Tuesday, December 1, 2015

गोल्डेन टेंपल वेलोर (महालक्ष्मी मंदिर) का दर्शन

हमारी ट्रेन वेलोर कैंट रेलवे स्टेशन पर बिल्कुल समय पर पहुंची। ये एक छोटा सा स्टेशन है, वेलोर शहर का। वैसे वेलोर का बड़ा और मुख्य स्टेशन काटपाडी जंक्शन है। पर वेलोर कैंट से महालक्ष्मी मंदिर की दूरी महज 7 किलोमीटर है और काटपाडी जंक्शन से 16 किलोमीटर है। लिहाजा हमारे ट्रेन में सहयात्री सरवनन जी ने बता दिया था कि आप वेलोर ही उतर जाएं। वेलोर कैंट पर ज्यादा चहल पहल नहीं है। बाहर आने पर एक आटो रिक्शा वाले से किराया तय किया 110 रुपये में श्रीपुरम। आटो करीब दो किलोमीटर चलने के बाद शहर से बाहर पतली इकहरी सड़क पर भाग रहा था। थोड़ी देर में हम श्रीपुरम में थे। 

श्रीपुरम यानी शक्तिअम्मा की बसाई हुई दुनिया। यहां है महालक्ष्मी मंदिर। पर
हमें भूख लगी थी लिहाजा सोचा दर्शन से पहले पेट पूजा ही कर ली जाए। बचपन में सुना था, भूखे भजन न होए गोपाला। इसलिए अपना लगेज मंदिर के लगेज रूम में जमा कराने के बाद मंदिर के मुख्यद्वार के बाहर के रेस्टोरेंट में खाने के लिए पहुंच गए। एक पंक्ति में तीन होटल दिखाई देते हैं।
यहां खाने पीने की दरें भी काफी वाजिब हैं। यानी 50 और 60 रुपये में थाली। जो दक्षिण भारत के अन्य शहरों से अभी कम है। खाना भी अच्छा है। इन होटलों में मिनरल वाटर लेना हो तो 5 रुपये देकर अपना बोतल भर लिजिए। ये बड़ी अच्छी बात लगी हमें। खाने पीने के नाम पर कोई लूट नहीं। हालांकि यहां मंदिर की ओर से संचालित कोई कैंटीन नहीं है। पर मंदिर के अंदर फास्टफूड मिलता है। खाने के बाद हमलोग मंदिर में दर्शन के लिए लाइन में लग गए।

 1500 किलोग्राम सोना -  अब थोड़ी सी बात महालक्ष्मी मंदिर वेलोर की कर लें। यह मंदिर गोल्डेन टेंपल के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि मंदिर में बड़ी मात्रा में सोना लगा है। सौ एकड़ में बने मंदिर का उदघाटन 15 अगस्त 2007 को हुआ। मंदिर पर 1500 किलोग्राम सोने की पत्तर चढ़ाई गई है। जबकि श्री हरिमंदिर साहिब (अमृतसर) जिसे स्वर्ण मंदिर भी कहा जाता है उसमें 750 किलोग्राम सोने का इस्तेमाल हुआ है। मंदिर का निर्माण कराने वाले शक्तिअम्मा का जन्म 1976 में हुआ था।
माना जाता है कि मंदिर के निर्माण में 300 करोड़ रुपये का खर्च आया। मंदिर का विस्तार 1.8 किलोमीटर में है। अब मंदिर की ओर से स्कूल और रियायती हास्पीटल का संचालन भी किया जाता है। वैसे वेलोर तमिलनाडु का वह जिला है जो कम बारिश के कारण कृषि में सबसे पिछड़ा हुआ है। पर महालक्ष्मी मंदिर के कारण वेलोर को नई पहचान मिली है। इससे पहले वेलोर सीएमसी हास्पीटल के कारण देश भर में चर्चित है। बड़ी संख्या में देश भर के लोग सीएमसी वेलोर में इलाज के लिए आते हैं।

तिरूपति की तरह दर्शन -  कड़ी सुरक्षा जांच के बाद हमलोग मंदिर के पहले हॉल में पहुंचे। दर्शन के दौरान भीड़ नियंत्रण के लिए तिरूपति बालाजी की तरह यहां भी तीन हाल बने हैं। दो हाल खाली होने के बाद हमारा नंबर आया। हाल में हमारी मुलाकात बिहार के मोतिहारी से आए एक परिवार से हुई। धनबाद में काम करने वाले सिंह साहब वेलोर में अपना इलाज कराने आए हैं। डाक्टर का एप्वाइंटमेंट मिलने में अभी कई दिन लगेंगे। एक दिन पहले आए थे महालक्ष्मी मंदिर का दर्शन करने। मंदिर का वैभव इतना भाया कि आज अपने पूरे परिवार को लेकर आए हैं। खैर हमलोग आगे बढ़े। पतले लंबे घुमावदार गलियारों को पार करते हुए चलने के बाद चौडा विशाल गलियारा आया। 

चारों तरफ हरियाली विराज रही है और हम चलते जा रहे हैं तेज कदमों से। और हम पहुंच गए सोने पत्तरों से आवृत महालक्ष्मी मंदिर के प्रवेश द्वार पर। वाकई सुनहले मंदिर की भव्यता को देर तक निहारते रहने की इच्छा होती है। पर महालक्ष्मी के दर्शन के बाद आगे बढ़ते जाना है। महालक्ष्मी मंदिर में दर्शन में आपको समान्य दिनों में तीन घंटे का वक्त लगता है। बाहर निकलने से पहले गुड़ की खीर का प्रसाद सभी श्रद्धालुओं को दिया जाता है। बाहर निकलने से पहले मंदिर की ओर से संचालित बड़ी दुकान है, जहां आप यादगारी के लिए खरीददारी कर सकते हैं।

55,000 वर्ग फीट है मंदिर का दायरा
1.8 किलोमीटर में है महालक्ष्मी मंदिर का विस्तार
1500 किलोग्राम शुद्ध सोना जडा है मंदिर में
300 करोड़ की अनुमानित लागात आई है मंदिर के निर्माण में
2007 में हुआ महालक्ष्मी मंदिर का उदघाटन
500 सुनार और शिल्पियों ने छह साल तक काम करके दिया मंदिर का अदभुत रूप।



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