Tuesday, May 31, 2016

हरिद्वार में लें पंडित जी पूरी वाले का स्वाद

शाकाहारी खाने में हरिद्वार का जवाब नहीं। मुझे लगता है पूरे देश में सबसे सस्ता रेस्टोरेंट में खाना हरिद्वार में मिल जाता है। आज भी (2016) में हरिद्वार में 30 से 40 रुपये की थाली मिलती है। 40 रुपये की थाली में 6 रोटियां, तीन सब्जी आदि मिल सकती है। हरिद्वार पवित्र शहर घोषित है इसलिए शहर की धार्मिक सीमा के अंदर मांस मछली, अंडा मदिरा का सेवन प्रतिबंधित है। इसलिए हरिद्वार में शाकाहारी खाने की बहार है। 

खास तौर पर हर की पौड़ी के पास अपर रोड पर कई रेस्टोरेंट हैं जहां आप अपनी पसंद का स्वाद ले सकते हैं। इनमें भी होशियारपुरी का ढाबा पंजाबी खाने के लिए प्रसिद्ध है। अगर आप हर की पौड़ी के पास हैं तो इसके बगल वाली गली में प्रवेश करें। मथुरा की पूड़ी सब्जी वाली दुकाने नजर आएंगी। हर पत्ते के दोने में पूड़ी और सब्जी खाइए। दावा है कि पूडी देशी घी में बनती है। स्वाद तो अच्छा लगता है। यहां आप कचौड़ी, समोसे आदि का भी स्वाद ले सकते हैं। कई किस्म की मिठाइयां भी हैं।

पर पूरी का बेहतरीन स्वाद लेना है तो पहुंचिए पंडित जी पूरी वाले के पास। इनकी दुकान गली में थोड़ा आगे जाने पर कुशावर्त घाट के पास है। बैठने के लिए काफी जगह है। 50 रुपये की पूरी की प्लेट में 4 पूरी के साथ तीन किस्म की सब्जियां परोसी जाती हैं। आपका खाकर दिल खुश हो जाएगा। अगर और स्वाद बढ़ना चाहते हैं तो पूरी के साथ रायता का ग्लास मंगा लें। 15 रुपये बढ़ जाएंगे पर आनंद दुगुना हो जाएगा। पंडित जी पूरी वाले के पास कई तरह के पूरी की प्लेट हैं। इनके नाम भी रोचक रखे गए हैं। दरबारी, युवराज, महाराज, आमरस और केलाराम। इनमें से कौन सा प्लेट लेना पसंद करेंगे आप। महाराज वाली प्लेट में लस्सी के साथ प्रसिद्ध चंद्रकला मिठाई का भी स्वाद मिलेगा।

पूड़ी के अलावा यहां आप खाने का भी आनंद ले सकते हैं। 60 रुपये की थाली में 6 रोटी के साथ तीन सब्जियां मिलेंगी। यहां छोला भठूरा और छोले चावल आदि का भी आप आर्डर दे सकते हैं। वहीं स्पेशल थाली 120 रुपये की है। इसमें दाल, पनीर, मिक्स वेज, मट्ठा, मिठाई, पापड़, रोटी, चावल सबका स्वाद मिलेगा।
 -vidyutp@gmail.com

(HARIDWAR, PANDIT JEE PURI WALE) 
हरिद्वार का प्रसिद्ध होशियारपुरी ढाबा, 1937 से चल रहा है। 






मां गंगा में आस्था की डूबकी...हरिद्वार हर की पौड़ी

HARIDWAR - NEW BRIDGE AT LALTARAO GHAT.
हरिद्वार वह जगह है जहां पावन गंगा पहाड़ों से आगे बढ़कर हिमालय का साथ छोड़ते हुए मैदानों को तृप्त करतीहुई आगे बढ़ती है। सालों भर हर रोज हजारों लोग हरिद्वार में इसी पतित को पावन करने वाली गंगा में डूबकी  लगाने हरिद्वार पहुंचते है। साल का कोई भी दिन हो आपको हरिद्वार में हर रोज लघु भारत का दर्शन होता है। यहां गंगा के घाट पर देश के हर राज्य के लोग मिल सकते हैं।

सुबह सूर्य की किरणें हर की पौड़ी पर पड़ती हैं तो गंगा का जो सौंदर्य दिखाई देता है वह हमेशा के लिए मन में रच बस जाता है। हर की पौड़ी की शाम भी उतनी ही सुहानी होती है। शाम ढलने के साथ गंगा की आरती का नजारा भव्य होता है। पौड़ी मतलब सीढियां। हर मतलब शिव। यानी शिव तक पहुंचने का रास्ता। और यह रास्ता भला गंगा जी से बेहतर क्या हो सकता है।   



गंगा की मूल धारा नहीं है हर की पौड़ी - हम जिस हर की पौड़ी पर गंगा में स्नान करते हैं वह वास्तव में गंगा जी मूल धारा नहीं है। गंगा पर भीमगोडा बैराज से गंग नहर निकाली गई है। भीमगोड़ा से गंगा की मूल धारा आगे बढ़ जाती है, जो गंगा से नहर निकाली गई है वह जल धारा हर की पौड़ी होते हुए आगे बढ़ती है। यह जलधारा आगे नहर का रूप ले ले लेती है। इसीहर की पौड़ी पर हर 12साल पर कुंभ और छठे साल पर अर्ध कुंभ लगता है।
कहा जाता है कि हर की पौड़ी इलाके का पहली बार निर्माण राजा विक्रमादित्य ने पहली शताब्दी में कराया था। पर ऐतिहासिक संदर्भों के साथ देखें तो हर की पौड़ी का निर्माण 1840 में ब्रिटिश काल में हुआ। ब्रिटिश सरकार ने 1840 में भीमगोडा बैराज का निर्माण कराया। यहां से अपर गंगा कैनाल निकाला गया जिससे बड़े क्षेत्र की सिंचाई होने लगी। वर्तमान में जो हर की पौड़ी है उन घाटों का निर्माण 1800 में कराया गया। बाद में समय समय पर इसका विस्तार किया गया। आर पार जाने के लिए कई पुल बनाए गए हैं। इनमें एक सिग्नेचर ब्रिज साल 2015 में तैयार हुआ है।  
कहा जाता है कि सिखों के पहले गुरु गुरुनानक देव जी (1469-1539) हरिद्वार आए थे तब उन्होंने कुशावर्त घाट पर स्नान किया था। इस स्थल पर उनकी याद में एक गुरुद्वारा बना है।

उद्योग और शिक्षा का केंद्र - 1886 में हरिद्वार पहली बार लश्कर होकर रेल नेटवर्क से जुड़ा। हरिद्वार में गुरुकुल कांगड़ी फार्मेसी विश्वविद्यालय पुराना शिक्षा का केंद्र है। यहां ऋषिकुल आर्युवेदिक महाविद्यालय भी स्थित है। अब हरिद्वार बड़ा औद्योगिक शहर भी बन चुका है। बीएचईएल के बाद सिडकुल में सैकड़ों उद्योग धंधे हैं।

पवित्र शहर – हरिद्वार पवित्र शहर घोषित है। यहां धार्मिक सीमा के अंदर मांस और मदिरा की दुकाने नहीं है। इनका सेवन भी प्रतिबंधित है।
  

Sunday, May 29, 2016

परमपावन धाम श्री सिद्धबली हनुमान मंदिर – कोटद्वार

कोटद्वार शहर के बाहर पहाड़ की तलहटी में खोह नदी के किनारे स्थित है सिद्धबली हनुमान मंदिर। यह स्थान तीन तरफ से वनों से ढका हुआ बड़ा रमणीक है। सड़क से मंदिर तक पहुंचने के लिए खोह नदी पर पुल बना हुआ है। गढ़वाल के प्रवेश द्वार कोटद्वार कस्बे से कोटद्वार-पौड़ी राजमार्ग पर लगभग तीन किलोमीटर आगे लगभग 40 मीटर ऊंचे टीले पर स्थित है गढ़वाल प्रसिद्ध देवस्थल सिद्धबली मन्दिर। यह हनुमान जी का एक पौराणिक मन्दिर है। इस मंदिर में आने वाले साधकों को अप्रतिम शांति की अनुभूति होती है।
इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहां साधना करने के बाद एक  बाबा को हनुमान की सिद्धि प्राप्त हुई थी। तब सिद्ध बाबा ने यहां बजरंगबली की एक विशाल पाषाण प्रतिमा का निर्माण किया। जिससे इसका नाम सिद्धबली हो गया । कहा जाता है कि ब्रिटिश शासनकाल में एक मुसलिम सुपरिटेंडैण्ट घोड़े से कहीं जा रहे थे, जैसे ही वह सिद्धबली के पास पहुंचे बेहोश हो गए। उनको स्वप्न आया कि सिद्धबली कि समाधि पर मन्दिर बनाया जाए। जब उन्हें होश आया तो उन्होने यह बात आस-पास के लोगों को बताई और वहां तभी से यह विशाल मन्दिर अस्तित्व में आया। पहले यह एक छोटा सा मन्दिर था। पर पौराणिकता और शक्ति की महत्ता के कारण श्रद्धालुओं ने इसे भव्यता प्रदान कर दी है।

यह मन्दिर न केवल हिन्दू-सिक्ख धर्मावलंबियों का है अपितु मुसलिम लोग भी यहां मनौतियां मांगने आते हैं। मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु लोग दक्षिणा तो देते हैं ही यहां भंडारा भी आयोजित करते हैं। यहां हर मंगलवार और शनिवार को भंडारा होता है। पर भंडारा कराने के लिए अगले आठ नौ सालों के लिए भक्त बुकिंग करा चुके होते हैं। इस स्थान पर कई अन्य ऋषि मुनियों का आगमन भी हुआ है। इन संतो में सीताराम बाबा, ब्रह्मलीन बाल ब्रह्मचारी नारायण बाबा एवं फलाहारी बाबा प्रमुख हैं।
यह मन्दिर का अदभुत चमत्कार ही है कि खोह नदी में कई बार बाढ़ आया किन्तु मन्दिर ध्वस्त होने से बचा हुआ है। यद्यपि नीचे की जमीन खिसक गई है किन्तु मन्दिर का बाल बांका नहीं हुआ।

मंदिर के बाहर निःशुल्क जूताघर बना है। मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं के लिए शीतल जल का इंतजाम है। मंदिर के ऊपर से आसपास का सुंदर नजारा दिखाई देता है। इस मंदिर को दान देने वाले में देश के बड़े-बड़े उद्योगपति शामिल हैं। मंदिर का प्रसाद गुड़ की भेली दिखाई देती है। कदाचित बिजनौर नजीबाबाद में गन्ने की खेती अधिक होने के कारण इधर लोग गुड़ प्रसाद में चढ़ाते हैं। 
कैसे पहुंचे - श्री सिद्धबली बाबा मंदिर दिल्ली से लगभग 230 किलोमीटर दूर एवं हरिद्वार से 70 किलोमीटर दूर और नजीबाबाद जंक्शन से 30 किलोमीटर की दूरी पर उत्तराखंड प्रदेश के कोटद्वार शहर में स्थित है। कोटद्वार रेलवे स्टेशन से शेयरिंग आटो रिक्शा से 7 से 10 रुपये में पहुंचा जा सकता है।
SIDHBALI HANUMAN MANDIR AT KOTDWAR LANSDOWNE ROAD ( UTTRAKHAND) - Photo- Vidyut


Saturday, May 28, 2016

कोटद्वार शहर- उत्तराखंड गढ़वाल का प्रवेश द्वार

कोटद्वार उत्तराखंड राज्य का शहर है। पौड़ी गढ़वाल जिले की तहसील है। पर यह एक प्लेन यानी समतल शहर है। नाम कोटद्वार है तो यह उत्तराखंड राज्य के गढ़वाल क्षेत्र का प्रवेश द्वार है। यह एक रेलवे स्टेशन भी है। आखिरी रेलवे स्टेशन। हालांकि यहां एक्सप्रेस रेलगाड़ियां दो ही आती हैं।
 पर अमूमन हर जगह के लिए कोटद्वार से आपको बसें और टैक्सियां मिल जाती है। पर आपको कोटद्वार से दिल्ली आना हो तो शाम को 4 बजे के बाद कोई बस नहीं मिलती। अगर आप कोटद्वार में अटक गए तो आपको रात को यहीं रुकना पड़ सकता है। पर रुकने के लिहाज से कोटद्वार में होटल सस्ते हैं। आप 100, 150 से 200 रुपये के होटलों में भी ठहर सकते हैं। मध्यमवर्गीय होटलों में अंबे होटल लोकप्रिय है।  रेलवे स्टेशन के पास गढ़वाल मोटर यूनियन के आसपास भी कई होटल हैं। मिठाइयां खानी हो तो सिद्धबली स्वीट्स पहुंचे। आपको हर तरह की बेहतरीन मिठाइयां खाने को मिल सकती हैं।  

मैं सुबह सुबह दिल्ली की बस से कोटद्वार पहुंचता हूं। नास्ता करने की इच्छा है। स्टेशन पर होटल पारामाउंट के नीचे पराठे की दुकान पर एक पराठा खाता हूं। 25 रुपये का बड़ा पंजाबी पराठा। नास्ते के लिए इतना काफी है।

कोटद्वार शहर मैं पहले कभी नहीं आया पर इस शहर से एक पुराना रिश्ता है। स्कूल के दिनों में 1985-86 के दौरान यहां से प्रकाशित एक छोटे से अखबार में मेरी कविताएं छपती थीं। हमारे एक पत्र मित्र कमल सिंह बिष्ट पंकज के सौजन्य से। वे पौड़ी गढ़वाल जिले के यमकेश्वर ब्लाक में रामजीवाला गांव के रहने वाले थे।
कोटद्वार से पौड़ी शहर की दूरी 101किलोमीटर है। यहां से हरिद्वार 70 किलोमीटर है। तो नजीबाबाद जंक्शन 30 किलोमीटर की दूरी पर है। मुझे लैंसडाउन से लौटते हुए 4 बजे गए थे। दिल्ली की बसें नहीं थी। लिहाजा हरिद्वार जाने का फैसला लिया। हरिद्वार के लिए मिनी बसें जाती हैं किराया 85 रुपये और समय दो घंटे से ज्यादा लगते हैं। लिहाजा हमने टैक्सी का विकल्प चुना. टैक्सी में 90 रुपये किराया और एक घंटे में टैक्सी ने चंडीघाट पर उतार दिया।  

थोड़ी और बातें कोटद्वार की। यह समुद्र तल से 395 मीटर की ऊंचाई पर बसा शहर है। कोटद्वार का मौसम सदाबहार है गर्मियों में भी तापमान 36 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा नहीं जाता।
ऋषि कण्व का आश्रम
कोटद्वार से 14 किलोमीटर की दूरी पर कण्व ऋषि का आश्रम। कहा जाता है इस आश्रम का संबंध राजा भरत से है जिनके नाम पर अपने देश का नाम भारत पड़ा। कहा जाता है यहीं पर मेनका ने विश्वामित्र का तप भंग किया था। मेनका ने शकुंतला को जन्म दिया। शकुंतला का पालन पोषण ऋषि कण्व ने इसी आश्रम में किया। एक दिन यहीं शकुंतला की मुलाकात दुष्यंत से हुई और उन दोनों के संसर्ग से भरत का जन्म हुआ। भरत की प्रारंभिक शिक्षा कण्व ऋषि के ही आश्रम में हुई। बाद में प्रतापी राजा बने जिनके नाम पर अपने देश का नाम भारत वर्ष पड़ा। पर कण्व ऋषि का आश्रम बहुत अच्छे हाल में नहीं है। कोटद्वार में सिद्धबली मंदिर, दुर्गा देवी मंदिर और कोटेश्वर मंदिर भी दर्शनीय हैं।
-vidyutp@gmail.com

( KOTDWAR, KANVA RISHI ASHRAM, UTTRAKHAND) 



Friday, May 27, 2016

पांच हजार साल पुराना है लैंसडाउन का कालेश्वर मंदिर

लैंसडाउन की सुरम्य वादियों में स्थित है शिव का अदभुत कालेश्वर मंदिर। यह लैंसडाउन का सबसे पुराना मंदिर है। कभी इस मंदिर के आसपास घने जंगल हुआ करते थे। मंदिर के बारे में बताया जाता है कि कोई 5000 साल पहले यहां कालुन ऋषि तपस्या करते थे। उन्ही के नाम पर इस मंदिर का नाम कालेश्वर मंदिर पड़ा। 5 मई 1887 को यहां गढ़वाल रेजिमेंट की स्थापना होने से पहले यह बिल्कुल वीरान जगह हुआ करता था। 4 नवंबर 1887 को जब रेजिमेंट की पहली बटालियन यहां पहुंची तो यहां घने जंगल थे। पर यहां गुफा में एक शिवलिंग स्थापित थी जिसे कालेश्वर के नाम से जाना जाता था। उन्हें आसपास के गांव के लोग ग्राम देवता के तौर पर पूजा करते थे। ये आपरूपि प्रकट हुए शिव हैं यानी इनकी स्थापना नहीं की गई है। गांव वालों का मानना था कि गांव की गायें इधर चरने आती थीं तो शिवलिंग के पास गुजरने पर वे स्वतः दूध देने लगती थीं।
लोग श्रद्धा और भक्ति से मन्नत मांगने आते थे उनकी मन्नत भी अवश्य पूरी हो जाती थी। यानी बाबा कालेश्वर गांव वालों की अखंड आस्था के केंद्र थे। 

साल 1901 में पहले गढ़वाल रेजिमेंट ने यहां एक छोटा सा मंदिर को धर्मशाला का निर्माण कराया। साल 1926 में लोगों के सहयोग से यहां विशाल मंदिर का निर्माण कराया गया। मंदिर में पूजा अर्चना साधु महात्मा करते थे। मंदिर का इंतजाम गढ़वाल रेजिमेंट देखता था। 1995 में मंदिर का पुनर्निमाण गढ़वाल रेजिमेंट ने करवाया। इसमें भी स्थनीय लोगों का सहयोग मिला।

बाबा कालेश्वर का मंदिर सुरम्य घाटी के बीच स्थित है। मंदिर परिसर में हरे भरे पेड़ हैं। मंदिर में अखंड धूनी भी जलती रहती है। परिसर में एक छोटी सी कैंटीन भी है, जहां से आप खाने पीने की वस्तुएं खरीद सकते हैं।

कैसे पहुंचे - लैंसडाउन के मुख्य बाजार से मंदिर तक पहुंचने के लिए सदर बाजार होकर रास्ता है। मंदिर में पहुंचने के लिए तकरीबन 100 सीढियां उतरनी पड़ती है। लैंसडाउन कोटद्वार शहर से 41 किलोमीटर की दूरी पर है। कोटद्वार से यहां टैक्सी से पहुंचा जा सकता है।





Thursday, May 26, 2016

भारतीय फौज की वीरगाथा सुनाता गढ़वाल संग्रहालय

लैंसडाउन 5800 फीट तकरीबन 1800 मीटर की ऊंचाई पर स्थित एक हिल स्टेशन है। पर यह जाना जाता है गढ़वाल राइफल्स के कारण। यह गढ़वाल रेजिमेंट का मुख्यालय है।
लैंसडाउन पहुंचे हैं तो गढ़वाल संग्रहलाय जरूर देखें। यह भारतीय फौज की वीरगाथा की दास्तां सुनाता है। इस संग्रहालय का नाम दरवान सिंह नेगी गढ़वाल म्यूजियम है। गढ़वाल रेजिमेंट के बहादुर सैनिक के नाम पर संग्रहालय का नाम रखा गया है।  यह गढ़वाल रेजिमेंट के फौजियों की युद्ध में वीरता की दास्तां सुनाता वार मेमोरियल और अनूठा संग्रहालय है।

नायक दरवान सिंह नेगी ने 1914 में प्रथम विश्वयुद्ध में फ्रांस में बहादुरी से लड़ते हुए अपना जीवन ब्रिटिश भारत के लिए उत्सर्ग किया था। उन्हें विक्टोरिया क्रास से नवाजा गया था। वे पहले भारतीय फौजी थे जिन्हे विक्टोरिया क्रास से नवाजा गया।  
संग्रहालय के अंदर गढ़वाल राइफल्स की स्थापना से लेकर इसके बहादुर फौजियों का इतिहास देखा जा सकता है। फौजियों की वर्दियों का भी अच्छा संग्रह है। फौज में इस्तेमाल की गई बंदूकें, 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के फौजियों से जब्त किए गए हथियार, पाकिस्तान के नोट, मनीआर्डर फार्म और खत आदि भी देखे जा सकते हैं। इसके अलावा कुछ वाद्य यंत्र का भी संग्रह है। यह संग्रहालय भारतीय सेना का इतिहास समझने के लिए बेहतरीन जगह में से है।
गढ़वाल राइफल्स की स्थापना 5 मई 1887 में बंगाल आर्मी के एक एनफेंट्री के तौर पर हुई थी। साल 1987 में इस रेजिमेंट ने अपना शताब्दी वर्ष मनाया। तकरीबन 25हजार फौजी इसके हिस्सा हैं। पहले विश्वयुद्ध के बाद दूसरे विश्वयुद्ध और फिर 1962 के भारत चीन युद्ध और 1965 और 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध फिर 1999 के कारगिल युद्ध में गढ़वाल राइफल्स ने बड़ी बहादुरी दिखाई थी। दूसरे विश्वयुद्ध में गढ़वाल राइफल्स ने बर्मा ( अब म्यांनमार) और मलाया में अपनी बहादुरी दिखाई थी। शांति काल में भी उत्तर काशी में 1991 में आए भूकंप और फिर 2013 में उत्तराखंड में बादल फटने के बाद चार धाम यात्रा में हुए हादसे में गढ़वाल राइफल्स ने लोगों की जान बचाने में बड़ी भूमिका निभाई। गढ़वाल राइफल्स का नारा है – बदरी विशाल लाल की जय।

शौर्य द्वार के ऊपर लिखी पंक्तियां जो वीर युद्ध में मारा जाता है उसके लिए शोक नहीं करना चाहिए क्योंकि वीर पुरुष युद्ध में वीर गति  प्राप्त कर स्वर्ग में सम्मान पाता है।

प्रवेश टिकट- संग्रहालय का प्रवेश टिकट 60 रुपये का है। संग्रहालय के अंदर फोटोग्राफी करने की मनाही है। संग्रहालय हर बुधवार को बंद रहता है। बाकी दिन सुबह 8 बजे से एक बजे और फिर 3 बजे से 5 बजे तक खुला रहता है। सर्दियों में 9.00 से 12.00 और शाम को 3.30 से 5.30 तक खुला रहता है। संग्राहलय लैंसडाउन कैंटोनमेंट एरिया में शौर्य स्थल सैनिकों के परेड ग्राउंड के पास बना हुआ है। आसपास के इलाके की सफाई व्यवस्था शानदार है।

पालीथीन मुक्त शहर - लैंसडाउन कैंटोनमेंट बोर्ड ने शहर को पालीथीन मुक्त घोषित कर रखा है। गढ़वाल राइफल्स को वृक्षारोपण और पर्यावरण बचाने के लिए लगातार किए जा रहे प्रयासों के लिए कई बार सम्मान मिल चुका है। लैंसडाउन की सड़कों पर हरियाली और फूलों की क्यारियां देखकर दिल खुश हो जाता है।

लैंसडाउन - गढ़वाल वार म्युजियम के लॉन में खिले गुलाब।

( LANSDOWNE, WAR MUSEUM, GARHWAL REGIMENT) 
-vidyutp@gmail.com


Wednesday, May 25, 2016

लुभाता है लैंसडाउन का भूला ताल

अगर लैंसडाउन में सबसे खूबसूरत जगह की बात करें तो वह भूला ताल झील। यह एक छोटी सी झील है लेकिन है प्यारी सी। लैंसडाउन के गांधी चौक से पैदल चलते जाएं। कैंटोनमेंट बोर्ड का दफ्तर उसके आगे आर्मी पब्लिक स्कूल और थोड़ा आगे करीब दो किलोमीटर के पैदल ट्रैक के बाद आ जाता है भूला ताल लेक। रास्ते में जगह जगह पथ प्रदर्शक लगे हैं इसलिए आपको रास्ता पूछना नहीं पड़ेगा। 

छोटे से लेक को सुंदर रूप प्रदान करने में गढ़वाल राइफल्स की अहम भूमिका है। भूला ताल लेक गढ़वाल राइफल्स के वीर गढ़वाली फौजियों को समर्पित है। वास्तव में भूला ताल लेक एक चेक डैम है। गढ़वाली में भूला का मतलब है छोटा भाई। गढ़वाली में प्यार से लोगों को भूला कहने का रिवाज है। इसी नाम पर इस झील का नाम भूला ताल रखा गया। इस झील का नया रूप 2003 में एक प्रोजेक्ट के तौर पर दिया गया। झील की लंबाई 35 मीटर है और इसमें 32 लाख गैलन पानी की क्षमता है। बरसात के दिनों में इस झील का सौंदर्य और बढ़ जाता है।

झील में बोटिंग का भी इंतजाम है। इसके लिए 80 रुपये का टिकट लेना पडता है। लिहाजा यह बच्चों का काफी पसंद आता है। झील के चारों तरफ हरे भरे पार्क बनाए गए हैं। इन पार्कों में सुंदर हट बनाए गए हैं। यहां नन्हें खरगोश चहलकदमी करते नजर आते हैं। पार्क के अंदर एक कैंटीन भी है। लोगों के लिए टायलेट का भी इंतजाम है।अगर आप लैंसडाउन से कुछ प्रतीक चिन्हों की खरीदारी करना चाहते हैं तो झील के परिसर में स्थानीय उत्पादों का स्टाल भी है। यहां पर आप मग पर अपनी फोटो भी प्रिंट करा सकते हैं। टाइम पास  के लिए भूला ताल अच्छी जगह है। बैठने के लिए कई बेंच बनी हुई हैं।

खुलने का समयः  झील सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता है। वहीं सर्दियो के दिन में सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक खुला रहता है। बुधवार को झील को रखरखाव के लिए बंद रखा जाता है। झील में प्रवेश के लिए 20 रुपये का टिकट है।  
vidyutp@gmail.com

( LANSDOWNE, BHULA TAL LAKE )   



Monday, May 23, 2016

लैंसडाउन में लगता एक रुपये प्रवेश कर

कोटद्वार से लैंसडाउन से लिए टैक्सी से चलने के साथ ही पहाड़ी रास्तों की शुरुआत हो जाती है। पतली ठो नदी के साथ साथ सड़क हरियाली संग संवाद करती हुई चलती है। रास्ते में चीड़ के जंगल दिखाई देते हैं। टैक्सी में उत्तराखंड के प्राथमिक स्कूल की कई शिक्षिकाएं मेरे साथ बैठी हैं। उनका स्कूल आने पर वे रास्ते में उतर जाती हैं। पता चला कि एक मैडम के स्कूल में सिर्फ 14 छात्र हैं और शिक्षक दो। यानी सात छात्रों पर एक शिक्षक। इस तरफ के कई प्राथमिक स्कूलों का यही हाल है। यानी छात्रों की पूरी मौज है किसी ट्यूशन या कोचिंग की तरह पढ़ाई। उसपर से स्कूल में वर्दी किताबें और खाना सब कुछ मिलता है। मेरे बगल में जिंस और लखनवी चिकेन का कुरता पहने मैडम बैठी हैं।

मैडम हिन्दी काफी अच्छा बोल रही हैं। अपने स्कूल के सामने उतरती हैं तो उनकी नन्ही नन्ही छात्राएं उनके इंतजार में सड़क पर खड़ी हैं। उन्हें प्रणाम करती हैं और स्वागत में बैग आदि  उठा लेती हैं। इतनी अच्छी मैडम हो तो छात्राएं सम्मान करेंगी ही। रास्ते में दुगड्डा नामक छोटा सा बाजार आता है। कुछ लोग टैक्सी से उतरते हैं तो कुछ चढ़ते हैं।

रास्ते में कई जगह खच्चर के साथ लोग जाते हुए दिखाई देते हैं। साथ वाली मैडम बताती हैं कि ये सभी केदारनाथ की ओर जा रहे हैं। चार धाम की यात्रा शुरू हो चुकी है तो ये लोग यात्रियों की सेवा में जा रहे हैं। पैदल पैदल ये तीन दिन में केदारनाथ पहुंच जाएंगे। एनएच 119 पौड़ी गढ़वाल को चला जाता है जो बदरीनाथ केदारनाथ के मार्ग में है।

इतने कम कर से क्या लाभ होगा
टैक्सी लैंसडाउन में प्रवेश करने वाली है। चेकपोस्ट आता है। सारे यात्रियों से प्रवेश कर मांगा जाता है। एक रुपये प्रति यात्री। कर है पर इतना कम। यह तो महज औपचारिकता भर है। इतने से वसूलने वाले का वेतन भी शायद निकल पाता हो। मैं दो रुपये देता हूं तो टैक्स वसूलने वाला एक रूपये लौटा देता है साथ में एक रुपये की रसीद भी थमा देता है। मैं सोचता हूं भला इतने कम कर से कितना राजस्व आता होगा। यह राशि तो वसूली कर्मियों पर ही खर्च हो जाती होगी। थोड़ी देर में टैक्सी लैंसडाउन में गांधी चौक पर छोड़ देती हैं। शहर में गांधी चौक पर ही थोड़ी चहल पहल दिखाई देती है। 

कहां ठहरें -  लैंसडाउन में रहने के लिए गिनती के होटल या रिसार्ट ही हैं। इनमें गांधी चौक स्थित होटल मयूर बेहतर हैं जहां 600-700 में सिंगल बेड रूम और 900 में डबल बेड रूम मिल सकता है।( फोन 94111- 79966 ) बाकी होटल इससे भी महंगे हैं। आप उत्तराखंड पर्यटन के विश्राम गृह या एलसीबी के गेस्ट हाउस में भी ठहर सकते हैं। खाने- पीने के लिए लैंसडाउन में सीमित होटल रेस्टोरेंट हैं। अगर घूमने की बात करें तो आप आधे दिन मेंपूरा लैंसडाउन घूम सकते हैं। चाहें तो सुबह जाकर दोपहर बाद लौट भी सकते हैं।

लैंसडाउन में क्या देखें - गढ़वाल रेजिमेंट म्यूजिम, कालेश्वर मंदिर, भूला ताल झील, भीम पकौड़ा ( तीन किलोमीटर दूर जंगल के अंदर है) , तारकेश्वर मंदिर (लैंसडाउन से 40 किमी दूर है निजी टैक्सी से ही जा सकते हैं) पूरे लैंसडाउन शहर की व्यवस्था लैंसाडाउन कैंटोनमेंट बोर्ड देखता है। शहर में गांधी चौक के पास सदर बाजार है, जहां आप जरूरत की चीजें ले सकते हैं।
 -vidyutp@gmail.com

( UTTRAKHAND, LANSDOWNE )




Saturday, May 21, 2016

दिल्ली से लैंसडाउन – एक शांत हिल स्टेशन

दिल्ली से 300 किलोमीटर से कम दूरी पर किसी हिल स्टेशन पर जाना चाह रहे हों तो उसमें लैंसडाउन विकल्प हो सकता है। हालांकि लैंसडाउन शिमला या मसूरी की तरह रौनक वाली जगह तो नहीं है पर यह एक शांत हिल स्टेशन है काफी कुछ डलहौजी की तरह। साम्यता यह है कि यहां भी कैंटोनमेट बोर्ड है।

दिल्ली से लैंसडाउन जाने के लिए रेल नेटवर्क के अलावा हमेशा बस की सुविधा उपलब्ध है। रेल से कोटद्वार तक ही जा सकते हैं। दिल्ली से गढ़वाल एक्सप्रेस सुबह 7.20 में खुलती है यह 238 किलोमीटर की दूरी तय करके दोपहर 2.15 बजे कोटद्वार पहुंचती है। दूसरी ट्रेन मसूरी एक्सप्रेस है जो रात 9.30 बजे खुलती है। यह सुबह 6 बजे कोटद्वार पहुंचाती है। कहीं और से आ रहे हैं तो निकटतम बड़ा रेलवे जंक्शन नजीबाबाद है। बरेली-हरिद्वार मार्ग पर स्थित नजीबाबाद से होकर काफी ट्रेनें गुजरती हैं।

दिल्ली से कोटद्वार बस से जाने के दो रास्ते हैं एक दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ-बिजनौर-नजीबाबाद-कोटद्वार तो दूसरा दिल्ली- हापुड़- गजरौला- बिजनौर - नजीबाबाद-कोटद्वार। दोनो तरफ से दूरी 240 किलोमीटर के आसपास है। अमूमन दिल्ली से कोटद्वार के लिए हमेशा बसें मिल जाती हैं। पर रात को एक बजे के बाद से सुबह 5 बजे तक कम बसें हो सकती हैं। दिल्ली से पांच घंटे का बस का सफर है कोटद्वार का। किराया 210 रुपये है। मेरठ कैंट के बाद बस मवाना रोड होते हुए बिजनौर पहुंचती है। मैं रात की बस से चल पड़ा हूं. सुबह 4 बजे बस एक ढाबे में रूकती है। ढाबा यूपी रोडवेज द्वारा अनुबंधित है। पर ढाबे पर खाने पीने की वस्तुओं की दरें नहीं लिखी हैं। यानी ग्राहकों की जेब पर डाका। बिजनौर शहर से पहले सड़कों के किनारे गन्ने से बनने वाले गुड़ की खुशबू आती है। बिजनौर बड़ा गन्ना उत्पादक क्षेत्र है। बिजनौर शहर से पहले गंगा बैराज आता है। बस एनएच 119 पर दौड़ रही है। बिजनौर शहर में सुबह का उजाला फैल चुका है। 
बिजनौर पार कर बस बसी कीरतपुर, जलालाबाद होते हुए नजीबाबाद पहुंच जाती है। नजीबाबाद बिजनौर जिले की तहसील है। पर बड़ा शहर और व्यस्त रेलवे स्टेशन है। यहां आकाशवाणी का केंद्र भी है। यहां से हरिद्वार सिर्फ 49 किलोमीटर है। नजीबाबाद के आसपास बीएसपी के झंडे ज्यादा दिखाई दे रहे हैं। 2017 के चुनावों की आहट सुनाई दे रही है। नजीबाबाबाद के बाद सड़क के दोनों तरफ जंगल दिखाई देते हैं। कोटद्वार शहर के ठीक पहले तक उत्तर प्रदेश राज्य की सीमा है। कोटद्वार उत्तराखंड के पौड़ी जिले की तहसील है। बस सुबह 6 बजे कोटद्वार पहुंच गई है।


कोटद्वार से लैंसडाउन जाने के लिए टैक्सियां ही विकल्प हैं। बसे कम चलती हैं। कुल 41 किलोमीटर दूरी के लिए टैक्सी का किराया 70 रुपये है। अमूमन एक घंटे का रास्ता है। पर टैक्सी दोपहर के बाद कम हो जाती हैं। 

वहीं अगर आपको लैंसडाउन से लौटना तब शाम को 5 बजे के बाद टैक्सी मिलने की संभावना नहीं रहती है। दरअसल टैक्सी को 12 सवारी चाहिए सवारी पूरी नहीं होने पर टैक्सी वाले नहीं जाते। इसके बाद रिजर्व टैक्सी करने का ही विकल्प बचता है। 

- vidyutp@gmail.com 

( UTTRAKHAND, LANSDOWNE )       

Friday, May 20, 2016

इंडिया गेट- अमर जवानों की याद

दिल्ली का इंडिया गेट। इसे दिल्ली का दिल कहा जाए तो गलत नहीं होगा। पूरी दिल्ली के मानचित्र में दिल्ली के बीचों बीच स्थित है। न सिर्फ बाहर से आने वाले लोगों के बीच बल्कि दिल्ली के स्थानीय लोगों के भी घूमने की सबसे प्रिय जगह है। हालांकि इंडियागेट नाम के मुताबिक यह कोई भारत का प्रवेश द्वार नहीं है। बल्कि यह अमर जवानों की यादगारी है।  यह 43 मीटर ऊंचा विशाल दरवाजा है। आजादी से पहले इसे किंग्सवे कहा जाता था। दिल्ली के वास्तुकार सर एडवर्ड लुटियन ने ही इसका भी डिजाइन तैयार किया था।

इंडिया गेट का निर्माण लाल और पीले बलुआ पत्थरों से किया गया है। इसकी नींव 1921 में ड्यूक ऑफ कनॉट ने रखी थी। इसका निर्माण 12 फरवरी 1931 को पूरा हुआ। तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड इरविन ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया।  इंडिया गेट निर्माण के समय यहां सामने एक जार्ज पंचम की प्रतिमा भी थी। पर देश आजाद होने के बाद उसे हटा दिया गया। अब उस प्रतिमा की छतरी भर यहां है।

इसे 80,000 से अधिक उन भारतीय सैनिकों की याद में निर्मित किया गया था जिन्होंने पहले विश्व युद्ध में और अफगान युद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त किया। तब ये भारतीय फौजी ब्रिटिश सेना में ब्रिटेन की ओर से लड़ रहे थे। इंडिया गेट की दीवारों पर कुल 13,300 ब्रिटिश फौजी अधिकारियों के नाम अंकित हैं जो युद्ध में खेत रहे।

देश आजाद होने के बाद 1971 में हुए भारत पाक युद्ध के बाद शहीदों की याद में इंडिया गेट के नीचे अमर जवान ज्योति की स्थापना की गई। ये ज्योति दिन रात लगातार जलती रहती है। देश की आजादी के जान गंवा देने वाले अनाम शहीदों की याद में एक राइफल और टोपी यहां लगा दी गई है।

इंडिया गेट के चारों तरफ गोल सड़क है। यहां से दिल्ली के हर कोने के लिए सडके निकलती हैं। कस्तूरबा गांधी मार्ग, तिलक मार्ग, पुराना किला मार्ग, शेरशाह सूरी मार्ग, पंडारा रोड, शाहजहां रोड जैसे प्रमुख रोड इंडिया गेट के गोलचक्कर पर आकर मिलते हैं। इसलिए यहां पहुंचने के लिए कहीं से भी बसें मिल जाती हैं। निकटम मेट्रो स्टेशन खान मार्केट, प्रगति मैदान या केंद्रीय सचिवालय है। सरदियों को दोपहर हो या फिर गर्मियों की रात इंडिया गेट गुलजार रहता है। यहां हजारों लोगों की भीड़ हमेशा रहती है। रात को इंडिया गेट को बिजली की बत्तियों से रोशन किया जाता है तब इसकी खूबसूरती बढ़ जाती है।

 इंडिया गेट के चक्कर लगाना, हरी हरी घास पर तफरीह करना और आइसक्रीम खाना दिल्ली वालों का प्रिय शगल है। आजकल इंडिया गेट के बिल्कुल अंदर जाने की इजाजत नहीं है। अगर आप दिल्ली में नए हैं तो दिन भर दिल्ली घूमने के बाद रात को इंडिया गेट पहुंच जाएं। इंडिया गेट से आप बोट क्लब और राष्ट्रपति भवन का विहंगम नजारा भी कर सकते हैं। इंडिया गेट हर साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के मौके पर भव्य परेड का साक्षी बनता है। इस दौरान कुछ दिनों के लिए यहां सुरक्षा को लेकर बैरिकेटिंग कर दी जाती है।   
-vidyutp@gmail.com

( INDIA GATE, DELHI, WAR MEMORIAL) 


Thursday, May 19, 2016

पुराना किला – कई अफसाने हैं दफन

दिल्ली को जानना है तो पुराना किला गए बिना बात अधूरी रह जानी है। पुराना किला के साथ कई पुरानी यादें जुड़ी हैं। लोग तो कहते हैं कि यह पांडव कालीन है। पर किले के साथ मुगलकाल की कई स्मृतियां जुडी है। कहते हैं कि ठीक इसी जगह पर पांडवों ने इंद्रप्रस्थ शहर बसाया था। पर वर्तमान पुराना किला की इमारत को अफगान शासक शेरशाह ने बनवाया था। वास्तव में इसका निर्माण कार्य हुमायूं ने शुरू कराया था।पर  बाद में शेरशाह ने इसका विस्तार कराया। उसने महज 5 साल दिल्ली पर शासन किया। पर शेरशाह को इतिहास में कई बड़े योगदान के लिए याद किया जाता है। पुराना किला तकरीबन एक मील के परिधि में फैला हुआ है। मजे की बात 1914 से पहले तक यहां एक गांव का अस्तित्व हुआ करता था।
पुराना किला में कुल तीन प्रवेश द्वार हैं। एक का नाम हुमायूं दरवाजा  दूसरे का नाम तलाकी दरवाजा है तो तीसरे का नाम बड़ा दरवाजा है। किले के चारों तरफ काफी मोटी सुरक्षा दीवार है। इस दीवार के चारों तरफ गहरी खाई थी। इस मोटी दीवार के अवशेष को आज भी देखा जा सकता है।

हुमायूं ने अपने 1531 से 1540 के शासन काल के दौरान पुराना किला का निर्माण शुरू कराया। उसने नाम दिया था दीनपनाह नगर। साल 1533 में किले का निर्माण शुरू हुआ। पांच साल में किला लगभग बनकर तैयार हो गया। 1540 में दिल्ली पर अधिकार के बाद यह किला शेरशाह के अधिकार में आ गया। पांच साल शेरशाह ने इस किले से पूरे हिंदुस्तान पर हुकुमत चलाई। पर 13 मई 1545 को कालिंजर के युद्ध में शेरशाह की मृत्यु हो गई। अब किला शेरशाह के बेटे सलीम शाह के अधिकार में आ गया। पर 1555 में एक बार फिर हुमायूं ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया और किला एक बार फिर हुमायूं के अधीन हो गया।

शेरमंडल के सामने। यहीं हुमायूं की मौत हुई। 
हुमायूं सीढ़ियों से फिसल गया आखिरी हुमायूं की मृत्यु कैसे हुई थी। सीढियों से फिसलकर न। वह अपने पुस्तकालय की सीढ़ियों से फिसल गया था। पढ़ने का बड़ा शौक था उसे। एक दिन पढ़ते हुए शेर मंडल ( पुस्तकालय) की सीढ़ियों से फिसल गया। फिर नहीं उठ सका। शेर मंडल शेरशाह द्वारा निर्मित दो मंजिला अष्टकोणीय भवन है। इसे हुमायूं ने अपना पुस्तकालय बनवा दिया था। हुमायूं को पढ़ने का काफी शौक था। इन्ही किताबों के बीच 27 जनवरी 1556 की एक सुबह वह सीढ़ियों से फिसल गया फिर बच नहीं सका। किले के अंदर कौन्हा मसजिद भी है जो इंडो इस्लामिक वास्तु कला का सुंदर उदाहरण है।    
पुराने किले की मोटी दीवार पर। चाहे हाथी दौड़ा लो। 
लाइट एंड साउंड शो  - पुराना किला में रोज शाम को होने वाला लाइट एंड साउंड शो न सिर्फ पुराना किला बल्कि दिल्ली की कहानी सुनाता है। अतीत के हर मोड की दास्तां रोचक अंदाज में। शो हिंदी और अंग्रेजी में प्रस्तुत किया जाता है। अगर समय है तो इस शो को जरूर देखें। 

कई बार बना पनाहगार – दूसरे विश्व युद्ध के समय पुराना किला को जापान की फौज ने अपनी शरण स्थली बनाया। यहां 3000 फौज ने लंबे समय तक शरण ली। 1947 में देश आजाद होने पर पाकिस्तान से आए हिंदु परिवारों ने पुराने किले में शरण ली। हजारों परिवार यहां लंबे समय तक रहे।

भारतीय पुरात्तव विभाग द्वारा संरक्षित पुराना किला अब दिल्ली का प्रमुख पर्यटक स्थल है। किले में प्रवेश के लिए 15 रुपये का टिकट है। लाइट एंड साउंड शो का टिकट अलग से है। किले के बाहर सुंदर तालाब है जिसमें पैडल बोटिंग का आनंद उठाया जा सकता है। किले के अंदर कई जगह सुंदर फूलों की क्यारियां हैं। दिन भर पुराना किला दिल्ली के प्रेमी युगलों से भी गुलजार रहता है। अगर आप पूरा किला घूमना चाहते हैं तो तीन चार घंटे का वक्त जरूर निकालिए। निकटतम मेट्रो या रेलवे स्टेशन प्रगति मैदान है।
-vidyutp@gmail.com

Wednesday, May 18, 2016

ये तीस जनवरी मार्ग है....

ये तीस जनवरी मार्ग है। एक सड़क का नाम है। पर ऐसी सड़क जो एक एतिहासिक घटना की गवाह बन गई। एक महान आत्मा की यात्रा जो गुजरात के शहर पोरबंदर से शुरू हुई थी यहां आकर खत्म होती है। वह 30 जनवरी 1948 का दिन था जब 79 साल की एक महान आत्मा हे राम के शब्द के साथ इस दुनिया से कूच कर गई। हालांकि बापू तो आत्मशक्ति से 125 साल जीना चाहते थे। पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। 


तीस जनवरी मार्ग का नाम पहले अलबुकर्क रोड हुआ करता था। पर बापू की याद में इसका नाम बदलकर 30 जनवरी मार्ग रखा गया। गांधी जी ने अपने जीवन के आखिरी पांच माह यानी 144 दिन यहां गुजारे। तब वे यहां बिरला परिवार के मेहमान थे। बंगला नंबर 5 बिरला परिवार का गेस्ट हाउस था जिसे गांधी जी को रहने के लिए दिया गया था। 1966 में भारत सरकार ने इसे बिरला परिवार से खरीदने का फैसला किया। 1971 में यह भारत सरकार के अधिकार में आ गया और यहां गांधी स्मृति बनाने का फैसला लिया गया। 
15 अगस्त 1973 को इसे गांधी स्मृति के तौर पर आम जनता के लिए खोल दिया गया। अब यहां पर बापू की स्मृति में एक संग्रहालय है। हरे भरे प्रांगण में बापू के संदेश अंकित किए गए हैं। एक मुक्ताकाश मंच और प्रार्थना स्थल है। 


देश दुनिया से आने वाले बापू का सम्मान करने वाले लोग राज घाट पर उनकी समाधि के अलावा तीस जनवरी मार्ग भी पहुंचते हैं। बापू 9 सितंबर 1947 को बिरला हाउस में आए थे। उनके जीवन के आखिरी पांच महीने की समस्त गतिविधियां यहीं से हुईं। हर साल 30 जनवरी को बापू की याद में यहां सर्व धर्म प्रार्थना सभा का आयोजन किया जाता है।

महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंसटाईन की ये पंक्तियां तीस जनवरी मार्ग पर गांधी स्मृति के प्रांगण में प्रस्तर पर उत्कीर्ण की गई हैं... 

गांधी जी भारत के ऐसे नेता थे जिनका नेतृत्व सत्ता पर आधारित नहीं था। वे एक ऐसे राजनीतिज्ञ थे जिनकी सफलता कूटनीति पर नहीं परंतु अपने व्यक्तित्व के प्रभाव पर भी निर्भर थी। वे ऐसे विजयी योद्धा थे जिन्होंने हिंसा का सख्त विरोध किया था। वे समझदार, विनम्र और दृढ़ निश्चयी थे और उनके जीवन में कोई असंगति नहीं थी। उन्होंने अपनी पूरी शक्ति अपने देशवासियों के उद्धार और कल्याण में लगा दी। यूरोप की बर्बरता का मानवता से सामना करके उन्होंने हमेशा के लिए अपनी श्रेष्ठता साबित की।
संभव है भविष्य की पीढ़ियां यह मानने को तैयार नहीं हो कि ऐसा कोई व्यक्ति इस धरती पर विचरता था।

-         अलबर्ट आइंस्टाइन

कैसे पहुंचे – इंडिया गेट से शाहजहां रोड पर जाते हुए ताज मानसिंह चौराहा आता है। वहीं से आप औरंगंजेब रोड के बगल से तीस जनवरी मार्ग पर जा सकते हैं। अगर मेट्रो से उतरते हैं तो निकटम स्टेशन रेस कोर्स और खान मार्केट हो सकते हैं।   
http://gandhismriti.gov.in/indexb.asp

( MAHATMA GANDHI, 30 JANUARY MARG, DELHI, BIRLA HOUSE  ) 

Tuesday, May 17, 2016

राजघाट में सो रहा है दुनिया का सबसे बड़ा फकीर

नाम राजघाट है पर यहां सो रहा है सदी का सबसे बड़ा फकीर। एक ऐसा फकीर जिसे नमन करने दुनिया भर के लोग आते हैं। शायद पूरी दुनिया में बापू ऐसे पहले आजादी की लड़ाई के अगुवा रहे होंगे जिन्होंने आजादी मिल जाने के बाद कोई सत्ता नहीं ग्रहण की। सरकार में कोई पद नहीं लिया। महलों में रहने नहीं गए। आजादी तो मिल गई पर बापू तो पीड़ित मानवता की सेवा में लगे रहे। उनके स्मृतियों को संजो कर उनकी समाधि बनाई गई तो उसका नाम राजघाट रखा गया। भला राज घाट क्यों। वे तो संत थे। उन्होंने तो अपने लिए राज पाने की कामना ही नहीं की थी। पर वे तो ऐसे असंख्य राजाओंसे काफी बड़े हैं जिन्होंने सालों राज किया हो। तभी तो भारत भूमि पर आने वाला हर शख्स चाहे वह किसी भी देश का शासनाध्यक्ष क्यों न हो, दिल्ली आने पर राजघाट पहुंचता है...नंगे पांव.... और उनकी समाधि पर पुष्पांजलि अर्पित करता है।
चरखा चलता बापू का - राजघाट ( जनवरी 2008) 
दिल्ली में रहते हुए जब जब जी थोड़ा उचाट होता है चुपचाप चला जाता हूं राजघाट। थोड़ी प्रेरणा पाने की आस में। यह संयोग ही है कि जब 1991 में पहली बार दिल्ली पहुंचा तो हमारा पहला पड़ाव राजघाट ही था। सितंबर 1991 में अलीगढ़ का शिविर खत्म हुआ तो दिल्ली देखने की इच्छा थी। मैं और बिपिन चतुर्वेदी बस में बैठे। आईटीओ पर रिंग रोड पर उतर गए। पैदल पैदल राजघाट की ओर। यहां पर सामने गांधी स्मृति दर्शन समिति में लोकसेवक मंडल का अंतरराष्ट्रीय शिविर लगा था। उसमें दो दिन ठहरे। इस दौरान बापू की समाधि राजघाट पर पहुंचे। इसके बाद वीरभूमि (राजीव गांधी की समाधि) शांतिवन ( पंडित नेहरू की समाधि) और विजय घाट ( लाल बहादुर शास्त्री की समाधि) के दर्शन। यह रिंग रोड ( महात्मा गांधी मार्ग) से लगता हुआ दिल्ली का बड़ा हरित क्षेत्र भी है। दूसरी बार 1992 में दुबारा एक शिविर में गांधी दर्शन में रूकना हुआ।

राजघाट में बापू की स्मृति में अखंड ज्योति जलती रहती है। इसके बगल में बापू का प्रिय चरखा भी चलता है। यहां चरखा चलाने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। हालांकि अब बहुत कम लोग चरखा चलाना जानते हैं।

राजघाट का विस्तार 44.35 एकड़ के हरित क्षेत्र में है। निधन के एक दिन बाद 31 जनवरी 1948 को बापू का अंतिम संस्कार यहीं पर किया गया था। तब यहां लाखों लोगों की भीड़ उमड़ी थी। बापू को अंतिम विदाई देने के लिए।

खुलने का समय - आम दर्शकों के लिए राजघाट हर रोज सुबह 6.30 बजे से शाम 6.00 बजे तक खुला रहता है। यहां जूता स्टैंड और पेयजल आदि का इंतजाम है।  2 अक्तूबर, 15 अगस्त और 26 जनवरी के आसपास यहां पर वीवीआईपी आयोजन के कारण आमजन का प्रवेश प्रतिबंधित किया जाता है।



राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय और पुस्तकालय – राजघाट के ठीक सामने स्थित है राष्ट्रीय गांधी संग्रहालय। यहां पर आप बापू और कस्तूरबा गांधी के जीवन से जुड़ी प्रदर्शनी देख सकते हैं। बापू की आवाज टेलीफोन पर सुन सकते हैं। दो मंजिला भवन में प्रदर्शनी काफी जानकारी परक है। इसमें चित्र प्रदर्शनी के अलावा बापू के आखिरी कपड़े यानी खून से सनी धोती और शॉल को देखा जा सकता है। बापू को लगी गोलियों में से एक गोली भी देखी जा सकती है।
40 किस्म के चरखे देखें यहां
सबसे नायाब है यहां का चरखा संग्रहालय। इसमें देश के अलग हिस्सों में बने चरखों का विशाल संग्रह है। यहां पर हर रोज बापू के जीवन से जुड़ी फिल्म का प्रदर्शन भी होता है। संग्रहालय के भवन में एक बेहतरीन पुस्तकालय भी है। यहां पर सुबह 10 से शाम 5 बजे तक बैठकर पुस्तकें पढ़ सकते हैं। साथ ही एक पुस्तक बिक्री केंद्र भी है। यहां बापू के जीवन और गांधी दर्शन से जुड़ी पुस्तकें और दूसरी यादगारी वस्तुएं खरीदी जा सकती हैं। गांधी संग्रहालय भवन का उदघाटन 30 जनवरी 1961 को भारत के पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद ने किया था। यह संग्रहालय सुबह 9.30 से शाम 5.00 बजे तक खुला रहता है। 
-vidyutp@gmail.com

( RAJGHAT, BAPU, MAHATMA GANDHI, DELHI )