Sunday, November 29, 2015

तिरुवनमलै के शिव – अरुणाचलेश्वर महादेव

तमिलनाडु के जिले तिरुवनमलै में शिव का अनूठा मंदिर है। अनामलाई पर्वत की चोटी की तराई में इस मंदिर को अनामलार या अरुणाचलेश्वर शिव मंदिर कहा जाता है। शिव के इस मंदिर में हर माह की पूर्णिमा को श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। खासतौर कार्तिक पूर्णिमा को विशाल मेला लगता है। श्रद्धालु यहां अनामलाई पर्वत की 14 किलोमीटर लंबी परिक्रमा करके शिव से कल्याण की मन्नत मांगते हैं। माना जाता है कि शिव का विश्व में सबसे बड़ा मंदिर है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण थेवरम और थिरुवासगम ने करवाया था।


मंदिर की कथा - एक बार ब्रह्मा ने हंस के रूप धारण किया और शिव का ताज को देखने के लिए उड़ान भरी। ताज को देखने में असमर्थ रहने पर ब्रह्मा ने एक थाजुंबू (केवड़ा, white lotus) के पुष्प को जो शिव का मुकुट नीचे गिर रहा था ताज के बारे में पूछा। फूल ने कहा है कि वह तो चालीस हजार साल के लिए गिर गया था। ब्रह्मा को लगा कि वे ताज तक नहीं पहुंच पाएंगे तब उन्होंने फूल को एक झूठे गवाह के रूप में कार्य करने को राजी किया। फूल ने ऐलान किया कि ब्रह्मा ने शिव का ताज देखा था। शिव इस धोखे पर गुस्सा हो गए। और ब्रह्मा को शाप दिया कि आपका कोई मंदिर धरती पर नहीं बनेगा। वहीं केवडा के फूल को शाप दिया कि उसका शिव की पूजा में इस्तेमाल नहीं होगा। भले ही केवड़ा में भीनी भीनी खूशबु होती है, इससे इत्र और अगरबत्तियां बनती हैं पर पूजा में इस्तेमाल नहीं होता। उस जगह पर जहां शिव ने ब्रह्मा को शाप दिया वह स्थल तिरुवनमलै है जहां पर अरुणाचलेश्वर का मंदिर बना है।

पर्वत है मंदिर का प्रतीक - आम तौर पर देवताओं के मंदिर पहाड़ों पर होते हैं। पर यहां मंदिर पहाड की तराई में है। वास्तव में यहां अनामलाई पर्वत ही शिव का प्रतीक है। पर्वत की ऊंचाई 2668 फीट है। यह पर्वत अग्नि का प्रतीक है। तिरुवनमलै शहर में कुल आठ दिशाओं में आठ शिवलिंग स्थापित हैं। इंद्र, अग्नि, यम, निरूथी, वरुण, वायु, कुबेर, इशान लिंगम नामक कुल आठ लिंगम हैं। हर लिंगम के दर्शन के अलग अलग लाभ हैं।

कार्तिक दीपम – कार्तिक पूर्णिमा पर इस मंदिर की शानदार उत्सव होता है। इसे कार्तिक दीपम कहते हैं। पूरे पर्वत पर तब रौनक रहती है। इस मौके पर विशाल दीपदान किया जाता है। हर पूर्णिमा को परिक्रमा करने का विधान है जिसे गिरिवलम कहा जाता है। इस मंदिर में तमिल फिल्मों के सुपर स्टार रजनीकांत की बड़ी आस्था है। उन्होंने 14 किलोमीटर के परिक्रमा पथ पर अपने खर्च से सोडियम लाइटें लगवाई हैं।
खुलने का समय - मंदिर सुबह 5.30 बजे खुलता है और रात्रि 9 बजे तक श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खुला रहता है। मंदिर की व्यवस्था तमिलनाडु राज्य प्रशासन देखता है। सभी पूजा के लिए दरें तय है। मंदिर में नियमित अन्नदानम भी चलता है। साल 2002 से चलने वाले अन्नदानम में रोज सैकड़ो लोग भोजन पाते हैं। मंदिर की ओर से श्रद्धालुओं के रहने का भी इंतजाम किया गया है। यहां गेस्ट हाउस में 100 से लेकर 400 रुपये में कमरे उपलब्ध हैं। ( http://www.arunachaleswarartemple.tnhrce.in/) वैसे तिरुवनमलै शहर में रहने के लिए और भी होटल उपलब्ध हैं।

कैसे पहुंचे – चेन्नई से तिरुवनमलाई की दूरी 200 किलोमीटर है। यहां बस से भी पहुंचा जा सकता है। ट्रेन से जाने के लिए चेन्नई से वेल्लोर होकर या फिर चेन्नई से विलूपुरम होकर जाया जा सकता है। आप विलुपुरम या वेल्लोर में रूक कर भी तिरुवनमलै जाकर मंदिर दर्शन करके लौट सकते हैं।

हमारी यात्रा-  पुडुचेरी से हमारा आगे का सफर शुरु हुआ बस से। बस ने एक घंटे में विलुपुरम पहुंचा दिया। पुडुचेरी से विलुपुरम की दूरी 37 किलोमीटर है। वैसे पुडुचेरी से विलुपुरम की ट्रेन सेवा भी है। पर ट्रेने कम हैं। बस हमेशा चलती रहती है। विलुपुरम से हमारी ट्रेन 11.40 बजे थी खड़गपुर एक्सप्रेस। थोड़ी शंका थी कि ट्रेन में जनरल डिब्बे में जगह मिलेगी या नहीं। पर ये क्या जनरल डिब्बे में हमारे पूरे डिब्बे में महज पांच सात लोग ही थे। ट्रेन ठीक 11.40 में चल पड़ी। यहां से 68 किलोमीटर के सफर के बार आया तिरुवनमलै रेलवे स्टेशन, जहां पर अरुणाचलेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर है। ट्रेन में हमारे साथ चल रहे, एम सरवनन मिले जिन्होंने इस शिव मंदिर के महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उनका धन्यवाद।


Saturday, November 28, 2015

महाबलीपुरम में समोसा, कचौरी, गोलगप्पा और जलेबी

महाबलीपुरम की शाम को सड़कों पर टहलते हुए कुछ हल्काफुल्का खाने की इच्छा थी। कई दुकानों पर नजर दौडाते हुए हम चल रहे थे। एक दुकान पर समोसा और कचौरी बिकता नजर आया। दक्षिण में समोसा देखकर खुशी हुई। हम जा पहुंचे और दे डाला समोसे का आर्डर। पर यह क्या यह समोसा तो बिल्कुल यूपी बिहार की तरह बना था। अभी तक हमें दक्षिण में अगर समोसा मिल रहा था तो वह प्याज समोसा टाईप का दक्षिण भारतीय तरीके से बना हुआ था। पर महाबलीपुरम में समोसा की दुकान चलाने वाले मोहित बिल्कुल बिहारी अंदाज में समोसे में आलू भरते हैं। बातचीत में पता चला कि मोहित यादव बिहार के मधुबनी जिले के रहने वाले हैं। (मोहित यादव -9840605726) वे 20 साल पहले दक्षिण भारत आए थे। यहां समोसे की दुकान शुरू की। हनुमान चाट भंडार महाबलीपुरम में खूब लोकप्रिय है।

समोसा के साथ उसी तरह की हरी और लाल चटनी बनाते हैं जैसी दिल्ली में मिलती है। समोसा के अलावा वे कचौरी और जलेबी भी बनाते हैं। साथ में उनका गोलगप्पा का स्टाल भी है। दुकान में समोसा, कचौरी, गोलगप्पा, जलेबी के अलावा कुछ नहीं बेचते। उनकी दुकान दोपहर बाद तीन बजे शुरू होती है और रात 9 बजे तक सब कुछ खत्म हो जाता है। यानी आधे दिन के कारोबार से ही संतुष्ट हैं। तीन बजे से पहले वे दुकान के लिए सामान तैयार करते हैं। मजे की बात कि मोहित की दुकान के ग्राहक महाबलीपुरम आने वाले उत्तर भारत के सैलानी नहीं हैं। उनके सबसे ज्यादा ग्राहक तमिलनाडु के स्थानीय लोग हैं, जिन्हें समोसा, कचौरी, जलेबी का स्वाद भा गया है।

मोहित बताते हैं कि शुरू में कारोबार धीमा चल रहा था। तो कई बार यहां से कामकाज समेट कर बिहार वापस जाने का ख्याल आया। पर जब जब ऐसा ख्याल आया कारोबार में फिर से तेजी आ गई। फिर बिहार वापस जाने का इरादा नहीं रहा। अब तो वे पक्के तमिल माटी के हो गए हैं। महाबलीपुरम में ही छोटी सी जमीन खरीद ली हैं। यहीं घर बनाकर बस जाएंगे। भला जहां से रोजी रोटी में बरकत होती हो वही तो घर है ना. उनकी दुकान पर काम करने वाले कई स्टाफ ऐसे हैं जो बिहार के मधुबनी जिले से आए हैं। ठीक इसी तरह हमने कभी शाहपुर पटोरी के शिवशंकर यादव पर लिखा था जो मणिपुर की राजधानी इंफाल में मिठाइयों की लोकप्रिय दुकान चलाते हैं। खैर मोहित यादव के श्रम और जीजिविषा का मेरा सलाम। अब चलते हैं आगे।
- विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

Friday, November 27, 2015

महाबलीपुरम - यहां पत्थर बोलते हैं…

महाबलीपुरम शहर में आप जहां भी घूमें हर गली और नुक्कड़ पर मूर्तियों की दुकानें नजर आती है। नन्ही मूर्तियों से लेकर विशालकाय मूर्तियां तक। ये मूर्तियां यहीं के मूर्तिकार बनाते हैं। कई दुकानों पर तो मूर्तिकार आपको काम करते हुए दिखाई दे जाते हैं। अहले सुबह सूरज उगने के साथ काम शुरू होता है, देर रात तक छेनी हथौड़ी पर काम चलता रहता है।

महाबलीपुरम के मूर्तिकारों द्वारा बनाई गई गौतम बुद्ध की एक दर्जन से ज्यादा भाव भंगिमाओं में मूर्तियां देखने को मिलती हैं। बुद्ध के सिर्फ चेहरे वाली कई किस्म की मूर्तियां दिखाई देती हैं। तो बैठे हुए बुद्ध की भी मूर्तियां यहां के कलाकार सृजित करते हैं। कई जगह पर कलाकारों ने लेटे हुए बुद्ध की विशाल प्रतिमा बनाई है। बुद्ध मूर्तियों की देश भर में मांग तो रहती है। साथ ही उनकी मूर्तियां की मांग विदेश में भी है। यहां कलाकार 5 हजार से लेकर 30 लाख रुपये तक की बुद्ध मूर्तियां बनाते हैं।

सिर्फ बुद्ध ही क्यों महाबलीपुरम के कलाकारों ने माखनचोर कृष्णा और गणेश की अनगिनत भाव भंगिमाओं में मूर्तियां बनाई हैं। लंबोदर गणेश उनका प्रिय विषय है। इसके बाद शिव विष्णु और लक्ष्मी की भी प्रतिमाएं आपको तैयार अवस्था में यहां मिल जाएंगी। इससे आगे स्वतंत्रता आंदोलन के सेनानियों में गांधी सबसे लोकप्रिय चेहरा है। गांधी के बाद नेहरू, शास्त्री और बाबा साहेब अंबेडकर की भी मूर्तियां यहां दिखाई देती हैं। आप वैसे चाहें तो महाबलीपुरम के कलाकारों से किसी भी मूर्ति आर्डर देकर तैयार करा सकते हैं।

हमने कुछ छोटी मूर्तियों के दाम पूछे पांच हजार से लेकर 30 हजार तक की मूर्तियां थीं। जब उनसे ले जाने के तरीके के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि आप अपना पता दे दीजिए मूर्तियां ट्रांसपोर्ट से सुरक्षित आपके घर तक पहुंच जाएंगी। हां ट्रांसपोर्ट का खर्च आपको स्वंय वहन करना पड़ेगा। कलाकारों के पास मूर्तियों को दुनिया भर में कहीं भी भेजवाने का इंतजाम है।

महाबलीपुरम के ये कलाकार किसी कला या शिल्प महाविद्यालय से पढ़ाई करके नहीं आए हैं। बल्कि ये इनका खानदारी पेशा है। संभवतः पल्लव काल से ही कलाकार यहां मूर्तियां बनाते आ रहे हैं। 1957 में यहां गवर्नमेंट कालेज ऑफ आर्किटेक्टर एंड स्कल्पचर की स्थापना की गई। यहां चार साल का स्नातक पाठ्यक्रम (बीएफए) चलाया जाता है। 2001 में यहां परंपरागत कला में बीटेक पाठ्यक्रम भी आरंभ किया गया। इस कालेज से नए जमाने के कलाकार निकल रहे हैं। पर कला तो महाबलीपुरम के लोगों के रग रग में सदियों से बसा हुआ है।
-vidyutp@gmail.com






Thursday, November 26, 2015

महाबलीपुरम का लाइट हाउस

बस स्टैंड से पंच रथ के रास्ते में महाबलीपुरम का लाइट हाउस भी पड़ता है। आप इस पर चढाई भी कर सकते हैं। इस 42 मीटर ऊंचे लाइट हाउस के लिए प्रवेश टिकट है। लाइट हाउस समुद्र में चलने वाले नाव और जहाज को रास्ता दिखाने के मकसद से बनाया जाता है। साल 2011 में इस सैलानियों के लिए खोला गया। 

साल 2001 में इसे लिट्टे की धमकी के बाद बंद कर दिया गया था। इसका निर्माण 1887 में हुआ था, 1904 से यह लोगों को रास्ता दिखा रहा है। इसके बगल में ही 640 ई. में पल्लव राजा महेंद्र वर्मन द्वारा बनवाया गया लाइट हाउस देखा जा सकता है। सातवीं सदी में महाबलीपुरम व्यापार का बड़ा केंद्र और अति व्यस्त बंदरगाह हुआ करता था। तब इस लाइट हाउस की काफी अहमियत थी।

लाइट हाउस के उपर से पूरे महाबलीपुरम शहर का विहंगम दृश्य दिखाई देता है। हालांकि आप यहां ज्यादा देर तक नहीं रूक सकते। लाइट हाउस पर चढाई के लिए 10 रुपये का टिकट लेना पड़ता है।

मुकुंद नयनार मंदिर-  हमें महाबलीपुरम के बाईपास पर मुकुंद नयनार मंदिर नजर आता है। यह भी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से संरक्षित स्मारक की श्रेणी में आने वाला मंदिर है। मंदिर पंचरथ मंदिर के धर्मराज रथ की तरह देखने में नजर आता है। लंबे समय तक यह मंदिर 12 फीट नीचे दबा हुआ था। यह पल्लव राजा राजसिम्हा के समय का माना जाता है। हालांकि मुकुंद नयनार मंदिर को देखने कम ही सैलानी पहुंचते हैं।

तमिल भक्ति आंदोलन में 63 नयनारों की संकल्पना है। ये नयनार शिव के भक्त हुआ करते थे। नयनारों का उद्भव मध्यकाल में मुख्यतः दक्षिण भारत के तमिलनाडु में ही माना जाता है। कुल 63 नयनारों ने शैव सिद्धान्तो के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसी प्रकार विष्णु के भक्त सन्तों को आलवार कहते हैं। सभी नायनारों की गिनती मुक्तात्मा में होती है। इनकी मूर्तियां मंदिरों मे स्थापित की गई है और इनकी पूजा भगवान के समान ही की जाती है। हमने इससे पहले चेन्नई के कपालेश्वर मंदिर में 63 नयनारों की प्रतिमा देखी थी।

टाइगर गुफाएं – यह महाबलीपुरम से 5 किलोमीटर दूर चेन्नई मार्ग पर स्थित है। पत्थरों को काटकर यहां बाघ की मुखाकृति बनाई गई है। इसका निर्माण भी आठवीं सदी में पल्लव राजाओं के काल में हुआ है। यहां पर एक विशाल मुक्ताकाश मंच (ओपन एयर थियेटर) बना हुआ है। यहां पर पल्लवकाल में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। यहां जाने के लिए अलग से वाहन का इंतजाम आपको करना पडेगा।


समुद्र तटीय मंदिर देखने के बाद अनादि और माधवी थक गए थे वे चाहते थे आगे की स्थलों को देखने के लिए हम आटो रिक्शा बुक करें। पर मैं चाहता था कि हम पैदल ही सारे स्थलों का भ्रमण करें। बात आईसक्रीम और नारियल पानी के साथ बनी। दिन चढ़ने के साथ थोड़ी गर्मी बढ़ती जा रही थी। पर जब हम पैदल चलते हैं आसपास के स्थलों पर निगाह डालना बेहतर तरीके से होता है। इस दौरान हम कई ऐसी चीजें भी देख पाते हैं जो वाहन से चलते समय संभव नहीं है।  हर साल दिसंबर में तमिलनाडु टूरिज्म महाबलीपुरम डांस फेस्टिवल का आयोजन करता है। इसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के कलाकार प्रस्तुति देते हैं। बड़ी संख्या में तब सैलानी यहां पहुंचते हैं। इसके साथ ही वे नया साल भी यहीं मनाते हैं।



 





Wednesday, November 25, 2015

इतना बड़ा माखन कान्हा ने खाया

मैया मोरी मैंने ही माखन खायो। बार बार जसोदा के पूछने पर आखिर कान्हा को मानना ही पड़ा था कि माखन उन्होंने ही खाया। लेकिन आखिर कान्हा का माखन कितना बड़ा था। इसका जवाब मिलता है महाबलीपुरम में आकर। महाबलीपुरम के बस स्टैंड के पीछे की तरफ पहाड़ियों पर एक गोल सा पत्थर दिखाई देता है। 

ये पत्थर पहाड पर कैसे टिका हुआ है उसे देखकर कर अचरज होता है। दूर से देखकर लगता है कि यह कभी भी लुढक जाएगा। पर यह अपनी जगह पर मदबूती से टिका हुआ है। इसे नाम दिया गया है कृष्णा बटर बॉल। यानी कान्हा का माखन। इसे देख मेरे बेटे अनादि पूछ बैठते हैं क्या कान्हा जी इतना बड़ा माखन खाते थे। कहा जाता है कि राजा के कई हाथी मिलकर भी इस बटर बॉल को अपनी जगह से एक इंच भी इधर से उधर नहीं कर सके।

अर्जुन तप स्थली –  महाबलीपुरम के बस स्टैंड के ठीक पीछे की गुफाओं को अर्जुन तप के नाम से जाना जाता है। यहां पर चट्टानों से बनी अर्जुन की तपस्या करती हुई मूर्ति है। यहां पर पत्थरों पर उकेरी गई नक्काशी के जरिए भगवान शिव से जुड़ी गंगा के अवतरण की घटना को भी दर्शया गया है।  लेकिन इन सब के बीच सबसे सुंदर है गाय का दूध निकालती हुई मूर्ति। 


इन मूर्तियों को आप घंटों निहारते रह सकते हैं लेकिन आपका मन नहीं भरता। यहां कुल 100 से ज्यादा मूर्तियां गुफाओं को तराश कर बनी हैं। मूर्तियों की ज्यादातर कथाएं महाभारत काल की हैं। राजा भागीरथ के गंगा अवतरण का दृश्य भी यहां पत्थरों पर उकेरा गया है।


पंचरथ – महाबलीपुरम आने वाले सैलानी पंच रथ को जरूर देखने जाते हैं। यह बस स्टैंड से एक किलोमीटर की दूरी पर है। ये रथ पहाड़ी की चट्टानों को काट कर बनाया गए हैं। शिल्पियों ने चट्टान को भीतर और बाहर से काट कर पहाड़ से अलग कर दिया है. ये प्रसिद्ध रथ शहर के दक्षिणी सिरे पर है। पंच पांडवों के नाम पर इन रथों को पांडव रथ कहा जाता है। इन पांच रथों में से चार रथों को एकल चट्टान पर उकेरा गया है, जबकि द्रौपदी और अर्जुन रथ चौकोर है। इन सबके बीच धर्मराज युधिष्ठिर का रथ सबसे ऊंचा है।

महिषासुर मर्दिनी गुफाएं – अर्जुन तप से एक किलोमीटर की दूरी पर पंच रथ स्थित है। लेकिन इसके रास्ते में महिषासुर मर्दिनी गुफाएं पड़ती हैं। इन गुफाओं में दुर्गा की महिषासुर को वध करते हुए प्रतिमा बनी है। इसके अलावा यहां गुफाओं में कई और प्रतिमाएं हैं। इन गुफाओं की ओर जाते हुए हुए आप गर्मी में छाछ पीने और फल खाने का आनंद ले सकते हैं।

सी सेल म्युजियम - आजकल पंच रथ के पास ही सी सेल म्जुयिम बन गया है। लोग इसे भी देखने जाते हैं। इसका टिकट 100 रुपये प्रति व्यक्ति है। यहां जलीय जीवन की अच्छी जानकारी मिलती है। यह एक निजी संग्रहालय है, पर देखने योग्य है। यहां आप मोतियों के विकास की वैज्ञानिक कहानी जान सकते हैं। यहां सबसे छोटा और सबसे बड़ा सेल देखा जा सकता है।
महाबलीपुरम - महिषासुर मर्दिनी गुफाओं की कलाकृतियां। 
महाबलीपुरम - महिषासुर मर्दिनी गुफाओं की कलाकृतियां। 




Tuesday, November 24, 2015

देश के सात अजूबों में एक समुद्र तटीय मंदिर

समुद्र तटीय मंदिर तमिलनाडु के महाबलीपुरम  का सबसे खास आकर्षण है। इसे देश के सात अजूबों में गिना जाता है। साथ ही यूनेस्को द्वारा विश्वदाय स्मारकों की सूची में भी 1984 से ही शामिल है। समुद्र तटीय मंदिर को दक्षिण भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक माना जाता है। यह आठवीं शताब्दी में निर्मित है और वास्तुकला की दृष्टि से भी अद्भुत है। वास्तव में ये स्थान पल्लव नरेशों की शिल्प साधना का अमर स्मारक है। यहां समुद्र तट पर द्रविड़ वास्तुकला के आधार पर यहां तीन मंदिर बनाए गए हैं। केंद्र में भगवान विष्णु का मंदिर है, जबकि उसके दोनों ओर शिव मंदिर हैं।

दो सौ साल पहले तक समुद्र तटीय मंदिर अनजाना था। पिछली शताब्‍दी में लगातार रेत हटने से समुद्र तटीय मंदिर के आस –पास की जमीन में दबी अनेक संरचनाएं सामने आईं। इन सब में आरंभिक पल्‍लव काल की सीढ़ीदार संरचना सबसे अनूठी है जो लगभग 200  मीटर लंबी है। इस विशाल इमारत का ठीक –ठीक प्रयोजन क्‍या था, यह अभी पता नहीं है। इसकी सीढि़यां ग्रेनाइट स्‍लैबों से निर्मित है।

साल 1990 में अकस्‍मात खोजी गई भूवराह मूर्ति , लघु मंदिर और कुआं पल्‍लव नरेश नरसिंह वर्मन ( 638 से 660  ई.) के शासन काल के हैं। ये राजसिम्हा ( 700 से 728 ई.) के शासन काल में निर्मित एक बड़े गोलाकार अहाते से घिरे हैं। इनको अनगढ़ आधार शैल पर तराशा गया है। यहां विष्‍णु जी लेटी हुई मुद्रा में विराजमान  हैं। शिव को समर्पित लघु मंदिर पत्थरों से तराश कर बनाया गया है। इसका शिल्‍प अनूठा है। मंदिर में विशाल शिवलिंग देखा जा सकता है।

मंदिर के आधार पर पल्‍लव शासक राजसिम्हा का नाम खुदा है। चारों तरफ दीवार का  निर्माण संभवत: इसलिए किया गया था कि अंदर रेत न आ पाए। पश्चिमी मंदिर में एक बाह्य दीवार है और एक साधारण गोपुरम है। बीच में विश्राम मुद्रा में लेटे विष्‍णु का एक आरंभिक मंदिर है। इन सभी मंदिरों के नाम राजसिम्‍हा के विभिन्‍न उपनामों का प्रतिनिधित्‍व करते हैं।

प्रवेश शुल्क :  समुद्र तटीय मंदिर और पंच रथ मंदिर के लिए भारतीय नागरिक और सार्क और बिमस्टेक देशों के पर्यटक- 10 रूपये प्रति व्यक्ति  है। अन्य देशों के लिए 250- रूपये प्रति व्यक्ति शुल्क है।  15 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए प्रवेश शुल्क नहीं है। एक स्‍मारक पर खरीदा गया टिकट अन्‍य स्‍मारकों पर भी वैध है। छोटी पहाड़ी पर स्थित शेष स्‍मारकों तथा अन्‍य स्‍थानों पर प्रवेश शुल्‍क नहीं है। स्टिल फोटोग्राफी के लिए कोई शुल्‍क नहीं है। यहां सुबह 6 बजे से शाम 5.30 बजे तक जाया जा सकता है।

कैसे पहुंचे - महाबलीपुरम बस स्टैंड से समुद्र तटीय मंदिर की दूरी आधा किलोमीटर है। मंदिर के बगल में बालु के मैदान पर चौपाटी नुमा बाजार लगा रहता है। यहां आप घुड़सवारी का आनंद ले सकते हैं। समुद्री चीजों की खरीददारी कर सकते हैं। यहां समुद्र तट पर तमिल संत तिरूवल्लुर की प्रतिमा भी स्थापित की गई है। यहां काफी लोग समुद्र तट पर स्नान करते दिखाई देती है। समुद्र तट काफी सुंदर है, पर स्नान करना खतरनाक है।
( Remember-  It is a UNESCO World Heritage Site )

http://whc.unesco.org/en/list/249/video
समुद्र तटीय मंदिर का विंहगम नजारा  ( विश्व धरोहर 1984 से ) 

( MAHABALIPURAM, SEA SHORE TEMPLA, CHOLA KING ) 

Monday, November 23, 2015

मनमोहक महाबलीपुरम की ओर

दिन भर गोल्डेन बीच पर मस्ती करके हम थक चुके थे। बाहर निकल कर क्लाक रूम से अपना सामान रीलिज कराया और बस स्टाप पर आकर बैठ गए। ईस्ट कोस्ट रोड पर गोल्डेन बीच के प्रवेश द्वार के पास ही बस स्टैंड है। हमारे साथ कुछ विदेशी सैलानी भी महाबलीपुरम के लिए बस का इंतजार कर रहे थे। लोगों ने बताया कि 599 नंबर की बस आएगी वह महाबलीपुरम तक जाएगी। थोड़े इंतजार के बाद इस नंबर की बस आ गई। हमें बस में जगह भी मिल गई। कोई 35 किलोमीटर यानी एक घंटे का रास्ता था। शाम गहराने लगी थी। बस ईस्ट कोस्ट रोड पर कुलांचे भर रही थी। हमें पता चला कि चेन्नई के हर इलाके से सिटी बसें महाबलीपुरम तक जाती हैं। अंधेरा होने के कारण ईस्ट कोस्ट रोड का सौंदर्य ज्यादा दिखाई नहीं दे पा रहा था।
मामल्लापुरम बस स्टैंड के पास विशाल रथ।

रास्ते में क्विलोन शहर आया। छोटे से इस शहर में बस मुख्य सड़क से अंदर बस स्टैंड तक गई। फिर बाहर आई और ईस्ट कोस्ट रोड पर दौड़ने लगी। थोड़ी देर में बस महाबलीपुरम शहर में प्रवेश कर गई। ईस्ट कोस्ट रोड के बाईपास से तकरीबन तीन किलोमीटर चलने के बाद बस स्टैंड पहुंच गई। बस से उतरने के बाद हमने अपने होटल का रास्ता पूछा। विनोधरा गेस्ट हाउस के लिए हमें वापस उसी रास्ते पर पैदल लौटना पड़ा जिधर से बस आई थी। बाजार में चहल पहल थी। महाबलीपुरम में सालों भर विदेशी सैलानी बड़ी संख्या में दिखाई दे जाते हैं।

राजस्थान के पुष्कर की तरह दक्षिण का ये शहर विदेशी सैलानियों की खास पसंद है। चेन्नई की तुलना में यहां का वातावरण खुशनुमा रहता है। इसलिए महाबलीपुरम के होटल सालों भर भरे रहते हैं। यहां तमाम रेस्टोरेंट ऐसे हैं जो विदेशी सैलानियों की पसंद के मुताबिक खाना परोसते हैं। शहर की चहल पहल देखते हुए हम अपने होटल के सामने थे। चेक इन की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद अपने कमरे में पहुंच गए। अब पेट पूजा करने की इच्छा हुई। बाहर निकले। हमारे होटल में भी रेस्टोरेंट था पर वह विदेशी सैलानियों से गुलजार था। हमें वहां का मीनू कुछ खास पसंद नहीं आया। सो हम आगे निकल पड़े। पास में एक तमिल मंदिर था। मंदिर खूब सजा हुआ था। वहां पूजा पाठ जारी था। आसपास के सैकड़ो लोग सपरिवार जुटे थे। मंदिर में मत्था टेककर हम आगे बढ़ गए।

रात घिर आने के महाबलीपुरम का कोई स्थल भ्रमण नहीं किया जा सकता था। इसके लिए सुबह का समय ही मुफीद है। लेकिन शहर की दुकानें रात को 10 बजे तक खुली रहती हैं। कभी इस शहर को मामल्लापुरम कहा जाता था। इसका एक अन्य प्राचीन नाम बाणपुर भी है। तमिलनाडु का यह प्राचीन शहर अपने भव्य मंदिरों, स्थापत्य और सागर-तटों के लिए जाना जाता है। चेन्नई से 60 किलोमीटर दूर महाबलीपुरम शहर कांचीपुरम जिले का हिस्सा है। कहा जाता है कि महाबलीपुरम पर चीन, फारस और रोम के प्राचीन सिक्कों मिले थे। जिससे ये पता चलता है कि यहां पर पहले बंदरगाह रहा होगा। महाबलीपुरम दो वर्ग मील के घेरे में फैला हुआ है।

- vidyutp@gmail.com ( 17oct 2015)



Sunday, November 22, 2015

इडली-डोसा-जूस आईसक्रीम- कांचीपुरम और सरवन भवन

दिल्ली में रहते हुए हम कई बार सरवन भवन में दक्षिण का स्वाद लेने जाते हैं तो चेन्नई में जब हम सरवन भवन के शहर में थे तो ये मौका कैसे छोड़ देते भला। कांचीपुरम में भी सरवन भवन की शाखा है। सो कांचीपुरम भ्रमण पूरा होने पर हम पहुंच गए सरवन भवन। कांचीपुरम का सरवन भवन बस स्टैंड के पास मुख्य बाजार में है। दो मंजिला रेस्टोरेंट में नीचे टिफीन सेवाएं हैं तो ऊपर लंच और डिनर सेवाएं।

सरवन भवन के तमिलनाडु में स्थित रेस्टोरेंट्स में खाने पीने की दरें दिल्ली की तुलना में आधी हैं। जैसे यहां मसाला डोसा 60 रुपये का है। टिफीन वाले हिस्से की सर्विस काफी तेज है। खास बात ये है कि यहां आपको चाय और काफी मिल जाएगी। बड़ी संख्या में स्थानीय लोग यहां चाय सुड़कते हुए भी मिल जाते हैं। कोई भी यहां से वापस नहीं लौटे इसलिए सरवन भवन ने ताजे फलों के जूस का काउंटर शुरू कर दिया है। साथ ही अपने ब्रांड की कई तरह की आइसक्रीम बनाना भी आरंभ कर दिया है।

कांचीपुरम के सरवन भवन में दो तरह के डायनिंग हाल हैं। समान्य की तुलना में वातानुकूलित वाले डायनिंग हाल में टैक्स के कारण दरें ज्यादा रहती हैं। हमलोग समान्य हाल में ही बैठ गए। चेन्नई में सरवन भवन के 16 रेस्टोरेंट हैं। पिछले दो दशक में उनके रेस्टोरेंट की संख्या बढ़ी है। चेन्नई में पेरियामेट इलाके में उनके रेस्टोरेंट में दुबारा जाने का मौका मिला। सरवन भवन के हर रेस्टोरेंट में मीनू एक जैसा ही है। दरें भी एक सी हैं।

कांचीपुरम के सरवन भवन में हम अपनी अपनी पसंद के अलग अलग व्यंजनों का आर्डर देते हैं। बाद में आइसक्रीम का भी लुत्फ उठाते हैं। आईसक्रीम की दरें काफी वाजिब हैं। दक्षिण में घूमते हुए सरवन भवन हमारा फेवरिट बन गया। हालांकि पुडुचेरी के जवाहर लाल नेहरू स्ट्रीट पर भी सरवन भवन देखने को मिला पर उसका मालिकाना हक चेन्नई से अलग समूह का है। चेन्नई के सरवन भवन की खास बात यह है कि इसमें न सिर्फ दक्षिण भारतीय बल्कि अब उत्तर भारतीय व्यंजन भी इसके मीनू में शामिल हो चुके हैं। मतलब की आपको कुछ भी चाहिए आप सरवन भवन से वापस नहीं जा सकते।
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Saturday, November 21, 2015

यहां शिव और पार्वती करते हैं नृत्य - कैलाशनाथ मंदिर, कांचीपुरम

कांचीपुरम भ्रमण में हमारा आखिरी पड़ाव था कैलाशनाथ मंदिर। हमारे आटो वाले भाई ने कह दिया था कि यहां के बाद आपको बस स्टैंड छोड़ दूंगा। फिर मेरी सेवा समाप्त। सो हम कैलाश नाथ मंदिर को अच्छी तरह निहार लेना चाहते थे।

कांचीपुरम शहर के पश्चिम दिशा में स्थित यह मंदिर सबसे प्राचीन और दक्षिण भारत के सबसे शानदार मंदिरों में एक है। लाल बलुआ पत्थर से निर्मित यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से संरक्षित स्मारकों की सूची में है। केंद्र सरकार की एजेंसी ने इस मंदिर का रखरखाव बेहतर कर रखा है। मंदिर के बाहर सुंदर हरित परिसर है। कैलाशनाथ मंदिर पल्लव कला का उत्कृष्ट नमूना है। मंदिर के निर्माण में द्रविड़ वास्तुकला की छाप देखने को मिलती है। वास्तु के लिहाज से ये मंदिर महाबलीपुरम के समुद्रतटीय मंदिर से मिलता जुलता है।

कैलाशनाथ मंदिर को आठवीं शताब्दी में पल्लव वंश के राजा राजसिम्हा या नरसिंह वर्मन द्वितीय ( 700 से 728 ई) ने अपनी पत्नी की इच्छा पूर्ति करने के लिए बनवाया था।  मंदिर का निर्माण 658 ई में आरंभ हुआ और 705 ई में जाकर पूरा हो सका। मंदिर के अग्रभाग का निर्माण राजा के पुत्र महेन्द्र वर्मन द्वितीय के करवाया था।

राजा की रूचि संगीत नृत्य और कला में काफी गहरी थी जो इस मंदिर में परिलक्षित होती है। कई लोग ये मानते हैं कि राजसिम्हा शिव का भक्त और संत प्रवृति का था। शिव ने उसके सपने में आकर मंदिर निर्माण की प्रेरणा दी थी। मंदिर में मूल आराध्य देव शिव के चारों ओर सिंहवाहिनी देवी दुर्गा, विष्णु समेत कुल 58 देवी-देवताओं की मूर्तियां है। पल्लव राजाओं की विभिन्न युद्ध-गाथाएं भी यहां ग्रेनाइट पत्थर से बनी वेदी के ऊपर उकेरी गई हैं जिन्हे देखकर लोग आनंदित होते हैं। कैलाशानाथ मंदिर परिसर के नैऋत्य कोण में बना है और परिसर की पूर्व एवं उत्तर दिशा पूरी तरह से खुली होकर निर्माण रहित है। इस प्रकार की स्थिति वास्तु का एक अनुपम उदाहरण है।

शिव पार्वती की नृत्य प्रतियोगिता - मंदिर में देवी पार्वती और शिव की नृत्य प्रतियोगिता को दीवरों पर चित्रों में दर्शाया गया है। यहां पार्वती की हंसती हुई प्रतिमा देख सकते हैं। मूल मंदिर के निकट शिव-पार्वती की नृत्य-प्रतियोगिता के दृश्य भी बहुत मनोरम है। मंदिर में बनी मूर्तियों की नक्काशी की उत्कृष्टता पर निगाहें अटकी रह जाती है।

मंदिर का एकमात्र गोपुरम ( प्रवेश द्वार) पूर्व दिशा में है। मंदिर परिसर में आने के दो द्वार है। एक बड़ा द्वार परिसर के पूर्व आग्नेय में है जो कि, वास्तुनुकुल स्थान पर नहीं होने के कारण आमतौर पर बंद रहता है। जबकि, दूसरा छोटा द्वार परिसर की दक्षिण दिशा में है जहां से श्रद्धालु आते-जाते है। मंदिर के ईशान कोण में बहुत बड़ा तालाब है।

बैकुंठ की गुफा - कैलाशनाथ मंदिर के मुख्य गर्भ गृह में एक गुफा है। यहां के पुजारी जी बताते हैं कि इस गुफा को अगर पार कर लेते हैं तो आप बार बार जन्म के बंधन से मुक्त हो जाते हैं और सीधे बैकुंठ की प्राप्ति होगी। पर इस गुफा में प्रवेश के लिए 10 रुपये का टिकट लेने को कहते हैं। मैंने देखा कुछ श्रद्धालु जो गुफा से सफलतापूर्वक बाहर निकले वे बडी मुश्किल से निकल पा रहे थे। हमने कहा, मुझे फिलहाल बैकुंठ की कामना नहीं है।

खुलने का समय – मंदिर सुबह सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक खुला रहता है। कैलाशनाथ मंदिर में आपके मार्ग दर्शन के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से अधिकृत गाइड उपलब्ध हैं। हालांकि यहां अनाधिकृत गाइड भी चक्कर लगाते रहते हैं।
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कांचीपुरम के कैलाश नाथ मंदिर का चौबारा। 







Friday, November 20, 2015

शिव का विशाल और अदभुत मंदिर- एकंबरनाथ मंदिर

वैसे तो देश में शिव के लाखों मंदिर हैं, उनमें 12 ज्योतिर्लिंग की खास प्रसिद्धि है। पर शिव का कांचीपुरम स्थित एकंबरनाथ मंदिर अपनी विशालता और स्थापत्य कला की दृष्टि से सबसे अदभुत और अलग मंदिर है। यह कांचीपुरम के मंदिरों में सबसे विशाल है। मंदिर 40 एकड़ में फैला हुआ है। इस मंदिर को पल्लवों ने सातवीं शताब्दी में बनवाया था। बाद में इसका पुनरुद्धार चोल और विजयनगर के राजाओं ने भी करवाया। 11 मंजिलों का यह मंदिर दक्षिण भारत के सबसे ऊंचे मंदिरों में एक है। मंदिर में बहुत आकर्षक मूर्तियां देखी जा सकती हैं। साथ ही यहां का 1000  स्तंभों वाला का मंडपम भी खासा लोकप्रिय है।

विशाल गोपुरम - मंदिर में प्रवेश करने के साथ ही इसका विशाल गोपुरम श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। मंदिर में विजयनगर के राजा कृष्णदेवराय की ओर से बनवाया गया यह राजा गोपुरम या मुख्य प्रवेश द्वार 59 मीटर ऊंचा है। जब आप मंदिर के मुख्य चौबारे में प्रवेश करते हैं तो विशाल गलियारा आपका स्वागत करता है। इसके दोनों तरफ की नक्काशी देखते ही बनती है। मंदिर परिसर में ऐसे पांच बड़े गलियारे हैं। एक सीमा के बाद एक बोर्ड मिलता है जिस पर लिखा है कि अपनी धार्मिक परंपराओं का सम्मान करते हुए इस सीमा के बाद गैर हिंदू लोगों के लिए प्रवेश की अनुमति नहीं है। आप यहीं तक मंदिर के वास्तु शिल्प का आनंद लें। हिंदू लोग पूरे मंदिर का मुआयना कर सकते हैं।


बालु का शिवलिंगम - आगे बढ़ने पर मंदिर के मुख्य मंडप में आप प्रवेश करते हैं। यहां सृष्टि के सृजक और विनाशक शिव विराजमान हैं। यहां पार्वती का कोई मंदिर नहीं हैं। क्योंकि शहर का कामाक्षी मंदिर उनका प्रतिनिधित्व करता है। मंदिर का शिवलिंग बालू का बना हुआ माना जाता है। यह ढाई फीट लंबा है। इसका जलाभिषेक नहीं होता। इसका तैलाभिषेक करके पूजन किया जाता है। श्रद्धालुओं को शिवलिंगम तक जाने की अनुमति नहीं है। मंदिर में भगवान विष्णु की भी एक छोटी प्रतिमा है जिन्हे यहां वामन मूर्ति कहा जाता है।

पुराना आम्र वृक्ष - मंदिर परिसर में एक आम का वृक्ष है। इसे 3500 साल पुराना बताया जाता है। कहा जाता है कि इसी वृक्ष के नीचे पार्वती ने शिव को पाने के लिए कठोर तप किया था। शिव प्रसन्न होने के बाद आम्र वृक्ष में प्रकट हुए इसलिए उनका नाम एकअंब्रेश्वर पड़ा। यानी आम वृक्ष के देवता। इसके तने को काटकर मंदिर में धरोहर के रूप में रखा गया है। तमिलनाडु के कांचीपुरम में इस छठी शताब्दी के मंदिर को पंचभूत स्थलम के पांच पवित्र शिव मंदिरों में से एक का दर्जा प्राप्त है और यह धरती तत्व का प्रतिनिधित्व करता है।


एक हजार स्तंभ और शिवलिंगम - मंदिर का एक मुख्य आकर्षण अविराम काल मंडपम हैजिसमें एक हजार स्तंभ हैं। इसमें भ्रमण करते हुए इसकी भव्यता में श्रद्धालु खो जाते हैं। देश में शायद ही कोई मंदिर इतना विशाल हो। मंदिर की भीतरी प्रांगण की दीवारों के साथ साथ 1008 शिवलिंगम भी स्थापित किए गए हैं जो मंदिर की दूसरी प्रमुख भव्यता है। इतने शिवलिंगम एक साथ किसी भी दूसरे मंदिर में नहीं हैं। मंदिर परिसर में एक सुंदर सरोवर भी है। इस सरोवर के बीच में एक गणेश की प्रतिमा है।

कांचीपुरम इडली - कांचीपुरम इडली एक परंपरागत रेसिपी है जो कि कांचीपुरमतमिलनाडु में काफी प्रसिद्ध है। यह कांचीपुरम इडली वहां पर म‍ंदिरों में प्रसाद के रूप में बांटी जाती है। इसे आप एकंबरनाथ मंदिर के काउंटर से प्राप्त कर सकते हैं।


 यह कांचीपुरम इडली काफी जगह भारत में भी खाई जाती है। यह इडली आम इडली की तरह फीकी और सादी नहीं होती। बल्‍कि यह काफी स्‍वाद से भरी होती है। एकंबरनाथ मंदिर के काउंटर पर इडली के अलावा खीर और अन्य प्रसाद भी प्राप्त किए जा सकते हैं।

खुलने का समय -  एकंबर नाथ मंदिर सुबह 6 बजे दर्शन के लिए खुलता है। यह दोपहर 12.30 बजे बंद हो जाता है। दुबारा शाम को 4 बजे खुलता है। रात्रि 8.30 बजे मंदिर बंद हो जाता है। मार्च अप्रैल में मनाया जाने वाला फाल्गुनी उथीरम इस मंदिर का बड़ा त्योहार होता है।
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Thursday, November 19, 2015

अति सुंदर नेत्रों वाली मां- कांचीपुरम का कामाक्षी मंदिर

तमिलनाडु के मदुरै मे मीनाक्षी मंदिर है तो कांचीपुरम में कामाक्षी मंदिर। देवी कामाक्षी का मंदिर कांचीपुरम शहर के बीचों बीच स्थित है। हालांकि ये मंदिर कांचीपुरम के बाकी मंदिरों की तरह विशाल परिसर वाला नहीं है। पर यह श्रद्धालुओं की आस्था का बड़ा केंद्र है। यहां सबसे ज्यादा श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। डेढ एकड़ में फैला ये मंदिर देवी शक्ति के तीन सबसे पवित्र स्थानों में एक है। मदुरै और वाराणसी अन्य दो पवित्र स्थल हैं।

विष्णु कांची और शिवकांची में  बात करें तो ये मंदिर शिवकांची में स्थित है। कामाक्षी देवी मंदिर देश के इक्यावन शक्ति पीठों में से एक है। मंदिर में कामाक्षी देवी की आकर्षक प्रतिमा देखी जा सकती है। यह भी कहा जाता है कि कांची में कामाक्षी, मदुरै में मीनाक्षी और काशी में विशालाक्षी विराजमान हैं। मीनाक्षी और विशालाक्षी विवाहिता देवियां हैं। इष्टदेवी देवी कामाक्षी खड़ी मुद्रा में होने के बजाय बैठी मुद्रा में हैं। देवी पद्मासन (योग मुद्रा) में बैठी हैं और उनके आसपास बहुत शान्त और स्थिर वातावरण है। वे दक्षिण पूर्व की ओर देख रही हैं।

 मंदिर परिसर में गायत्री मंडपम भी है। कभी यहां चंपक का वृक्ष हुआ करता था। मां कामाक्षी देवी का भव्य मंदिर में भगवती पार्वती का श्रीविग्रह है, जिसको कामाक्षीदेवी अथवा कामकोटि भी कहते हैं। भारत के द्वादश प्रधान देवी-विग्रहों में से यह मंदिर एक है। इस मंदिर परिसर के अन्दर चारदीवारी के चारों कोनों पर निर्माण कार्य किया गया है। एक कोने पर कमरे बने हैं, तो दूसरे पर भोजनशाला, तीसरे पर हाथी स्टैंड और चौथे पर शिक्षण संस्थान बना है। कहा जाता है कि कामाक्षी देवी मंदिर में आदिशंकराचार्य की काफी आस्था थी। उन्होंने ही सबसे पहले मंदिर के महत्व से लोगों को परिचित कराया। परिसर में ही अन्नपूर्णा और शारदा देवी के मंदिर भी हैं।


यह भी कहा जाता है कि देवी कामाक्षी के नेत्र इतने कमनीय या सुंदर हैं कि उन्हें कामाक्षी संज्ञा दी गई। वास्तव में  कामाक्षी में मात्र कमनीय या काम्यता ही नहीं, वरन कुछ बीजाक्षरों का यांत्रिक महत्त्व भी है। यहां पर '' कार ब्रह्मा का, '' कार विष्णु का, '' कार महेश्वर का प्रतीक है। इसीलिए कामाक्षी के तीन नेत्र त्रिदेवों के प्रतिरूप हैं। सूर्य-चंद्र उनके प्रधान नेत्र हैं। अग्नि उनके भाल पर चिन्मय ज्योति से प्रज्ज्वलित तृतीय नेत्र है। कामाक्षी में एक और सामंजस्य है 'का' सरस्वती का। 'मां'  महालक्ष्मी का प्रतीक है। इस प्रकार कामाक्षी के नाम में सरस्वती तथा लक्ष्मी का युगल-भाव समाहित है।
मंदिर का निर्माण - संभवतः ये मंदिर छठी शताब्दी में पल्लव राजाओं ने बनवाया था। मन्दिर के कई हिस्सों को पुनः निर्मित कराया गया है क्योंकि मूल संरचनायें या तो प्राकृतिक आपदा में नष्ट हो गये या फिर इतने समय तक खड़े न रह सके। हालांकि कांचीपुरम के सभी शासकों ने भरपूर प्रयास किया कि मन्दिर अपने मूल स्वरूप में बना रहे।

खुलने का समय - मंदिर सुबह 5.30 बजे खुलता है और दोपहर 12 बजे बंद हो जाता है। दुबारा शाम को 4 बजे खुलता है और रात्रि 9 बजे बंद हो जाता है। ब्रह्मोत्सव और नवरात्रि मंदिर के खास त्योहार हैं।

17 अक्तूबर 2015 की सुबह, शनिवार का दिन। हम मां कामाक्षी मंदिर के प्रांगण में पहुंचे हैं। मंदिर के गोपुरम पर रंगाई पुताई का काम चल रहा है। मंदिर के अंदर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ है। थोड़ी देर पंक्तिबद्ध रहने के बाद दर्शन का सौभाग्य मिल जाता है। हम आगे बढ़ते हैं। अगले मंदिर के द्वार पर एक सज्जन बैठे हैं। वे अपने गले से गीत के बोल और वाद्य यंत्र की ध्वनि एक साथ निकालकर मुग्ध कर देते हैं। मंदिर के अंदर कांची कामकोटि पीठम शंकराचार्य जी का पोस्टर लगा हुआ दिखाई देता है। हम बाहर निकलते हैं। मंदिर के बाहर यात्रियों के लिए गेस्ट हाउस दिखाई देता है। पर हम चल पड़ते हैं अगले मंदिर के लिए।
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Wednesday, November 18, 2015

वामन मंदिर कांचीपुरम- विष्णु की अदभुत प्रतिमा

कांचीपुरम शहर के बिल्कुल मध्य में कामाक्षी देवी मंदिर के पास ही वामन मंदिर स्थित है। वैसे तो इस मंदिर का परिसर बहुत बड़ा नहीं पर यह कांचीपुरम के अनूठे मंदिरों में से एक है। यहां भगवान विष्णु की अदभुत प्रतिमा देखने को मिलती है। भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर जिस असुर महाबली को हराया था, उसी की याद में उनका नाम वामन पड़ा था।

वामन भगवान केमंदिर में भगवान वामन ( श्रीविष्णु) की पांच मीटर ऊंची विशाल मूर्ति है। यह मूर्ति काले पत्थरों की बनी है। इसमें भगवान का एक चरण ऊपर के लोकों को नापते हुए ऊपर उठा हुआ है जबकि दूसरा चरण राजा बलि के मस्तक पर है। जब आप इस मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचते हैं तो मंदिर के पुजारी एक बांस में बहुत मोटी बत्ती अर्थात मशाल जलाकर भगवान के श्रीमुख का दर्शन कराते हैं। विष्णु की इस तरह की मूर्ति और कहीं देखने को नहीं मिलती। मंदिर में प्रवेश के लिए 2 रुपये का दान का टिकट भी है। इसी मंदिर के समीप ही सुब्रह्मण्य मंदिर भी है, जिसमें स्वामी कार्तिकेय की भव्य मूर्ति प्रतिष्ठित है।

वामन अवतार की कथा- वामन अवतार भगवान विष्णु का पांचवा अवतार है। इसकी कथा श्रीमदभागवत पुराण में आती है। कथा में देवता दैत्यों से युद्ध में पराजित होने लगते हैं। शुक्राचार्य अपनी संजीवनी विद्या से दैत्यों को लगातार जीवित कर देते हैं। खुद को हारता देख इंद्र विष्णु की शरण में पहुंचते हैं।  देवताओं के आग्रह पर वामन अवतारी श्रीहरि, राजा बलि के यहां भिक्षा मांगने पहुंच जाते हैं । ब्राह्मण बने श्रीविष्णु भिक्षा में तीन पग भूमि मांगते हैं । राजा बलि दैत्यगुरु शुक्राचार्य के मना करने पर भी अपने वचन पर अडिग रहते हुए, श्रीविष्णु को तीन पग भूमि दान में देने का वचन कर देते हैं । वामन रुप में भगवान एक पग में स्वर्ग और उर्ध्व लोकों को ओर दूसरे पग में पृथ्वी को नाप लेते हैं । अब तीसरा पांव रखने को कोई स्थान नहीं रह जाता है।
कांचीपुरम - वामन मंदिर के सामने। 

 ऐसे में बलि के सामने संकट उत्पन्न हो गया। ऐसे मे राजा बलि यदि अपना वचन नहीं निभाए तो अधर्म होगा । इसिलिए बलि अपना सिर भगवान के आगे कर देता है और कहता है तीसरा पग आप मेरे सिर पर रख दीजिए । वामन भगवान ने ठीक वैसा ही करते हैं और बलि को पाताल लोक में रहने का आदेश करते हैं। वहीं श्रीविष्णु को अपना वचन का पालन करते हुए, पातललोक में राजा बलि का द्वारपाल बनना स्वीकार करते हैं ।

आधी कांची शिव की आधी विष्णु की-  कांचीपुरम नगरी मोक्षदायिनी सप्तपुरियों में से एक है। इन सात पुरियों में साढ़े तीन पुरियां विष्णु कीं और इतनी ही शिवजी की हैं। यानी कांची नगरी आधी विष्णु की और आधी शिव की है। यहां सप्त कांची की परिकल्पना है जिसके दो भाग हैं- शिवकांची तथा विष्णुकांची। 
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