान मंदिर मूल मंदिर के नष्ट होने के बाद बनाया गया है। सारा चंबा शहर मां चामुंडा के चरणों में बसा हुआ है। मंदिर भित्ति चित्र और काष्ठकला का अदभुत उदाहरण है। चामुंडा मंदिर पैगोडा शैली में बना हुआ है। यह चंबा के बाकी मंदिरों से काफी अलग है।

कहा जाता है कि राजा शालिवर्मन द्वारा चंबा नगर बसाने से पहले यह मंदिर यहां मौजूद था। पर आपदा में मंदिर के ध्वस्त हो जाने पर इसका दुबारा निर्माण कराया गया। पैगोडा शैली के इस मंदिर का गर्भगृह ऊंचे चबूतरे पर बनाया गया है। इसका मंडप खुला हुआ है। निर्माण में स्लेटी पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। छतों के किनारों में चार नक्काशीदार काष्ठ निर्मित श्रंखला देखी जा सकती है। मंडप की काष्ठ निर्मित छत नौ हिस्सों में बंटी है। इस पर काष्ठ फलक और चार सुंदर प्रतिमाएं अंकित की गई हैं। बाकी आठ वर्गों में अर्धामूर्ति पूरणीय आकृतियां बनी हैं।
मंदिर का पूरा छत मूर्ति शिल्प से सज्जित है। बीम पर देवी देवताओं,गंधर्वों और ऋषिओं के चित्र अंकित किए गए हैं। कई बीम पर पशु पक्षियों के भी चित्र हैं। स्तंभ शीर्ष पर योगासन करती मानव आकृतियां बनी हैं। गर्भ गृह के प्रवेश द्वार पर विशाल पीतल की घंटियां बनी हैं। यहां पर एक अभिलेख भी उत्तकीर्ण है। इस पर लिखा गया है कि पंडित विद्याधर ने 2 अप्रैल 1762 में 27 सेर वजन और 27 रुपये मूल्य की इस घंटी को दान में दिया था।
चामुंडा मंदिर काष्ठ कला का उत्कृष्ट उदाहरण पेश करता है। भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने इस राष्ट्रीय महत्व का संरक्षित स्मारक घोषित किया है।  

बैशाख में विशाल मेला - चामुंडा मंदिर में बैशाख मास में मेला लगता है। इस समय बैरावली चंडी माता अपनी बहन चामुंडा से मिलने के लिए आती हैं। इस दौरान विशाल मेला लगता है। उस समय श्रद्धालुओं की तांता लग जाता है।
चामुंडा मंदिर के प्राचीर से चंबा शहर का अदभुत नजारा दिखाई देता है। मंदिर ऊंचाई पर स्थित है इसलिए नीचे की तरफ पूरा शहर दिखाई देता है। मंदिर के प्रांगण से रावी नदी और सड़कों का भी सुंदर नजारा दिखाई देता है। रात की रोशनी में तो यहां से शहर का सौंदर्य और भी बढ़ जाता है। मंदिर में रोज शाम को आरती होती है। आरती के बाद अगर आप यहां से चंबा शहर का नजारा करें तो अदभुत आनंद आता है।

कैसे पहुंचे – मंदिर तक पहुंचने के दो रास्ते हैं। एक सड़क मार्ग से और दूसरा सीढ़ियों से। कोई 500 सीढ़ियां चढ़कर चंबा के मुख्य बाजार से चामुंडा मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। अगर सड़क मार्ग से मंदिर पहुंचना है तो झुमार जाने वाले मार्ग पर कोई दो किलोमीटर चलने के बाद मंदिर पहुंच सकते हैं।
चामुंडा देवी मंदिर के प्राचीर से दिखाईदेता चंबा शहर और चौगान मैदान। 

Friday, June 24, 2016

झुमार का जम्मू नाग मंदिर – खजिनाग के बड़े भाई जम्मू नाग

हिमाचल और जम्मू कश्मीर में नाग मंदिरों की बड़ी श्रंखला है। पहाड़ों पर कहावत है 18 नारायण और 18 नाग। यानी बहुत सारे नारायण और बहुत सारे नाग। इसे 18 से इसलिए जोड़ते हैं क्योंकि यह एक पवित्र अंक है। हिमाचल प्रदेश में जगह जगह नाग मंदिर हैं। नाग देवता की पूजा की परंपरा अति प्राचीन है। हो सकता है यह परंपरा उस काल से चली आ रही हो जब इंसान कबीलों में रहता था। इन नागों में बासुकि नाग सबसे बड़े माने जाते हैं। बासुकि नाग का एक मंदिर कांगड़ा में मैकलोड गंज के पास है।

चंबा क्षेत्र में भी कई नाग मंदिर हैं। इन नाग मंदिरों प्रमुख है जम्मू नाग मंदिर। चंबा से 14 किलोमीटर दूर झुमार में चंबा के नाग मंदिरों की श्रंखला में जम्मू नाग का मंदिर स्थित है। जम्मू नाग खज्जिनाग के बड़े भाई बताए जाते हैं। वे चार भाइयों में दूसरे नंबर पर आते हैं। इस मंदिर के प्रति स्थानीय लोगों में अगाध आस्था है। वर्तमान जम्मू नाग मंदिर 18वीं सदी का बना हुआ बताया जाता है। मंदिर का भवन ज्यादातर लकड़ी का बना हुआ है। देवदार की लकड़ी इस्तेमाल ज्यादा दिखाई देता है। मंदिर के मुख्य मंडप में जम्मू नाग देवता की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर प्रवेश द्वार के पास दो विशाल जानवरों के सिंग भी देखे जा सकते हैं। मंदिर के बरामदे में कई घंटियां भी लगी हैं। मंदिर के बगल में एक छोटी सी झील है। यह झील अब बुरे हाल में है। आसपास में घने जंगल हैं। 

आसपास के श्रद्धालु पदयात्रा करके जम्मू नाग के दर्शन करने आते हैं। मंदिर में सुबह शाम परंपरागत तरीके से पूजा होती है। इसमें स्थानीय वाद्य यंत्रों का प्रमुखता से इस्तेमाल किया जाता है। जम्मू नाग मंदिर परिसर में बाद में भगवान शिव की एक विशाल प्रतिमा भी स्थापित की गई है। शिव के गले में हमेशा नाग देवता विराजमान रहते हैं इसलिए नाग मंदिर और शिव का अन्योन्याश्रय संबंध है।
चंबा के पास झुमार में स्थित ये जम्मू नाग मंदिर 7000 फीट यानी 2100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। मौसम सालों भर सुहाना रहता है। सर्दियों में झुमार में बर्फबारी होती है। तब ये मंदिर बर्फ से ढक जाता है।

जम्मू नाग मंदिर परिसर में बच्चों का एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय संचालित होता है। स्कूल में 55 छात्र पढ़ते है। हम जब पहुंचे तो स्कूल की कक्षाएं चल रही थीं। दो शिक्षक मौजूद थे। स्कूल के भवन पर प्रेरक वचन लिखे हुए थे। ये सरकारी स्कूल काफी व्यवस्थित लगा। मुझे प्रतीत हुए ये बच्चे भी बड़े किस्मत वाले हैं जो जम्मू नाग मंदिर परिसर में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। 
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( JAMMU NAG MANDIR, TEMPLE, JHUMHAR, CHAMBA, HIMACHAL )



Thursday, June 23, 2016

झुमार - ताल से ताल मिला....

हिमाचल में चंबा के पास झुमार पहुंच जाना यूं लगता है जैसे सपनों की दुनिया में आ गए हों। झुमार चंबा शहर से 14 किलोमीटर की दूरी पर है। रास्ता लगातार चढ़ाई वाला है। पर जब आप झुमार पहुंचते हैं तो मौसम काफी बदल चुका होता है। यह एक ग्रामीण इलाका है जहां दूर दूर तक हरियाली, सेब, चीड़ और देवदार के पेड़ दिखाई  देते हैं। झुमार का नैसर्गिक सौंदर्य फिल्मकार सुभाष घई को इतना भाया कि उन्होंने अपनी सुपर हिट फिल्म ताल की आधी शूटिंग झुमार में की। 1999 में आई इस फिल्म में चंबा का सौंदर्य निखर कर आया है। झुमार में जो सेब का बाग है उसका नाम ही ताल गार्डेन रख दिया गया है। 

हालांकि ये बाग चंबा के राजघराने का है। इस बाग में एक इसकी रखवाली करने वाले परिवार का एक छोटा सा घर है। फिल्म ताल में हमें वह घर भी दिखाई देता है। सेबों के बाग में घूमते हुए हमारी मुलाकात इस घर में रहने वाले एक बच्चे से होती है जो अब 20 साल से ज्यादा उम्र के हो गए हैं। उन्हें याद है कि उन्होंने ऐश्वर्य राय और अक्षय खन्ना को यहां शूटिंग करते हुए देखा था। झुमार में फिल्म ताल के प्रारंभिक हिस्से की शूटिंग हुई है। फिल्म का लोकप्रिय गीत दिल ये बैचन है....रस्ते पे नैन है...ताल से ताल मिला....की शूटिंग हुई है। 

यहीं पर नायक और नायिका की पहली मुलाकात होती है। उनका प्रेम परवान चढ़ता है। झुमार की फिजा में आज भी रुमानियत तैरती है, जिसे आप महसूस कर सकते हैं। मई की दोपहर में यहां चटखीली धूप खिली है, पर मौसम सुहाना है। गरमी का तो नामोनिशान नहीं है। एक बार आ गए तो यहां से जाने का दिल नहीं करता।

कैसे पहुंचे - चंबा शहर के बस स्टैंड से झुमार जाने के लिए दिन भर में चार बसें जाती हैं। एक बस सुबह 9 बजे है दूसरी 1.30 बजे तो तीसरी 3 बजे। फिर 4.00 बजे फिर 5.45 , 6.30 बजे बसें जाती है। इसी तरह वापसी के लिए भी इतनी ही बसें हैं। आपके पास दूसरा विकल्प है। अपनी टैक्सी बुक करके जाएं। हमने एक टैक्सी बुक की। टैक्सी चौगान के आसपास से मिल जाती है। टैक्सी वाले आने जाने का 600 रुपये लेते हैं। वहां आप दो तीन घंटे रूक कर घूम सकते हैं।

झुमार ग्राम पंचायत बाट में पड़ता है। जम्मू नाग मंदिर के पास ही बस स्टाप है। वैसे बात करें तो झुमार मुल्तान इलाके के एक संगीत परंपरा का नाम है। हो सकता है झुमार का नाम इसी आधार पर पड़ा हो। पर यहां आप 24 घंटे प्रकृति का संगीत सुन सकते हैं।

कहां ठहरें - अगर आप पहाड़ों पर कुछ दिन शांति के पल बीताना चाहते हैं तो झुमार में भी ठहर सकते हैं। स्वास्थ्य लाभ के लिए झुमार सुंदर जगह हो सकता है। झुमार में कुछ होटल और होम स्टे उपलब्ध हैं। एक सरकारी रेस्ट हाउस भी है। यहां आप 400 से 800 रुपये प्रति दिन की दर पर ठहर सकते हैं। कई समूह में आने वाले लोग झुमार ( JHUMHAR)  में ठहरना पसंद करते हैं।  झुमार एक गांव है इसलिए यहां सीमित दुकानें हैं और सीमित सामान उपलब्ध हैं। अगर आपकी खास जरूरत की दवाएं आदि हों तो अपने साथ ही लेकर जाएं।

ट्रैकिंग का मजा - झुमार प्रवास के दौरान आप पहाड़ों पर ट्रैकिंग कर सकते हैं। यहां की ट्रैकिंग ज्यादा चुनौतीपूर्ण नहीं है। नए लोगों के लिए ट्रैकिंग आनंददायक हो सकती है। स्थानीय लोगों की मदद से आसपास के कुछ गांवों का भ्रमण कर सकते हैं। झुमार से तीन किलोमीटर की ट्रैकिंग करके एक देवी मंदिर के दर्शन करने जा सकते हैं।




Wednesday, June 22, 2016

चंपावती के नाम पर पड़ा चंबा शहर का नाम

विख्यात कलापारखी और डच विद्वान डॉ. बोगल ने चम्बा को 'अचंभा' कहा था। उन्होंने यू हीं शहर को अचंभा नहीं कहा था। यहां के मंदिर कला संस्कृति में विविधता को देखते हुए उन्होंने अनायास ही यह उपाधि दे डाली थी। वैसे चंबा शहर का नाम चंबा के राजा के बेटी चंपावती के नाम पर पड़ा था।

राजा ने  इस शहर का नामकरण अपनी बेटी चम्पा के नाम पर क्यों किया था, इस बारे में एक बहुत ही रोचक कहानी सुनाई जाती है। राजकुमारी चम्पावती बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति की थी। राजकुमारी हर रोज  स्वाध्याय के लिए एक साधु के पास जाती थी। एक दिन राजा को किसी कारण अपनी बेटी पर संदेह हो गया। शाम को जब साधु के आश्रम में बेटी जाने लगी तो राजा भी चुपके से उसके पीछे चल पड़े। बेटी के आश्रम में प्रवेश करते ही जब राजा भी अंदर गया तो उसे वहां कोई दिखाई नहीं दिया। लेकिन तभी आश्रम से एक आवाज आई – राजा तुम्हारा संदेह निराधार है। बेटी पर शक करने की सजा के रूप में उसकी निष्कलंक बेटी छीन ली जाती है। साथ ही राजा को इस स्थान पर एक मंदिर बनाने का आदेश भी मिला।

इसके बाद राजा ने देवीय आदेश का पालन करते हुए सुंदर मंदिर का निर्माण कराया। चम्बा नगर के ऐतिहासिक चौगान मैदान के पास स्थित चंपावती मंदिर को लोग चमेसनी देवी के नाम से भी पुकारते हैं। वास्तुकला की दृष्टि से यह मंदिर अनुपम है। इस घटना के बाद राजा साहिल वर्मा ने नगर का नामकरण राजकुमारी चम्पा के नाम कर दिया। पर यह बाद में चम्बा कहलाने लगा।

चंपावती मंदिर में शक्ति की देवी महिषासुर मर्दिनी की सुंदर प्रतिमा है। मंदिर परिसर में कई खूबसूरत पत्थर की मूर्तियां दीवारों में स्थापित की गई हैं। 

विशाल मैदान है चौगान  चंपावती मंदिर के सामने विशाल मैदान है जिसे चौगान कहते हैं। यह चंबा शहर का विशाल मैदान है। मैदान के नीचे रावी नदी बहती है,जबकि मैदान के ऊपर शहर बसा है।आप यूं मान सकते हैं कि पूरा चंबा शहर चौगान के चारों तरफ बसा है। चौगान चंबा शहर का दिल है। लोग सुबह से शाम यहां टहलने और टाइम पास करने के लिए आते हैं। 
चंबा का ऐतिहासिक चौगान मैदान। 

किसी समय में चौगान एक विशाल मैदान था। पर बाद में इसे पांच हिस्सों में बांट दिया गया है। मुख्य मैदान के अलावा अब चार छोटे छोटे मैदान हैं। चौगान मैदान में ही हर साल जुलाई में चंबा का प्रसिद्ध मिंजर मेला लगता है। यह चंबा  की लोककलाओं को पेश करने वाला मेला है। मिंजर मेले के समय चंबा मेंदूर दूर से सैलानी पहुंचते हैं।

हरिराय मंदिर चंबा मैदान के एक कोने में हरिराय मंदिर स्थित है। यह भगवान विष्णु का सुंदर मंदिर है। यह मंदिर भी पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है। मंदिर के बगल में चौगान मैदान का लाल रंग का सुदंर प्रवेश द्वार है। चौगान मैदान में एक विशाल मिलेनियम गेट का भी निर्माण कराया गया है। चौगान का एक किनारा लंबाई में रावी नदी के साथ मिलता है। यहां दो झरोखे बनाए गए हैं, जहां बैठकर आप रावी नदी की कल-कल बहती जलधारा का मुआयना कर सकते  हैं। यहीं पर एक रावी कैफे भी है।  चौगान के एक तरफ हिमाचल टूरिज्म का इरावती होटल स्थित है, जो चंबा शहर का प्रमुख होटल है।

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(CHAMBA, CHAMPAWATI TEMPLE, CHAUGAN, IRAVATI HOTEL) 

Tuesday, June 21, 2016

चंबा का लक्ष्मीनारायण मंदिर समूह

हिमाचल प्रदेश का छोटा सा शहर चंबा मंदिरों का नगर है। वैसे चंबा के आसपास कुल 75 प्राचीन मंदिर हैं। छोटे से शहर में ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व के कई मंदिर हैं। इन मंदिरों में प्रमुख है लक्ष्मीनारायण मंदिर समूह। यह चंबा शहर का सबसे विशाल मंदिर समूह है। मंदिर मुख्य बाजार में अखंड चांदी पैलेस के बगल में स्थित है। मंदिर परिसर में श्रीलक्ष्मी दामोदर मंदिर, महामृत्युंजय मंदिर, श्री लक्ष्मीनाथ मंदिर, श्री दुर्गा मंदिर, गौरी शंकर महादेव मंदिर, श्री चंद्रगुप्त महादेव मंदिर और राधा कृष्ण मंदिर स्थित है।

लक्ष्मीनारायण मंदिर समूह एक वैष्णव मत का मंदिर है। इसे दसवीं सदी में राजा साहिल वर्मन ने बनवाया था। मंदिर को स्थानीय मौसम को देखते हुए लकड़ी के इस्तेमाल से तोरण द्वार और शिखर बनवाए गए थे। विष्णु का वाहन गरुड़ की धातु की बनी प्रतिमा मुख्य द्वार पर सुशोभित हो रही है। 1678 में राजा चतर सिंह ने मुख्य मंदिर में सोने के आवरण चढ़वाया। मंदिर परिसर काफी भव्य और मनोरम है।

भगवान विष्णु पर केंद्रित यह मंदिर पांरपरिक वास्तुकारी और मूर्तिकला का उत्कृष्‍ट उदाहरण है। चंबा के 6 प्रमुख मंदिरों में यह मंदिर सबसे विशाल और प्राचीन है। कहा जाता है कि सवसे पहले यह मन्दिर चम्बा के चौगान में स्थित था परन्तु बाद में इसे वर्तमान स्थल पर स्थापित किया गया।

शिखर शैली में बने इस मंदिर परिसर में राधा कृष्ण, शिव व गौरी आदि देवी-देवताओं के मंदिरों को भी शामिल हैं।  इस मन्दिर समूह में महाकाली, हनुमान, नंदीगण के मंदिरों के अलावा विष्णु एवं शिव के तीन-तीन मंदिर हैं। मंदिर में स्थित लक्ष्मी नारायण की बैकुंठ मूर्ति कश्मीरी और गुप्तकालीन निर्माण कला का अनूठा संगम हैइस मूर्ति के चार मुख और चार हाथ हैं। मूर्ति की पृष्ठभूमि में तोरण है, जिस पर दस अवतारों की लीला चित्रित की गई है।

चंबा के लक्ष्मीनारायण मंदिर का इंतजाम ट्रस्ट देखता है। इसके लिए लक्ष्मीनारायण मंदिर ट्रस्ट का निर्माण किया गया है। मंदिर परिसर में एक संग्राहालय, प्रवचन कक्ष भी है। श्रद्धालुओं के शौचालय और पेयजल का भी सुंदर इंतजाम है। संग्रहालय में आप चंबा शहर के इतिहास और चंबा राजघराने से जुड़ी रोचक जानकारियां प्राप्त कर सकते हैं। 

मंदिर के प्रवचन कक्ष में अक्सर साधु संतों का प्रवचन चलता रहता है। देश में लक्ष्मीनारायण के और भी कई मंदिर हैं पर इन सबके बीच चंबा का यह मंदिर अपना अनूठा स्थान रखता है।

कैसे पहुंचे – चंबा बस स्टैंड से मंदिर की दूरी एक किलोमीटर के करीब है। यहां पैदल चलकर पहुंचा जा सकता है। निकटम रेलवे स्टेशन पठानकोट है, जहां से 120 किलोमीटर की बस यात्रा करके चंबा पहुंच सकते हैं।


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( CHAMBA, HIMACHAL, LAXMI NRAYAN TEMPLE, VISHNU ) 





Monday, June 20, 2016

चंबा की विरासत से रूबरु कराता भूरी सिंह संग्रहालय

किसी भी शहर के इतिहास को जानने के लिए वहां के संग्रहालयको जरूर देखना चाहिए। चंबा का भूरी सिंह संग्रहालय आपको शहर और आसपास के समृद्ध ऐतिहासिक विरासत से परिचित कराता है। यह एक छोटा सा संग्रहालय है पर इसे काफी बेहतर ढंग से प्रबंध करके रखा गया है।  प्रवेश टिकट 20 रुपये का है। बच्चों के लिए प्रवेश टिकट 10 रुपये का है। संग्रहालय चौगान के पांच उद्यान पार करने के बाद आता है। यह चंबा शहर के सिविल हास्पीटल के सामने स्थित है। संग्रहालय के प्रांगण में एक बुद्ध की मूर्ति लगी है। भूरी सिंह संग्रहालय का अब नया भवन बना है। पहले यह संग्रहालय पुराने भवन में हुआ करता था। मुख्य भवन  में संग्रहालय  में कुल चार गैलरियां हैं। दो गैलियां आधार तल पर हैं तो दो पहली मंजिल पर।
चंबा की पनघट शिलाएं - भूरी सिंह संग्रहालय का सबसे बड़ा आकर्षण है, चंबा क्षेत्र की पनघट शिलाएं। आखिर ये पनघट शिलाएं क्या हैं। वास्तव में पहाड़ों पर जो जल के स्रोत हुआ करते थे, उसके आसपास के पत्थरों में कलाकार नक्काशी करके कई तरह के चित्र अंकित करते थे। ये शिलाएं पनघट शिलाएं कहलाती थीं। पानी के स्रोत के आसपास सुंदर चित्रकारी। पूरे संग्रहालय में 20 से ज्यादा ऐसी पनघट शिलाओं का संग्रह है। इसमें कई शिलाएं चुराह और तीसा क्षेत्र से ली गई हैं। ज्यादातर शिलाएं सोलहवीं सदी की बनी हुई हैं।
संग्रहालय के प्रथम तल पर मिनिएचर पेंटिंग की सुंदर गैलरी है। इसमें गुलेर शैली की पेंटिंग बनाई गई हैं। यहां चंबा शहर की पुरानी श्वेत श्याम तस्वीरें भी देखी जा सकती हैं। यहां कांगड़ाके राजा संसार चंद कटोच और चंबा के राजा राज सिंह के बीच हुई संधि का तांबे से बना संधि पत्र देखा जा सकता है।
भूरी सिंह संग्रहालय के अलावा एक छोटा सा संग्रहालय लक्ष्मीनारायण मंदिर के परिसर में भी है। इसे स्थानीय लोग ट्रस्ट बनाकर संचालित कर रहे हैं। वहां हमारी मुलाकात नरेंद्र बड़ोत्रा से होती है ( फोन – 8894305733 )। वे हमें चंबा के इतिहास के बारे में काफी रोचक जानकारियां देते हैं।
चंबा वह शहर है जहां भारत में कोलकाता के बाद बिजली पहुंची। यानी कोलकाता के बाद बल्ब यहां जमगाया। यह संभव हुआ चंबा के राजा भूरी सिंह के प्रयास से। उनका बनवाया भूरी सिंह पावर हाउस आज भी संचालन में है। भूरी सिंह संग्रहालय की स्थापना 14 सितंबर 1908 को राजा भूरी सिंह ने करवाई थी। भूरी सिंह ने 1904 से 1919 तक चंबा पर शासन किया। भूरी सिंह ने अपने राजकीय संग्रह से कई ऐतिहासिक महत्व की सामग्रियां संग्रहालय को दान में दीं।

 चंबा है अचंभा - 996 मीटर की ऊंचाई पर बसा चंबा आबादी में छोटा सा शहर है पर इसका इतिहास काफी समृद्ध है। कई विदेशी सैलानियों ने तो इसे अचंभा शहर कहा है। शहर की आबादी 40 हजार के आसपास है। पर शहर का इतिहास एक हजार साल से ज्यादा पुराना है। 500 ईश्वी के आसपास यहां मारू वंश का शासन था। इलाके की प्राचीन राजधानी यहां से 75 किलोमीटर आगे भारमौर थी। 920 ई. में राजा साहिल वर्मन ने राजधानी चंबा में स्थानांतरित की। ऐसा उसने अपनी बेटी चंपावती के आग्रह पर किया। 1846 में चंबा ब्रिटिश शासन में आया। यह एक प्रिंसले स्टेट था जो अप्रैल 1948 में चंबा स्वतंत्र भारत का अंग बना।

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(CHAMBA, HIMACHAL, BHURI SINGH MUSEUM )










Sunday, June 19, 2016

जायका का स्वाद जो कभी नहीं भूलता...

दोपहर में हमलोग होटल रायल ड्रीम में चेक-इन कर चुके थे। अब चंबा शहर को देखने निकलना था। चंबा में चौगान पर हमारा इंतजार ममता शर्मा कर रही थीं। वही ममता जो हमें श्रीनगर में मिली थीं। दिल्ली के प्रगति मैदान में भी दो बार मिलीं। वे अपने गांव जा रही हैं। उनका घर चंबा से 60 किलोमीटर आगे तीसा क्षेत्र में है। हमारे होटल से बस स्टैंड 5 किलोमीटर है। वहां तक जाने के लिए समय समय पर आने वाली बस ही विकल्प है। पर हमें भूख लग रही है। 

जायका रेस्टोरेंट का लजीज खाना
हमारे होटल वाले ने जायका रेस्टोरेंट में खाने की सलाह दी। तकरीबन 800 मीटर पैदल चलने के बाद बालू ब्रिज के पास होटल जायका रेस्टोरेंट आया। होटल का डायनिंग हाल विशाल है। हमने खाने का आर्डर दिया। 70 रुपये की समान्य थाली और 120 की स्पेशल थाली। समान्य थाली में दो लच्छा पराठा, चावल, दो सब्जियां, कडी पकौड़ा, दाल ।  जायका का बतरन बड़े ही सुंदर हैं। सभी सब्जियां परोसी जाने वाली कटोरियों की बनावट हमें काफी पसंद आईं। खाने का स्वाद भी अच्छा था। अगर दो लच्छा पराठा नहीं लें तो तीन बटर रोटी ले सकते हैं। जो 120 रुपये वाली स्पेशल थाली है उसमें एक पनीर वाली सब्जी, एक मिस्सी रोटी और एक स्वीट डिश (आईसक्रीम) अतिरिक्त है। हमने एक समान्य और एक स्पेशल थाली मंगाई और छक कर खाया। 

अपने चंबा प्रवास में जब-जब मौका मिला हमलोग खाने के लिए जायका में ही पहुंचे. हालांकि जायका सुबह के नास्ते में पराठे भी पेश करता है, पर हमें इसका मौका नहीं मिल सका। हमारी रेस्टोरेंटके प्रोपराइट से मुलाकात तो नहीं हो सकी, पर चंबा में इतने बेहतरीन रेस्टोरेंट के लिए धन्यवाद। ( JAYKA RESTURANT, Balu Bridge, Sultanpur, Chamba )
भरपेट खाने के बाद हमने बस स्टैंड तक जाने के लिए बस ली। बस सुल्तानपुर के बाद रावी नदी पर शीतला ब्रिज पार करके बस स्टैंड पहुंची। बस स्टैंड से दो सौ मीटर आगे जाने पर चंबा का विशाल चौगान मैदान आ जाता है। चौगान में खिली खिली धूप में ममता शर्मा हमारा इंतजार कर रही थीं। थोड़ी देर पुरानी यादें ताजा करने और सुख दुख साझा करने के बाद हमलोग आगे बढ़े। 
चंबा के बाजारों से होते हुए भूरी सिंह संग्रहालय की और बढ़े।संग्रहालय के बाद चर्च देखते हुए हम लक्ष्मीनाराय मंदिर पहुंच गए। ममता का गांव यहां से 60 किलोमीटर दूर है। उनके गांव जाने वाली आखिरी बस शाम को 4 बजे है। वे चली गईं गांव अपने। हम शाम तक चंबा के बाकी मंदिर और बाजार घूमते रहे। परेल स्थित होटल पहुंचने के लिए हमें रात 8 बजे बस मिली।

चंबा शहर में आटो रिक्शा या छोटे वाहन नहीं चलते। चूंकि हमारा होटल पठानकोट मुख्य मार्ग पर है इसलिए बनीखेत पठानकोट जाने वाली सारी बसें वहां से होकर गुजरती हैं। रात का खाना अपने होटल से सामने वाले ढाबे में खाने के बाद मीठी नींद में चले गए। कल फिर किसी नई जगह पर।
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(CHAMBA, HIMACHAL, ZAIKA PISHORI DHABA, BALU BRIDGE) 
  


Saturday, June 18, 2016

रावी के तट पर चंबा शहर .... ऐ रावी विच हंसा दा जोड़ा...

चंबा शहर रावी नदी के तट पर बसा है। शहर की तलहटी में रावी नदी बहती है। नदी के दूसरी तरफ ऊपर नीचे पूरा चंबा शहर बसा है। रावी का पौराणिक नाम इरावती है। रावी उसका संक्षिप्त नाम है जो लोकप्रिय हो गया है। रावी नदी हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा क्षेत्र में हिमालय पर्वत माला से निकलती है। यह पंजाब की पांच नदियों में से एक है। वे पांच नदियां हैं सतलुज, व्यास, झेलम, चिनाब और रावी। चंबा शहर तक आते आते रावी विशाल रूप ले लेती है। पानी का बहाव काफी तेज है। नदी में जगह जगह विशाल शिलाएं हैं। इनके बीच रावी का जल यूं अटखेलियां करता आगे बढ़ता है मानो हिमालय से निकलता मधुर संगीत हो। रावी नदी के तट पर 24 घंटे इस संगीत को महसूस किया जा सकता है।
चामुंडा हिल्स से रावी नदी ऐसी दिखाई देती है....

 रावी नदी पर चंबा के पास एनएचपीसी ने बांध बनाया है। इस बांध से पानी छोड़े जाने पर कभी भी नदी में पानी बढ़ सकता है। इसलिए नदी के किनारे हर थोड़ी दूर पर बोर्ड लगाकर लिखा गया है कि नदी के करीब न जाएं पानी कभी बढ़ सकता है। चंबा शहर में रावी नदी पर दो प्रमुख पुल हैं। पहला पुल है शीतला ब्रिज। पुराना शीतला ब्रिज सस्पेंस ब्रिज था, अब उसी की जगह नया पुल बन गया है। यह पुल सुलतानपुर और चंबा शहर के बीच है। सुल्तानपुर और परेल के बीच रावी पर दूसरा पुल है जिसका नाम बालू ब्रिज है। यहां से भारमौर के लिए रास्ता आगे चला जाता है।
चंबा में रावी नदी पर बालू ब्रिज 

रावी नदी हिमाचल से आगे बढ़कर पाकिस्तान में चली जाती है। पाकिस्तान का ऐतिहासिक शहर लाहौर भी रावी नदी के तट पर बसा हुआ है। पाकिस्तान में रावी चिनाब नदी में जाकर मिल जाती है। आगे चिनाब सिंधू नदी में मिल जाती है। सिंधू आगे अरब सागर में मिलती है। रावी नदी की कुल लंबाई 720 किलोमीटर है। लंबाई के लिहाज से यह पंजाब की पांच नदियों में सबसे छोटी है। चंबा से पहले इसमें बुधील और धोना नदियां आकर मिलती है। बुधील नदी मणिमहेश झील से निकलती है। रावी नदी में पानी का मूल स्रोत बारिश और ग्लेसिर का पिघला हुआ जल है इसलिए रावी का जल काफा निर्मल दिखाई देता है। पठानकोट के पास माधोपुर में पहुंचने के बाद रावी नदी अगले 80 किलोमीटर तक भारत पाकिस्तान की सीमा बनाती हुई बहती है। इसके बाद यह पाकिस्तान में प्रवेश कर जाती है। लाहौर शहर रावी के पूर्वी किनारे पर बसा है। अहमद सियाल शहर के पास रावी चिनाब में मिलती है। यहीं पर मुगल बादशाह जहांगीर का मकबरा भी है। पर लाहौर तक पहुंचकर रावी का जल काफी प्रदूषित हो जाताहै। इसके लिए औद्योगिक कचरा जिम्मेवार है।
चंबा के पास कामेरा में रावी नदी पर दो हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट बनाए गए हैं। 198 मेगावाट का बैरा सुईल प्रोजेक्ट, 540 मेगावाट का कामेरा -1, 600 मेगावाट का रंजीत सागर प्रोजेक्ट और 300 मेगावाट का कामेरा 2 हाईड्रो प्रोजेक्ट रावी नदी पर बनाए गए हैं।      
रावी नदी की सुंदरता पर पंजाबी के मशहूर गायक पूरन शाह कोटी ने बड़ी सुंदर पंक्तियां गाई हैं। मेरे मित्र सुधीर राघव ने ये पंक्तियां साझा की हैं
सानूं वंज्जली सुणा वे ढोला लंबी दैया...
बगदी ऐ रावी विच हंसा दा जोड़ा।
  (पूरन शाहकोटी )
चंबा शहर में चौगान मैदान के बगल में हिमाचल टूरिज्म का रावी व्यू कैफे बना है। यहां बेंच पर बैठकर घंटों रावी की जलधारा को निहारते रहने का सुख अदभुत है।
-vidyutp@gmail.com  ( CHAMBA, RAVI RIVER, HIMACHAL PRADESH, DAM, HYDRO PROJECT ) 
चंबा शहर में रावी नदी पर शीतला ब्रिज, इसके पीछे पुराना पुल था जो अब प्रयोग में नहीं है। 



Friday, June 17, 2016

साडे चिड़ियों दा चंबा वे...बाबुल अस उड़ जाना...

खजियार से ंचंबा...
हमारी बस धीरे धीरे चंबा की ओर बढ़ रही थी। खजियार 1900 मीटर के करीब ऊंचाई पर है और चंबा 900 मीटर पर नीचे. इसलिए खजियार से चली बस धीरे धीरे उतर रही थी। 

खजियार से तकरीबन सात किलोमीटर चलने पर गेट आया। गेट एक जगह का नाम है. गेट में छोटा सा बाजार है। इसके बाद बनाडू फिर मंगला। चंबा से 4 किलोमीटर पहले सुल्तानपुर आता है। यह चंबा का बाहरी इलाका है। यहीं पर पठानकोट बनीखेत की ओर से आ रहा हाईवे और खजियार से आ रहे सड़क मिल जाते हैं। हम इसी तिराहे पर उतर गए। 
सुल्तानपुर चंबा, जहां बनीखेत खजियार का रास्ता मिलता है...

हमारा होटल यहां से एक किलोमीटर पीछे बनीखेत वाली सड़क पर परेल में है। सुल्तानपुर में भी हमें एक आवासीय होटल राजबीर दिखाई देता है। यहां कुछ ढाबे और मिठाई की दुकानें भी हैं। हम पैदल परेल की तरफ बढ़े। तभी एक बस मिल गई। उसने हमें परेल में हमारे होटल के बिल्कुल सामने उतार दिया। किराया 3 रुपये प्रति व्यक्ति। हिमाचल रोडवेज में न्यूनतम किराया 3 रुपये है अभी भी। हमारे होटल का नाम रायल ड्रिम्स है। यह मेकमाई ट्रिप डॉट काम से बुक किया था। मेन हाईवे पर स्थित होटल रावी नदी के किनारे है। कमरे काफी बड़े बड़े हैं। हमारा कमरा नंबर 112 तीसरी मंजिल पर है। इसमें एक बालकोनी भी है।

होटल के सामने सड़क औ रावी नदी तो पीछे पहाड़ का नजारा दिखाई देता है। होटल के रिसेप्शन और लाबी में चंबा के रुमाल फ्रेम करके लगाए गए हैं। होटल में रेस्टोरेंट है पर चलता नहीं है। होटल के मैनेजर बताते हैं कि मणिमहेश यात्रा के  समय होटल में खूब भीड़ होती है। हमारा तीन दिनों का प्रवास इस होटल में आनंददायक रहा। होटल के पास रावी नदी के किनारे एक सुंदर मंदिर कांप्लेक्स है। सामने एक ढाबा है। यहां एक परिवार खाना बनाता है। हमने एक रात यहां खाना खाया। एक सुबह नास्ते  पराठे आलू की सब्जी के साथ और दही खाई। मजा आ गया खासकर अनादि को करारे पराठे खाकर। आखिरी दिन हमारी मुलाकात होटल रायल ड्रिम्स के प्रोपराइटर हितेंद्र कुकरेजा से हुई। होटल बुक करने के दौरान मेरी कई बार बात हुई थी। उन्होंने मणिमहेश यात्रा के दौरान आने को कहा। अगर भोले बाबा की इच्छा हुई तो शायद आना हो जाए।
चंबा आने की मेरी बहुत पुरानी इच्छा पूरी हुई है। पांच साल जालंधर में रहने के दौरान नहीं पहुंच सका था। तब डलहौजी आकर वापस लौट गया था। इससे पहले चंबा गीतों में सुना था। दोस्तों से सुना था। पंजाबी का अति लोकप्रिय लोकगीत है ... साडे चिड़ियों दा चंबा वे... जिसमें चंबा का जिक्र आता है। खास तौर पर शादियों में बेटी की विदाई के वक्त ये गीत जरूर बजता है। इसमें बेटी की तुलना चंबा की चिड़िया से की गई है।

साडे चिडिये दा चंबा वे बाबुल अस उड जाना
साडी लंबी उडारी वे बाबुल केडे देस जाना

तेरे महलां दे विच विच वे बाबा कहदेने कौन खेडे
मेरियां खेडे पोतराइयां धी घर जा अपने

साडे चिडिये दा चंबा वे बाबुल अस उड जाना
तेरी लमियां पासराइयां विच वे बाबुल चरखा कौन काते

मेरियां कतन पोतराइयां धी घर जा आपने
साडा चिडिया दा चंबा वे बाबुल अस उड़ जाना

तेरायं पेदियां गलिया चे वे बाबुल डोला नहीं लंघदा
इक अत कुत्ता दे हां धी घर जा अपने

साडे चिडिये दा चंबा वे बाबुल अस उड जाना
साडी लंबी उडारी वे बाबुल केडे देस जाना...

गीत में पिता पुत्री का भावुक संवाद है. बेटी पूछती है  कि मेरे जाने के बाद चरखा कौन कातेगा. पर पिता उसे बाबुल के घर जाने को राजी करता है। इस गीत को पंजाब की कोयल नाम से मशहूर सुरिंदर कौर व प्रकाश कौर ने गाया है। पाकिस्तानी गायिका रेशमा ने भी गाया है। कुछ फिल्मों में भी इसका मुखड़ा सुना जा सकता है। फिल्म कभी कभी का ये गीत सुनिएगा- सुर्ख जोड़े की ये... 
( चंबा की बातें आगे भी पढिए...रावी नदी का किनारा, चौगान, लक्ष्मीनारायण मंदिर, ताल फिल्म की सपनीली दुनिया झुमार, चामुंडा देवी मंदिर और भी बहुत कुछ )
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