Thursday, March 31, 2016

मुंबई की लाइफलाइन लोकल ट्रेन

मुंबई की लाइफलाइन है लोकल ट्रेन। मुंबई का मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग और मजदूर वर्ग इसी लोकल ट्रेन के सहारे अपनी नौकरी और व्यापार को अंजाम दे पाता है। बिना लोकल के मुंबई के जीवन  में गति की कल्पना करना मुश्किल है। बारिश के दिनों भारी जलजमाव से लोकल बंद हो जाए या फिर किसी मरम्मत के कारण बंद हो कोई मार्ग तो जिंदगी मुश्किल हो जाती है। अममून मुंबई के फोर्ट इलाके से 100 किलोमीटर से ज्यादा दूर रहने वाले लोग भी लोकल ट्रेन के भरोसे से 24 घंटे अपने घर पहुंचने को लेकर निश्चिंत रहते हैं। अगर आप मुंबई में पहुंचे हैं या मुंबई में रहते हैं और आपने लोकल के नेटवर्क को समझ लिया तो समझिए की मुंबई का भूगोल समझ गए।

मुंबई में लोकल ट्रेन तीन प्रमुख लाइनें हैं। पहली लाइन विरार से चर्चगेट तक जाती है इसे वेस्टर्न लाइन कहते हैं। इसमें मीरा रोड, भायंदर, बोरिवली,कांदिवली, मलाड, अंधेरी, गोरेगांव, सांताक्रूज, बांद्रा, माहिम, दादर जैसे इलाके आते हैं। दूसरी लाइन है जो छत्रपति शिवाजी टर्मिनस से थाणे, कल्याण होती हुई पुणे मार्ग में करजत तक जाती है। इसे सेंट्रल लाइन कहते हैं। मुंबई में किसी भी उपनगर में ईस्ट और वेस्ट का मतलब भी रेलवे लाइन से जुड़ा है। रेलवे स्टेशन से पश्चिम का इलाका वेस्ट और पूरब का इलाका ईस्ट।
मुंबई की तीसरी लोकल ट्रेन की लाइन है जो छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (सीएसटी या वीटी) से पनवेल तक जाती है। इसे हारबर लाइन कहते हैं क्योंकि ये समंदर के समानंतर चलती है। हारबर लाइन सभी लोकल में सबसे नई है। 1990 से पहले यह लाइन मान खुर्द तक ही जाती थी। बाद में इसका विस्तार नवी मुंबई होते हुए पनववेल तक हुआ। 1998 से ये लोकल लाइन पनवेल तक जाती है। हालांकि इस लाइन में लोकल के लिए अप और डाउन के दो ही ट्रैक हैं। इसलिए इस मार्ग पर फास्ट ट्रेनें नहीं चलती हैं। वहीं वेस्टर्न और सेंट्रल लाइन पर लोकल के लिए कुल चार ट्रैक हैं। इसलिए इस मार्ग पर स्लो और फास्ट ट्रेनें चलाई जाती हैं। दो ट्रैक पर स्लो के अप और डाउन लाइन के लिए हैं तो दो ट्रैक पर फास्ट ट्रेनें चलती हैं। फास्ट लोकल ट्रेनों में किराया तो उतना ही लगता है पर ये सभी स्टेशनों पर नहीं रूकती हैं। लंबी दूरी के सफर करने वालों के लिए फास्ट ट्रेन मुफीद है।

मुंबई के लोकल ट्रेन में अभी भी 5 रुपये का न्यूनतम टिकट मिलता है। साल 2015 में रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने देश भर में 5 रुपये का टिकट खत्म कर दिया। पर मुंबईकरों के भारी विरोध को भांपते हुए यहां 5 रुपये का टिकट जारी है। यह बाकी देश के लोगों के लिए भारी अन्याय है। एक ही देश के एक ही रेलवे में दो तरह की टिकट प्रणाली।

हारबर लाइन का सफर

तो बात हारबर लाइन की। सीएसटी के बाद मसजिद, सैंडहर्स्ट रोड, डॉकयार्ड रोड, रे रोड, कॉटन ग्रीन, सेवरी, वडाला रोड, गुरु तेगबहादुर नगर, चूनाभाटी, कुर्ला जंक्शन, तिलक नगर, चेंबूर, गोवंडी और उसके बाद मानखुर्द। मानखुर्द आज भी गांव जैसा लगता है। इसके बाद मुंबई खत्म। इस मार्ग पर चेंबूर में राजकपूर का प्रसिद्ध आरके स्टूडियो है। सीएसटी से मानखुर्द 21 किलोमीटर है। मानखुर्द के बाद थाणे क्रीक (नाला) आता है। इस पर पुल बनाने के बाद लाइन को वासी तक ले जाया गया। मानखुर्द से वासी 8 किलोमीटर है। इन दोनों स्टेशनों के बीच लंबा पुल बना है। वासी से नवी मुंबई शुरू हो जाता है। इस मार्ग पर वासी, सनपाडा, जुईनगर, नेरूल, सी वुड दारावे, बेलापुर सीबीडी और खारघर, मानसरोवर, खांडेश्वर जैसे स्टेशनों के बाद आता है पनवेल। 

इस लाइन पर खारघर के बाद तलोजा नदी आती है। पनवेल इस मार्ग का आखिरी स्टेशन है। बेलापुर में मुंबई का विस्तार करके तमाम सरकारी दफ्तर बनाए गए हैं। इसे सीबीडी ( सेंट्रल बिजनेस डिस्ट्रक्ट ) बेलापुर कहते हैं। नवीं मुंबई का इलाका मुंबई से थोड़ा खुला खुला है। यहां भीड़ कम और सड़के चौड़ी हैं। पर इस क्षेत्र में खारघर ऐसा इलाका है ऊंची पठारी भूमि पर विकसित किया गया है। इसमें 40 से ज्यादा आवासीय और कामर्सियल सेक्टर हैं। पर नवी मुंबई के कई इलाके ऐसे हैं जो रेक्लेमेशन हैं। यानी समंदर पर कब्जा करके विकसित किए गए हैं। ज्यादातर इलाकों का विस्तार 1990 से 2000 के बीच हुआ है। हारबर लाइन के नवी मुंबई इलाके के स्टेशन भव्य बने हैं। पर पीछे के स्टेशन छोटे छोटे हैं। इस मार्ग पर 9 डिब्बों वाली लोकल ट्रेन चलती हैं। जबकि दूसरे मार्ग पर 12 डिब्बों की लोकल ट्रेन चलती हैं। अब इसके कई स्टेशनों के प्लेटफार्मों का विस्तार किया जा रहा है जिससे 12 डिब्बों वाली ट्रेनें चलाई जा सकें। मैं 19-20-21-22 फरवरी 2016 को मुंबई में था, तो उस दौरान 18 से 20 फरवरी के बीच मेगा ब्लाकेज किया गया था जिसमें सीएसटी से वडाला रोड तक लोकल को बंद किया गया था। इधर कई रविवार को मेगा ब्लाकेज करके हारबर लाइन को अपग्रेड किया जा रहा है।


टाइमलाइन - सीएसटी से मानखुर्द तक सेवा – 1951 से शुरू है। पर वासी तक 1992 में नेरूल तक फरवरी 1993 में बेलापुर तक जून 1993 में और पनवेल तक जून 1998 में सेवा आरंभ हुई।

कई लोग रोज घर नहीं पहुंचते
रात को 1.40 बजे से सुबह 4.00 बजे तक सिर्फ लोकल ट्रेन अपनी सेवा बंद करती है। शेष 22 घंटे लोगों की सेवा में अनवरत दौड़ती लोकल ट्रेन आम तौर पर 40 किलोमीटर प्रतिघंटे की गति से लोगों को मंजिल तक पहुंचाती है। पर सुबह और शाम के व्यस्त घंटों में आप लोकल की भीड़ देखें तो आपको अचरज होगा कि लोग कैसे इन लोकल ट्रेनों में चढ़ और उतर जाते हैं। हजारों लोग ट्रेन के कोच प्रवेश द्वार पर लटक कर सफर करते हैं। अगर इतनी भीड़ में आपको उतरना हो तो दो तीन स्टेशन पहले से तैयारी करनी पड़ती है। इतनी भीड़ में खतरा मोल लेकर सफर करने वाले लोगों में से हर रोज सुबह काम पर निकलने वाले लोगों में से कुछ लोग शाम को अपने घर नहीं लौटते। एक शोध के मुताबिक औसतन हर रोज मुंबई लोकल में हादसों से 10 लोगों की मौत हो जाती है। ( मई 06, 2008, आईबीएन लाइव)


  

Tuesday, March 29, 2016

चलिए मोनो रेल से देखें मुंबई

मोनो रेल यानी एक पहिए पर चलने वाली रेल। देश में मुंबई शहर में चलने लगी है मोनो रेल। इस बार मुंबई की यात्रा में हमारी दिली तमन्ना थी कि मोनो रेल का सफर किया जाए। सो 20 फरवरी की सुबह सुबह मैं और अनादि तैयार हो गए मोनो रेल के सफर पर जाने के लिए। अपने होटल के निकटतम लोकल ट्रेन के स्टेशन मसजिद पहुंचे तो पता चला कि वडाला तक जाने वाले हारबर लाइन की लोकल दो दिनों के लिए बंद है। काउंटर वाले बाबू ने कहा, दादर तक चले जाइए। वडाला बगल में ही है। दादर पहुंचकर बाहर पूछने पर पता चला कि वडाला बगल में है जरूर पर मोनो रेल का वडाला डिपो स्टेशन यहां से दूर है। थोड़ा पूछते हुए हमलोग नयगांव क्रासिंग भी पार कर गए। एक टैक्सी वाले ने बताया कि यहां से मोनो रेल का भक्ति पार्क स्टेशन नजदीक है। सो टैक्सी किया 65 रुपये किराया आया और हम पहुंच गए भक्ति पार्क मोनो रेल के स्टेशन।

मोनो रेल का स्टेशन बाहर से दिल्ली के मेट्रो रेल के स्टेशन जैसा ही है। हाईवे के ऊपर स्टेशन बनाना है। प्रवेश की सीढियों के साथ एक्सलेटर भी लगे हैं। हम उपर पहुंचे। आखिरी स्टेशन चेंबूर तक का टोकन लिया। टोकन भी मेट्रो जैसा ही है। अभी अधिकतम किराया 9 रुपये है। प्लेटफार्म पर पहुंचे। मोनो रेल के दरवाजे भी मेट्रो की तरह ही खुलते हैं। पर कोच की आंतरिक बनावट अलग है। इसमें बीच में बैठने की सीट बनी है और चारों तरफ खड़े होने के लिए। कोच की चौड़ाई दिल्ली के मीटर गेज वाले मेट्रो कोच के बराबर ही है। इंजन (लोकोमोटिव) के बाद कुल चार कोच लगे हैं। 


हमें आसमानी, गुलाबी, और हरे रंग की मोनो रेल दिखाई दी। जब मोनो रेल रफ्तार भरती है लगता है मानो कोई सांप बल खाता हुआ टेढी मेढ़ी चाल में रफ्तार भर रहा हो। मेट्रो की तुलना में मोनो रेल के ट्रैक में ज्यादा तीखे मोड़ आते हैं। स्पीड मेट्रो ट्रेन से कम है। पर चेंबूर तक के सफर में इतना आनंद आया कि हमने वापसी भी मोनो रेल से करने की ठानी। सो बाहर निकल कर वापसी का टोकन लिया। 
अभी मोनो रेल इन स्टेशनों से होकर गुजर रही है- चेंबूर, वीएनपी एंड आरसी मार्ग जंक्शन, फर्टिलाइजर टाउनशिप, भारत पेट्रोलियम, मैसूर कालोनी, भक्ति पार्क और वडाला डिपो। यानी कुल 7 स्टेशन हैं अभी। पर इसका निर्माण कार्य सेंट्रल मुंबई में जैकब सर्किल तक चल रहा है। ये ट्रैक चालू होने पर 18वां मोनो रेल स्टेशन होगा। वहीं मोनो रेल मुंबई के दिल दादर होकर भी गुजरेगी। दादर इसका 12वां स्टेशन होगा। अभी छोटी दूरी के बीच संचालित होने के कारण मोनो रेल मुंबई के लोगों में ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो सकी है। किराया वाजिब है, पर ज्यादा लोग नहीं चलते है। हर 15 मिनट पर फ्रिक्वेंसी है। पर अभी मोनो रेल परिचालन लागात के लिहाज से घाटे में जा रही है।

एमएमआरडीए चलाती है मुंबई की मोनो रेल

मुंबई मोनो रेल का संचालन एमएमआरडीए यानी मुंबई मेट्रोपलिटन रीजनल डेवलपमेंट ऑथरिटी करती है। यानी यह महाराष्ट्र राज्य सरकार के अधीन है। आधुनिक भारत में यह देश की पहली मोनो रेल है। हालांकि इससे पहले देश में दो बार मोनो रेल चलाई जा चुकी है। पटियाला स्टेट मोनो रेल पटियाला राजघराना ने चलाया था जिसमें एक पहिया रेलवे ट्रैक पर तो दूसरा पहिया सड़क पर होता था। केरल के चाय बगानों में टाटा समूह ने भी कुंडाला वैली मोनो रेल चलाई थी। पर स्वतंत्र भारत में मुंबई में पहली बार मोनो रेल चल रही है। इस बीच मोनो रेल की तकनीक बदल चुकी है। मुंबई की मोनो रेल एलिवेटेड ट्रैक पर है। इसमें मेट्रो रेल की तरह लोहे की दो पटरियां या फिर पहिए नहीं हैं।  

मुंबई में मोनो रेल का निर्माण कार्य 2009 में आरंभ हुआ। पहली मोनो रेल का संचालन 2 फरवरी 2014 को आरंभ हुआ। फिलहाल सुबह 6 बजे से रात्रि 8 बजे तक मोनो रेल चलाई जा रही है। इसे लार्सन एंड टूर्बो और मलेशिया की कंपनी स्कामी इंजीनियरिंग के सहयोग से बनाया गया है। मेट्रो की तरह इसके कोच भी वातानुकूलित हैं। इसके सभी कोच स्कोमी से बन कर मलेशिया से आए हैं। चार कोच वाले मोनो रेल में 568 लोग सफर कर सकते हैं। एक कोच में 18 लोगों के लिए बैठने की जगह और 142 लोगों के लिए खड़े होने की जगह है। हर कोच में दो सीसीटीवी कैमरे भी लगे हैं। फिलहाल छह मोनो रेल की रैक संचालन में है। साल 2013 तक मुंबई में 135 किलोमीटर मोनो रेल का ट्रैक बनाने की योजना है।

मुंबई मोनो रेल की अधिकतम स्पीड 80 किलोमीटर प्रतिघंटा होती है, हालांकि यह औसत 65 किलोमीटर की गति से चलती है। अगर ठहराव जोड़ दें तो औसत गति 31 किलोमीटर प्रति घंटे है। यानी मुंबई के लोकल ट्रेन से यह धीमी है। मुंबई लोकल 40 किलोमीटर पहुंचा देती है एक घंटे में। मोनो रेल 65 से 85 डेसीबल तक ध्वन प्रदूषण करती है जो बेस्ट की बसों से काफी कम है।
तकनीक की बात करें तो मोनो रेल में कोई पहिया नहीं होता। यह एलिवेटेड ट्रैक पर पटरियों को दोनों तरफ से पकड़ कर सरकती हुई चलती है। वास्तव में यह एक बीम होता है जिस पर रेल चलती है। इसलिए इसके डिरेलिंग यानी पटरी से उतरने की संभावना काफी कम है। यह बिजली भी ट्रैक से ही प्राप्त करती है। यानी इसमें ओवरहेड केबल नहीं होता है।
बिना किसी ट्रैफिक रूकावट के रेड लाइट से फ्री मोनो रेल का सफर रोमानी है। इसके कोच से आपको शहर का विहंगम नजारा दिखाई देता है। दुनिया के मोनो रेल की बात करें तो टोकियो की मोनो रेल काफी लोकप्रिय है जिसमें रोज 1.27 लाख लोग सफर करते हैं।
-vidyutp@gmail.com
( MONO RAIL, CHEMBUR, VADALA, MUMBAI) 


Sunday, March 27, 2016

शापिंग मुंबई के फैशन स्ट्रीट से

मुंबई में मध्यम वर्ग के लोगों के लिए खरीददारी करने का प्रिय स्थल है फैशन स्ट्रीट। पहले ये जान लेते हैं कि फैशन स्ट्रीट है कहां। तो जनाब ये वेस्टर्न लाइन के आखिरी स्टेशन चर्च गेट या फिर सेंट्रल लाइन के आखिरी टर्मिनल छत्रपति शिवाजी टर्मिनस से बीच में है। दोनों रेलवे स्टेशनों से पैदल चलकर आप फैशन स्ट्रीट पहुंच सकते हैं। अगर मुंबई के चर्चगेट स्टेशन से बाहर निकलते हैं तो बायीं तरफ रेलवे मुख्यालय के भवन को पार करके अगली सड़क को भी पार करें। पहली सड़क है महर्षि कर्वे मार्ग। इसके बाद एक खेल का मैदान दिखाई देगा। यह कर्नाटक स्पोर्ट्स ग्राउंड है। इस मैदान को पार करने के बाद आप पहुंचते है कर्मवीर भाउराव पाटिल मार्ग। इसके बाद फैशन स्ट्रीट की दुकाने शुरू हो जाती हैं। सारी दुकानों को देखते हुए चलते चलते पहुंच जाइए मेट्रो सिनेमा तक। वैसे इस सड़क का नाम कर्मवीर भाउराव पाटिल मार्ग है। आगे यह सड़क महात्मा गांधी मार्ग को जोड़ती है। पर ज्यादातर लोग इसका असली नाम नहीं जानते। फैशन स्ट्रीट मुंबई के प्रसिद्ध आजाद मैदान के सामने है। फैशन स्ट्रीट में तकरीबन 400 पंजीकृत दुकाने हैं। इसके पास का प्रसिद्ध लैंडमार्क बीएसएनल का आफिस भी है।
तकरीबन एक किलोमीटर से ज्यादा लंबा फुटपाथ का बाजार. अस्थायी दुकाने हैं, पर इन दुकानों के नंबर तय हैं। आम तौर पर सुबह 11 बजे से रात के 9 बजे तक फैशन स्ट्रीट की दुकानें खुली रहती हैं। कभी छुट्टी नहीं होती. बाजार सातों दिन ही खुला रहता है। इससे मिलता जुलता बाजार कोलाबा में भी है। पर वहां कीमतें थोड़ी ज्यादा रहती हैं।
फैशन स्ट्रीट में आप पुरुषों के लिए टी शर्ट, पैंट, शर्ट, बारमुडा, कारगो, जींस, बेल्ट, पर्स कुछ भी खरीद सकते हैं।
महिलाओं के लिए स्कर्ट, टॉप, नाइटी, गाउन से लेकर देश में आने वाले हर नए फैशन और डिजाइन को आप फैशन स्ट्रीट में महसूस कर सकते हैं। बच्चों के लिए भी हर तरह के कपड़े आप यहां पा सकते हैं। लेडीज पर्स, स्कूल बैग, बैग पैक से लेकर खिलौने तक जो कुछ भी ढूंढ रहे हैं, यहां मिल सकता है। चलते चलते भूख लग जाए तो गोलगप्पे भी खा सकते हैं।
 मुंबई के अलावा, त्रिपुर, लुधियाना या देश के दूसरे शहरों में जो कुछ भी नया बनता वह फैशन स्ट्रीट पर पहुंच जाता है। कॉटेन होजरी का त्रिपुर से बनने वाला माल यहां हर रोज पहुंचता है। फैशन स्ट्रीट के ज्यादातर दुकानदार इलाहाबाद, बलिया, जौनपुर और बिहार के हैं। थोड़ी थोड़ी बारगेनिंग होती है। मैंने एक दुकानदार से जो बलिया के थे, जैसे ही भोजपुरी में बोला, कातना के पड़ी....तपाक से बोले सब केहू से त ढाई सौ, जाईं रउआ 200 ही दे दीहीं। तो ये था अपनी माृतभाषा का कमाल। 
-vidyutp@gmail.com




Saturday, March 26, 2016

दादर यानी मुंबई का दिल

वैसे तो मुंबई बहुत बड़ी है। पर मुंबई का दिल तो दादर में बसता है। भला कैसे। अगर आप नक्शे में देखेंगे तो दादर मुंबई के लगभग बीच में है। मैंने अपने मुंबई के पुराने दोस्त आईपीएस यादव से पूछा की मुंबई में घूमने के लिए कुछ दिन रूकन हो तो कहां रूकना ठीक होगा। उन्होंने कहा, दादर में रूकिए। वहां से सारे स्थानों को जाने के लिए गाडियां मिल जाती है। वैसे दादर कहीं से भी बीच में है। यह काफी हद तक सही भी है। 

अगर लोकल ट्रेन के हिसाब से देखें तो दादर वेस्टर्न और सेंट्रल रेलवे दोनों पर पड़ता है। वहीं आप दादर से कुर्ला जाकर हार्बर लाइन की ट्रेनें भी पकड़ सकते हैं। सेंट्रल लाइन पर आप दादर से छत्रपति शिवाजी टर्मिनस भी आसानी से पहुंच सकते हैं तो वेस्टर्न लाइन पर चर्च गेट स्टेशन तक भी आसानी से जा सकते हैं। वहीं एयरपोर्ट (सांताक्रूज), फिल्म सिटी ( गोरेगांव) और अंधेरी, बांद्रा जैसे उपनगरीय इलाके भी दादर से काफी पास में हैं।

लंबी दूरी की तमाम ट्रेनें दादर होकर गुजरती हैं तो कई रूकती भी हैं। कुछ साल पहले जब मैं बड़ौदा से मुंबई जा रहा था तो हमारी ट्रेन मुंबई सेंट्रल जाने वाली थी। पर हमें जाना था छत्रपति शिवाजी टर्मिनस तो हमारी महिला सहयात्री ने बताया कि आप दादर उतर कर सीएसटी की लोकल ट्रेन पकड़ लें वो बेहतर होगा। इसी तरह हम पुणे से आ रहे तो हमारी ये ट्रेन (चालुक्य एक्सप्रेस) भी सेंट्रल तक जाने वाली थी। इस बार भी हमने वही किया दादर उतर कर लोकल से सीएसटी के लिए रवाना हुए। वैसे दादर रेलवे स्टेशन से हार्बर लाइन का वडाला लोकल स्टेशन भी काफी नजदीक है। आप दादर से बाहर निकल कर वडाला तक टहलते हुए भी जा सकते हैं। मोनो रेल का वडाला डिपो स्टेशन भी दादर से ज्यादा दूर नहीं है। जल्द ही दादर से होकर मोनो रेल भी गुजरने लगेगी।
मुंबई में किसी दोस्त से मिलना हो तो आप दादर में मिलने का तय कर सकते हैं। आप दोनों अलग अलग कोने पर रहते हों तो भी यहां आकर मिलना हो सकता है। मुंबई का प्रसिद्ध सिध्दिविनायक मंदिर भी दादर रेलवे स्टेशन से पास में है। आप दादर पश्चिम की तरफ उतर कर सिद्धिविनायक मंदिर के लिए टैक्सी की सेवा ले सकते हैं।

दादर के पश्चिमी क्षेत्र में समुद्र तट भी ज्यादा दूर नहीं है। इसी समुद्र तट पर स्थित है चैत्य भूमि। चैत्य भूमि जहां 6 दिसंबर को डॉक्टर भीमराव अंबेडकर का महापरिनिर्वाण हुआ था। हर साल 6 दिसंबर को यहां लाखों लोग पहुंचते हैं। अब यहां पर विशाल और भव्य स्मारक बनाया जा रहा है। वैसे दादर के इलाके में होलसेल बाजार भी है। मनीष मार्केट खरीददारी करने वालों की पसंदीदा जगह है। दादर पूर्व में कालनिर्णय पंचाग का दफ्तर नजर आता है तो मराठी साहित्य सम्मेलन का भवन नजर आता है। दादर पूर्व में रेलवे स्टेशन के सामने स्वामी नारायण संप्रदाय का भव्य मंदिर भी है। आपको दादर रेलवे स्टेशन के आसपास ठहरने के लिए मध्यम दर्जे के तमाम होटल भी मिल सकते हैं।
-vidyutp@gmail.com


Thursday, March 24, 2016

मुंबई की टैक्सी सेवा के बहाने प्रीमियर पद्मिनी की याद

मुंबई के कई अच्छे चेहरे हैं। इसमें एक है यहां की टैक्सी और आटो सेवा। मुंबई में कोई टैक्सी वाला आपको दिन हो या रात कभी भी कहीं जाने से मना नहीं करेगा। हमेशा मीटर से चलने की बात करेंगे। कोई किराया की बारगेनिंग नहीं। मुख्य मुंबई के इलाके में तो आटो रिक्सा चलते ही नहीं हैं। सिर्फ टैक्सी सेवाएं हैं।

 छत्रपति शिवाजी टर्मिनस, चर्चगेट, गेटवे ऑफ इंडिया, फोर्ट, कोलाबा और आसपास के इलाकों में बस के अलावा टैक्सी ही विकल्प है। पर इन टैक्सी का किराया वाजिब है। न्यूनतम किराया है 22 रुपये जिसमें आप 1.4 किलोमीटर तक जा सकते हैं। यानी डेढ़ किलोमीटर का सफर 20 से 25 रुपये के दायरे में। ये साइकिल रिक्शा के किराया के बराबर ही तो है। हम मुंबई प्रवास के दौरान सीएसटी से अपने होटल जो एक किलोमीटर था 20 रुपये देकर टैक्सी से चले जाते थे। मुंबई की पीली काली टैक्सी देखकर मेरे बेटे ने कहा का पापा पुरानी फिएट या एंबेस्डर में सफर करेंगे। नए मॉडल की गाड़ियां तो हर जगह दिखाई दे जाती हैं।

 संयोग से हमें दो या तीन बार फिएट में सफर करने का मौका मिल भी गया। साल 2013 में आए आदेश के बाद मुंबई में टैक्सी सेवा से 20 साल पुरानी गाड़ियों को फेज में बाहर किया जा रहा है। चूंकि फिएट यानी प्रीमियर पद्मिनी कार सन 2000 में बननी बंद हो गई, इसलिए मुंबई की सड़कों पर टैक्सी में अब प्रीमियर पद्मिनी कम ही दिखाई देती है। टैक्सी ड्राईवर 20 साल पूरे होने के बाद पुरानी कार के बदले नई कारें ले रहे हैं। पर प्रीमियर पद्मिनी कार की अपनी शान है।

भारत में प्रीमियर पद्मिनी कार 1964 से सन 2000 तक बनती रही। ये एंबेस्डर की तुलना में छोटे आकार की सीडान कार थी। मारुति के आने के बाद इसकी मांग में कमी आने लगी। पर ये कार लाखों लोगों की लंबे समय तक पसंद बनी रही। चार दरवाजों वाली इस कार का निर्माण भारत में वालचंद समूह करता था. इसका निर्माण मुंबई के कुर्ला में  होता था। प्रीमियर पद्मिनी विदेशी कंपनी फिएट से लाइसेंस लेकर कारों का निर्माण कर रही थी। चूंकि माडल फिएट का था इसलिए तमाम लोग प्रीमियर पद्मिनी को फिएट नाम से ही पुकारते थे। पर 1100 से 1221 सीसी की इस कार नाम 14 वीं सदी राजपूत रानी पद्मिनी के नाम पर रखा गया था। इसका निर्माण प्रीमियर आटोमोबाइल्स करती थी इसलिए कार का पूरा नाम हुआ प्रीमियर पद्मिनी। यह 4 सीलिंडर की पेट्रोल कार थी।
अब हुंडई की टैक्सियां दिखाई देती हैं मुंबई में 

 पर तमाम हूंडाई, डेवू जैसी तमाम विदेशी कंपनियों की कारों से प्रतिस्पर्धा के बीच घटती बिक्री के कारण वालचंद समूह ने कंपनी को वापस फिएट को बेच डाला। अब फिएट अपने मूल नाम से भारत में आ गई। इस तरह प्रीमियर पद्मिनी का नाम इतिहास बन गया। धीरे धीरे मुंबई मुंबई की टैक्सी सेवा से भी गायब हो रही प्रीमियर पद्मिनी सन 2020 के बाद मुंबई की सड़कों पर भी दिखाई नहीं देगी। पर देश भर में इस कार के लाखों दीवाने हैं जो सन 1973 मॉडल की प्रीमियर पद्मिनी कार को भी सड़कों पर शान से दौड़ा रहे हैं।
-vidyutp@gmail.com
( MUMBAI, TAXI, PREMIER PADMINI) 






Tuesday, March 22, 2016

रूमानी है एलिफैंटा के लिए स्टीमर का सफर

मुंबई के गेटवे ऑफ इंडिया से एलीफैंटा टापू तक जाने में तकरीबन सवा घंटे लगते हैं। पर ये सफर यादगार होता है। दूरी की बात करें तो यह रास्ता 12 किलोमीटर का है। मुंबई से एलीफैंटा के बीच कुल 90 मोटर बोटों को संचालन होता है। ये मोटर बोट एक सहकारी समिति के तहत चलती हैं। इनमें आने जाने का टिकट एक साथ ही मिल जाता है। एक टिकट किसी भी मोटर बोट पर मान्य होता है। इन मोटर बोट में आप नीचे कुरसियों पर या फिर छत पर जाकर खुले में कुरसियों पर बैठ सकते हैं। अमूमन बोट में मौजूद स्टाफ ऊपर बैठने के लिए 10 रुपये अतिरिक्त मांगते हैं। पर नजारे ऊपर बैठे या नीचे हर जगह से दिखाई देता है। समंदर की लहरों से अटखेलियां करती हुई बोट हौले हौले आगे बढ़ती है। आप चाहें तो स्पीड बोट से भी एलीफैंटा जा सकते हैं।


 गेटवे ऑफ इंडिया से जाने के समय धीरे धीरे मुंबई से आप दूर होते जाते हैं। तब पीछे देखने पर गेटवे आफ इंडिया ताज होटल और कोलाबा का सुंदर नजारा नजर आता है। जिनको आप तसवीरों में उतार सकते हैं। समंदर मं लहरों के साथ बोट कई बार उछलती हुई नजर आती है। बोट के आसपास बड़ी संख्या में सफेद पक्षी अटखेलियां करते हैं। इन पक्षियों को देखना बड़ा भला लगता है। कई बार लोग इन पक्षियों को दाने डालते हैं। एक मोटर बोट  में तकरबीन सौ लोग सफर करते हैं। एक बोट के भरने के बाद ही दूसरी बोट संचालित होती है।

एलीफैंटा के मार्ग पर समंदर में कई मध्यम आकार के जहाज नजर आते हैं। ये जहाज वास्तव में नौ सेना की ओर से समंदर पर निगरानी के लिए लगाए गए हैं। इन जहाजों में अंकलेश्वर समेत कई अलग अलग नाम के जहाज हैं। इन पर हमारी सेना के जवान हमेशा चौकसी करते हुए नजर आते हैं। बीच में कुछ छोटे टापू भी नजर आते हैं।
एक शिलापट्ट हमें ये जानकारी देता है कि 5 मई 1989 को एलिफैंटा द्वीप पर बिजली आई। इसके पहले यहां रोशनी का इंतजाम नहीं था। पर अब एलीफैंटा रात में भी रोशन रहता है। जब आप स्टीमर से एलीफैंटा के तट पर पहुंचते हैं तो वहां स्वागत का बोर्ड नजर आता है। एक खिलौना ट्रेन नजर आती है जो थोड़ी दूर का सफर कराती है 5 रुपये में। खिलौना ट्रेन खत्म होने के बाद आपको एलीफैंटा जिसका नाम धारापुरी भी है में प्रवेश के लिए 10 रुपये का टैक्स देना पड़ता है। यह टैक्स यहां की नगर पंचायत वसूलती है। इसके बाद ऐतिहासिक गुफाओं तक पहुंचने के लिए तकरबीन 500 से ज्यादा सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। हालांकि इन सीढ़ियों के दोनों तरफ बाजार है इसलिए यह पदयात्रा मुश्किल नहीं लगती है। हालांकि जो लोगो बुजुर्ग या विकलांग हैं उनके लिए पालकी का भी इंतजाम है। एलीफैंटा में खाने पीने के लिए कई रेस्टोरेंट भी हैं जहां पर वाजिब कीमत पर ही खाने पीने की सामग्री मिल जाती है। हालांकि आप एलीफैंटा से लौटने का समय याद रखें। आखिरी स्टीमर शाम को छह बजे तक चलती है।
- vidyutp@gmail.com

( एलीफैंटा की आगे की कड़ी यहां पढ़े  ) 

Monday, March 21, 2016

पुणे जंक्शन पर रेलवे की लापरवाही से हमारी ट्रेन छूट गई

51034 शिरडी मुंबई छत्रपति शिवाजी फास्ट पैसेंजर में हमारा आरक्षण एसी 3 कोच मे था। तीन सीटें आरक्षित थीं। पीएनआर नंबर था 8400165464  कुल किराया दिया 1515 रुपये। कोच बी-1 में सीट नंबर थी 33, 36 और 39 हमने 18 फरवरी को चलने वाली ट्रेन के लिए 6 फरवरी 2016 को ऑनलाइन टिकट बुक कर लिया था। पुणे जंक्शन स्टेशन समय पर पहुंचे। तीन घंटे इंतजार के बावजूद रेलवे की घोर लापरवाही से हम ट्रेन नहीं पकड़ सके। रेलवे की आनलाइन इन्क्वारी सेवा में ट्रेन लेट बताई जा रही थी। पर पुणे जंक्शन पर लगे डिजिटल डिस्प्ले बोर्ड पर 51034 ट्रेन के बारे में कहीं कोई उदघोषणा नहीं हो रही थी। हम लगातार डिस्प्ले बोर्ड देख रहे थे। पर बीजापुर से आने वाली 51030 के बारे में सूचना जरूर आ रही थी। हालांकि 51034 एक रोज चलने वाली पैसेंजर ट्रेन है जो शिरडी से आती है, इसकी कोई जानकारी डिस्प्ले बोर्ड पर नहीं आ रही थी।

मैंने एक बार 12 बजे रात को मोबाइल क्रिस की साइट पर चेक किया तो पता चला कि ट्रेन पुणे से पीछे वाले स्टेशन पर खड़ी है। रात एक बजे चेक करने पर पता चला कि ट्रेन पुणे स्टेशन पर खड़ी है। हालांकि हमने प्लेटफार्म नंबर एक से लेकर छह तक चेक किया कहीं भी ट्रेन नंबर 51034 का अता पता नहीं था। थोड़ी देर बाद क्रिस की वेबसाइट ने अपडेट किया कि ट्रेन पुणे से तीन किलोमीटर आगे शिवाजीनगर जा चुकी है। अब हमारी चिंता बढ़ी मैं परिवार के साथ अपना ढेर सारा लगेज लिए हुए दौड़ता हुआ प्लेटफार्म नबंर एक पर स्टेशन मास्टर के दफ्तर में पहुंचा। वहां मेरा पाला ऑन ड्यूटी स्टेशन मास्टर से पड़ा। उन्होंने बताया कि हां ट्रेन आई और चली भी गई। उनसे ही पता चला कि ये 51034 ट्रेन पुणे में बीजापुर से आने वाली 51030 के साथ जुड़ कर आगे मुंबई की ओर जाती है। पर रेलवे स्टेशन के डिस्प्ले में हर रोज चलने वाली इस ट्रेन के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई। ऐसा हर रोज होता है।


रेलवे की इस घोर लापरवाही से हमारी ट्रेन छूट गई। हमने वातानुकूलित क्लास में आरक्षण इसलिए कराया था कि रात भर सो कर आराम से मुंबई जा सकें। पर हमारी ये रात किसी बुरे सपने मे तब्दील हो गई। ड्यूटी पर मौजूद स्टेशन मास्टर ने अपना नाम बताने से इनकार किया। रेलवे की घोर लापरवाही ये भी है कि इस दैनिक ट्रेन का कोई डिजिटल डिस्प्ले नहीं हुआ साथ ही कोई उदघोषणा भी इस ट्रेन को लेकर नहीं की गई। मैं, मेरी पत्नी माधवी और बेटा अनादि लगातार अपनी ट्रेन को लेकर होने वाली घोषण पर ध्यान रखे हुए थे। इस तरह हमारे 1515 रुपये झटके में पानी में चले गए। हम निर्धारित समय पर मुंबई नहीं पहुंच सके इसको लेकर परेशानी हुई सो अलग। आखिर इसके लिए कौन जिम्मेवार है। प्लेटफार्म नंबर एक पर मौजूद पूछताछ केंद्र के बाबू ने भी माना कि 51034 ट्रेन को लेकर कहीं डिजिटल डिस्प्ले नहीं किया गया। उन्होने कहा इस संदर्भ में आप स्टेशन मास्टर से बात करें।

स्टेशन मास्टर का लापरवाही भरा जवाब था कि इस बाकी लोग इस ट्रेन से जाने वाले चले गए, आप कैसे रह गए। दरअसल बाकी स्थानीय लोगों को ये मालूम है कि पुणे से 51034 और 51030 जुड़ कर चलती हैं पर किसी बाहरी व्यक्ति को ये कैसे पता चलेगा जब तक इसके बारे में रेलवे स्टेशन पर डिस्प्ले या उदघोषणा नहीं होगी। मैंने डीआरएम पुणे और जीएम सेंट्रल रेलवे, सीएसटी मुंबई को अपनी शिकायत टिवटर पर की है। मेरे नुकसान की भरपाई से ज्यादा जरूरत इस बात की है कि पुणे स्टेशन पर इस ट्रेन के बारे में नियमित डिस्प्ले और घोषणा हो और स्टेशन के लापरवाह अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए।
उपसंहार - कुछ लोगों ने जानना चाहा इसके बाद क्या हुआ। रात के 2.10 बजे चालुक्य एक्सप्रेस आ रही थी पुड्डुचेरी से। हमने तीन जनरल टिकट खरीदे। इंजन के ठीक बाद वाले कोच में मुश्किल से जगह मिल गई। तकरीबन तीन घंटे में चालुक्य एक्सप्रेस ने हमें दादर पहुंचा दिया। 
vidyutp@gmail.com 
( PUNE, RAIL) 





Sunday, March 20, 2016

स्पंज डोसा का स्वाद अलबेला

मसाला डोसा तो आपने कई तरह के खाए होंगे, पर स्पंज डोसा का स्वाद लिया क्या। तो आइए लेते हैं स्पंज डोसा का स्वाद... कहां। पुणे में।  वैसे तो दक्षिण भारत में रहते हुए और अलग अलग राज्यों में घूमते हुए कई तरह के डोसा का स्वाद लिया है। मसाला डोसा, प्लेन डोसा, मैसूर मसाला डोसा, रवा डोसा के अलावा मूंग दाल डोसा। पर इस बार पुणे के रेस्टोरेंट में स्पंज डोसा देखने और खाने को मिला। जैसा की नाम से ही स्पष्ट है कि यह स्पंज जैसा होता है। यह डोसा बनाने की महाराष्ट्रियन तकनीक है। इसमें डोसा को रोटी के आकार का बनाते हैं। पर इसमें मसाला मिला कर इसे लपेटते नहीं है। बल्कि मसाला और चटनी अलग से परोस देते हैं। स्पंज डोसा बनाने का यह तरीका दक्षिण के दावणगिरी से आया है। यह लोकप्रिय तौर पर सुबह और शाम का नास्ता है। इसमें डोसा पेस्ट बनाकर इसे तवे पर कम दायरे में फैलाते हैं। यह परंपरागत डोसा की तुलना में थोड़ा मोटा तैयार होता है। खाने में यह नर्म और मुलायम रहता है।
पुणे के बंद गार्डन रोड पर बंद गार्डन के पास स्थित छोटे से बाजार में स्पंज डोसा बनता हुआ देखा। रेस्टोरेंट का नाम था पुणेरी काटा। यहां लिखा था दावणगिरी लोणी का मशहूर स्पंज डोसा। सो हमारी भी इच्छा हुई इस डोसा को चखने की। यह तो भोजपुरी इलाके में गांव में बनने वाले ढकनेसर की तरह है।मानो यह चावल की रोटी है जो तवे पर बनाई गई है। पर यहां इसका नाम दिया गया है स्पंज डोसा। खैर नाम जो भी हो खाने में स्वाद तो आता है। और दाम । तो जनाब ये मिल रहा है 30 रुपये की प्लेट। और एक प्लेट में हैं तीन स्पंज डोसा।आप एक प्लेट लेकर खा लो तो आपका पेट भर जाए। तो कभी पुणे की तरफ पहुंचे तो जरूर स्पंज डोसा का स्वाद लें। दुकान के प्रोपराइट हैं शैलेश। वे प्लेन स्पंज डोसा के अलावा स्पंज ओनियन डोसा,स्पंज ओनियन टोमैटो डोसा,  स्पंज टोमाटो डोसा भी बनाते हैं। एक और वेराइटी है स्पंज काकटेल डोसा। सबका स्वाद लेकर देखिए ना।


Friday, March 18, 2016

स्वाद...विरासत और परंपरा - काका हलवाई

पुणे के काका हलवाई। पुणे की प्रसिद्ध मिठाई की दुकान। पुणे के प्रसिद्ध दगडुसेठ हलवाई गणपति मंदिर से थोड़ी दूरी पर है ये मिठाइयों की दुकान। यूं तो हमें इस दुकान के बारे में पहले पता नहीं था। पर बाहर से विशाल इमारत और आसमान में लहराते बड़े से बोर्ड को देखकर इच्छा हुई इस दुकान से कुछ स्वाद लेने की। तो मैं और अनादि काका हलवाई के शोरूम में प्रविष्ट हुए। ग्राउंड फ्लोर में किस्म किस्म की मिठाइयां और नमकीन। आपको जो पसंद हो आर्डर करते जाइए। पहले आपको एक डिजिटल टोकन लेना पड़ता है। जिस काउंटर से जो भी खरीदेंगे उनका सिस्टम आपके टोकन में दर्ज करता जाएगा। सारी खरीददारी के बाद काउंटर पहुंचे। अपना टोकन जमा करें। आपका बिल हाजिर होगा।

अगर आप बैठकर खाना चाहते हैं तो सेल्फ सर्विस की तरह अपना आर्डर प्राप्त करें और अपनी प्लेट लेकर पहली मंजिल के डाइनिंग हॉल में पहुंच जाएं। वहां खाने के बाद नीचे पहुंचे और बिलिंग काउंटर पर अपना बिल जमा करें। काका हलवाई में प्रवेश करने का और निकास का रास्ता अलग अलग है, ताकि कोई बिना बिल दिए न निकल जाए। पुणे के अन्य़ दुकानों से काका हलवाई की मिठाइयां थोड़ी महंगी हैं पर उनकी क्वालिटी भी उम्दा है। 
अनादि ने अपने लिए इमरती पसंद की। तो मैंने मटर करंजी ( पैरकिया जो नमकीन होता है) और साथ में मटर समोसा। एक मटर समोसा और मटर करंजी 15-15 रुपये का है। लेकिन स्वाद उम्दा है। कई बार काका हलवाई के काउंटर पर भारी भीड़ उमड़ती है। 
काका हलवाई की इमरती काफी लोगों की पसंद है। वैसे आपको यहां तमाम तरह की मिठाइयां मिल जाएंगी। खास तौर पर पेडे, मावा मिठाई, खोवा बर्फी, लड्डू और हलवा उनकी खासियत है। 

वैसे काका हलवाई की कहानी शुरू होती है 1892 से। गुणवत्ता और साफ सफाई को बनाए रखना काका हलवाई की प्रमुख विशेषता है। वे तीन विंदुओं का ध्यान रखते हैं। QHS यानी क्वालिटी, हाईजिन और सर्विस। अब पुणे में काका हलवाई के 18 सेल्स आउटलेट हैं। जबकि मुख्यालय सदाशिव पेठ, तिलक मार्ग पर है।  (www.kakahalwai.com)  काका हलवाई सुबह 8 बजे से रात्रि नौ बजे तक खुला रहता है। हर रोज। कोई साप्ताहिक छुट्टी नहीं होती। कैसे पहुंचे। भला ये भी कोई बताने की बात है। पुराने पुणे के बुधवार पेठ में स्थित काका हलवाई का रास्ता कोई भी बता देगा।
पता है – काका हलवाई, 1114 शिवाजी रोड, निकट दत्त मंदिर, बुधवार पेठ पुणे। 

Tuesday, March 15, 2016

बेटे की याद में बनवा डाला विशाल संग्रहालय- केलकर म्युजियम

देश कुछ बेहतरीन संग्रहालयों में से एक है पुणे का राजा दिनकर केलकर म्युजियम। ये संग्रहालय पुणे के शुक्रवार पेठ में स्थित है। यह संग्रहालय किसी एक आदमी के प्रयास से किए संग्रह का बेहतरीन नमूना है। इस संग्रहालय की स्थापना 1962 में हुई थी। संग्रहकर्ता डाक्टर दिनकर गंगाधर केलकर को उनके शानदार कार्य के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया। वे 14 मई 1990 को इस दुनिया को अलविदा कह गए, पर उनके अदभुत संग्रह को देखने के लिए हजारों लोग रोज देश विदेश से यहां पहुंचते हैं। डाक्टर केलकर ने ये संग्रहालय अपने बेटे राजा की स्मृति में बनवाया था।

केलकर संग्रहालय की लाल रंग की तीन मंजिला इमारत है। प्रवेश द्वार पर टिकट लेने के बाद आप आगे बढ़ते तो आपको सबसे पहले कई किस्म के लकड़ी के नक्काशीदार दरवाजे देखने को मिलते हैं। तीन मंजिल से संग्रहालय में घूमने के तरीके लिए मार्ग दर्शक बना हुआ है। बिना किसी गाइड के आनंद लेते हुए आप पूरा संग्रहालय घूम सकते हैं। संग्रहालय में लकड़ी से बने वस्तुओं का विशाल संग्रह है। इनमें पंच मुखी मारूति की प्रतिमा आपको आकर्षित करेगी। 19वीं सदी की तमिलनाडु से प्राप्त मीनाक्षी की प्रतिमा। याली यानी दुष्टदमनक की प्रतिमाएं खास तौर पर ध्यान खिंचती हैं।

एक खंड में रसोई में प्रयोग किए जाने वाले पुराने समानों का सुंदर संग्रह है। इनमें से कई सामान ऐसे हैं जिन्हें शहर के लोगों ने देखा ही नहीं होगा। तेल रखने का का एक विशाल मर्तबान इस खंड में है जो ऊंट के चमड़े से बना है। केलकर संग्रहालय में वस्त्र गैलरी, कठपुतली गैलरी भी खास हैं।

वाद्य यंत्रों की खास गैलरी - एक गैलरी में विभिन्न किस्म से शास्त्रीय वाद्य यंत्रों का संग्रह देखा जा सकता है। यहां तानपुरा, सितार, ताउस, सर्पाकृति तानपुरास तंबोरा, सारंगी देखी जा सकती है। आप यहां उस्ताद कादरबक्श खां साहब की सारंगी भी देख सकते हैं। विचित्र वीणा, मयूर वीणा, त्रिदंडी तंबूरा, बाल गंधर्व का इस्तेमाल किया हुआ तंबूरा देख सकते हैं। पांव से बजाया जाने वाला हारमोनियम, गोटू वाद्यम देख सकते हैं। पंच मुख वाद्यम देखकर अचरज होता है। इसमें विशाल घड़े पर पांच तबले बनाए गए हैं। यहां आप 16 तारों वाला नारायण वीणा भी देख सकते हैं। इतना ही नहीं मृदंग, शहनाई, बांसुरी, चंग (आदिवासी वाद्य, चांदनी नगस्वरम, सुर बहार, रुद्रवीणा आदि का भी संग्रह देख सकते हैं। एक जगह हाथी दांत के प्यादों से बनी बनी शतरंज की बिसात दिखाई देती है।

मस्तानी महल की सैर- पर केलकर संग्रहालय का खास हिस्सा है मस्तानी महल। पेशवा बाजीराव तृतीय की प्रेमिका बाजीराव मस्तानी के जीवन से जुड़ी कथाओं के संसार को मस्तानी महल में आकर महसूस किया जा सकता है। ये संग्रहालय खास तौर पर छात्रों और शोधार्थियों के लिए काफी उपयोगी है। जो लोग भारत की संस्कृति और विरासत के बारे में जानने में रूचि रखते हैं उनके लिए बेहतरीन जगह है। 

कैसे पहुंचे-  संग्रहालय शुक्रवार पेठ में नातुबाग में बाजीराव रोड पर स्थित है। केलकर संग्रहालय में प्रवेश टिकट 50 रुपये का है। बच्चों के लिए 10 रुपये का टिकट है। फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के लिए अलग से टिकट लेना पड़ता है। संग्रहालय 15 अगस्त 26 जनवरी और अनंत चतुर्दशी को बंद रहता है। बाकी के दिन सुबह 10 बजे से शाम 5.30 बजे तक संग्रहालय खुला रहता है।
केलकर संग्रहालय में श्री गणेश और श्री लक्ष्मी।

-         vidyutp@gmail.com

  

Sunday, March 13, 2016

पार्क में बैठे ओशो – मानो अभी बोल उठेंगे

पुणे शहर से कई लोगों को रिश्ता जुड़ा है। कभी यह गांधी और अंबेडकर का शहर था। तो पुणे आध्यात्मिक गुरु आचार्य रजनीश यानी ओशो की भी स्थली रही है। ओशो अमेरिका से वापस आने के बाद अपने आखिरी वक्त में यहीं पर रहे। पुणे ही क्यों भला। एक तो पुणे का मौसम है जो काफी लोगों को अपनी ओर खिंचता है। मुंबई के रहने वाले लोग भी यहां घर बनाकर रहना पसंद करते हैं। चाहे वे लता मंगेश्कर हों या फिर सचिन तेंदुलकर। पुणे का मौसम सदाबहार रहता है। न सरदी ज्यादा पड़ती है न गरमी ज्यादा। मुंबई से तीन घंटे का रास्ता है। आसपास में घूमने के लिए भी तमाम लोकेशन हैं। पुणे में ओशो ने अपना आश्रम बनाया कोरेगांव पार्क इलाके में। यह शहर का पॉश इलाका है। रेलवे स्टेशन से ज्यादा दूर भी नहीं है।


 मैं पुणे में  बंद गार्डन रोड पर होटल ला रॉस में ठहरा था। मेरी इच्छा ओशो के आश्रम का इलाका देखने की थी। सो सुबह का मार्निंग वाक शुरू किया। हमारे होटल के पास शहीद हेमंत करकरे चौक से सीधा रास्ता कोरेगांव पार्क की ओर जाता है। करीब दो किलोमीटर पैदल टहलते हुए जाने के बाद ओशो पार्क का इलाका आ गया। एक दाहिनी तरफ मुड़ रही सड़क में जाने पर ओशो कम्यून का प्रवेश द्वार मिला। आम लोगों के लिए ओशो कम्यून के प्रवेश द्वार पर एक प्रदर्शनी है जो दिन में खुलता है। ओशो इंटरनेशनल मल्टी मीडिया गैलरी सुबह 9.00 से दोपहर 1.00 बजे और दोपहर 2.00 से शाम 4.00 बजे तक लोगों के लिए खुलता है। मैं सुबह सुबह पहुंचा था इसलिए प्रदर्शनी देख नहीं सका। ओशो कम्यून कोरेगांव पार्क लेन नंबर वन में है। लेन नंबर वन में दोनों तरफ हरियाली नजर आती है और शांति का एहसास होता है। आसपास में कुछ होटल हैं, जहां अच्छी संख्या में विदेशी नजर आते हैं। ओशो के भक्त दुनिया भर में हैं जो पुणे पहुंचते रहते हैं। इसी सड़क पर साधु टीएल वासवानी का हास्पीटल है। इस अस्पताल में मेरे बीएचयू के जमाने को दोस्त गौतम शरण कैंसर स्पेशलिस्ट हैं। हालांकि वे शहर में नहीं थे इसलिए उनसे मिलना नहीं हो सका।

कोरेगांव पार्क के लेन नंबर 2 में ओशो तीर्थ पार्क है। ये हरा भरा पार्क जिसमें आप सुबह टहल सकते हैं। पार्क के अंदर सुंदर झरने हैं। पार्क सुबह से शाम तक खुला रहता है। यहां कई बार दो दिल मिल रहे हैं चुपके चुपके सा नजारा दिखाई देता है। पार्क के अंदर एक जगह बांस के झुरमुट के आगे ओशो की पत्थर की बैठी हुई प्रतिमा नजर आती है। प्रतिमा को देखकर लगता है मानो अभी ओशो बोल उठेंगे।

ओशो पार्क से रास्ते में लौटते हुए जर्मन बेकरी दिखाई देती है। छोटी सी जर्मन बेकरी विदेशियों से गुलजार रहती है, खास तौर पर शाम को। जर्मन बेकरी से कुछ याद आता है आपको..

- vidyutp@gmail.com



Tuesday, March 8, 2016

एक मराठी शादी में....बारी बरसी खटन गया सी...

फरवरी 16 साल 2016 की सुबह हमारा पुणे जाना हुआ था शादी में शामिल होने के लिए। शादी किसकी। हमारी साली साहिबा की। वे रेडियोलॉजिस्ट हैं। पटना की हैं पर मुंबई में रहते हुए उन्होंने अपने लिए मराठी दुल्हा ढूंढा। तो शादी की सारी रश्में मराठी रीति रिवाज से होनी थी। सोलह फरवरी की शाम बंद गार्डन रोड पर रॉयल कनाट बोट क्लब की शाम गुलजार हुई सगाई की रस्म और संगीत से। रायल कनाट बोट क्लब पुणे का बड़ा ही पुराना और प्रतिष्ठित क्लब है। ये 1890 का स्थापित है जैसा कि इसका साइन बोर्ड बताता है। यह सेना के लोगों की खास पंसद में से है। यूं कहें कि ये पुणे का ये खास हैपनिंग सेंटर है। 16 फरवरी का दिन मेरे लिए भी खास है क्योंकि 1996 में इसी दिन यानी 20 साल पहले हमने अपनी पहली नौकरी शुरू की थी।

खैर सगाई की रस्म, रिंग सेरमनी गुजर गया। पर इस दिन खास आकर्षण था संगीत जिसे वर पक्ष के लोगों ने काफी मेहनत से तैयार किया था। इसमें धुले शहर के तमाम डाक्टर दंपतियों ने हिंदी फिल्म के गीतों पर लाइव परफारमेंस किया। गीतों भरी कहानी थी वो जिसमें बूढ़े डाक्टर दंपति संगीत की धुन पर थिरकते हुए जिंदगी जिंदादिली का नाम है...जैसा कुछ संदेश दे रहे थे। कहानी का तानाबाना शानदार बुना गया था। कोरियोग्राफी भी दमदार थी। इतने अच्छे परफारमेंस के बाद कुछ खाना पीना। महाराष्ट्र के शादी की खास बात होती है कि यहां खाने पीने पर फिजूलखर्ची नहीं होती। भोज के मीनू में चयनित आइटम होते हैं। पूरे देश के लोगों को मराठी लोगों से इस मायने में सीख लेनी चाहिए। उत्तर भारत की तरह चाट पकौड़े गोलगप्पे के स्टाल नहीं।

17 फरवरी की सुबह शादी का मुहुर्त था। सो बारात सात बजे लगनी शुरू हो गई। होटल सन एंडसैंड में । बारात में सभी पंजाबी धुन में थिरक रहे थे। ढोल मास्टर गा रहे थे –
बारी बरसी खटन गया सी...खटके ले आंदे ताले
और अब डांस करेंगे दूल्हे के साले।

बारी बरसी खटन गया सी...खटके ले आंदे बालियां
और अब डांस करेंगी दूल्हे के सालियां।

फिर - बारी बरसी खटन गया सी...खटके ले आंदे चूल्हा
और अब डांस करेंगा शादी वाला दूल्हा....

उनके निर्देश के हिसाब से सभी डांस करने को तैयार होते जा रहे थे।

बारी बरसी खटन गया सी...खटके ले आंदे तारे
और अब डांस करेंगे सारे के सारे....   और सारे लोग नाच उठे।

सुबह 9 बजे शादी आरंभ हो गई। शादी में पुरोहित की भूमिका निभा रही थीं एक महिला। पुणे शहर में कई महिलाएं शादी से कर्मकांड कराती हैं। हमारी शादी की पुरोहित उच्च कोटि की विद्वान नजर आ रही थीं। वे शादी के सारे मंत्रों का अर्थ, हिंदी और मराठी में भी समझा रही थीं। साथ ही वे शादी के मंत्रों और संकल्पों को आधुनिक संदर्भों में भी समझाने की कोशिश कर रही थीं।

लगभग दो घंटे में शादी संपन्न हो गई। इस शादी में कई रोचक रस्में थी जो यहीं पर देखने को मिलीं। शादी खत्म हो जाने के बाद कन्या का भाई जाकर दुल्हे का कान खींचता है और कान में चुपके से कुछ कहता है। ( सारी उम्र मेरी बहन का ख्याल रखना ) दोपहर के लंच से पहले शादी की सारी रश्मों का समापन हो चुकी थी। सारे लोगों ने लंच किया उसके बाद शुरू हो गई विदाई की तैयारी। पर कुछ रोना धोना नहीं हुआ। अब भला दुल्हन रोती है क्या।

-vidyutp@gmail.com

Sunday, March 6, 2016

बुधवार पेठ- यहां सावित्री बाई फूले ने खोला था पहला बालिका विद्यालय

अगर महाराष्ट्र का शहर मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है तो पुणे महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी। पुणे महाराष्ट्र का पुराना शहर है। इसे पुण्य नगरी भी कहा जाता है। पर पुणे शहर के दो हिस्से हैं। पुराना शहर और नया शहर। बात पुराने शहर की करें तो यह पेठ का शहर है। इनके नाम हैं- रविवार पेठ, सोमवार पेठ, मंगलवार पेठ, बुधवार पेठ, गुरुवार पेठ, शुक्रवार पेठ, शनिवार पेठ, नाना पेठ, कसबा पेठ, रास्ता पेठ, गणेश पेठ आदि। पुणे जंक्शन रेलवे स्टेशन से प्लेटफार्म नंबर एक की तरफ बाहर निकलने के बाद जब आप दाहिनी तरफ की ओर चलेंगे तो सबसे पहले आप मंगलवार पेठ में पहुंच जाएंगे। किसी जमाने में ये बाजार पुणे की रौनक थे। रौनक आज भी है। पर अब भीड़ बढ़ गई है। कई सड़कों को वन वे कर दिया गया है। कई सड़कों पर बसें नहीं चलतीं। सिर्फ आटो रिक्शा से या पैदल चला जा सकता है।
वैसे पुणे शहर में कुल 17 पेठ हैं। इन सभी पेठ का निर्माण पेशवा के शासन काल में17वीं से 19वीं शताब्दी के बीच हुआ है। पेठ से तात्पर्य शहर के किसी इलाका से है। जिन पेठ का नाम अलग अलग दिन पर है। किसी जमाने में उस क्षेत्र में उसी दिन साप्ताहिक बाजार लगा करता था। जैसे बुधवार पेठ में बुधवार के दिन। हालांकि अब ये नियमित बाजार में तब्दील हो चुके हैं।  बुधवार पेठ की शुरुआत पेशवा बालाजी विश्वनाथ ने कराई थी। हर पेठ के साथ किसी न किसी राजा का नाम जुड़ा हुआ है। सदाशिव राव पेशवा ने सदाशिव पेठ तो नारायण राव पेशवा ने नारायण पेठ की शुरुआत कराई। नाना फड़नवीस के समय में नाना पेठ की शुरुआत हुई। ब्रिटिश काल में जिस बाजार की शुरुआत हुई उसका नाम नवी पेठ पड़ गया।
इन सबके बीच कसबा पेठ सबसे पुराना है जिसकी शुरुआत नौवीं शताब्दी में चालुकय राजाओं ने कराई थी। ये सारे पेठ पुणे की संस्कृति और विरासत का परिचय देते हैं। बाजार में दुकानों का स्वरूप बदल रहा है पर प्राचीनता की सोंधी सी खूशबु भी आप इन पेठ से गुजरते हुए महसूस कर सकते हैं। बुधवार पेठ के पास आप पुणे नगरपालिका की ऐतिहासिक इमारत भी देख सकते हैं।  बुधवार पेठ में 1660 में औरगंजेब ने अपना डेरा डाला था।
सन 1848 में सावित्री बाई फूले ने महाराष्ट्र में लड़कियों के लिए पहला स्कूल बुधवार पेठ में ही भीडे वाडा में शुरू किया था। तब माता सावित्री बाई फूले को लड़कियों को शिक्षा देने के कारण काफी विरोध का सामना करना पड़ा था। तब सावित्रि बाई फूले की उम्र मात्र 17 साल थी जब उन्होंने इतना बड़ा क्रांतिकारी कदम उठाया था। सावित्री बाई ने अछूत महिलाओं की सेवा की तो ऊंची जाति की महिलाओं को भी पढ़ाने का काम किया। बापू से भी पहले फूले दंपति ने छूआछूत खत्म करने के लिए कई व्यवहारिक कदम उठाए।
 सावित्री बाई फूले ( जन्म 3 जनवरी 1831 - निधन 10 मार्च 1897)
 जहां सावित्रि बाई ने स्कूल शुरू किया ता वह जगह मशहूर दगड़ु सेठ हलवाई गणपति के मंदिर के पास ही है। शुक्रवार पेठ इलाके में स्थित पुणे महानगर पालिका के फल मंडी का भवन का नाम महात्मा फूले के नाम पर है। महात्मा फूले मंडई पुणे शहर का सबसे बड़ा फल बाजार है।
बात एक बार फिर बुधवार पेठ की तो  अब बुधवार पेठ की पहचान बदल गई है। आम तौर पर देश भर में टैक्सी में लगने वाला रेंट मीटर यहीं बुधवार पेठ में ही बनता है। बुधवार पेठ का एक और चेहरा है। यहां देश बड़ा रेडलाइट एरिया भी है। तकरीबन 5000 से ज्यादा सेक्स वर्कर्स यहां रहती हैं।

Friday, March 4, 2016

आगा खां पैलेस – जहां बा बापू का साथ छोड़ गईं

पुणे के यरवदा इलाके में स्थित आगा खां पैलेस, देश के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास बताने वाले प्रमुख स्मृति स्थलों में से एक है। मुख्य सड़क पर स्थित यह विशाल इमारत ब्रिटिश सत्ता से भारत के संघर्ष की कहानी सुनाता है। आगा खां पैलेस इसलिए खास है क्योंकि बापू ने यहां गिरफ्तारी ( नजरबंदी) का लंबा वक्त गुजारा, साथ ही बापू के दो प्रिय लोग इसी इमारत में उनका साथ छोड़ गए। पहले उनके निजी सचिव महादेव भाई देसाई और फिर जीवन के हर उतार चढ़ाव में उनका साथ निभाने वाली उनकी जीवन संगिनी कस्तूरबा गांधी। 22 फरवरी 1944 का दिन था जब बा इस दुनिया से कूच कर गईं। आगा खां पैलेस में बापू व्यक्तिगत तौर पर दो बार टूटते हुए प्रतीत हुए। आज पैलेस की बगिया में  आप बा और महादेव भाई देसाई की समाधि साथ साथ देख सकते हैं। 

आगा खां महल का निर्माण - आगा खां पैलेस का निर्माण 1892 में खोजा इस्माइली धर्म गुरु सुल्तान मोहम्मद शा आगा खां ने करवा था। वास्तव में महल का निर्माण आसपास के सूखा पीड़ित गांव के लोगों को रोजगार देने के उद्देश्य से करवाया गया था। निर्माण में एक हजार लोगों को रोजगार मिला। उन्हें भरपूर मजदूरी दी गई। तब महल के निर्माण में 12 लाख रुपये खर्च किए गए। 1969 में प्रिंस करीम शाह अल हुसैनिम आगा खां चतुर्थ जब भारत आए तो उन्होंने यह इमारत और इसके चारों तरफ की जमीन गांधी जी के यादगारी के तौर पर गांधी स्मारक निधि और भारत सरकार को दान में दे दी।

दो साल तक बापू  रहे यहां – 9 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के ऐलान के बाद महात्मा गांधी को मुंबई में गिरफ्तार कर लिया गया। 10 अगस्त 1942 को बापू, कस्तूरबा गांधी और उनके सचिव महादेव भाई देसाई समेत कई नेताओं को पुणे के इस आगा खां पैलेस में लाकर रखा गया। बापू यहां 6 मई 1944 तक नजरबंद रहे। ये महल बापू से जुड़ा असाधारण स्मारक है। यहां पर उन कमरों को देखा जा सकता हैं जहां बापू रहते थे। बापू के जीवन में इस्तेमाल की गईं कई वस्तुएं बरतन, कपड़े माला , चप्पल आदि यहां देखी जा सकती है। अब आगा खां पैलेस के कई कमरों को सुंदर संग्रहालय में तब्दील कर दिया गया है। 30 मार्च 2003 को भारत सरकार ने आगा खां पैलेस को राष्ट्रीय महत्व का स्मारक घोषित कर दिया।

महादेव भाई को अपना उत्तराधिकारी मानते थे बापू
15 अगस्त 1942 को महादेव भाई देसाई को दिल का दौरा पड़ा और अचानक ही वे चल बसे। दिन वही था जिस दिन पांच साल बाद देश आजाद हुआ। अपने प्रिय सचिव के निधन पर बापू काफी अंदर तक व्यथित हुए। ऐसा उनके पत्र से लगता है। सरोजनी नायडू और महादेव भाई ब्रिटिश अधिकारी से शिकायत कर रहे थे कि उन्हे अखबार आदि नहीं मिल रहे हैं। इसी दौरान महादेव भाई को दिल का दौरा पड़ा। 10 नवंबर 1942 को बापू लिखते हैं – महादेव को मेरा वारिस होना था। पर मुझे उसका वारिस होना पड़ा है। महादेव की समाधि पर जाना मेरा बिल्कुल सहज बन गया है। मैं न जाउं तो बेचैन हो जाऊं। ....अगर मैं जिंदा रहा तो यह जमीन आगा खां से मांग लूंगा। वह न दे यह संभव हो सकता है। पर किसी दिन तो हिंदुस्तान आजाद होगा। तब यह यात्रा का स्थान होगा। हो सकता है मेरी जिंदगी में यह जगह मुझे न मिल सके। और इस जगह को यात्रा स्थल बनते मैं न देख सकूं. मगर किसी न किसी दिन वह जरूर बनेगा। इतना मैं जानता हूं। और बापू का सोचा हुआ सच हुआ। एक दिन आगा कां पैलेस संग्रहालय और पर्यटक स्थल में तब्दील हो गया।

और एक दिन बा भी छोड़ गईं - मुख्य भवन के बायीं तरफ बाग में महादेव भाई देसाई की समाधि है। उसके बगल में कस्तूरबा गांधी की समाधि बनाई गई है। 22 फरवरी 1944 को बा का निधन हुआ उस दिन महाशिवरात्रि का त्योहार था। बापू एक बार फिर दुख के सागर में डूब गए। बा के शव के पास बापू घंटों चुपचाप बैठे उन्हें देखते रहे।  बापू के साथ यहां सरोजनी नायडू भी नजरबंद की गई थीं पर खराब सेहत के कारण उन्हें 19 मार्च 1943 को रिहा कर दिया गया। आगा खां पैलेस में बापू के साथ मीरा बेन, प्रभावती नारायण भी नजरबंद थीं।  

कैसे पहुंचे – आगा खां पैलेस पुणे में नगर रोड पर स्थित है। रेलवे स्टेशन से तकरीबन 4 किलोमीटर की दूरी पर है। आप बस, आटो आदि से नगर रोड पर जा सकते हैं। पैलेस पुणे की ऐतिहासिक यरवडा जेल से ज्यादा दूर नहीं है। यहां गांधी म्युजियम और कस्तूरबा गांधी और महादेव भाई देसाई की समाधि है। प्रवेश टिकट पांच रुपये का है। विदेशी पर्यटकों के लिए टिकट 100 रुपये का है। आगा खां पैलेस में एक कैंटीन भी है। साथ ही परिसर में कुटीर उद्योग की बनी वस्तुएं भी आप यादगारी के तौर पर खरीद सकते हैं। कई एकड में फैला परिसर काफी हरा भरा है।