Thursday, January 7, 2016

कांगड़ा का स्वाद - लुंगडू का अचार

जब भी मैं हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा की वादियों में जाता हूं अचार और चायपत्ती जरूर लाने की कोशिश करता हूं। कांगडा के बांस के अचार का स्वाद सालों से जुबां पर है। पर इस बार यहां देखने को मिल लुंगड़ू का अचार । दुकानदार ने बताया यह सर्दिंयों के लिए अच्छा है। सो हमने एक पैकेट खरीद लिया। सर्दियों में बांस का अचार भी खाना अच्छा रहता है। अब बात लुंगडू की। लुंगडू यानी ( Fiddle head fern)  का अचार कांगड़ा की खास विशेषता है।
अचार के अलावा सब्जी भी-  वैसे लुंगडू की अचार के अलावा सब्जी भी बनती है। सब्जियों में इसके पत्तों को खाया जाता है। उबालने के बाद इसे साग के तौर पर भी खाने की थाली में शामिल किया जाता है। सिक्किम, असम और मणिपुर के होटलों की थाली में यह आपको खाने में मिल जाएगी। 
यह प्रकृति से एंटीआक्सीडेंट होता है। इसमें ओमेगा 3 और ओमेगा 6 प्रचूर मात्रा में मिलता है। यह आईरन और फाइबर का बड़ा स्रोत है। हरे रंग का इसका पौधा देखने में वायलिन सरीखा होता है। इसकी खेती आमतौर पर वसंत के मौसम में की जाती है। यह ठंडे प्रदेशों में ही होता है। वैसे तो यह दुनिया के कई हिस्सों मिलता है। पर भारत में यह कांगडा की वादियों में मिल सकता है। कांगडा में इसे लुंगडू कहते हैं। पर इसकी खेती देश में हिमायलयी राज्यों में ही होती है। 

अलग अलग नाम – कांगड़ा यह लुंगड़ू का लिंगड़ी उत्तराखंड में लंगुड़ा हो जाता है। वहीं दार्जिलिंग और सिक्किम क्षेत्र में इसे नियुरो कहते हैं। यहां लोग इसकी सब्जी बनाकर चाव से खाते हैं। असम में इसे धेकिया झाक कहते हैं। वहीं जम्मू कश्मीर में इस कसरोड कहते हैं।

 डोगरा लोग भी कसरोड का अचार बनाकर सालों भर खाते हैं। वहीं सब्जी बनाकर रोटी और पराठा के साथ भी खाते हैं। दुनिया के कई देशों में अलग-अलग नाम से यह रसोई का हिस्सा है। वैसे कच्चा लुंगडू तीखापन या कसैलापन लिए होता है। इसे उबालने पर इसका कसैलापन दूर हो जाता है। 

कई रोगों में लाभकारी - वैज्ञानिक शोध में पता चला है कि पहाड़ी नदी नालों में आसानी से पाई जाने वाली जैविक पौध लुंगड़ू मधुमेह और चर्म रोग में काफी लाभकारी है। लुंगडू को आप जंगली पालक भी कह सकते हैं। हिमालय में लुंगड़ू की कुल 1200 प्रजातियों का पता चला है। हिमालयन जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (आइएचबीटी) पालमपुर के वैज्ञानिकों ने लुंगडू पर शोध किया है।


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