Wednesday, February 3, 2016

गंगटोक के बौद्ध विहार – छूतेन स्तूप

गंगटोक शहर में कई जगह गौतम बुद्ध नजर आते हैं। वैसे तो सिक्किम में प्रवेश करते ही रंगपो में ही पहला बौद्ध विहार है। पर गंगटोक में दो प्रसिद्ध बौद्ध विहार हैं। इससे पहले मुझे एमजी रोड पर चलते हुए बुद्ध के दो बड़े ही सुंदर म्यूरल नजर आते हैं।
छूतेन स्तूप ( CHHOEDTEN STUPA ) - गंगटोक शहर के बौद्ध स्थलों में प्रमुख आकर्षण है दुदुल छूतेन स्तूप। स्थानीय लोगों के बीच ये छोटेन स्तूप के तौर पर मशहूर है। इसका निर्माण 1946 में हुआ था। इसका निर्माण तिब्बती बौद्ध गुरु और नियांगमा के प्रमुख त्रूशिक रिनपोछे ने करवाया था। स्तूप के अंदर आप दोरजी प्रमुख की भव्य छवि देख सकते हैं। यहां पर बड़ी संख्या में बौद्ध श्रद्धालु दूर दूर से पहुंचते हैं। स्तूप के चारों तरफ कुल 108 प्रार्थना चक्र बनाए गए हैं।  इन प्रार्थना चक्र पर तिब्बती भाषा में मंत्र लिखे हैं। अगर आप इन्हें घुमाते हैं तो हमेशा घड़ी की सूई की दिशा में ही घुमाएं।

कहा जाता है कि समय में यह पहाड़ी जहां यह स्तूप है खतरनाक जगह मानी जाती थी। यहां आने वाले लोगों की अक्सर मृत्यु हो जाती थी। स्थानीय लोग मानते थे कि यहां बुरी आत्माओं का वास था। पर तिब्बती बौद्ध धर्म गुरु त्रूशिंक रिनपोछे यहां आए और उन्होंने इसे अपना स्थान बनाया। इसके बाद यह बौद्ध लोगों की पवित्र स्थली बन गई।
स्तूप के बगल में स्थित मंदिर के अंदर बौद्ध धर्म से जुड़ी पवित्र पुस्तकों का विशाल संग्रह है। ये पुस्तके तिब्बती भाषा में हैं। सुबह सुबह लामा लोग इन पुस्तकों को खोलकर सामूहिक प्रार्थना करते हैं। 

इस प्रार्थना में परंपरागत वाद्य यंत्रों को इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रार्थना को देखना आस्था की बड़ी ही सौम्य अनुभूति प्रतीत होती है। मंदिर में छूतेन लाखांग और गुरु लाखांग की प्रतिमाएं हैं। वहीं गुरु रिनपोछे की भी प्रतिमा बनी है। स्तूप परिसर में रहने वाले लामा तिब्बती भाषा का अध्ययन करते हैं जिससे वे बौद्ध ग्रंथों को पढ सकें। मंदिर परिसर में लामाओं के लिए विशाल आवास भी बना है। यहां 700 लामाओं के रहने की जगह है। जो लोग बौद्ध धर्म के बारे मे अध्ययन करना चाहते हैं, उनका यहां स्वागत है। कोई नामांकन शुल्क नहीं है। आप चाहें तो दान दे सकते हैं। परिसर में अद्भुत शांति का वास होता है। आपको यहां अविरल आस्था का वातावरण महसूस होगा।

स्तूप के परिसर में हमारी मुलाकात भूटान से आए बौद्ध परिवार से होती है। वे बड़ी अच्छी हिंदी बोल रहे थे। पूछने पर पता चला कि थोड़े समय दिल्ली में पढ़ाई कर चुके हैं। वे भूटान से परिवार के साथ इस स्तूप में दर्शन के लिए पधारे हैं।

छूतेन स्तूप देवराली इलाके में स्थित है। टैक्सी स्टैंड से थोड़ा ऊपर चलने पर रोपवे का स्टैंड आता है। इस चौराहे से दाहिनी तरफ ऊपर की ओर एक सड़क जा रही है। इस सड़क पर आधा किलोमीटर चढ़ाई के बाद ये सुंदर स्तूप नजर आता है। यहां कोई सीढ़ियां नहीं है। पर आप निजी वाहनों से स्तूप तक पहुंच सकते हैं। छूतेन स्तूप से ठीक पहले नामग्याल इंस्टीट्यूट ऑफ तिब्बतोलॉजी की इमारत दिखाई देती है। इसकी स्थापना 1958 में हुई थी। इसका उदघाटन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने किया था। स्तूप तक जाने का रास्ता हर भरा और मनोरम है।

देवराली बस स्टैंड से आगे बढ़ने पर बायीं तरफ एक बौद्ध विहार नजर आता है। यह है गुरु कुबुमलखांग (Guru kubum lhakhang) बौद्ध विहार। छोटे से बौद्ध विहार में लगातार प्रार्थना होती रहती है। इसे सांग छे विहार नाम से भी जाना जाता है। यहां भी मुख्य मंदिर के चारों तरफ प्रार्थना चक्र बने हैं। बौद्ध विहार के ऊपरी तल पर पवित्र ज्योति के दर्शन के किए जा सकते हैं। यहां एक साथ असंख्य मोमबत्तियां जलाई जाती हैं। खास मौकों पर गुरु कुबुम लखांग बौद्ध विहार से छूतेन स्तूप तक बौद्ध समाज के लोग रैली भी निकालते हैं। 

सुंदर गुरुद्वारा -  देवराली टैक्सी स्टैंड के विपरीत दिशा में एक खूबसूरत गुरुद्वार भी बना है। आप यहां मत्था टेकने जा सकते हैं। गुरुद्वारा परिसर में सिक्किम के दूसरे गुरुद्वारों के बारे में भी जानकारी दी गई है। 1982 में बने इस गुरुद्वारे की व्यवस्था भारतीय थल सेना के द्वारा देखी जाती है। 2006 में यह गुरुद्वारा पूरी तरह बनकर तैयार हो गया। इसे उत्तर प्रदेश के शिल्पकारों ने भव्य रूप प्रदान किया।

BUDDHA ON MG ROAD GANGTOK. 



2 comments:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन जन्मदिवस : वहीदा रहमान और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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