Monday, January 11, 2016

प्राचीन गौड मालदा शहर - कभी था 'लक्ष्मणावती'

बारा सोना मसजिद 
बंगाल का पुराना शहर गौड़ कभी बंगाल की राजधानी रहा है। गौड़ प्राचीन काल में  'लक्ष्मणावती' मध्यकाल में  'लखनौती' के नाम से जाना जाता था। किसी समय यह संस्कृत भाषा और हिंदू राजसत्ता का बड़ा केंद्र था। गौड़ का सबंध गीत गोविंद के रचयिता जयदेव के अलावा व्याकारणाचार्य हलयुद्ध से रहा है। सेन वंश के राजा लक्ष्मणसेन के नाम से इस शहर का नाम लक्ष्मणावती रखा गया था। आठवीं से 10 वीं सदी तक यहां पाल राजाओं का शासन था। जबकि 11वीं और 12वीं सदी में सेन वंश का शासन रहा। सेन वंश के शासन में यहां कई हिंदू मंदिरों का निर्माण हुआ पर अब उनका अवशेष नहीं है। 1573 मे अकबर के सूबेदार गौड़ से इसे अपना केंद्र बनाया तब इसका नाम गौड़ पड़ गया। अब गौड़ मालदा मे कई मसजिदें हैं जिनके निर्माण में हिंदू मंदिरों के भग्वनावशेषों का इस्तेमाल प्रतीत होता है।
बारा सोना मसजिद। 


आप पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में मालदा टाउन शहर से 12 किलोमीटर दक्षिण में पुराने गौड़ शहर के ऐतिहासिक अवशेष देख सकते हैं। मालदा शहर महानंदा नदी के किनारे बसा है। 1771 में एक इंगलिश फैक्ट्री के कारण इसे इंगलिश बाजार के नाम से भी जाना जाता था। 18 वीं सदी मैंगो सिटी (आमों का शहर) मालदा अपनी सिल्क इंडस्ट्री के लिए भी जाना जाता था।
बारा सोना मसजिद – यह गौड़ का सबसे बड़ा स्मारक है। मालदा की ओर से आने पर सबसे पहले यही स्मारक नजर आता है। नाम के मुताबिक इसमें 12 दरवाजे होने चाहिए। हालांकि दिखाई 11 देते हैं। इसका निर्माण अल्लाउद्दीन हुसैन शाह ने 1526 में करवाया। ठीक उसी साल जब पानीपत की पहली लड़ाई इब्राहिम लोदी की पराजय हुई थी। इस मसजिद में इंडो अरब स्थापत्य का मेल दिखाई देता है।  इसके मेहराब और गुंबद देखने लायक हैं। गुंबद मुगलकालीन अमरूदी गुंबद की तरह न होकर गोलाकार है। अब यह मसजिद कई इलाकों में टूटी फूटी नजर आती है। पुरातत्व विभाग की ओर से इसका संरक्षण किया गया है।
फिरोज मीनार के आगे।

फिरोज मीनार – कुछ कुछ कुतुबमीनार से मिलती जुलती फिरोजमीनार की ऊंचाई 26 मीटर है। यह पांच मंजिला है। मीनार से सामने एक बड़ा तालाब है। इसका निर्माण 1485-89 के बीच सुल्तान सैफुद्दीन फिरोज ने करवाया था। इसके आधार का वृत 19 मीटर का है। शुरुआत की तीन मंजिलों 12 कोणीय हैं जबकि ऊपर की दो मंजिलें गोलाकार सरंचना में हैं। ऊपर तक पहुंचने के लिए 84 सीढियां बनी है। हालांकि आप इसे सिर्फ बाहर से देख सकते हैं। अंदर जाने की अनुमति अब नहीं है।
सलामी दरवाजा - फिरोज मीनार से एक किलोमीटर पहले दक्षिण दरवाजा आता है। इसे सलामी दरवाजा भी कहते हैं। इसका निर्माण 1925 में लाल पत्थरों से कराया गया था। यह दरवाजा 21 मीटर ऊंचा और 34 मीटर चौड़ा है। कभी यह गौड़ के किले का मुख्य द्वार हुआ करता था।
फिरोज मीनार से आधा किलोमीटर आगे बढ़ने पर एक साथ पांच स्मारकों को समूह नजर आता है। यहां पर सबसे पहले कदम रसूल मसजिद उसके बाद, फतेह खान की मजार, चीका मसजिद, गुमटी गेट, लुकाचोरी गेट देख सकते हैं। यहां पर कुछ दुकानें भी हैं। स्थानीय लोगों के लिए ये एक पिकनिक स्पाट की तरह है। आसपास में आम के बागीचे नजर आते हैं।  
कदम रसूल मसजिद।

कदम रसूल मसजिद – कदम रसूल मसजिद के बारे में कहा जाता है कि यहां पर मुहम्मद साहब के पांव के निशान है। इस मसजिद का निर्माण 1531 में हुआ था। यह एक गुंबद वाली संरचना है। इसका गुंबद ऐसा लगता है मानो कमल के फूल को उल्टा करके रख दिया गया हो। इसकी आंतरिक संरचना कलात्मक है। इसे सुल्तान नुसरत शाह ने बनवाया था। यहां पत्थरों पर मुहम्मद साहब के पांव के निशान है। इसका संरक्षण माहिदपुर गांव के खादिम करते हैं। इस गांव में खादिम के परिवार के 50 घर हैं। खादिम की 60वीं पीढ़ी से हमारी यहां मुलाकात होती है। उनका नाम है मुहम्मद जमील हसन मुल्ला। लोगों में इस इस मसजिद को लेकर बड़ी आस्था है। लोग यहां मन्नते मांगने आते हैं। इसके पास ही तांतीपारा मसजिद है, यहां भी सुंदर नक्काशी देखी जा सकती है।
फतेह खां की मजार। 

फतेह खां की मजार – फतेह खां औरंगजेब का जनरल दिलावर खां का बेटा था। 1658 में जन्मे फतेहखान की मौत 1707 में हुई। यहां उसकी मजार बनी है जिसकी दीवारें कलात्मक हैं। बताया जाता है कि फतेह खां को एक मुस्लिम संत की हत्या के लिए भेजा गया था पर वह अपनी मंजिल का नहीं पहुंच सका और खून की उल्टियां करके मर गया।


चीका मसजिद – सुल्तान युसुफ शाह ने 1475 में चीका मसजिद का निर्माण कराया। वास्तव में यह कभी चीका यानी चमगादड़ों की शरण स्थली हुआ करता था। यह भी एक गुंबद वाली संरचना है। 
चीका मसजिद। 

अब इसका अवशेष ही बचा है। इसकी दीवारों पर शानदार नक्काशी दिखाई देती है। दीवारों पर हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां देखी जा सकती हैं। यह एक ऐसी मसजिद है जिसकी वास्तुकला हिंदू मंदिर की है। इससे प्रतीत होता है कि यह कभी हिंदू मंदिर रहा होगा।

गुमटी गेट – गुमटी गेट की इमारत दूर से ही अदभुत नजर आती है। यह चीका मसजिद के ठीक सामने है। 1512 में इसका निर्माण अलाउद्दीन हुसैन शाह ने करवाया। इसका आकार छोटा है पर देखने में सुंदर है। इसके निर्माण में ईंट और मिट्टी का इस्तेमाल हुआ है। पर इसके रंग अदभुत हैं और दरवाजे पर शानदार नक्काशी है। हालांकि आजकल इसके संरक्षण के लिए इसे बंद कर दिया गया है। गुमटी गेट और चीका मसजिद के बीच खाली मैदान में एक मंदिर का अवशेष दिखाई देता है। इसका अब सिर्फ आधार तल ही रह गया है। इसे देखकर लगता है कि कभी यहां मंदिरों का समूह रहा होगा।

गुमटी गेट के आगे। 


लुका चोरी गेट लोकाचुरी गेट का निर्माण 1655 का  है। इस गेट के अंदर से आजकल सड़क सरपट गुजरती है। इसके नाम के पीछे रोचकता है। अंगरेजी के खेल हाइड एंड सीक यानी लुकाछिपी के खेल के नाम पर इस गेट का बांगला नाम है लुका चोरी। कहा जाता है यहां सुलतान अपनी बेगमों के साथ लुका छिपी का खेल खेला करता था। दो मंजिला यह दरवाजा महल में प्रवेश के मुख्य दवारा के तौर पर काम करता था।

चामकाटी मसजिद। 
चामकाटी मसजिद – मेहदीपुर बार्डर के रास्ते में यह नन्ही सी मसजिद है जिसका नाम चामकाटी मसजिद लिखा गया है। इस मसजिद का भी निर्माण सुलतान शमशुद्दीन युसुफ शाह ने 1475 में कराया। माना जाता है कि इसका संबंध मुसलिम समाज के चामकाटी समुदाय से है। गौड़ मालदा से बांग्लादेश के मेहदीपुर बार्डर की दूरी महज दो किलोमीटर है। यहां से अंतरराष्ट्रीय व्यापार होता है। हमें रास्ते में ट्रकों की लंबी लाइनें लगी देखीं। यहां से ज्यादातर सामग्री बांग्लादेश जाती है। पर दूसरी तरफ से माल कम ही आता है। 

कैसे पहुंचे – मालदा टाउन के रथबारी चौक से गौड़ की दूरी 12 किलोमीटर है। आप आटोरिक्शा या टैक्सी किराये पर लें। सार्वजनिक वाहन से नहीं जा सकते क्योंकि सारे ऐतिहासिक स्थल एक ही जगह पर नहीं हैं। इसलिए आरक्षित वाहन ही सुविधाजनक है। इतिहास के शोधार्थी मो अनवारुल हक के साथ हमारी यात्रा शुरू हुई। हमने रथबारी चौक  से आटो रिक्शा किराये पर लिया। आटो चालक बोबाई सिंह ( 98511-40223) ने हमें सारे स्मारक बड़े दिल से घुमाया उनका धन्यवाद।
और ये रहा गौर मालदा का लोकाचुरी  ( Hide and Seek ) गेट। 

   

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