Sunday, January 15, 2017

युद्ध में बहादुरी की दास्तां बयां करता एयरफोर्स म्यूजियम

लड़ाकू विमान हंटर के साथ जिसने पाकिस्तान के साथ दो युद्धों में जलवा दिखाया....
मेघालय की राजधानी शिलांग भ्रमण के दौरान वायु सेना म्युजियम देखना न भूलें। वास्तव में शिलांग में वायु सेना के ईस्टर्न कमांड (पूर्वी कमांड) का मुख्यालय है। पूरे देश में वायु सेना के पांच कमांड हैं। पूर्वी कमांड की स्थापना 1958 में हुई थी। इस कमांड का युद्ध और शांति दोनों की काल में बहुत बड़ा योगदान रहता है।

युद्ध के समय आर्मी को हर तरीके से मदद करना तो शांति काल में फंसे हुए लोगों की मदद करने में वायु सेना की बड़ी भूमिका रहती है। असम में बाढ़ के दौरान फंसे लोगो को भोजन पहुंचाना हो या उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना हो या ओडिशा में सुपर साइक्लोन का समय वे पूर्वी कमान ने कमाल का काम किया है।
पूर्वी कमान के पास मिग 21 और मिग 27 का बड़ा बेड़ा है। इसके अलावा एएन 32 और एन 26 और सुखोई विमान भी इस कमान के अधीन हैं। साल 1962 के चीन से हुए युद्ध और 1971 में पाकिस्तान से हुए युद्ध में इस कमान ने बड़ी भूमिका निभाई थी। संग्राहालय के अंदर चित्र प्रदर्शनी के माध्यम से वायु सेना और खास तौर पर पूर्वी कमांड का इतिहास बताया गया है। यहां आप भारत में वायु सेना के विकास की कहानी चित्रों माध्यम से देख सकते हैं। अंगरेजी राज से लेकर आजादी के बाद दास्तां यहां समझी जा सकती है। सभी वायुसेना प्रमुख के चित्र और उनका कार्यकाल देखा जा सकता है।  

वायु सेना के पूर्वी कमांड के मुख्यालय के अंदर एयरफोर्स म्युजियम है जिसे देखकर वायु सेना के बारे में ज्ञान बढ़ाया जा सकता है। यहां वायुयानों के मिनिएचर माडल से लेकर असली विमान और वायुसेना द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले कपड़े और अन्य वस्तुएं देखी जा सकती हैं। यहां भारत चीन युद्ध और 1965 , 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध की यादगार तस्वीरें भी देखी जा सकती हैं। यहां पर आप कई तरह के मिसाइल भी देख सकते हैं। जेट विमानों के अंदर का नजारा क्या हो सकता है इसको यहां आप महसूस कर सकते हैं।
एमआई 17 के अंदर का वाशप्लेट और अन्य यंत्र को आप देख सकते हैं। एक वायुसैनिक की वर्दी कैसी होती है। उसका काकपिट कैसा होता है। चेतक का एयरो इंजन के अलावा सुखोई 30, मिराज 2000 और जैगुआर की कहानी चित्रों में देख समझ सकते हैं।  यहां वायु सेना द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले हथियारों का भी संग्रह है। वायु सेना का ये संग्रहालय पूर्वोत्तर राज्यों के कला और संस्कृति के रंग से भी यहां आने वालों को रूबरू कराता है। 
एएमआई 4 हेलीकॉप्टर के साथ, 70 के दशक में इसका जलवा था....


संग्रहालय के बाहर लॉन में एक एमआई 4 हेलीकॉप्टर प्रदर्शित किया गया है जो 60 के दशक में काफी इस्तेमाल में था। 1971 तक एमआई 4 ने वायु सेना में परिवहन में अपनी बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1971 के युद्ध में बांग्लादेश के सिलहट क्षेत्र में इसने खूब उड़ाने भरी थीं। बांग्लादेश को आजाद कराने में एमआई 4 की भी भूमिका यादगार है। आगे आप यहां एनतनोव 32 ( एएन 32)  विमान के प्रोपेलर को देख सकते हैं। इस विमान की भी वायु सेना के परिवहन में अहम भूमिका है। आज भी यह विमान वायुसेना की रीढ़ बना हुआ है। इसे खास तौर पर देश के हर हिस्से में सामान ढोने और लोगों को परिवहन में भी इस्तेमाल में लाया जाता है। यह एक डबल इंजन वाला विमान है जिसकी 100 से ज्यादा विमानों की खेप भारतीय वायुसेना के पास है। इसके पंखे में कुल 4 ब्लेड लगे होते हैं जो 5000 हार्स पावर की शक्ति से 1075 आरपीएम ( रोटेशन पर मिनट) की गति से घूमते हैं। यहां इजरायल से खरीदे गए अवाक्स विमान को भी शान से विराजमान देखा जा सकता है। 
हंटर से मुलाकात - संग्रहालय के बाहर लॉन में आप हंटर विमान को देख सकते है। 1954 में आए हंटर ने भारत पाकिस्तान के बीच हुए दो युद्ध 1965 और 1971 में अपना कमाल दिखाया था। जैसलमेर बेस से उड़ान भरने वाले छह हंटर विमानों ने पाकिस्तान में खूब तबाही मचाई थी। दो सीटों वाले इस विमान का लंबे समय तक फाइटर पायलटों ने इस्तेमाल किया। 

पोलैंड से 1975 में आया इसकरा ( ISKRA) ट्रेनर विमान। इसकी समान्य गति 600 किलोमीटर प्रतिघंटा और अधिकम 720 किमी प्रति घंटा है। खास तौर पर नए पायलटों की ट्रेनिंग में इसका इस्तेमाल हुआ करता था। 



कैसे पहुंचे - एयरफोर्स म्यूजिम ईस्ट खासी  हिल्स में अपर शिलांग में स्थित है। आपको शिलांग के पुलिस बाजार चौराहे से कोई वाहन लेकर यहां तक पहुंचना होगा। संग्रहालय दोपहर में एक से ढाई बजे तक बंद रहता है। प्रवेश के लिए कोई टिकट नहीं है। आपको पास कोई मान्य परिचय पत्र होना चाहिए।  पर यहां पूरा संग्रहालय देखने के लिए दो घंटे का वक्त मुकर्रर रखें। संग्रहालय परिसर में सोवनियर और गिफ्ट शॉप भी है जहां से आप यादगारी के लिए कुछ खरीद भी सकते हैं। संग्रहालय में घूमते हुए यह ध्यान रखें कि आप संग्रहालय के अलावा वायु सेना क्षेत्र के बाकी हिस्सों में नहीं जाएं। 
-vidyutp@gmail.com

( SHILLONG, MEGHALAYA, AIR FORCE MUSEUM ) 

कारिबोउ डीएचसी के साथ... 32 सैनिको को लेकर उडा़न भरने में सक्षम था। 400 किलोमीटर प्रतिघंटे तक की अधिकतम गति के साथ उड़ान भरता था। 1963 से लेकर 1988 तक सेवा में रहा। कम जगह में भी उतरने में सक्षम। 

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