Friday, April 29, 2016

आइए फेयरी क्वीन को करें याद

भारतीय रेलवे के लोकोमोटिव (इंजन) के इतिहास में फेयरी क्वीन का अपना अनूठा महत्व है. जब हम विजयवाड़ा रेलवे स्टेशन के बाहर निकलते हैं तो स्टेशन के लॉन में फेयरी क्वीन लोकोमोटिव खड़ी दिखाई देती है। मानो अभी चल पड़ने को तैयार हो। वास्तव में ये मूल फेयरी क्वीन नहीं है। पर रेलवे के इंजीनियरों ने इसका बिल्कुल वैसा ही रेप्लिका तैयार किया है। तो इस फेयरी क्वीन को भी देर तक निहारने की जी चाहता है।

फेयरी क्वीन को विश्व का सबसे पुराना लोकोमोटिव माना जाता है। इसका निर्माण 1855 में इंग्लैंड में हुआ था। इसे  किटसन थामसन एंड हेविस्टन नामक कंपनी ने बनाया था। यह एक ब्राडगेज पर चलने वाला लोकोमोटिव है। इसी भारत लाए जाने पर इसे इस्ट इंडियन रेलवे कंपनी की सेवा में पश्चिम बंगाल में लगाया गया। तब इसे 22 नंबर प्रदान किया गया था। फेयरी क्वीन की मदद से बंगाल में 1857 की क्रांति के दौरान फौज को ढोने का काम किया गया। इसने लंबे समय तक हावड़ा से रानीगंज के बीच अपनी सेवाएं दीं। 1909 में सेवा से बाहर होने के बाद फेयरी क्वीन लोको 1943 तक हावड़ा में यूं ही पड़ा रहा। इसके बाद इसे यूपी के चंदौसी में रेलवे के प्रशिक्षण केंद्र में लाकर रखा गया। साल 1972 में फेयरी क्वीन को हेरिटेज स्टेट प्रदान किया गया। बाद में इसे दिल्ली के राष्ट्रीय रेल संग्रहालय में रखा गया।

बाद में इसने नई दिल्ली से अलवर के बीच हेरिटेज ट्रेन के तौर पर अपनी सेवाएं दीं। यह एक कोयला से संचालित इंजन था। इसमें दो सिलिंडर लगे थे। इसका पावर आउटपुट 130 हार्स पावर का था।यह अधिकतम 40 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से दौड़ता था। सुंदर से दिखने वाले इस लोकोमोटिव का वजन 26 टन था। इसकी पानी टंकी की क्षमता 3000 लीटर थी। फेयरी क्वीन को 1909 में सेवा से बाहर किया गया यानी यह इसके रिटायरमेंट का साल था। यानी कुल 54 साल इसने अपनी सेवाएं दीं।

एक बार फिर फेयरी क्वीन को रेलवे ने काफी परिश्रम से रिस्टोर किया। यह 1997 में 18 जुलाई को एक बार फिर पटरियों पर दौड़ा।  88 साल बाद किसी लोकोमोटिव को एक बार फिर पटरी पर दौड़ाया गया। साल 1998 में इसे गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में विश्व के सबसे पुराने लोकोमोटिव के तौर पर शामिल किया गया। साल 2011 में फेयरी क्वीन के कुछ पार्ट पुर्जे चोरी चले गए। 
और ये रही असली वाली फेयरी क्वीन । 
बाद में इसे चेन्नई के पास स्थित पेरांबुर रेल इंजन कारखाना भेजा गया जहां से दुबारा चलने योग्य बनाया गया। एक बार फिर इसने 22 दिसंबर 2012 के पटरियों पर कुलांचे भरी। अभी भी रेलवे इसे अक्तूबर से मार्च के बीच महीने  में दो बार दिल्ली से अलवर के बीच सैलानियों के लिए संचालित करता है। यह एक एसी कोच को खींचता है जिसमें 60 लोगों के बैठने की क्षमता होती है।
विजयवाडा रेलवे स्टेशन के बाहर को ऐतिहासिक फेयरी क्वीन का रेप्लिका स्थापित किया गया है, इसे साउथ सेंट्रल रेलवे, विजयवाड़ा के मेकेनिकल ब्रांच के लोगों ने काफी परिश्रम से तैयार किया है। ताकि आते जाते लोगों को रेलवे के इतिहास से अवगत कराया जा सके।
-vidyutp@gmail.com

( FAIRY QUEEN, RAIL, VIJAYWADA, ALWAR) 




Wednesday, April 27, 2016

अति व्यस्त रेलवे स्टेशन पर कायम है स्वच्छता - विजयवाड़ा

वैसे तो विजयवाड़ा आंध्र प्रदेश का सबसे भीड़भाड़ वाला रेलवे स्टेशन है। स्टेशन पर कुल 10 प्लेटफार्म हैं। रोज सैकड़ो गाड़ियां गुजरती हैं। पर स्टेशन पर साफ सफाई का जो आलम है उसमें रेलवे को धन्यवाद देने का जी चाहता है। हमारी मिलेनियम एक्सप्रेस प्लेटफार्म नंबर 7 पर पहुंची। समय से पहले। हमारे पास दो घंटे का समय था। कुल 29 घंटे ट्रेन में था। विजयवाड़ा शहर का तापमान मार्च महीने में 35 को पार कर रहा था। लिहाजा नहाने की इच्छा हो रही थी। मैं प्लेटफार्म नंबर एक पहुंचता हूं। आमतौर पर हर रेलवे स्टेशन पर प्लेटफार्म नंबर एक की तरफ ही मुख्य प्रवेश द्वार होता है। रास्ते में देखता हूं कि हर प्लेटफार्म पर उतरने के लिए एक्सिलेटर यानी स्वचालित सीढ़ियां लगाई जा चुकी हैं। प्लेटफार्म नंबर एक पर पहुंच कर शौचालय पूछता हूं। थोड़ी देर बाद में बाथरूम कांप्लेक्स के सामने हूं। स्नान करने का 15 रूपये। साफ सुथरा बड़ा बाथरूम है। अंदर ही बैग कपड़े आदि टांगने की इंतजाम है। मैं जी भर के नहाकर गर्मी और थकान मिटाता हूं। इसके बाद प्लेटफार्म का मुआयना करता हूं। जूस, छाछ और नास्ते के स्टाल हैं। विजया मिल्क का स्टाल है। मैं छाछ पीता हूं। आठ रुपये का नमकीन छाछ।  50 रुपये वेज बिरयानी मिल रही है।एक पैकेट खरीदता हूं। जनरल वेटिंग हाल भी अति विशाल बना है। सभी जगह पंखे चल रहे हैं। जगह-जगह मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट भी है। बिरयानी खाकर आराम फरमा रहा हूं। बगल में कमसम का भी रेस्टोरेंट है। इसका मीनू भी विविधतापूर्ण है। तभी सोचता हूं थोड़ा सा स्टेशन के बाहर भी घूम लेता हूं।

बाहर से विजयवाडा रेलवे स्टेशन की सफेद रंग की इमारत अति भव्य दिखाई देती है। इमारत की चौड़ाई तकरीबन आधा किलोमीटर में है। परिसर में एक घंटा घर ( क्लाक टावर ) है। स्टेशन परिसर में आटो लेने के लिए प्रीपेड बूथ बना हुआ है। मैं वापस आकर वेटिंग हाल में बैठ जाता हूं। मेरे सामने सातवाहन एक्सप्रेस, हटिया सिकंदराबाद एक्सप्रेस, विशाखापत्तनम सिकंदराबाद एक्स्प्रेस जैसी ट्रेनें गुजर जाती हैं। शाम को गांधी हिल्स से विजयवाड़ा स्टेशन को देखता हूं। वहां पूरे रेलवे स्टेशन का विहंगम नजारा दिखाई देता है। आती जाती रेलगाड़ियां छोटी-छोटी दिखाई देती हैं। रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 10 की तरफ से प्रवेश द्वार और टिकट घर है। प्लेटफार्म नंबर 10 के ठीक सामने एक चर्च है । इसी के बगल से गांधी हिल्स पर चढाई करने का रास्ता भी है। बीच में स्टेशन को साइकिल और पैदल पार करने के लिए रैंप भी बना हुआ है। स्टेशन पर विकलांगों के लिए रैंप का भी इंतजाम है।    
   
 विजयवाड़ा रेलवे स्टेशन पर रेलगाड़ियों का संचालन 1888 में आरंभ हुआ। आज की तारीख में यह मुंबई सेंट्रल के बाद देश का दूसरा सबसे व्यस्त रेलवे जंक्शन गिना जाता है। यह साउथ सेंट्रल रेलवे जोन में आता है। इसका स्टेशन कोड  BZA  है। यहां से चार सेक्शन के लिए रेलगाड़ियां मिलती हैं। विजयवाड़ा-गुडिवाडा, विजयवाड़ा- गुडुर, विजयवाड़ा, विशाखापत्तनम और विजयवाड़ा-काजीपेट खंड।  
vidyutp@gmail.com 

Monday, April 25, 2016

मिलेनियम एक्सप्रेस से विजयवाड़ा तक

मिलेनियम एक्सप्रेस ( 12646) देश की लंबी दूरी की चंद ट्रेनों में से है जो हजरत निजामुद्दीन से केरल के शहर एर्नाकुलम यानी कोच्चि तक जाती है। पर देश की राजधानी से दूसरे छोर तक जाने वाली ये ट्रेन दिल्ली से आगरा, ग्वालियर,झांसी, बीना, भोपाल, इटारसी, नागपुर, काजीपेट, वारंगल, विजयवाड़ा होकर केरल की ओर जाती है। यह पुराना परंपरागत रास्ता है। यह 48 घंटे में एर्नाकुलम साउथ (ERS) पहुंचती है। पर हमें राजामुंदरी ( राजा महेंद्रवर्मनपुरम) जाना था एक शादी में। रात को 12 बजे तक दफ्तर में काम करने के बाद ट्रेन पकड़नी तो मिलेनियम एक्सप्रेस का समय मुफीद है। यह निजामुद्दीन से सुबह 5.55 में खुलती है। आमतौर पर हर रोज समय पर ही खुलती है।
ग्वालियर और झांसी के बीच मिलेनियम एक्सप्रेस 

 दिल्ली से विजयवाड़ा का भी रास्ता इस ट्रेन में कुल 29 घंटे का है। राजमुंदरी जाएं तो 33 घंटे। पर हमें बारात के परिवार के लोगों ने कहा था कि वे लोग सुबह हैदराबाद से चलेंगे और 11 बजे विजयवाड़ा से गुजरेंगे इसलिए हमने विजयवाड़ा तक का टिकट लिया। कोच एस 6 में हमारी बर्थ 60 नंबर है। आसपास की बर्थ खाली है। दिल्ली से ट्रेन समय पर खुली। कोच में मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट नहीं हैं। अब लंबे सफर के लिए ये जरूरी हो गया है। मिलेनियम में पेंट्री कार भी नहीं है। ट्रेन में मथुरा में रूकी। वहां प्लेटफार्म से नास्ता लिया।  आगरा के बाद ग्वालियर में है ठहराव। ग्वालियर से झांसी के बीच ट्रेन पहाड़ी रास्तों से गुजरती है। ऑन बोर्ड केटरिंग वाले झांसी में दोपहर का खाना लेकर आए। 70 रुपये का खाना। चार पूरी, चावल, दाल, सब्जी। पैकिंग अच्छी थी पर खाना पसंद नहीं आया। अगला पड़ाव आया बीना जंक्शन। यहां पर सांची के स्टाल से छाछ लिया। 8 रुपये की छाछ। सांची की छाछ हमेशा ही अच्छी लगती है। रास्ते में कुछ लोग पर्चा बांटने आए।
ललितपुर के आगे बेतवा नदी पर पुल 

 भोपाल में अलग अलग रेस्टोरेंट का मीनू। ट्रेन से फोन कर रात का खाना मंगाएं। दरें भी वाजिब थीं। पर ट्रेन भोपाल में शाम 5 बजे ही पहुंच जाती है। इतनी जल्दी खाना लेना मुफीद नहीं लगा। पर भोपाल रेलवे स्टेशन पर पकौड़े जरूर खाए। हमारी ट्रेन ज्यादा तर स्टेशनों पर समय से पहले ही पहुंच जा रही है। इटारसी स्टेशन पर हमेशा खाना बड़ी आसानी से और वाजिब दरों पर मिलता है। मैं सालों से यहां खाना लेता रहा हूं। पर इस बार इटारसी का भी खाना पंसद नहीं आया। 70 रुपये की पैक थाली मिली। पर हर व्यंजन में नमक कम। मजा नहीं आया। खैर अब सोने का समय था।

 नागपुर में ट्रेन पूरी तरह भर गई। इससे पहले आसपास की बर्थ खाली थी। अब सुबह हो गई। हालांकि मिलेनिमय का काजीपेट में स्टाप नहीं है पर ट्रेन रूक गई। हमने वारंगल में इडली खाई। 20 रुपये की एक प्लेट। हमेशा की तरह अच्छा स्वाद। दक्षिण भारत के स्टेशनों पर खाने में कोई धोखाधड़ी नहीं। ट्रेन समय से पहले चल रही है।इसलिए खम्मम और कई छोटे-छोटे स्टेशनों पर रूक जा रही है। इसके बावजूद विजयवाड़ा नियत समय पर यानी 10.30 बजे ही पहुंच गई।

( MILLENNIUM EXPRESS, ERNAKULAM SOUTH, RAIL, ANDHRA) 

Sunday, April 24, 2016

हमारी वह पहली मुंबई यात्रा

ताज होटल के सामने लंबू जी और टींगू जी 
वह पहली नौकरी के दिन थे। 1998 का साल था। टीवी और फिल्मों की बीट पर रिपोर्टिंग किया करता था। इस दौरान दिल्ली में अक्सर प्रेस कान्फ्रेंस में टीवी और फिल्म स्टारों से मुलाकात होती थी। इस दौरान में कई फिल्मी हस्तियों का साक्षात्कार करने का मौका मिला। तब ख्याल आया कि क्यों न एक बार मुंबई का दौरा किया जाए। वहां एक हफ्ते प्रवास कर फिल्मों और टीवी धारावाहिकों की शूटिंग देखी जाए। एक दिन अपने मित्र दीपक दुआ से बात की। तब वे चित्रलेखा नामक पत्रिका के लिए काम करते थे। हम दोनों ने साथ साथ मुंबई जाने की योजना बनाई। फिर क्या आरक्षण कराया और एक दिन ट्रेन में सवार हो गए। हमारी ट्रेन थी (2926 ) पश्चिम एक्सप्रेस। दिल्ली से शाम को 4.30 बजे खुलती है। आने और जाने के लिए ट्रेन का चयन दीपक दुआ ने ही किया था। दीपक छह फीट से ज्यादा लंबे हैं। इसलिए वे ट्रेन में साइड लोअर बर्थ लेना पसंद करते हैं जिससे सोते समय दूसरे लोगों को परेशानी न हो।
मुंबई के मरीन ड्राईव पर पहली बार। 
हमारी ट्रेन मथुरा, कोटा, नागदा, रतलाम होती हुई आगे बढ़ रही थी। अगले दिन सुबह हुई तो हम बड़ौदा में थे। गुजरात की खूशबू थी। हमने प्लेटफार्म से नास्ते में ढोकला लिया। सूरत, नवसारी, वापी जैसे गुजरात के स्टेशनों को पीछे छोड़ती हुई दहानू रोड होते हुए मुंबई में प्रवेश कर गई। विरार के बाद मुंबई लोकल रेलवे स्टेशन आरंभ हो जाते हैं। दीपक मौसा जी के पास हमलोग जाने वाले थे। उन्हें पहले ही पत्र लिख दिया था, उन्होंने कहा था कि बांद्रा स्टेशन पर मैं आप लोगों का इंतजार करूंगा। दोपहर में ट्रेन बांद्रा पहुंची। प्लेटफार्म की भीड़ में दीपक भाई को मौसा जी नजर आ गए। वे हमे माहिम में अपने आवास पर ले गए। अकेले रहते थे। हमें मुंबई में एक और मित्र निर्देश त्यागी जो धारावाहिक चंद्रकांता संतति और बेताल पचीसी आदि में सहायक निर्देशक थे, ने भी अपने यहां रुकने का आमंत्रण दिया था। अगले दिन हमलोग मलाड पूर्व में उनके आवास में शिफ्ट कर गए। यहां से मुंबई के तमाम जगहों की यात्रा करना आसान था।  
सौरभ शुक्ला के ड्राईंग रूम में।


इसके बाद अगले सातदिन हमलोगों ने मुंबई के लोकल ट्रेन के सफर और आटो रिक्शा का खूब मजा लिया। मजा इसलिए कि हमलोग सुबह 10 बजे घर से निकलते थे जब लोकल में भीड़ कम हो जाती थी। रात को 10 बजे के बाद लौटते तब भी लोकल परेशान नहीं करती थी। रेलवे स्टेशनों पर बड़ा पाव और तरबूज के जूस का आनंद भी खूब लिया। गरमी के दिन थे। अपने मुंबई प्रवास के दौरान एक दिन मुंबई दर्शन बस से पूरे मुंबई को देखा बाकी दिन शूटिंग और टीवी चैनलों के दफ्तरों में लोगों से मिलना जुलना। 
एक दिन हमलोग अभिनेता और पटकथा लेखक सौरभ शुक्ला के घर गए। उनके ड्राईंग रूम में बैठकर उनका लंबा साक्षात्कार लिया। तब उनकी सत्या फिल्म सुपर हिट हो चुकी थी। एक दिन स्टार प्लस के धारावाहिक ये है राज के सेट पर पहुंचे वहां दीप्ति भटनागर का साक्षात्कार किया। वर्सोवा में समुद्र तट के किनारे एक बंगले में धारावाहिक की शूटिंग देखी। एक दिन हमलोग गोरेगांव में दूरदर्शन पर चल रहे धारावाहिक ओम नमः शिवाय के सेट पर भी पहुंचे। वहां चंड मुंड नामक पौराणिक चरित्र से मिलना हुआ। उनके साथ तस्वीरें भी ली।

महायज्ञ के सेट पर प्रीति खरे के साथ 

जब हमने सोनी चैनल के धारावाहिक में अभिनय किया
पर सबसे मजेदार रहा सोनी के धारावाहिक महायज्ञ के सेट पर पहुंचना। वहां पर प्रीति खरे जो पत्रकार विष्णु खरे बेटी हैं उनके लंबी बातचीत की। पर महायज्ञ धारावाहिक में हमें छोटा सा रोल करने को कहा गया जो हमारे लिए कौतूहल भरा था। कुछ जूनियर आर्टिस्ट कम पड़ गए थे। हमारा शाट गोविंद नामदेव के साथ था। वे स्थानीय नेता के रोल में थे। उनके ड्राईंग रुम में पहले बैठे कुछ मुलाकातियों में हम थे। उनके प्रवेश पर हम खड़े होकर उन्हें नमस्कार करते हैं और बैठ जाते हैं।  
हमलोग अपनी इस यात्रा के दौरान सोनी चैनल के दफ्तर, वीनस म्युजिक के दफ्तर गए। मुंबई की प्रोफेसनल लाइफ को समझा। तेजी से दौड़ती भागती जिंदगी को महसूस किया। मुंबई में आप बिना पहले से एप्वाइंटमेंट लिए किसी से मिलने न जाएं तो अच्छा रहता है। 

रेन डांस पार्टी में। 
हिंदूजा समूह वाइस प्रेसिडेंट कारपोरेट कम्युनिकेशंस पद पर कार्यरत हिमा मेहता से एक दिन हमलोग मिलने गए। उनसे दिल्ली में कई बार मुलाकात हुई थी। अंधेरी मोरल नाका रोड पर एमआईडीसी में हिंदुजा का दफ्तर है। हिमा जी ने हमें दोपहर का लंच कराया। हमारे एक और साथी आशीष कौल नहीं मिले, वे छुट्टी पर चल रहे थे। अगले दिन हम हीमा जी के आमंत्रण पर हमलोग जे डब्लू मेरिएट पांच सितारा होटल में रात्रि में एक रेन डांस पार्टी में शामिल हुए। देर रात तक पार्टी चलती रही। मैं और दीपक दोनों ही शराब नहीं पीते इसलिए कोल्ड ड्रिंक से मन बहलाते रहे। सात दिनों बाद दिल्ली से हमारी वापसी गोल्डेन टेंपल मेल ट्रेन से हुई। 

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(MALAD EAST, NIRDESH TYAGI )


Saturday, April 23, 2016

जायका रतलाम के सेव का

हमारी ट्रेन जब भी रतलाम से होकर गुजरती है मैं रतलामी सेव का एक पैकेट जरूर खरीदता हूं। वैसे तो सेव इंदौर और उज्जैन के भी प्रसिद्ध हैं पर रतलामी सेव की बात अलग है। रतलाम मध्य प्रदेश का शहर है। यह रेलवे का बड़ा जंक्शन है। ट्रेन जब  गुजरात से निकल कर मध्य प्रदेश में प्रवेश करती है तो रतलाम पहला बड़ा स्टेशन आता है। ज्यादातर ट्रेनें यहां रूकती हैं।

ब्रिटिश राज में रतलाम की रियासत मशहूर थी। पर अब रतलाम को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई है यहां के सेव ने। वैसे कहा जाता है कि रतलाम की पहचान सोना , साड़ी और सेव से है। पर सेव ऐसी चीज है जो हर किसी के जेब के अनुकूल है।


रतलाम का सेव भी तो बेसन और नमक से बनता है। तो इसमें खास क्या है सेव तो पूरे देश में बनता है। पर रतलामी सेव का अपना अलग स्वाद है। इसमें एक खास तरह का तीखापन होता है। इसमें लौंग, लहसून, हिंग और काली मिर्च का इस्तेमाल होता है। रतलामी सेव मूंगफली के तेल में बनता है।

रतलाम की हवा, पानी और यहां का मौसम यहां के सेव को खास बनाते हैं। यहां के कारीगरों ने यही प्रयोग दूसरी जगह भी करके देखा पर वे रतलाम जैसा स्वाद नहीं ला सके। वैसे मालवा के लोग रोज खाने में सेव का इस्तेमाल करते हैं। दाल चावल की थाली मेंऊपर से सेव का छिड़काव करके खाने को और भी स्वादिष्ट बनाते हैं।

रतलाम में खंडेलवाल के रतलामी सेव काफी प्रसिद्ध हैं। पर मुझे स्टेशन पर गणेश का सेव मिलता है। इसका भी स्वाद अच्छा है। यहां मैं खरीदता हूं 80 रुपये में आधा किलो का पैकेट। हो सकता है बाजार में थोडा सस्ता हो। रतलाम के बाजार में आपको सादा सेव के अलावा लौंग सेव, पालक सेव, टमाटर सेव, लहसून सेव आदि किस्म मिल जाएंगी। खास तौर पर लौंग सेव और लहसून सेव का स्वाद आपको लुभाएगा। एक अनुमान है कि रतलाम से रोज 10 टन सेव आर्डर पर दूसरे शहरों में भेजी जाती है।

रतलाम के बाद ट्रेन राजस्थान में प्रवेश कर जाती है। भवानी मंडी नामक रेलवे स्टेशन आता है जो झालावाड़ जिले में है। यह एक राज्य का सीमांत शहर है। इसके बाद रामगंज मंडी दूसरा स्टेशन आता है जो कोटा जिले में है हालांकि यहां दूरंतो, गरीब रथ जैसी ट्रेनें नहीं रुकतीं। रामगंज मंडी झालावाड जाने का निकटतम रेलवे स्टेशन हुआ करता था। यहां से झालावाड़ 26 किलोमीटर है। अब रामगंज मंडी से झालवाड़ तक रेल लिंक बन चुका है। झालावाड़ से 13 किलोमीटर आगे आप गगरोन का किला देख सकते हैं जो विश्व विरासत की सूची में शामिल है।  

Friday, April 22, 2016

अचानक ट्रेन हुई रद्द – कैसे पहुंचे दिल्ली

आप मुंबई जैसे शहर में हों, और अचानक आपको आपकी ट्रेन रद्द होने की जानकारी मिले तो क्या गुजरेगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। मुंबई से परिवार समेत वापसी का टिकट एक महीने पहले करवाया था। अमृतसर एक्सप्रेस जैसी ट्रेन जिसे डुप्लिकेट पंजाब कहा जाता है एसी 3 में वेटिंग मिला था जो खिसकते हुए आरएसी में आ गया था। पर वह 20 फरवरी की शाम थी, दिन भर बोरिवली नेशनल पार्क में घूमने के बाद शाम को हमलोग मुंबई के फैशन स्ट्रीट पर घूम रहे थे। थोड़ी शापिंग कर डाली थी, कुछ और करने के लिए मोलभाव में लगे थे। तभी मोबाइल पर एक आईआरसीटीसी का मैसेज आता है। पहले मुझे लगा कि आरएसी टिकट के कनफर्म होने का संदेश होगा। मैंने बेतकल्लुफी से लिया। पर सोचा एक बार संदेश पढ़ लेता हूं। संदेश पढ़ते ही ऐसा लगा कि किसी ने भरी सरदी में आठ घड़े ठंडे पानी से नहला दिया हो। संदेश था- आपकी ट्रेन रद्द हो गई है....असुविधा के लिए खेद है। हम कुछ घंटे बाद ही डिनर करने के बाद होटल चेकआउट करके स्टेशन पहुंचने वाले थे। अपनी सुविधा के लिए हम छत्रपति शिवाजी टर्मिनस स्टेशन के पास ही होटल सी लार्ड ( पी डिमेलो रोड ) में ठहरे थे। 

ये होटल हमने गोआईबीबो डाटकाम से बुक किया था।  अमृतसर एक्सप्रेस सीएसटी रात्रि 11.40 बजे खुलती है। अब हमारी चिंता बढ़ गई। दफ्तर में छुट्टी खत्म हो रही थी। चार दिन बाद बेटे की वार्षिक परीक्षा भी थी। शादी में शामिल होने की खुमारी खत्म हो चुकी थी। दिल्ली लौटना जरूरी था।
 पर हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन के कारण तमाम ट्रेनें कैंसिल हो चुकी थीं। हम उन हजारों परेशान लोगों की सूची में शामिल हो चुके थे। होटल में चेकआउट का समय अगले दिन सुबह का था। पर वापसी के लिए टिकट पाना अभी सबसे बड़ी चिंता थी। हम वहीं फैशन स्ट्रीट में ही फुटपाथ पर बैठकर मोबाइल का डाटा आन कर टिकट की तलाश करने लगे। अगले दिन 21 को भी ज्यादातर दिल्ली जाने वाली ट्रेनें रद्द दिखाई दे रही थीं। काफी कोशिश के बाद 22 को नई दिल्ली जाने वाली दूरंतो एक्सप्रेस ( 22209 ) में आरएसी में सीटें खाली दिखाई दे रही थीं। हमने पूरी कोशिश की पर मोबाइल फोन से ट्रांजेक्शन फेल हो जा रहा था। फिर अपने मुंबई में रिश्तेदार दीपक जी से मदद मांगी कि वे अपने घर से वाईफाई कनेक्शन से बुक करने की कोशिश करें। टिकट बुक हो गया तो राहत मिली। अब चिंता थी कि ये ट्रेन समय से चले। 

22 को रात 11.15 बजे मुंबई सेंट्रल के प्लेटफार्म नंबर दो से दूरंतो एक्सप्रेस खुलने वाली थी।  हमलोग समय पर स्टेशन पहुंच गए थे। मुंबई सेंट्रल पर कुल 5 लंबी दूरी की ट्रेनों के लिए प्लेटफार्म हैं। स्टेशन साफ सुथरा है। रेलवे का फ्री वाईफाई काम कर रहा था। स्टेशन के बुक स्टाल से हमने बाबा नागार्जुन का उपन्यास वरुण के बेटे खरीदी। ट्रेन समय पर खुल गई। हमारा आरएसी का टिकट कनफर्म भी हो गया था। मुंबई से दिल्ली के बीच दूरंतो सिर्फ बड़ौदा, रतलाम और कोटा में रूकती है। ट्रेन कोटा तक समय पर चल कर आई। पर भरतपुर से पहले बयाना जंक्शन में रूक गई। पता चला भरतपुर के पास लाइन डिस्टर्ब है। बाद में पता चला वहां 23 फरवरी को दिन में एक इंजन फूंक दिया गया था।
आगरा कैंट - यहां भी रूक गई दूरंतो एक्सप्रेस। 

 ट्रेन बयाना से फतेहपुर सीकरी होते हुए आगरा पहुंची। ये सिंगल लाइन है। आगरा फोर्ट में ट्रेन का इंजन आगे से पीछे करना पड़ा तो ट्रेन यहां भी रूकी रही। तकरीबन आधे घंटे। वहां से चलकर दिल्ली पहुंची, शाम को 7 बजे के बाद। 
दूरंतो जैसी ट्रेन ढाई घंटे से ज्यादा लेट हो चुकी थी। फिर भी पूरा हरियाणा जल रहा था जिसका असर देश भर के रेल नेटवर्क पर पड़ा था। इन सब के बीच हम सकुशल घर पहुंच चुके थे।

12 से 24 फरवरी 2016 के दौरान जाट आंदोलन के दौरान 2,134 ट्रेनें रद्द हुई जिसमें से 1,033 मेल एवं एक्सप्रेस ट्रेन और 1,101 पैसेंजर ट्रेंने शामिल हैं। जाट आंदोलन के दौरान रेलवे को 55.92 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। यह नुकसान संपत्ति की हानि होने, टिकट रद्द होने और 2,134 ट्रेनें रद्द किए जाने के कारण हुई। 

Wednesday, April 20, 2016

मुंबई में पेट पूजा – आनंद भवन की शाकाहारी थाली

मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस रेलवे स्टेशन के पास शाकाहारी खाने के लिए सबसे निकट में अच्छा विकल्प है, स्पेशल आनंद भवन। स्टेशन से बाहर निकलते ही मिंट रोड पर चलने पर दाहिनी तरफ स्पेशल आनंद भवन नजर आता है। मुंबई के फोर्ट एरिया में 70 रुपये में शाकाहारी थाली। इससे अच्छा और क्या हो सकता है। 100 रुपय़े में स्पेशल थाली। थाली में रोटियां, चावल, दाल, दो सब्जी, सांभर आदि। ये फिक्स थाली है। स्पेशल थाली में रोटी की जगह पूड़ियां, पापड, रायता और स्वीट डिश भी है। स्वीट डिश में हलवा है जो सुस्वादु है। खाने के बाद 5 रुपये में पान खा सकते हैं। मीठा पान। आपको काउंटर पर बना बनाया पान मिलेगा। 


आनंद भवन के मीनू कार्ड पर लिखा हुआ है 1936 में स्थापित है। यानी तकरीबन अस्सी साल से ये भोजन परोस रहे हैं। खाने का स्टाइल वैसे तो आंध्र प्रदेश जैसा है पर इसमें रोटियां तवे वाली उत्तर भारत की तरह मिलती हैं। होटल सुबह 8 बजे से रात्रि 10 बजे तक खुला रहता है। वे पंजाबी और चाइनीज डिश भी सीमित मात्रा में पेश करते हैं। खाने के बाद आप आइसक्रीम का भी आनंद ले सकते हैं। 

भोजनालय में पानी पूरी का भी स्टाल है। हालांकि पर स्पेशल आनंद भवन रविवार को बंद रहता है। खुद होटल के प्रोपराइटर बताते हैं कि हम रविवार को बंद रखते हैं। पर अगर आपको रविवार को शाकाहारी भोजन करना हो तो पंचम पूरी वाला के पास पहुंच सकते है। 

पंचम पूरी वाले की पहचान खास तौर पर पूरी के लिए है। पंचम पूरी वाले के दीवाने लोगों की संख्या काफी बड़ी है। वहां लोग सुबह के नास्ते के लिए पहुंचते हैं। रविवार को साई पूजा नामक रेस्टोरेंट भी है जो खुला रहता है। हमने पिछली मुंबई यात्राओं के शहीद भगत सिंह रोड पर अनुभव वेज में भी शाकाहारी भोजन का आनंद लिया था। इस बार आनंद भवन और सदानंद जैसे शाकाहारी भोजन स्थलों को तलाशा।
-vidyutp@gmail.com

Monday, April 18, 2016

मुंबई का जूता घर यानी बूट हाउस


Boot House - 1998 +Vidyut Prakash Maurya 
मुंबई के रोचक स्थलों में से एक है जूता घर। यानी बूट हाउस। जैसा कि नाम से ही जाहिर है कि ये घर जूते जैसा लगता है। बूट हाउस मुंबई के कमला नेहरू पार्क के अंदर स्थित है। इसकी देखभाल बृहनमुंबई नगरपालिका करती है। बूट हाउस बाहर से देखने में बिल्कुल ही एक फीते वाला जूता प्रतीत होता है। बच्चे इस जूता घर को देखकर इतना खुश होते हैं कि पूछो मत। वैसे जूता घर में अंदर जाने के लिए सीढियां भी हैं। सीढ़ियों से चढ़कर आप जूते के टॉप पर जा सकते हैं। बच्चे जूता घर के ऊपर हमेशा चहल कदमी करते नजर आते हैं। यह जूता घर हर उम्र के लोगों की पसंद है।

 क्या बच्चे, क्या बड़े क्या बूढ़े सबको ये जूता घर देखकर आनंद आ जाता है। वास्तव में यह एक महिला का जूता है। इस बूट हाउस के निर्माण से कमला नेहरू पार्क का आकर्षण और बढ़ गया है। यह पूरी तरह से पत्थर से बनाया गयाहै। धीरे-धीरे यह मुंबई का खास आकर्षण बन गया। इसका निर्माण अंग्रेजी की प्रसिद्ध कविता – देअर वाज एन ओल्ड वूमन हू लिव्ड इन ए शू .... से प्रेरित होकर किया गया है।  
 
कमला नेहरू पार्क  का नाम देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू के नाम पर रखा गया है। कमला नेहरू जी का साथ काफी पहले छोड़ गई थीं। कमला नेहरू पार्क 4000 वर्ग फीट में फैला हुआ छोटा सा पार्क है। यहां कुछ पेड़ पौधे और फूलों की क्यारियां हैं। पार्क से मरीन ड्राईव का सुंदर नजारा दिखाई देता है। यह मुंबई के सबसे पुराने गार्डन में से एक है। 
 
वास्तव में हैंगिग गार्डन का निर्माण मुंबई में एक विशाल जलाशय के ऊपर हुआ है इसलिए इसे हैंगिंग गार्डन भी कहा जाता है। मूल रूप से यह पार्क 1881 के आसपास बना था। बाद में 1921 में इसका नवीकरण और उन्नयन हुआ। इस जलाशय की क्षमता 3 करोड़ गैलन जल स्टोर करने की है। यहां से आसपास के इलाकों में पेयजल की सप्लाई होती है। हैंगिग गार्डन का नाम प्रसिद्ध बैरिस्टर फिरोजशाह मेहता के नाम पर रखा गया है।   

कैसे पहुंचे - मुंबई में जूता घर कमला नेहरू पार्क के अंदर और हैंगिग गार्डन के सामने है। आमतौर पर मुंबई दर्शन के पैकेज में दिन भर घुमाने वाली बसें आपको जूता घर जरूर लेकर जाती हैं। यह केंद्रीय मुंबई के इलाके में मालबार हिल्स के पास है। जूता घर बीजी खेर रोड पर स्थित है। यह सुबह 5 बजे से रात्रि 9 बजे तक खुला रहता है। जूता घर पहुंचने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन चर्नी रोड है। 
BOOT HOUSE , MUMBAI- MAY- 2013 -vidyut

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 (KAMLA NEHRU HANGING GARDEN, BOOT HOUSE, JUTA GHAR, MUMBAI )

Saturday, April 16, 2016

अनूठा संग्रह - मुंबई का छत्रपति शिवाजी महाराज संग्रहालय

देश के प्रमुख संग्रहालयों में से एक है मुंबई का छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय। इसका पुराना नाम प्रिंस ऑफ वेल्स म्युजियम है। इसलिए काफी लोग इसे अभी इसी पुराने नाम से जानते हैं। इतिहास में रूचि रखने वालों को यह संग्रहालय जरूर देखने चाहिए। संग्रहालय का भवन भी मुंबई की हेरिटेज बिल्डिंग में शुमार है। भवन निर्माण में मुगल, मराठा और जैन वास्तुकला की छाप दिखाई देती है। संग्रहालय के प्रांगण में विशाल खजूर के पेड़ हैं जो परिसर की सुंदरता बढ़ाते हैं। संग्रहालय में विश्व स्तर के 60 हजार वस्तुओं का संग्रह है। संग्रहालय के बाहर गौतम बुद्ध की सुंदर प्रतिमा दिखाई दे जाती है। आधार तल पर सातवीं सदी की उमा महेश्वर की अदभुत प्रतिमा देख सकते हैं।
इस संग्रहालय की शुरुआत 10 जनवरी 1922 को हुई थी। इसकी स्थापना में  मुंबई के संभ्रांत नागरिकों और ब्रिटिश सरकार का योगदान था। इस संग्रहालय के बनाने का विचार 1905 में प्रिंस आफ वेल्स जो बाद में जार्ज पंचम बने, के मुंबई आगमन के मौके पर आया। इसलिए इसका नाम प्रिंस आफ वेल्स के सम्मान में रखा गया। साल 1907 में बांबे प्रेसिडेंसी ने इस स्थल पर संग्रहालय बनाने की अनुमति दी थी। 1909 में जार्ज विटेट को इस संग्रहालय भवन का डिजाइन बनाने के लिए अधिकृत किया गया। वे मुंबई  के गेट वे आफ इंडिया और जीपीओ बिल्डिंग के भी डिजाइनर थे। 1915 में इसका भवन बनकर तैयार हुआ। पर इसी दौरान पहला विश्व युद्ध शुरू हो गया। तब इस भवन का इस्तेमाल अगले पांच सालों तक मिलिट्री हास्पीटल के तौर पर किया गया। युद्ध समाप्त होने के बाद यहां 1920 में संग्रहालय का उदघाटन हो सका। बांबे के गवर्नर जार्ज लिलोड की पत्नी लेडी लिलोड ने इसका उदघाटन किया।

साल 1995 में जब बांबे का नाम बदल कर मुंबई किया गया इसके बाद ही इस संग्रहालय का नाम बदलकर महान शासक छत्रपति शिवाजी के नाम पर रख दिया गया। संग्रहालय का परिसर 3 एकड़ में फैला है। इसका भवन तीन मंजिला है।
संग्रहालय का संग्रह मूल रूप से तीन हिस्सों में विभाजित है। कला, पुरातत्व और प्राकृतिक इतिहास। यहां नदी घाटी सभ्यता के बारे में विशेष जानकारी देने वाली गैलरी है। ऐतिहासिक काल खंड की बात करें तो गुप्त काल,मौर्य काल, चालुक्य और राष्ट्रकूट राजाओं से जुड़े संग्रह यहां देखे जा सकते हैं। यहां पेंटिंग का भी विशाल संग्रह है। इसमें मुगल, दक्कन, राजस्थानी और पहाड़ी चित्रों का संग्रह देखा जा सकता है। साल 2008 में संग्रहालय में तीन नई गैलरियां भी शुरू की गई हैं। आप कला प्रेमी हैं तो इसके देखने के लिए 4 से 6 घंटे का समय निकालिए तो बेहतर रहेगा।

खुलने का समय – हर रोज सुबह 10.15 से शाम 6 बजे तक खुला रहता है। पर आखिरी टिकट शाम 5.45 बजे तक लिया जा सकता है। संग्रहालय 26 जनवरी, 15 अगस्त, 1 मई और 2 अक्तूबर को बंद रहता है।

कैसे पहुंचे - संग्रहालय मुंबई के फोर्ट इलाके में है। सीएसटी स्टेशन से यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। वैसे यह मुंबई में महात्मा गांधी रोड पर काला घोड़ा इलाके में स्थित है।
आफिसियल वेबसाइट - http://csmvs.in/
( Prince of Wales Museum, Mumbai, Buddha ) 

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Thursday, April 14, 2016

मुंबई का मणि भवन और बापू

जिन शहरों में बापू के कदम पड़े वहां कोई न कोई ऐसा स्थल जरूर है जो अब तीर्थ में परिणत हो चुका है। मुंबई में बापू की स्मृतियां देखनी हो तो मणि भवन पहुंचे।
मणि भवन वह स्थल है जहां मुंबई प्रवास के दौरान बापू ने लंबा वक्त गुजारा। मणि भवन मुंबई के लेब्रनम रोड पर गाम देवी इलाके में स्थित है। 1917 से 1934 के बीच बापू कई बार यहां रहे। अब यहां बापू की याद में एक संग्रहालय और रेफरेंस लाइब्रेरी बनाया गया है। इस पुस्तकालय में लगभग 40 हजार पुस्तकों का संग्रह है। भवन की पहली मंजिल पर एक आडिटोरियम है जहां बापू से जुडी फिल्म का प्रदर्शन समय समय पर किया जाता है। यहां गांधीवादी संस्थाओं द्वारा छोटे छोटे आयोजन भी समय समय पर होते रहते हैं।

मूल रूप से यह भवन रविशंकर जगजीवन झवेरी का हुआ करता था। वे बापू के बड़े सहयोगियों में से थे। बापू के मुंबई प्रवास के दौरान उनके रहने का इंतजाम वही किया करते थे। मणि भवन वह जगह है जहां से बापू ने असहयोग आंदोलन, होमरूल आंदोलन, स्वदेशी, सत्याग्रह, खादी और खिलाफत जैसे आंदोलन की शुरुआत की। आप यूं समझ सकते हैं कि यह भवन 20 सालों तक बापू का मुंबई मुख्यालय रहा।

1955 में इस भवन को गांधी स्मारक निधि ने अपने अधिकार में लिया और यहां बापू की याद में स्मारक बनाने का फैसला लिया गया। यह दो मंजिलों का भवन अब मुंबई शहर का गौरव है।

साल 2010 में अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा मणि भवन का दौरा करने आए। वह पहले अमेरिकी राष्ट्रपति हैं जो यहां पहुंचे। मणि भवन के आधार तल पर बापू द्वारा इस्तेमाल की गई वस्तुओं का संग्रह है। वहीं पहली मंजिल पर बापू से जुड़ी फोटो गैलरी बनाई गई है। यहां बापू द्वारा इस्तेमाल किए गए दो चरखे और उनका एक बिस्तर अभी भी देखा जा सकता है। साथ ही वह जगह भी देख सकते हैं जहां 4 जनवरी 1932 को बापू को गिरफ्तार कर लिया गया था।
3 मार्च 1959 को भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी यहां पहुंचे थे। मणिभवन से बापू की सैकड़ो स्मृतियां जुडी हैं। 1919 में जब उनकी तबीयत खराब हुई तो उन्होंने कस्तूरबा की सलाह पर बकरी का दूध लेना शुरू किया।
मार्च 1919 में रालेट एक्ट के खिलाफ सत्याग्रह मणि भवन से ही शुरू किया गया। 7 अप्रैल 1919 को बापू ने यहां से साप्ताहिक बुलेटिन सत्याग्रही की शुरुआत की। 9 जून 1931 को कांग्रेस वर्किंग कमेटी की एक बैठक मणि भवन में हुई। बापू का स्मारक बनने के बाद मणि भवन देश के करोड़ो लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।
खुलने का समय - आम दर्शकों के लिए मणि भवन सुबह 9.30 बजे से शाम 6.00 बजे तक खुला रहता है। यहां पहुंचने के लिए सुगम रास्ता चर्च गेट या मरीन लाइन्स लोकल ट्रेन से स्टेशन से है। मणिभवन मुंबई के चर्च गेट रेलवे स्टेशन से काफी नजदीक है। आप यहां टैक्सी करके या फिर  बस से पहुंच सकते हैं।
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( MANI BHAWAN, GANDHI, MUMBAI ) 

Monday, April 11, 2016

कन्हेरी - 109 गुफाओं में बुद्ध

अगर आप अजंता एलोरा की गुफाओं का भ्रमण कर चुके हैं तो आपको मुंबई के बोरिवली इलाके में स्थित कन्हेरी की गुफाएं जरूर देखनी चाहिए। अगर अजंता एलोरा नहीं गए तो भी कन्हेरी जरूर जाएं। यह काफी कुछ अजंता एलोरा जैसा ही है। भले ही कन्हेरी को यूनेस्को की विश्वदाय स्मारकों की सूची में नहीं शामिल किया गया है। पर ये उसकी प्रबल दावेदार हो सकती हैं। अगर देश के सात अजरजों की बात की जाए तो इसमें कन्हेरी का नाम जरूर आना चाहिए।

मराठी में इन्हें कन्हेरी लेणी कहते हैं। यह भारत की गुफाओं में विशालतम हैं, क्योंकि यहां गुफाओं की संख्या अजंता और एलोरा से ज्यादा है। कन्हेरी में कुल 110 गुफाएं हैं। कहीं कहीं ये संख्या 109 बताई जाती है। ये सभी बौद्ध गुफाएं हैं। यानी आपको सारी गुफाएं देखने के लिए पूरा स्टेमिना और इसके साथ ही समय भी चाहिए। साथ ही उबड़ खाबड़ पहाड़ी रास्तों पर ट्रैकिंग करने का इल्म भी। अगर आप सारी गुफाएं नहीं घूम सकते तो 3, 11, 34, 41, 67 और 87 जरूर देख लें। ये ज्यादा महत्व की हैं। वैसे कोशिश करें की सारी देखें।

गुफाओं में बुद्ध -  कन्हेरी गुफाओं का निर्माण ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से लेकर 11 शताब्दी के बीच में हुआ है। यानी 2200 साल से ज्यादा पुरानी हैं इन गुफाओं की कलाकृतियां। शुरुआत की गुफाओं में बुध्द की  कई अलग अलग मूर्तियां है। आगे की गुफाएं जो चढ़ाई चढ़ने के बाद आती हैं वे ज्यातर बौद्ध भिक्षुओं और साधकों का निवास प्रतीत होती हैं। ज्यादातर गुफाओं में यहां मूर्तियां नहीं है। कई गुफाओं में दो दो कमरे भी बने हुए  हैं। बारिश के दिनों में यहां पहाड़ों से कई जल स्रोत निकलते हैं। कन्हेरी को देश के 15 रहस्यमयी गुफाओं में शुमार किया जाता है।


 गुफाओं की कई बुद्ध मूर्तियां खंडित हो गई हैं। पर इसके बावजूद इनका सौंदर्य महसूस किया जा सकता है। ज्यादातर बुद्ध मूर्तियां खड़ी अवस्था में हैं। माना जाता है कि कन्हेरी बौद्ध शिक्षा के अध्ययन का बड़ा केंद्र हुआ करता था। जो समान्य गुफाएं हैं वे हीनयान संप्रदाय की मानी जाती हैं, जबकि अलंकरण वाली गुफाएं महायान संप्रदाय की हैं। कन्हेरी में सबसे ऊंची बुद्ध मूर्ति 25 फीट की है। कुछ गुफाओं तक पहुंचने के लिए चट्टानों को काटकर सीढ़ियां भी बनाई गई हैं। पहाड़ी रास्ते पर चढ़ाई करते समय सुंदर जलधारा भी दिखाई देती है। सारे गुफाओं पर नंबर अंकित किए गए हैं इसलिए घूमने में कोई दिक्कत नहीं आती।


बुद्ध की प्रतिमाओं में स्थानाक बुद्ध, मानुषी बुद्ध, बोधिसत्व के संग तारा आदि को प्रदर्शित किया गया है। कुछ प्रतिमाओं में सर्वानंद अवलोकितेश्वर, बोधिसत्व और मुचालिंद को भी प्रदर्शित किया गया है। भारतीय पुरात्व सर्वेक्षण की नजर इन गुफाओं पर काफी देर से पड़ी। कन्हेरी को 26 मई 2009 को राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित किया गया।

कैसे पहुंचे - संजय गांधी नेशनल पार्क से कन्हेरी गुफाओं की दूरी 7 किलोमीटर है। ये गुफाएं सुबह 9 बजे से शाम 5 बजे तक खुली रहती हैं। यहां का प्रवेश टिकट सिर्फ 5 रुपये का है। कन्हेरी गुफाओं की रख रखाव भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के हवाले है। अगर पार्क और गुफाएं दोनों एक दिन में घूमना चाहते हैं तो पहले गुफाएं ही घूमने जाएं।

बस और साइकिल सेवा - मुख्य द्वार से गुफा तक के लिए बस सेवा चलती है। इसमें एक तरफ का किराया 44 रुपये है इस 7 किलोमीटर के सफर के लिए। आपके पास निजी वाहन है तो प्रवेश टिकट देने के बाद निजी वाहन से भी जा सकते हैं। बस वन विभाग चलाता है। पर ये मिनी बस भरने पर ही चलती है। यहां दो बसें सेवा में हैं।

आप साइकिल किराये पर लेकर भी कन्हेरी के प्रवेश द्वार तक जा सकते हैं। कन्हेरी के प्रवेश द्वार के पास एक कैंटीन भी है। यहां आप बड़ा,  चाय काफी आदि ले सकते हैं। लेणयाद्रि की गुफाओं की तरह यहां भी बड़ी संख्या में बंदर भी हैं। उनसे थोड़ा सावधान रहें।


हरी सौंफ – कन्हेरी जाने वाली बस में  हमें एक मुंबई की महिला फोटोग्राफर मिलती हैं। उनकी हाथों में हरी सौंफ का गुच्छा है। आमतौर पर हम खाने के बाद सौंफ खाते हैं। पर हरी हरी सौंफ का स्वाद पहली बार लिया। यहां कन्हेरी उद्यान में कई जगह हरी सौंफ बिकती है। पांच रुपये में एक गुच्छा। 
( BORIVALI NATIONAL PARK, Sanjay Gandhi National Park,  KANHERI CAVES)