Tuesday, November 17, 2015

हस्तगिरी पर्वत पर विशाल वरदराज पेरुमाल मंदिर

कांचीपुरम के विशालतम मंदिरों में से एक है वरदराज पेरुमाल मंदिर। चेन्नई से ट्रेन से कांचीपुरम की ओर जाते समय कांचीपुरम शहर आने से पहले ही वरदराज पेरूमाल मंदिर की विशाल गुंबद दिखाई देने लगता है। भगवान विष्णु को समर्पित इस मंदिर में उन्हें देवराजस्वामी के रूप में पूजा जाता है। कांचीपुरम शहर से बाहर यह मंदिर हस्तगिरी की पहाड़ियों पर स्थित है। यह मंदिर 11वीं सदी का बना हुआ है। कुल 23 एकड़ मे फैला यह मंदिर विशालता में यह कांचीपुरम के एकंबरनाथ मंदिर के बाद दूसरे स्थान पर आता है।

वरदराज पेरुमाल मंदिर को सन 1053 में चोल राजाओं ने बनवाया था। बाद में कुलोत्तुंग चोल प्रथम और उसके बेटे विक्रम चोल ( 1118- 1135) ने इस मंदिर का पुनरुद्धार करवाया था। हालांकि विक्रम चोल शिव के बड़े भक्त थे पर उन्होने वरदराज पेरुमाल मंदिर को विकसित करने में पूरी रूचि दिखाई। मुख्य मंदिर में भगवान विष्णु की खड़ी प्रतिमा है जो पश्चिम की ओर देख रहे हैं। 40 फीट के करीब ऊंची विशाल विष्णु प्रतिमा अथी ( गूलर) की लकड़ी से बनी हुई है। इन्हें 40 साल बाद लोगों के दर्शन के लिए बाहर लाया जाता है। अब 2017 में उनके बाहर लाए जाने का वर्ष है। मंदिर में कुल पांच चौबारे हैं। पृष्ठ भाग में एक विशाल सरोवर भी है। मंदिर में विष्णु के अलावा पेरुनदेवी (लक्ष्मी), नाद, भृगु, ब्रह्मा समेत कई देवताओं की भी मूर्तियां हैं। मंदिर में कुल 24 सीढ़ियां है जो गायत्री मंत्र का प्रतीक हैं।

सोने और चांदी की छिपकली - मंदिर में आने वाले श्रद्धालु सोने और चांदी की बनी छिपकली की पूजा भी करते हैं। ऐसा माना जाता है कि इनकी पूजा से कई तरह के अपशकुन कट जाते हैं और घर में वैभव और ऐश्वर्य आता है। इससे मानसिक शांति और सुरक्षा का भी भाव आता है।

विशाल कल्याण मंडपम - मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर विशाल गोपुरम बना है। बाद में इसे सफेद रंग से रंगा गया है। इस गोपुरम की ऊंचाई 160 फीट है। इसके अंदर प्रवेश करते हुए आपको दिखाई देता है 96 स्तम्भों वाला एक हॉल जिसे कल्याण मंडपम कहा जाता है। इस हॉल को विजयनगर के राजाओं ने बनवाया था। इसका आधार तल दो मीटर ऊंचा है। इस हाल के प्रत्येक स्तंभ पर शानदार नक्काशी की गई है। इस नक्काशी लोग घंटों निहारते रह जाते हैं। इन स्तंभो पर खास तौर पर घोड़े दिखाई देते हैं। इन्हें देखकर यह प्रतीत होता है कि 11वीं सदी में वास्तुकला कितनी समृद्ध रही होगी और कलाकारों ने अपने शिल्प का कितना उत्कृष्ट देने की कोशिश की होगी। भव्य और विशालकाय वरदराज पेरुमल मंदिर दक्षिण भारतीय कारीगरों की कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह मंडप 575 वर्ग मीटर में फैला हुआ है।

सालाना उत्सव हर साल मई-जून में मनाया जाने वाला गरुड़ोत्सव इस मंदिर का प्रमुख त्योहार है। यह काफी रंगीन व आकर्षक तरीके से मनाया जाता है। इस दौरान मंदिर की भव्य सजावट की जाती है। इस समय हज़ारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। यह देश भर से विष्णु भक्तों को बरबस अपनी ओर खींचता है। वहीं दिसंबर जनवरी के मध्य मंदिर में वैकुंठ एकादशी मनाई जाती है। कई वैष्णव संतों ने वरदराज पेरूमाल की स्तुतियां अपने तमिल भजनों में गाई है।

कैसे पहुंचे – कांचीपुरम पूरब रेलवे स्टेशन से वरदराज पेरुमाल मंदिर की दूरी 6 किलोमीटर है। जबकि कांचीपुरम बस स्टैंड से 5 किलोमीटर दूरी है। मंदिर के मार्ग में ऊंची चढ़ाई है। मंदिर के आसपास छोटा सा बाजार भी है। मंदिर सुबह 6 से 11 बजे तक और शाम को 4 से आठ बजे तक खुला रहता है।

चेन्नई से लोकल ट्रेन में चलते हुए हमारी मुलाकात सामने वाली सीट पर बैठे सुब्रमन्यम जी से होती है। वे 40 साल दिल्ली में रह चुके हैं, इसलिए फर्राटे से हिंदी बोलते हैं। उन्होंने कहा सबसे पहले वरदराज पेरुमाल मंदिर ही जाएगा दर्शन के लिए। और हमने उनका कहा माना। तकरीबन एक घंटे से ज्यादा इस मंदिर में बीताने के बाद चल पड़े अगले मंदिर के लिए।



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