Saturday, January 30, 2016

वो भूटिया लड़की याद आती है...

गंगटोक शहर- रात में कुछ यूं दिखाई देता है....
एमजी रोड पर लाल पीले फूलों के बीच हरी हरी बेंच पर बैठ कर शाम को टाइम पास कर रहा हूं। तभी मेरे बगल में आकर दो लड़कियां बैठ जाती हैं। पहले आपस में बातचीत और चुहलबाजी शुरू करती हैं। फिर एक मुझसे पूछती है आप कहां से आए हैं। बातचीत शुरू होती है। पता चलता है मेरे बगल में बैठी शोख लड़की भूटिया समुदाय की है। यहां एक होटल में काम करती है। होटल रिकासा शहर से थोड़ा बाहर है। वह अपने होटल के एक टूरिस्ट परिवार को एमजी रोड पर घुमाने लाई है। नीले रंग की लंबी स्कर्ट और सुर्ख टॉप में बैठी भूटिया बाला के बाल रेशम जैसे थे। वह हिंदी बहुत अच्छी बोल रही थी। जब मैंने उसकी हिंदी की तारीफ की थी तो उसने गर्व से कहा, सबको आनी चाहिए हमारी नेशनल लैंगवेज है हिंदी।

भूटिया नाम से कुछ याद आता है। बाइचुंग भूटिया (Baichung Bhutia) और डैनी (Danny Denzongpa) दो ऐसे लोकप्रिय नाम हैं जो भूटिया समुदाय से आते हैं। बाइचुंग बड़े फुटबालर बने। बाद में तृणमूल कांग्रेस से लोकसभा चुनाव भी लड़ा हालांकि राजनीति में सफलता नहीं मिली। पर डैनी फिल्म इंडस्ट्री के सफल नाम हैं। वे कभी सिक्किम से मुंबई पहुंचे। फिल्म स्टार होने के साथ वे सफल कारोबारी भी हैं। मुझे सुबह गंगटोक की सड़क पर एक भूटिया कुली मिले। वे बताते हैं कि आजकल भूटिया समाज के कई लोग बॉक्सिंग में भी बड़ा नाम कर रहे हैं। वे एक बाक्सर को दिखाते हुए कहते हैं कि इसका एक पंच कोई बरदास्त नहीं कर सकता। दुनिया के मानचित्र पर भूटिया लोगों की कुल आबादी 70 हजार के आसपास है। भूटिया भारत, नेपाल और भूटान में फैले हैं। इनमे से बड़ी संख्या में लोग सिक्किम में रहते हैं। सिक्किम में भी वे ज्यादातर उत्तरी सिक्किम में हैं। वे यहां पर आरक्षित ट्राईब (जनजाति, बीएल) श्रेणी में आते हैं।
गंगटोक की सड़क पर मिले एक और भूटिया

भूटिया लड़की बता रही है...वह पढाई के साथ नौकरी कर रही है। पत्राचार पाठ्यक्रम में बीए में एडमिशन ले रखा है। आगे वह कुछ और भी पढ़ाई करना चाहती है। भूटिया लड़की के बगल में उसकी एक तिब्बती दोस्त भी बैठी है, जो किसी से ऊंची आवाज में फोन पर बातें कर रही है। बीच बीच में ठठाकर हंस पड़ती है।

भूटिया लड़की बता रही है उसका गांव यहां से 80 किलोमीटर दूर है। छुट्टियों में वह गांव जाती है। अभी नवंबर में अपना नया साल लूसांग त्योहार मनाकर लौटी है। इसमे खूब मस्ती होती है। बांसुरी जैसे वाद्य यंत्र की धुन पर भूटिया लड़कियां अपने पारंपरिक पहनावे में जमकर नाचती हैं। यह त्योहार तिब्बती कैलेंडर में दसवें महीने में आता है। त्योहार 15 दिनों तक मनाया जाता है। वह बता रही है गांव में कुछ नहीं बदला। परंपराएं पुरानी है। शादी के नाम पर कहती है, भूटिया लड़कियां कई बार बाहर के समुदाय में शादी कर लेती हैं। पर गांव में इसकी इजाजत नहीं है। गांव के लोग कठोर होते हैं। वे भूटिया समाज की लड़कियां बाहर शादी करें तो जल्दी स्वीकार नहीं करते। हालांकि महिलाओं की भूटिया समाज में खूब सुनी जाती है। वे पुरुषों से बराबरी करती हैं। पर सोना पहनने का उन्हें खूब शौक है। वह 24 कैरेट गोल्ड हो तो अच्छा। वह बता रही है। फरवरी में उसका गांव में लोसार का त्योहार होगा, तब फिर वह गांव जाएगी। उसकी इच्छा तो सरकारी नौकरी में जाने की है। पर भूटिया समाज को बीएल में आरक्षण के बावजूद सरकारी नौकरी आसान नहीं है।
गंगटोक के एमजी रोड पर ...यूं ही अकेले...

मुझे याद आता है भूटिया समाज का समृद्ध इतिहास। कभी सिक्किम में जब राजतंत्र था तब यहां भूटिया समुदाय के नामग्याल वंश के राजाओं का ही शासन था। ज्यादातर भूटिया बौद्ध मत को मानने वाले होते हैं, इसलिए भूटिया समाज में काफी शाकाहारी भी हैं। भूटिया लोग बौद्ध में वज्रयान संप्रदाय को मानने वाले हैं। भूटिया लड़की बताती है वह भी शाकाहारी है।

बातों बातों में कितना वक्त गुजर गया पता नहीं चला। अच्छा तो अब मैं चलती हूं। हमारा टूरिस्ट इंतजार कर रहा होगा। पर आगे बढ़ने के बाद वह पीछे मुड़कर देखती है.. मुझे बाय..बाय कहने के साथ ही नए साल की ढेर सारी शुभकामनाएं देती है...आज 30 दिसबंर है...नया साल एक दिन बाद ही तो आने वाला है। मैं उसकी शुभकामनाएं स्वीकार करता हूं। पर दिल में उस शोख भूटिया लड़की की स्मृतियां बसी रह जाती हैं....
- vidyutp@gmail.com  
( SIKKIM, GAMGTOK, BHUTIA GIRL ) 

Thursday, January 28, 2016

बाबा हरभजन सिंह रिटायर हो गए...अब छुट्टी नहीं जाते

बाबा मंदिर के नाम से मशहूर है यह जगह, तकरीबन 13 हजार फीट से ज्यादा की ऊंचाई पर। भारतीय फौज में इंडियन आर्मी की गहरी आस्था है बाबा में। कहते हैं बाबा की आत्मा भारत चीन सीमा पर फौजियो का मार्ग दर्शन करती है। तो चीन के फौजी भी बाबा की शक्ति से कहीं न कहीं डरते हैं। गंगटोक से नाथुला के मार्ग पर सरथंग से बाबा मंदिर के लिए रास्ता बदलता है। वहां से नाथुला 4 किलोमीटर है जबकि पुराना बाबा मंदिर तकरीबन 9 किलोमीटर आगे है। हालांकि आजकल नया बाबा मंदिर बना दिया गया है, तो बड़ी संख्या में सैलानी वहीं से वापस लौट आते हैं।

बाबा हरभजन सिंह की कहानी मैंने पहली बार सन 2000 में सुनी थी जब मैं जालंधर में अमर उजाला में कार्यरत था। हमारे साथी अरविंद श्रीवास्तव ने एक खबर लिखी की बाबा जी छुट्टी पर घर आ रहे हैं। उनके लिए ट्रेन में तीन बर्थ बुक हैं। वे दो महीने गांव में छुट्टी काटेगें फिर वापस सिक्किम में नाथुला सीमा पर जाएंगे। दरअसल बाबाजी तो इस दुनिया में रहे नहीं पर अनूठा आस्था है भारतीय थल सेना उन्हें वेतन भी देती थी और छुट्टी पर घर भी भेजती थी। पर साल 2008 में बाबा जी रिटायर हो गए तो अब उनकी पेंशन लग गई है। अब उनके छुट्टी पर घर जाने का सिलसिला रूक गया है।

बाबाजी पंजाब के कपूरथला जिले के बारंदोल गांव पैदा हुए थे। वे 1966 में पंजाब रेजिमेट में बतौर सिपाही भर्ती हुए। 4 अक्तूबर 1968 को सिक्किम मे नाथुला इलाके में तैनाती के दौरान भयानक प्राकृतिक आपदा आई। भारी बारिश और चट्टान खिसकने से काफी लोगों की जान चली गई। इस समय सिपाही हरभजन सिंह अपने खच्चर कारवां को लेकर जा रहे थे। यह कारवां टुकला से डेंगचुला जा रहा था। इस दौरान हरभजन सिंह एक तेज बहती जलधारा मे बह गए। पांच दिनों तक उनका पता नहीं चला। वे साथी प्रीतम सिंह के सपनों में आए। अपने बारे में बताया कि वे कहां दबे हैं। बाद में तलाशी पर उनका शव वहीं मिला। उन्होंने अपनी समाधि बनाने की इच्छा भी जताई थी। बाद में उनके साथियों ने उनकी इच्छा के मुताबिक चोकियाको में उनकी समाधि बनवाई। तब से बाबा सीमा पर खतरनाक गतिविधियों के बारे में फौजियों को सपने में आकर बताते हैं। उनपर चीनी सैनिक भी विश्वास करते हैं। पूरे सीमा क्षेत्र में एक छाया पेट्रोलिंग करती नजर आती है। अब बाबा को फौज ने मानद कप्तान पद से सम्मानित किया है।

पुराने बाबा मंदिर में बाबा जी की समाधि, बाबा जी का बंकर बना है। बंकर में उनका बिस्तर लगा है। उनके कपड़े, जूते आदि रखे हैं। देश भर से आने वाले लोग श्रद्धा से शीश नवाते हैं। हर शुक्रवार को यहां पर लंगर भी लगाया जाता है। बाबा जी की समाधि पर प्रसाद बांटते मुझे जालंधर के बस्ती मिठू के फौजी गुरप्रीत सिंह मिले। ये जानकर बड़े खुश हुए कि मैं जालंधर में लंबे समय तक रह चुका हूं। 14 हजार फीट पर जिंदगी कितनी मुश्किल होगी मैं इसका अनुमान लगाता हूं। दोपहर के बाद बर्फीली हवाएं चलने लगती हैं पर फौजी मस्त हैं। देश की सेवा भी और आस्था भी।

हम लौटते हुए नए बाबा मंदिर के पास भी रूकते हैं। नए बाबा मंदिर के सामने एक कैफे बना है। यह कैफे 13 हजार फीट की ऊंचाई पर है। यहां पर खाने में मोमोज के अलावा कुछ और चीजें मिलती हैं। यहां पर सोवनियर का स्टाल भी है, जहां से आप यादगारी से जुड़ी कई चीजें खरीद कर ले जा सकते हैं। 
नया बाबा मंदिर - 13 हजार फीट की ऊंचाई पर कैफे में मोमोज का स्वाद 
अब इतनी ऊंचाई पर आए हैं तो खाने की हसरत क्यों न पूरी करें। तो मैंने भी कूपन लिया 30 रुपये में शाकाहारी मोमोज की प्लेट का और रेस्टोरेंट में बैठकर मोमोज का स्वाद लिया। रास्ते में रोडेंड्रम (गुरांस) की झाड़ियां भी दिखाई देती हैं। हालांकि इसमें अभी फूल नहीं लगे हैं। पहाड़ों पर उगने वाले इस फूल को लाली गुरांस भी कहते हैं। खिलने पर इसकी सुंदरता देखने लायक होती है।
- vidyutp@gmail.com



( सफर के सहयोगी - मीठू सिंह – 9749888509 मैनेजर, प्रमोद – 9475009042 ( ट्रेवल एजेंट) प्रकाश क्षेत्री ( ड्राईवर) - 9564765076 ) 

Tuesday, January 26, 2016

...और इस तरह बन गई छांगू झील

गंगटोक से 35 किलोमीटर की दूरी पर आता है छांगू लेक (TOSONGMO LAKE ) इसके पानी की गहराई 50 फीट तक है। झील का पानी आधा जमा हुआ दिखाई देता है। दोनों तरफ पहाड़ की चोटियां हैं। झील के किनारे ढेर सारे रंग बिरंगे याक हैं जिसके साथ लोग तस्वीरें खिंचवाते नजर आते हैं। ये सभी लोग रंगबिरंगी नेपाली और भूटिया ड्रेस पहनकर फोटो खिंचवाते हैं। झील तकरीबन एक किलोमीटर लंबी और अंडाकार आकार की है। सिक्कम के लोगों में इस झील के प्रति काफी सम्मान है। वे इसे काफी पवित्र झील मानते हैं। झील के किनारे एक मंदिर भी बना हुआ है। साथ ही बोर्ड लगा है जिस पर झील को साफ सुथरा रखने की अपील सैलानियों से की गई है। 

लोककथाओं के मुताबिक जहां आज लेक है कभी मवेशियों का आश्रय स्थल हुआ करता था। जहां लोक याकों को रखते थे। एक दिन एक बूढ़ी महिला को सपना आया कि जल्दी से जानवरों को हटा लें यह जगह पानी से भरने वाली है। हालांकि गांव वालों ने उसका भरोसा नहीं किया। वह महिला वहां से चली गई, पर ये जगह सचमुच पानी से भरकर झील में तब्दील हो गई। उसके बाद लोग इसे ईश्वर का चमत्कार मानकर झील की पूजा करने लगे। खास तौर पर गुरु पूर्णिमा के दिन यहां विशेष पूजा की जाती है।

अंजू लेक और मंजू लेक – नाम से ऐसा लगता है कि दो सगी बहने हों। नाम रखने वालों ने भी कुछ ऐसा ही सोचा होगा। छांगू लेक से आगे बढ़ने पर सड़क के किनारे ये दो झीलें नजर आती हैं। हालांकि ये दोनो बहने कभी आपस में मिल नहीं पातीं। पर इसके थोड़ा आगे जाने पर आता है एलीफैंट लेक। जब इसे समग्र तौर पर देखा जाए तो इसका आकार हाथी जैसा नजर आता है।

थेवू ट्रेड सेंटर – शेरथांग  में नजर आता है थेवू ट्रेड सेंटर। इस सेंटर पर भारत चीन के बीच व्यापार होता है। पर यह सब कुछ साल के छह महीने में ही होता है। क्योकि बाकी के छह महीने बर्फ पड जाती है तो रास्ते बंद हो जाते हैं। व्यापार के लिए नाथुला के रास्ते से ट्रक चीन को जाते और आते हैं। चीन से यहां सस्ते कपड़े, जैकेट, टोपियां, दस्ताने आदि आते हैं। हालांकि उनकी क्वालिटी अच्छी नहीं होती। जबकि भारत से वनस्पति तेल और दूसरी खाने पीने की चीजें भेजी जाती हैं। हमारी आंखो के समाने व्यापार केंद्र वीरान था। अभी तिजारत बंद है।   

दुनिया का सबसे ऊंचा गोल्फ कोर्स – पुराने बाबा मंदिर के रास्ते में नजर आता है दुनिया का सबसे ऊंचा गोल्फ कोर्स। कुपुप में यह गोल्फ कोर्स 13, 025 फीट की ऊंचाई पर है। इसे याक गोल्फ कोर्स नाम दिया गया है। गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में इसे दुनिया का सबसे ऊंचा गोल्फ कोर्स का दर्जा दिया गया है। इस गोल्फ कोर्स का निर्माण 1972 में किया गया। पूर्वी सिक्किम में स्थित ये 18 होल का गोल्फ कोर्स  है। इसका प्रबंधन इंडियन आर्मी और इंडियन गोल्फर यूनियन देखती है। रास्ते मे मुझे टैक्सी ड्राईवर एक ट्रांजिट कैंप दिखाते हैं। बताते हैं कि ये सैलानियों के लिए आवास का इंतजाम है। अगर कभी बर्फबारी में सैलानी फंस गए तो सेना उनके आवास और भोजन का इंतजाम यहां करती है।


रास्ते में टैक्सी ड्राईवर हमें टूकला ( TUKLA)  दिखाते हैं। बताते हैं कि 1958 में इस हिस्से पर चीन ने कब्जा कर लिया था। इस क्षेत्र में बड़ी लड़ाई हुई थी। बाद में इस क्षेत्र को 1962 में ही भारत की सीमा में वापस लिया जा सका। कहानी सुनकर सीना चौड़ा हो जाता है कि हमने ये इलाका चीन से छीन लिया था। पर इस इलाके में सड़क के दोनों तरफ खूब बर्फ पड़ी है। सिर्फ सड़क साफ दिखाई देती है बाकी दोनों तरफ बर्फ ही बर्फ। ड्राईवर साहब गाड़ी रोक देते हैं बर्फ के संग अटखेलियां करने के लिए। हम भी बर्फ के संग कुछ देर के लिए मस्त हो जाते हैं। सफेद बर्फ यूं लगते हैं मानों पहाड़ो पर बिस्तर बिछा हो और हम उसपर यूं लेट जाएं। 
-vidyutp@gmail.com
कुछ नहीं बस ....मुट्ठी बर बर्फ। 

Sunday, January 24, 2016

नाथुला यानी पुराने सिल्क रूट (रेशम मार्ग ) की ओर...

सुबह का सूरज अभी निकला है और मैं तिब्बत रोड पर टहल रहा हूं। गंगटोक का तिब्बत मार्ग एमजी रोड से ऊपर की ओर जाता है। यह चीन की सीमा यानी नाथुला की ओर जा रहे रास्ते से जा मिलता है। ईसा पूर्व दूसरी सदी से चीन से हमारा कारोबार चलता था। यह रास्ता रेशम मार्ग (SILK ROUTE) कहलाता था। भारत का सिल्क रूट से संपर्क सिक्किम और तिब्बत से होकर था। कई सौ सालों तक चीन के साथ न सिर्फ रेशम बल्कि अन्य सामग्रियों की भी तिजारत इसी सड़क मार्ग से चलती रही। पर कारोबार का मुख्य हिस्सा रेशम था इसलिए इस मार्ग का नाम रेशम माल्ग या सिल्क रूट पड़ गया। गंगटोक में एक सड़क का नाम तिब्बत रोड है। हालांकि इसका नया नाम सोनम ग्यात्से मार्ग दिया गया है पर ज्यादातर लोग इसे तिब्बत मार्ग नाम से ही बुलाते हैं।


हमारी तैयारी नाथुला सीमा की ओर और बाबा हरभजन सिंह मंदिर जाने की है। गंगटोक से नाथुला की दूरी 56 किलोमीटर है। पर रास्ता मनोरम और थोड़ा मुश्किल भरा भी है। नाथुला की ओर जाने वाली टैक्सियां वज्र स्टैंड से मिलती हैं। आप अपनी निजी कार से उधर नहीं जा सकते। आपको सिक्किम की ही टैक्सियां किराए पर लेनी पड़ती हैं।
कागजी कार्रवाई – नाथुला मार्ग पर जाने के लिए कागजी कार्रवाई भी पूरी करनी पड़ती है। इसके लिए परमिट एक दिन पहले ही बनवाना पड़ता है। हालांकि इसकी कागजी कार्रवाई आपका टूर आपरेटर ही पूरा कर देता है। पर आपको अपनी चार फोटो, दो आईडी प्रूफ जमा करना पड़ता है। परमिट पुलिस विभाग और वन विभाग जारी करता है। गंगटोक शहर से बाहर निकलते ही परमिट की चेकिंग होती है। यहां पर हर यात्री को एक दस रुपये का स्वच्छता डोनेशन कूपन भी लेना पड़ता है। वहीं विदेशी नागरिकों को इस प्रतिबंधित क्षेत्र में जाने के लिए एफआरओ बनवाना पड़ता है।

टैक्सी धीरे धीरे आगे बढ़ती जा रही है। धूप पर मौसम में सर्द होता जा रहा है। घुमावदार रास्तों के साथ ऊंचाई बढ़ती जा रही है। हम बादलों के करीब होते जा रहे हैं। कोई 20 किलोमीटर से ज्यादा चलने पर आता है, 15 मील यानी क्यांगोसला। टैक्सी वाले यहां पर कुछ हल्का फुल्का खाने के लिए रोकते हैं। यहां पर कैफै है जो सिक्किम टूरिज्म द्वारा संचालित है। यह कैफे 10 हजार 400 फीट की ऊंचाई पर है। क्यांगोसला यानी 15 मील पर एक रेडीमेड कपड़ो जिसमें खास तौर पर टोपियां, दस्ताने और जैकेट बिकते हैं इसकी दुकान है। दुकान में चाय, कॉफी और मोमोज भी मिलते हैं।


इसके काउंटर पर बैठी मिली 12 साल की नन्हीं रेजिना। रेजिना सातवीं क्लास में पढ़ती है। पूछने पर बताती है कि गंगटोक के स्कूल में पढ़ती हं। इन दिनों स्कूल बंद हैं इसलिए छुट्टियों में मां के साथ दुकान पर उनकी मदद कर रही हूं। यहां चाय 10 रुपये में मिल रही है। यानी कीमत को लेकर कोई लूटपाट नहीं। मैगी 50 रुपये की। उबले अंडे भी मिलते हैं। मैं आम तौर पर चाय नहीं पीता। पर ठंड बढ़ती जा रही है तो चाय की चुस्की लेना भला लगता है। लौटती यात्रा में ही हम यहां पर रूकते हैं तब यहां बादल सड़कों पर टहलते हुए नजर आते हैं। हम इन बादलों के संग थोड़ी देर तक मस्ती करते हैं और फिर रवाना  हो जाते है आगे के लिए।
-vidyutp@gmail.com 

Friday, January 22, 2016

मोमोज, रोल, समोसा, पूड़ी सब कुछ खाए गंगटोक में

जब आप दार्जिंलिंग जाते है और अगर आप शाकाहारी हैं तो खाने पीने के कम विकल्प नजर आते हैं। पर सिक्किम की राजधानी गंगटोक में ऐसा नहीं है। यहां पर हर सड़क पर शाकाहारी भोजन का विकल्प मौजूद है। कई जगह तो यूपी बिहार की तरह आपको पूड़ी सब्जी और समोसा खाने के मिल जाएगा। स्वाद भी बिल्कुल बिहार और यूपी जैसा। न सिर्फ एमजी रोड पर बल्कि देवराली बाजार तक आपको अपनी पसंद का खानापानी मिल सकता है। चाहे आप मोमोज के शौकीन हों या फिर अलग अलग तरह के रोल्स के या फिर शाकाहारी थाली के, आप निराश नहीं होंगे।

सबसे पहले बात शाकाहारी थाली की। वैसे तो एमजी रोड पर परिवार यहां का सबसे लोकप्रिय शाकाहारी फूड ज्वाएंट है। पर ये थोड़ा महंगा है। हालांकि वहां सैलानियों की भीड़ उमड़ती है। लेकिन यहां पर कई मारवाडी बासा भी हैं। परिवार के ठीक उल्टी तरफ दूसरी मंजिल पर लक्ष्मी मारवाड़ी बासा में पहुंचे। सौ रूपये की अनलिमेटेड थाली का आनंद लें। घी लगी चपाती, चावल, दाल, तीन तरह की सब्जियां और पापड़ छक कर खाएं। सुबह और शाम के मीनू में थोड़ा अंतर रहता है। इसी तरह का दूसरा स्थान भी है परिवार के बगल में सीढ़ियां उतरिए। शर्मा भोजनालय। यहां भी 100 रुपये थाली खा सकते हैं अनलिमिटेड। चाहें तो अलग अलग व्यंजनों का भी आर्डर कर सकते हैं। सभी जगह गर्म ताजा खाना और पीने के लिए गर्म पानी मिल जाता है। डेकोरेशन बहुत शानदार नहीं पर खाने से निराश नहीं होंगे। सिक्किम टूरिज्म की ओर से संचालित रसोई वेजटेरियन एमजी रोड पर स्थित है। इसका इंटिरियर शानदार है। पर दरें थोड़ी ऊंची हैं। सिक्किम के ज्यादातर होटलों में भी रेस्टोरेंट हैं। हमारे होटल निर्वाण रीजेंसी में रेस्टोरेंट था। हालांकि मैंने यहां कभी नहीं खाया।

एमजी रोड पर कंचन फास्ट फूड – एमजी रोड पर चलते हुए एक दुकान नजर आती है  कंचन फास्ट फूड। समोसा दस रुपये में। सुबह के नास्ते में पूड़ी सब्जी मिलती है तो लोगों के मांग के अनुरूप मोमोज भी बनाते हैं। कंचन फास्ट फूड वाले दुर्गा प्रसाद शाह बिहार के आरा के रहने वाले हैं। 1992 से इधर दुकान चला रहे हैं। वे किसिम किसिम के रोल, ब्रेड पकौड़ा आदि भी बनाते हैं। कहते हैं सिक्किम में आकर मोमोज नहीं खाया तो क्या खाया।
डेज स्वीट्स – एमजी रोड पर ही डेज स्वीट्स बेहतरीन दुकानों में से हैं। यहां आप सुबह नास्ते में पूड़ी सब्जी खा सकते हैं। 35 रुपये में बेहतरीन नास्ता। इसके अलावा आप कई तरह की मिठाइयां खरीद सकते हैं। उनका स्वाद लाजवाब है। ये शाकाहारी दुकान है।
नारायण स्वीट्स की विरासत – मिठाइयों के लिए नारायण स्वीट्स पहुंचे। गंगटोक के एमजी रोड में ये दुकान 1965 से है। हालांकि दार्जिलिंग में नारायण स्वीट्स तो 1877 से ही है। यहां भी आप मिठाइयों के अलावा सुबह के नास्ते में कई वेराइटी का आनंद ले सकते हैं।
रोल हाउस –  एमजी रोड पर रोल हाउस में भी खूब भीड़ उमडती है। रोल हाउस परिवार के उल्टी तरफ है। गंगटोक में लोगों को अलग अलग तरह के रोल खाना खूब पसंद है। इसमें वेज रोल, एग रोल, चिकेन रोल से लेकर कई किस्म के रोल हो सकते हैं। रोल के आगे सरदी के बीच पेस्ट्री और आईस्क्रीम के दीवाने भी कम नहीं दिखाई देते।
झालमूड़ी वाले – लाल मार्केट के बाहर चौराहे पर कई झालमूडी वाले दिखाई देते हैं। पटना की तरह चनाजोर गरम खाइए, दस रुपये में। पर चनाजोर गरम खाने के लिए आपको चम्मच भी देते हैं ताकि हाथ गंदे न हों। वहीं कंचनजंगा शापिंग कांपलेक्स में सब्जी बाजार के बीच में कुछ बिहारी दुकानदार हैं जो गोलगप्पे भी शानदार बनाते हैं।

-vidyutp@gmail.com ( GANGTOK,  FOOD,  SAMOSA,  MOMOS,  PURI,  GOLGAPPA) 
( अगली कड़ी में चलिए नाथुला की ओर..... ) 

Wednesday, January 20, 2016

गंगटोक - एमजी रोड की सुबह सुहानी... शाम रंगीन

सुबह सुहानी है तो शाम रंगीन.. एक किलोमीटर लंबी सड़क हर रोज नए किस्से बुनती है.. पात्र बदल जाते हैं पर रौनक बरकरार रहती है। सरदी गरमी बरसात कोई भी मौसम हो कोई फर्क नहीं पड़ता. ये गंगटोक का एमजी रोड है। एमजी रोड यानी महात्मा गांधी रोड। वैसे तो देश के ज्यादातर शहरों में महात्मा गांधी के नाम पर सड़के हैं। पर एमजी रोड उनमें से अलग है। रोड पर बापू की दो प्रतिमाएं भी हैं। एक आवक्ष प्रतिमा है तो दूसरी आदमकद। दोनो में बापू मुस्कुराते नजर आते हैं। यहां बापू के शर्मिंदा होने का कोई कारण भी नहीं है, क्योंकि बापू के स्वच्छता अभियान को यहां भली प्रकार आत्मसात किया गया है। जगह जगह डस्टबिन लगे हैं। हर कोई कूड़ा उसी में फेंकता है। सड़के बीचो बीच फूलों की क्यारियां लगी हैं। जिसमें अनगिनत फूल खिले हैं। लोग अलग अलग एंगिल से इन फूलों के साथ तो कोई इन फूलों की तस्वीरें उतारता नजर आता है।


अल सुबह लोग एमजी रोड पर बैडमिंटन खेलते नजर आते हैं। सड़क खाली नजर आती है। कुछ चाय वाले सुबह सुबह चाय लेकर अपनी मोबाइल दुकान चलाते हैं। आपसे बड़े प्रेम से चाय पीने का आग्रह करते हैं। चाय बेचने का यह सिलसिला रात के 10 बजे तक भी चलता रहता है। चटक धूप निकलने के साथ एमजी रोड की दुकाने खुलने लगती हैं और शुरू हो जाता है कारोबार। गंगटोक शहर के कई प्रसिद्ध शोरुम एमजी रोड पर हैं। बेकरी की दुकानें। कपड़ों की दुकानें। खाने पीने के लोकप्रिय होटल। परिवार भोजनालय, रसोई शाकाहारी, मारवाड़ी बासा से लेकर रोल्स की प्रसिद्ध दुकानें। यादगारी के लिए शापिंग के तमाम विकल्प मौजूद हैं। शहर के कई प्रसिद्ध आवासीय होटल भी एमजी रोड पर स्थित हैं। सड़क एक ओर नेशनल हाईवे से आरंभ होती है तो दूसरी और शहर के प्रशासनिक इलाके नामनांग में जाकर खत्म होती है। बीच में कई जगह सड़क ऊपर नीचे जाती सीढ़ियों से दूसरी प्रमुख सड़कों से जुड़ी हुई है।

पर लोगों का सबसे प्रिय शगल है एमजी पर लगे बेंच पर बैठना और टाइम पास करना. सड़क पर वाहन पूरी तरह से प्रतिबंधित हैं। इसलिए बेखौफ होकर सड़क पर घूमते रहिए। कोलकाता, गुवाहाटी, मुंबई और देश के दूसरे शहरों से आई नौयौवनाएं अंगड़ाई लेती सरदी में आईसक्रीम चाटती चुलबुली हरकतें करतीं नजर आती हैं। बच्चों के लिए तो आनंद मार्ग है एमजी रोड। बापू के साथ सेल्फी लेने का भी अपना आनंद है। ऐसा लगता है मानो बापू नौनिहालों को मस्ती करते देखकर उन्हें आशीष दे रहे हों- इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के।

वैसे तो एमजी रोड बहुत पुरानी सड़क है राजधानी गंगटोक की। पर साल 2008 में इसे नया रूप दिया गया है। एमजी रोड का आधा हिस्सा नया बाजार कहलता है। सड़कों के किनारे सुंदर फुटपाथ। रोशनी के लिए नक्काशीदार लाइटिंग। खाली जगहों पर पेंटिंग और म्यूरल्स। ये सब कुछ मिलाकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं कि आपका एमजी रोड से जाने का दिल नहीं करता। कंपकपाती सुबह हो या चटकीली दोपहर या फिर रुमानी शाम एमजी रोड हमेशा मुस्कुराता रहता है। तो चलिए ना कुछ घंटे गुजारते हैं एमजी रोड पर। - vidyutp@gmail.com
 ( MG ROAD,  GANDI,  GANGTOK,  EVENING  )

( अगली कड़ी में चलिए नाथुला की ओर..... ) 

Monday, January 18, 2016

काजी दोरजी - सिक्किम में लाए लोकतंत्र

काजी दोरजी को सिक्किम में जनतंत्र लाने का श्रेय जाता है। उन्हें सिक्कम में फादर ऑफ डेमोक्रेसी कहा जाता है। 10 नवंबर 1904 को जन्में काजी दोरजी ने राजतंत्र के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंका था। अब सिक्किम विधानसभा परिसर में उनकी आदमकद प्रतिमा लगाई गई है। दोरजी का निधन 2007 में 28 जुलाई को हुआ।

सिक्किम हिन्दुस्तान का सबसे नया राज्य है। यह पुडुचेरी और गोवा के बाद भारत का हिस्सा बना। यह 1975 मे भारत का 22वां राज्य बना। इससे पहले सिक्किम में लंबे समय से राजतंत्र हुआ करता था। पर जनता चोग्याल के शासन से त्रस्त थी। चोग्याल ने जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों की उपेक्षा शुरू कर दी, तब लोग नाराज हुए। हालांकि चोग्याल चाहता था कि उसका भूटान की तरह स्वतंत्र देश की तरह अस्तित्व बना रहे। पर सिक्किम की जनता हमेशा से विशाल भारतीय लोकतंत्र का हिस्सा बनना चाहती थी। वहीं भारत के लिए सिक्किम का सामरिक महत्व हैं क्योंकि यह तिब्बत जाने का मार्ग है और तिब्बत चीन के कब्जे में है।



( QAZI DORJEE,  GANGTOK,  DEMOCRACY,  SIKKIM) जनता को स्वीकृति के तुरन्त बाद काजी लेन्दुप दोरजी ने 16 अप्रैल 1975 को भारत सरकार से उचित कार्रवाई करने का अनुरोध किया। काजी दोरजी का अनुरोध था कि कार्रवाई तुरन्त की जानी चाहिए । भारत ने काजी  दोरजी के अनुरोध को स्वीकार किया और चोग्याल की पद की समाप्ति के लिए जनता की राय ली। इस बीच चोग्याल ने विदेशी शक्तियों से संपर्क साधने की कोशिश की। पर जनता ने उसके संपर्क के सारे साधन ध्वस्त कर दिए। कोई बड़ा खून खराबा नहीं हुआ। 16 मई 1975 को भारत सरकार ने एसके लाल को सिक्किम का गवर्नर बनाकर भेजा। इस तरह सिक्किम भारत का हिस्सा बन गया। इसी दिन काजी दोरजी को भी सिक्किम के पहले मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई गई। इसके साथ ही गंगटोक में तिरंगा लहराने लगा। वे अगले चार साल तक 1979 तक सिक्किम के मुख्यमंत्री रहे। उसके बाद नर बहादुर भंडारी के हाथों में कमान आई। नर बहादुर 1979 से 1984 फिर 1984 से 1994 तक सिक्किम के मुख्यमंत्री रहे।

चामलिंग का दौर - 12 दिसंबर 1994 को सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट के पवन कुमार चामलिंग के हाथ में सिक्किम की कमान आई। अब पिछले 22 साल से वे सिक्किम के मुख्यमंत्री के तौर पर काम कर रहे हैं। उम्मीद है वे ज्योति बसु का रिकॉड तोड़ सकते हैं। चामलिंग की लोकप्रियता का आलम ये है कि वहां विपक्ष काफी कमजोर है। गंगटोक शहर के तमाम दुकानों  एसडीएफ के विशाल कैलेंडर लगे दिखाई देते हैं जिसमें चामलिंग की तस्वीरें लगी हैं। ये उनकी लोकप्रियता का परिचायक है कोई तानाशाही नहीं। दुकान सम्मान में उनकी तस्वीरों वाली कैलेंडर लगाते हैं।

सिक्किम विधान सभा - सिक्किम में कुल 32 विधानसभा क्षेत्र हैं। इसमें से 12 अनुसूचित जाति और जनजातीय आबादी के लिए आरक्षित हैं। राज्य की कुल आबादी सवा छह लाख है जिसमें 3.25 लाख मतदाता हैं। राज्य की कुल आबादी में 69 फीसदी नेपाली लोग हैं। वहीं बाकी आबादी में भूटिया, तिब्बती और लेपचा प्रमुख रूप से आते हैं। सिक्किम का वर्तमान एसेंबली भवन नामनांग स्थित है। यह मार्च 1993 में बनकर तैयार हुआ। भवन को सिक्किम की वास्तुकला के हिसाब से बनाया गया है। यह तीन मंजिला है। दूर से देखने में यह किसी बड़े घर सा ही लगता है। इसके बगल में अब चिंतन भवन का निर्माण हुआ है जो विशाल बैठक कक्ष है। इसमें राज्य के प्रमुख राजकीय आयोजन होते हैं।
 - vidyutp@gmail.com
(QAZI DORJEE,  GANGTOK, DEMOCRACY  ))

Saturday, January 16, 2016

आर्गेनिक स्टेट बना सिक्किम- बाकी राज्यों के लिए नजीर

देश के एक नन्हें से राज्य सिक्किम ने वो कर दिखाया है जो दूसरे राज्यों के लिए नजीर बन सकती है। कई सालों से चल रहे प्रयास के बाद सिक्किम देश का पहला आर्गेनिक स्टेट बन गया है। यानी सिक्किम के किसी भी खेत में जो कुछ भी पैदा होगा वह आर्गेनिक उत्पाद ही होगा। आलू, गोभी, चाय से लेकर सब कुछ। यह कर दिखाया है मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग के नेतृत्व में राज्य के लोगों ने। साल 2003 में जब सिक्किम ने विधानसभा में ये प्रस्ताव लाया तो लोगों को थोड़ा आश्चर्य हुआ था, पर अब ये हकीकत बन चुका है।
पूरी दुनिया में आर्गेनिक खेती को लेकर जागरुकता की बयार तो सालों से चल रही है। कई राज्यों के खेत लगातार पेस्टिसाइड्स और यूरिया पोटाश जैसे खाद डाले जाने के कारण बर्बाद हो चुके हैं। कई साल पहले पंजाब सरकार के एक मंत्री ने सार्वजनिक तौर पर माना था कि उनके राज्य का गेहूं तो जानवरों के खाने लायक भी नहीं रह गया है। भविष्य में होने वाली कैंसर जैसी तमाम घातक बीमारियों से बचने का ऊपाय है कि हम समय रहते चेत जाएं। वैसे उत्पादों का ही सेवन करें जो बिना रासायनिक खाद और कीटनाशक के ही उगाए गए हों। पर भला किसी राज्य के कुछ गांव के कुछ किसानों के आर्गेनिक फार्मिंग करने से भला हम कब तक सार्थक नतीजों तक पहुंच सकेंगे। इस सच को समझा सिक्किम ने।

साल 2003 में हुई शुरुआत – सिक्किम ने 2003 में ही कानून पास कर दिया कि राज्य के खेतों में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल प्रतिबंधित होगा। वहां आप घरों में पेस्ट कंट्रोल भी नहीं करा सकते। चामलिंग के इस ऐतिहासिक फैसले के पीछे हिमालय के पारिस्थितिक तंत्र को बचाने की भावना भी थी। क्योंकि सिक्किम का बड़ा हिस्सा हिमालय की पर्वत श्रंखलाओं के बीच विस्तारित है। सिंथेटिक फर्टिलाइजर पर प्रतिबंध से ग्रीन हाउस गैस के उत्सर्जन में भी कमी आई है। पूरे सिक्किम का वातावरण में सुधार हुआ है। यह एक ऐसा दूरदर्शी फैसला था जिसके परिणाम दूरगामी होंगे। आज दुनिया क्लाइमेट चेंज के खतरों से जूझ रही है उसमें सिक्किम की ये कोशिश सराहनीय है।     
अब सौ फीसदी आर्गेनिक खेती -  सिक्किम में कुल 60 हजार हेक्टेयर फार्मलैंड यानी खेती योग्य जमीन है। इसमें साल 2014 तक 40 फीसदी इलाके में आर्गेनिक तरीके से खेती होने लगी थी। पर 2015 के अंत तक 100 फीसदी का लक्ष्य प्राप्त कर लिया गया। सिक्किम स्टेट कोआपरेटिव सप्लाई एंड मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेट ( सिमफेड) ने खेती की निगरानी के लिए एक तंत्र विकसित किया। किसानों को आर्गेनिक खेती के लिए न सिर्फ प्रेरित किया गया। बल्कि इसके लिए कानून भी बनाए गए। गंगटोक के पत्रकार राजेंद्र क्षेत्री बताते हैं कि सरकार ने कानून लाकर साल 2003 में सिक्किम में रासायनिक खाद और पेस्टिसाइड्स के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी।

 राज्य में अगर कोई खाद या कीटनाशक का प्रयोग करता पाया गया तो दो लाख रुपये जुर्माना है। इससे फायदा हुआ किसानों को उनके उत्पाद का बेहतर रिटर्न मिलने लगा। मैं गंगटोक के सब्जी बाजार में जाता हूं। स्थानीय आलू जो आर्गेनिक है 30 से 40 रुपये किलो बिक रहा है तो सिलिगुड़ी से आने वाले आलू 20 रुपये किलो। अब बेहतर मार्केटिंग सिस्टम से किसानों को उनके आर्गेनिक उत्पादों का बेहतर दाम मिलने की उम्मीद है। राज्य की सरकारी एजेंसियां इसके लिए काम कर रही हैं। सिमफेड ने किसानों के उत्पादों के  मार्केटिंग के लिए 200 के करीब कोआपरेटिव सोसाइटियां बनाई हैं जो किसानों से उनके उत्पाद उनके खेतों से खरीद लेते हैं। ये उत्पाद न सिर्फ दूसरे राज्यों बल्कि विदेशों में भी भेजे जा रहे हैं। किसानों को भुगतान करने की सिस्टम पारदर्शी है। उन्हें 15 दिनों में भुगतान मिल जाता है।

किन उत्पादों की खेती - आर्गेनिक खेती के तहत सिक्किम के किसान धनिया, अदरक जैसे मसाले, फलों में संतरा तो सब्जियों में आलू, बिन्स,  बेबी कॉर्न और स्वीट कॉर्न उगाते हैं। कुछ इलाकों में धान की भी खेती होती है। इसके अलावा हल्दी, बक ह्वीट (हिंदी प्रदेश में कूटू कहते हैं),  और कई तरह के औषधीय पौधों की भी खेती हो रही है।


आर्गेनिक टूरिज्म भी - सिर्फ खेती ही नहीं बल्कि सिक्किम में आर्गेनिक टूरिज्म को बढ़ावा दिया जा रहा है। सिक्किम आने वाले सैलानियों के लिए गांव में होम स्टे का ऑफर दिया जाता है। इसे नेचर टूरिज्म का नाम दिया गया है। इस दौरान सैलानियों को पूरी तरह आर्गेनिक फूड खाने में परोसा जाता है। साथ ही सैलानियों को आर्गेनिक फार्मिंग वाले खेत भी दिखाए जाते हैं। इस दौरान सैलानी चाहें तो किसानों से सीधे आर्गेनिक उत्पाद खरीद भी सकते हैं।
दूसरे राज्यों ने ली प्रेरणा - सिक्किम की कोशिशों से दूसरे राज्य भी प्रेरणा ले रहे हैं। नगालैंड और मिजोरम जैसे राज्यों ने भी खुद को 100 फीसदी आर्गेनिक खेती वाला राज्य बनाने की इच्छा जताई है। उत्तराखंड ने अपने कई पहाड़ी जिलों में आर्गेनिक फार्मिंग को बढ़ावा देने की शुरुआत की है। साल 2004 में उत्तराखंड आर्गेनिक सार्टिफिकेशन बोर्ड का गठन किया गया। साल 2005 में भारत सरकार के कृषि मंत्रालय ने आर्गेनिक खेती के लिए राष्ट्रीय परियोजना की शुरूआत की। इस क्रम में नवंबर 2005 में पहली बार बेंगलुरू के लालबाग में इंडिया आर्गेनिक 2005 नामक इंटनेशनल ट्रेड फेयर का आयोजन किया गया। बाद में केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश की सरकारें भी अपने यहां आर्गेनिक फार्मिंग की नीति लेकर आई। अब नेशनल हार्टिकल्चर मिशन के तहत भी आर्गेनिक फार्मिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है।
पवन कुमार चामलिंग जो सिक्किम को मुख्यमंत्री के तौर पर 17 सालों से ज्यादा समय से नेतृत्व प्रदान कर रहे हैं, उनकी इच्छा है कि सिक्किम के हरित वातावारण बनाने के लिए नॉन बायोडिग्रेडबल उत्पादों ( प्लास्टिक पॉलीथीन जैसे उत्पाद जो आसानी से नष्ट नहीं होते ) को पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जाए। चामलिंग साहब ने यह साबित कर दिया है कि इच्छा शक्ति हो तो बड़े बदलाव असंभव नहीं हैं। शाबाश सिक्किम। http://www.sikkimorganicmission.gov.in/

-    विद्युत प्रकाश मौर्य ( vidyutp@gmail.com)

 (SIKKIM, GANGTOK, ORGANIC FARMING, PAWAN KUMAR CHAMLING, AGRICULTURE) 

Thursday, January 14, 2016

तीस्ता के साथ गंगटोक का सफर

तीस्ता नदी सी तू चंचला... येशुदास के आवाज में ये गीत बचपन से सुन रहा हूं। सिलिगुड़ी से गंगटोक के रास्ते में सड़क के साथ साथ लंबे समय तक तीस्ता नदी साथ साथ चलती है। उछलती-कूदती बलखाती किसी अल्हड़ किशोरी की तरह। चंचल- चपल तीस्ता।

सिक्किम के चोल्हमु लेक से निकलने वाली तीस्ता 309 किलोमीटर का सफर तय करके ब्रह्मपुत्र में जाकर मिल जाती है। इसके किनारे सिलिगुड़ी, जलपाईगुड़ी, सेवक, रंगपो जैसे शहर आते हैं। तीस्ता लंबी दूरी तक सिक्किम और बंगाल की सीमा बनाते हुए बहती है। भारत ने गोजालडोबा में तीस्ता पर बांध बनाया। हमें रास्ते में तीस्ता पर बने हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट दिखाई देते हैं। भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी के जल के बंटवारे को लेकर 1930 से ही विवाद चला आ रहा है। बांग्लादेश चाहता है कि भारत तीस्ता का 20 फीसदी स्वभाविक बहाव उसके लिए छोड दे
बांग्लादेश ने भी तीस्ता पर अपने यहां दलिया में सिंचाई के लिए बांध बनाए हैं।  वैसे भारत और बांग्लादेश के बीच 54 छोटी बड़ी नदियों के जल को लेकर साझेदारी होती है।
तीस्ता नदी पर एक पुल। 
न्यू जलपाईगुडी से सिक्किम की राजधानी गंगटोक की दूरी 126 किलोमीटर है। हमारी टैक्सी सिलिगुड़ी टाउन को पार करके सालुगड़ा होते हुए सेवक पहुंचती है। यह आर्मी का बड़ा एरिया है। सेवक के आगे हरे भरे घने जंगल आते हैं। इसके बाद तीस्ता नदी के दर्शन होते हैं। सेवक में तीस्ता नदी पर रेल पुल दिखाई देता है। वास्तव में न्यू जलपाईगुडी से न्यू अलीपुर दुआर जाने के दो मार्ग हैं। एक मार्ग फालकाटा, न्यू कूचबिहार होकर है। दूसरा मार्ग सिलगुड़ी, गुलमा, सेवक, न्यू माल जंक्शन, बीनागुड़ी, हासीमारा (भूटान के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन) से होकर। यह सिंगल ट्रैक वाली ब्राडगेज लाइन है। एनजेपी से बीनागुड़ी होकर अलीपुर दुआर 169 किलोमीटर है। 
तीस्ता नदी का विस्तार। ( तीस्ता शहर में ) 

वहीं एनजेपी से न्यूकूच बिहार होकर न्यू अलीपुर दुआर 144 किलोमीटर है। खैर अभी चलते हैं गंगटोक की ओर। तीस्ता नदी में अक्तूबर से मार्च के बीच पानी कम रहता है। लेकिन कम पानी के बीच तीस्ता की चपलता नयनाभिराम है। कई जगह तीस्ता में बिल्कुल कम पानी दिखाई देता है तो कई जगह ज्यादा। नदी में कई जगह लोग रीवर राफ्टिंग के मजे लेते हैं। पर अखबार में खबर पढ़ता हूं – तीस्ता में राफ्टिंग करने गए कोलकाता के तीन छात्रों की मौत। यानी तीस्ता खतरनाक भी है।

टैक्सी एनएच 31ए पर दौड़ रही है। सेवक के बाद कालीझोरा, रोंगचोंग होते हुए तीस्ता नदी के साथ साथ सड़क चलती है। तीस्ता बाजार में तीस्ता नदी पर सडक पुल आता है। अभी तक तीस्ता नदी दाहिनी तरफ थी अब बायीं तरफ हो जाती है। थोड़ा आगे से कालिंपोंग के लिए मार्ग बदलता है। यहां से कालिंपोंग महज 18 किलोमीटर है।
आगे किरने (कालिंपोंग, दार्जिलिंग) में सभी सूमो, टैक्सियां खाने के लिए रुकती हैं। तीन होटल हैं एक साथ। खाने की थाली 80 रुपये में अनलिमिटेड। थाली अच्छी है। पर मैं यहां खाता नहीं हूं। 
रंगपो में सिक्किम का प्रवेश द्वार। 

करीब 80 किलोमीटर के सफर के बाद आता है रंगपो। यहां सिक्किम का प्रवेश द्वार बना है। यहां चेकपोस्ट पर भी यात्रियों को आईकार्ड दिखाना पड़ता है। रंगपो में बौद्ध विहार है। यहां एचडीएफसी बैंक और डोमिनो पिज्जा दिखाई देता है। एक यात्री यहां उतरते हैं। पर टैक्सी चालक पहले सड़क किनारे टैक्सी को पार्किंग में लगता है फिर उन्हें उतारता है। सिक्किम में ट्रैफिक नियम बहुत सख्त हैं, यह आगे भी दिखाई देता है। सिंगतम में एक और पुल आता है तीस्ता नदी पर। इसके बाद आता है रानीपुल। यहां 12 किलोमीटर रह जाता है गंगटोक। नौ किलोमीटर पहले सिक्किम यूनीवर्सिटी का परिसर दिखाई देता है। इसके बाद नादरेंग। फिर देवराली।

देवराली बाजार में टैक्सी और बस स्टैंड है। यहां से आगे दिन में बड़ी टैक्सियां नहीं जातीं। गंगटोक शहर में छोटी टैक्सियां चलती हैं शेयरिंग में। किराया 10, 20, 30 और 40 रुपये। एक पुलिस वाला मुझे ऐसी ही एक टैक्सी दिलाने में मदद करता है। देवराली से एमजी रोड के पास के लिए 20 रुपये किराया। लाल बाजार के पास से सीढ़ियां चढ़कर एमजी रोड होते हुए नामनांग पहुंचता हूं। यहां पर है मेरा होटल निर्वाण रीजेंसी, जिसे मैंने मेक माईट्रिप के द्वारा बुक किया था।
-vidyutp@gmail.com
( TEESTA RIVER, GANGTOK, SIKKIM)  
( यात्रा का  मार्ग - न्यू जलपाईगुड़ी, सिलिगुड़ी,सालुगड़ा, सेवक, कालीझरा, रोंगचोंग, तीस्ता बाजार, किरने, रंगपो, रानीपुल, देवराली, गंगटोक ) 




Tuesday, January 12, 2016

बंगाल की महबूब ट्रेन - पदातिक एक्सप्रेस

पदातिक एक्सप्रेस- सियालदह सेन्यू जलपाईगुड़ी के बीच चलने वाली दार्जिलिंग मेल के बाद एक और ट्रेन। मैं सुबह सुबह अपने साथी अनवारुल हक के साथ मालदा टाउन स्टेशन पर 12377- पदातिक एक्सप्रेस का इंतजार करता हूं। पर इंतजार कहां। ट्रेन का सुबह 5.40 पहुंचने और 5.45 छूटने का समय है। लेकिन ट्रेन तो आधा घंटे पहले आकर प्लेटफार्म पर लग चुकी है। बीच के एसी कोच के सामने भारी सुरक्षा है।

टीटी बाबू बताते हैं कि जनरल डिब्बा पीछे हैं। एक दिन पहले एक बंगाली बाला ने बताया था कि ट्रेन में काफी भीड़  होती है। हमें चूंकि न्यू जलपाईगुड़ी तक ही जाना था इसलिए चार घंटे के सफर के लिए आरक्षण नहीं कराया। पर हमें जनरल डिब्बे में जगह आसानी मिल गई। पदातिक का जनरल डिब्बा, एक दम साफ सुथरा। हर डिब्बे में मोबाइल चार्जिंग प्वाइंट, सारी बत्तियां ठीक ठाक। यहां तक की जनरल डिब्बे के टायलेट में डस्टबिन लगे हुए। काश सभी ट्रेनों का जनरल डिब्बा ऐसा ही होता। पूर्व रेलवे को ऐसी सफाई और इंतजाम के लिए धन्यवाद। पदातिक एक्प्रेस का नाम बांग्ला  के प्रसिद्ध कवि सुभाष मुखोपाध्याय कृति - पदातिक के नाम पर रखा गया है। 

पदातिक एक्सप्रेस कोलकाता से न्यू जलपाईगुड़ी तक जाने के लिए बेहतरीन ट्रेन है। हालांकि अब ये बदले नंबर के साथ न्यू कूचबिहार तक जाती है। पदादिक पहली बार 4 अक्तूबर 2009 को चली थी। इसका नाम ममता बनर्जी की साहित्यिक अभिरूचि का परिचायक है। तो बंगाल के लोगों की यह महबूब ट्रेन है। 2010 के रेल बजट में इसे दैनिक ट्रेन घोषित किया तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी ने। संयोग से 29 दिसंबर की सुबह जब हम इस ट्रेन से सफर कर रहे थे तो इसमें पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी अपने लाव लश्कर के साथ जा रही थीं। वे किशनगंज में उतर गईं. यहां से उन्हें उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर के दौरे पर जाना था। पदातिक अपने समय पर न्यू जलपाईगुड़ी स्टेशन पहुंचती है। अब इस ट्रेन को न्यू अलीपुर दुआर तक विस्तार की मांग हो रही है।

न्यू जलपाईगुड़ी जंक्शन के बाहर से दार्जिलिंग और गंगटोक जाने की टैक्सियां मिलती हैं। वैसे ऐसी ही टैक्सियां सिलिगुड़ी टाउन से भी जाती हैं। पर एनजेपी स्टेशन के बाहर आप किसी ट्रेवल एजेंट के चक्कर में न पड़े। ये आपको पैकेज दुगुने से तीगुने दाम पर बेचकर मूर्ख बनाएंगे। होटल बुकिंग के में 50 फीसदी कमीशन खा जाते हैं। मुझे एनजेपी स्टेशन के प्लेटफार्म पर एक एजेंट मिल गया। बोला गंगटोक 200 रुपये में टैक्सी पर चलिए बिठा देता हूं। पर व ले गया एक ट्रेवल एजेंट के दफ्तर में। जैसे ही एजेंट को पता चला कि गंगटोक में मेरा होटल बुक है तो उसका चेहरा उतर गया। मैंने कोई पैकेज नहीं लिया। बाहर आकर टैक्सी स्टैंड से गंगटोक की टैक्सी ली। टैक्सी भक्तिनगर, डीबीसी (देशबंधु चितरंजनदास) रोड, एचसी रोड होते हुए महानदी के पुल को पार कर गंगटोक की ओर चल पड़ी।
न्यू जलपाई गुडी स्टेशन की बात करें तो यहां देश में सबसे सस्ता खाना-पीना उपलब्ध है। स्टेशन के बाहर के होटलों में 60 रुपये में रोटी चावल अनलिमिटेड खाइए। 20 रुपये और 10 रुपये में नास्ता। मैंने 10 रुपये की खिचड़ी खाई नास्ते में। पहाड़ी रास्ते पर जाना था इसलिए हल्की सी पेटपूजा।  
-vidyutp@gmail.com
 

  

Monday, January 11, 2016

प्राचीन गौड मालदा शहर - कभी था 'लक्ष्मणावती'

बारा सोना मसजिद 
बंगाल का पुराना शहर गौड़ कभी बंगाल की राजधानी रहा है। गौड़ प्राचीन काल में  'लक्ष्मणावती' मध्यकाल में  'लखनौती' के नाम से जाना जाता था। किसी समय यह संस्कृत भाषा और हिंदू राजसत्ता का बड़ा केंद्र था। गौड़ का सबंध गीत गोविंद के रचयिता जयदेव के अलावा व्याकारणाचार्य हलयुद्ध से रहा है। सेन वंश के राजा लक्ष्मणसेन के नाम से इस शहर का नाम लक्ष्मणावती रखा गया था। आठवीं से 10 वीं सदी तक यहां पाल राजाओं का शासन था। जबकि 11वीं और 12वीं सदी में सेन वंश का शासन रहा। सेन वंश के शासन में यहां कई हिंदू मंदिरों का निर्माण हुआ पर अब उनका अवशेष नहीं है। 1573 मे अकबर के सूबेदार गौड़ से इसे अपना केंद्र बनाया तब इसका नाम गौड़ पड़ गया। अब गौड़ मालदा मे कई मसजिदें हैं जिनके निर्माण में हिंदू मंदिरों के भग्वनावशेषों का इस्तेमाल प्रतीत होता है।
बारा सोना मसजिद। 


आप पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में मालदा टाउन शहर से 12 किलोमीटर दक्षिण में पुराने गौड़ शहर के ऐतिहासिक अवशेष देख सकते हैं। मालदा शहर महानंदा नदी के किनारे बसा है। 1771 में एक इंगलिश फैक्ट्री के कारण इसे इंगलिश बाजार के नाम से भी जाना जाता था। 18 वीं सदी मैंगो सिटी (आमों का शहर) मालदा अपनी सिल्क इंडस्ट्री के लिए भी जाना जाता था।
बारा सोना मसजिद – यह गौड़ का सबसे बड़ा स्मारक है। मालदा की ओर से आने पर सबसे पहले यही स्मारक नजर आता है। नाम के मुताबिक इसमें 12 दरवाजे होने चाहिए। हालांकि दिखाई 11 देते हैं। इसका निर्माण अल्लाउद्दीन हुसैन शाह ने 1526 में करवाया। ठीक उसी साल जब पानीपत की पहली लड़ाई इब्राहिम लोदी की पराजय हुई थी। इस मसजिद में इंडो अरब स्थापत्य का मेल दिखाई देता है।  इसके मेहराब और गुंबद देखने लायक हैं। गुंबद मुगलकालीन अमरूदी गुंबद की तरह न होकर गोलाकार है। अब यह मसजिद कई इलाकों में टूटी फूटी नजर आती है। पुरातत्व विभाग की ओर से इसका संरक्षण किया गया है।
फिरोज मीनार के आगे।

फिरोज मीनार – कुछ कुछ कुतुबमीनार से मिलती जुलती फिरोजमीनार की ऊंचाई 26 मीटर है। यह पांच मंजिला है। मीनार से सामने एक बड़ा तालाब है। इसका निर्माण 1485-89 के बीच सुल्तान सैफुद्दीन फिरोज ने करवाया था। इसके आधार का वृत 19 मीटर का है। शुरुआत की तीन मंजिलों 12 कोणीय हैं जबकि ऊपर की दो मंजिलें गोलाकार सरंचना में हैं। ऊपर तक पहुंचने के लिए 84 सीढियां बनी है। हालांकि आप इसे सिर्फ बाहर से देख सकते हैं। अंदर जाने की अनुमति अब नहीं है।
सलामी दरवाजा - फिरोज मीनार से एक किलोमीटर पहले दक्षिण दरवाजा आता है। इसे सलामी दरवाजा भी कहते हैं। इसका निर्माण 1925 में लाल पत्थरों से कराया गया था। यह दरवाजा 21 मीटर ऊंचा और 34 मीटर चौड़ा है। कभी यह गौड़ के किले का मुख्य द्वार हुआ करता था।
फिरोज मीनार से आधा किलोमीटर आगे बढ़ने पर एक साथ पांच स्मारकों को समूह नजर आता है। यहां पर सबसे पहले कदम रसूल मसजिद उसके बाद, फतेह खान की मजार, चीका मसजिद, गुमटी गेट, लुकाचोरी गेट देख सकते हैं। यहां पर कुछ दुकानें भी हैं। स्थानीय लोगों के लिए ये एक पिकनिक स्पाट की तरह है। आसपास में आम के बागीचे नजर आते हैं।  
कदम रसूल मसजिद।

कदम रसूल मसजिद – कदम रसूल मसजिद के बारे में कहा जाता है कि यहां पर मुहम्मद साहब के पांव के निशान है। इस मसजिद का निर्माण 1531 में हुआ था। यह एक गुंबद वाली संरचना है। इसका गुंबद ऐसा लगता है मानो कमल के फूल को उल्टा करके रख दिया गया हो। इसकी आंतरिक संरचना कलात्मक है। इसे सुल्तान नुसरत शाह ने बनवाया था। यहां पत्थरों पर मुहम्मद साहब के पांव के निशान है। इसका संरक्षण माहिदपुर गांव के खादिम करते हैं। इस गांव में खादिम के परिवार के 50 घर हैं। खादिम की 60वीं पीढ़ी से हमारी यहां मुलाकात होती है। उनका नाम है मुहम्मद जमील हसन मुल्ला। लोगों में इस इस मसजिद को लेकर बड़ी आस्था है। लोग यहां मन्नते मांगने आते हैं। इसके पास ही तांतीपारा मसजिद है, यहां भी सुंदर नक्काशी देखी जा सकती है।
फतेह खां की मजार। 

फतेह खां की मजार – फतेह खां औरंगजेब का जनरल दिलावर खां का बेटा था। 1658 में जन्मे फतेहखान की मौत 1707 में हुई। यहां उसकी मजार बनी है जिसकी दीवारें कलात्मक हैं। बताया जाता है कि फतेह खां को एक मुस्लिम संत की हत्या के लिए भेजा गया था पर वह अपनी मंजिल का नहीं पहुंच सका और खून की उल्टियां करके मर गया।


चीका मसजिद – सुल्तान युसुफ शाह ने 1475 में चीका मसजिद का निर्माण कराया। वास्तव में यह कभी चीका यानी चमगादड़ों की शरण स्थली हुआ करता था। यह भी एक गुंबद वाली संरचना है। 
चीका मसजिद। 

अब इसका अवशेष ही बचा है। इसकी दीवारों पर शानदार नक्काशी दिखाई देती है। दीवारों पर हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां देखी जा सकती हैं। यह एक ऐसी मसजिद है जिसकी वास्तुकला हिंदू मंदिर की है। इससे प्रतीत होता है कि यह कभी हिंदू मंदिर रहा होगा।

गुमटी गेट – गुमटी गेट की इमारत दूर से ही अदभुत नजर आती है। यह चीका मसजिद के ठीक सामने है। 1512 में इसका निर्माण अलाउद्दीन हुसैन शाह ने करवाया। इसका आकार छोटा है पर देखने में सुंदर है। इसके निर्माण में ईंट और मिट्टी का इस्तेमाल हुआ है। पर इसके रंग अदभुत हैं और दरवाजे पर शानदार नक्काशी है। हालांकि आजकल इसके संरक्षण के लिए इसे बंद कर दिया गया है। गुमटी गेट और चीका मसजिद के बीच खाली मैदान में एक मंदिर का अवशेष दिखाई देता है। इसका अब सिर्फ आधार तल ही रह गया है। इसे देखकर लगता है कि कभी यहां मंदिरों का समूह रहा होगा।

गुमटी गेट के आगे। 


लुका चोरी गेट लोकाचुरी गेट का निर्माण 1655 का  है। इस गेट के अंदर से आजकल सड़क सरपट गुजरती है। इसके नाम के पीछे रोचकता है। अंगरेजी के खेल हाइड एंड सीक यानी लुकाछिपी के खेल के नाम पर इस गेट का बांगला नाम है लुका चोरी। कहा जाता है यहां सुलतान अपनी बेगमों के साथ लुका छिपी का खेल खेला करता था। दो मंजिला यह दरवाजा महल में प्रवेश के मुख्य दवारा के तौर पर काम करता था।

चामकाटी मसजिद। 
चामकाटी मसजिद – मेहदीपुर बार्डर के रास्ते में यह नन्ही सी मसजिद है जिसका नाम चामकाटी मसजिद लिखा गया है। इस मसजिद का भी निर्माण सुलतान शमशुद्दीन युसुफ शाह ने 1475 में कराया। माना जाता है कि इसका संबंध मुसलिम समाज के चामकाटी समुदाय से है। गौड़ मालदा से बांग्लादेश के मेहदीपुर बार्डर की दूरी महज दो किलोमीटर है। यहां से अंतरराष्ट्रीय व्यापार होता है। हमें रास्ते में ट्रकों की लंबी लाइनें लगी देखीं। यहां से ज्यादातर सामग्री बांग्लादेश जाती है। पर दूसरी तरफ से माल कम ही आता है। 

कैसे पहुंचे – मालदा टाउन के रथबारी चौक से गौड़ की दूरी 12 किलोमीटर है। आप आटोरिक्शा या टैक्सी किराये पर लें। सार्वजनिक वाहन से नहीं जा सकते क्योंकि सारे ऐतिहासिक स्थल एक ही जगह पर नहीं हैं। इसलिए आरक्षित वाहन ही सुविधाजनक है। इतिहास के शोधार्थी मो अनवारुल हक के साथ हमारी यात्रा शुरू हुई। हमने रथबारी चौक  से आटो रिक्शा किराये पर लिया। आटो चालक बोबाई सिंह ( 98511-40223) ने हमें सारे स्मारक बड़े दिल से घुमाया उनका धन्यवाद।
और ये रहा गौर मालदा का लोकाचुरी  ( Hide and Seek ) गेट।