Friday, October 2, 2015

जौरा - जहां 186 बागियों ने डाले थे हथियार

जौरा का महात्मा गांधी सेवा आश्रम वह स्थल है जहां 1972 में माधो सिंह मोहर सिंह जैसे बगियों ने हथियार डाले थे। 25-27 सितंबर 2015 के मध्य जौरा पहुंचे युवाओं की इच्छा उस स्थल को देखने की थी। जौरा रेलवे स्टेशन से कोई 4 किलोमीटर दूर मानपुर गांव में के खुले मैदान में 14 और 16 अप्रैल 1972 को चंबल के बागियों ने हथियार डाले थे। एस एन सुब्बराव जी कहते हैं तब इस समर्पण को देखने के लिए कोई 60 से 70 हजार लोगों की भीड़ जमा हो गई थी। जब बागी हथियार डालने लगे तो बंदूकों की काफी ऊंची ढेर जमा हो गई। ये बंदूकें दुनिया के अलग अलग देशों की बनी हुई थीं। सामने गांधी जी की बड़ी तस्वीर थी और बागी आकर अपनी बंदूके रखे जा रहे थे। वह नजारा अदभुत था, ऐतिहासिक था। आजाद भारत के इतिहास में ऐसा बड़ा डाकूओं का सरेंडर कभी नहीं हुआ।

 लोकनायक जय प्रकाश नारायण की मौजूदगी थी, तब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रकाश चंद्र सेठी थे। 14 अप्रैल को जिन बागियों ने सरेंडर किया उनमें माधो सिंह और मोहर सिंह शामिल थे। इन बागियों ने बाद में चंबल के डाकू नामक फिल्म बनाई थी। 1972 में कुल 186 बागियों ने हथियार डाले थे। सरेंडर के बाद सबको बसों में बिठाकर ग्वालियर सेंट्रल जेल ले जाया जा रहा था। पर बागियों ने पुलिस वालों के साथ बैठने से इनकार कर दिया। पुलिस से अदावत पुरानी थी। पुलिस पर भरोसा नहीं था। लिहाजा बस में पुलिस वाले बागी के बीच गांधी आश्रम के कार्यकर्ता बिठाए गए तब बस चल सकी। ये सभी बसें मध्य प्रदेश रोडवेज की थीं।
दो बागी अजमेर सिंह और नेत्रपाल सिंह के साथ। 

1972 में ही सरेंडर करने वाले मोहर सिंह गैंग के बागी अजमेर सिंह बताते हैं- मुख्यमंत्री प्रकाश चंद्र सेठी का हेलीकाप्टर आसमान में दिखाई दिया। हम खुशी के मारे फायरिंग करने लगे। पर फायरिंग देखकर हेलीकाप्टर लौट गया। बाद में हमें फायरिंग से मना किया गया तब जाकर हेलीकाप्टर उतर सका। माधो सिंह मोहर जैसे बागियों को सरकार पर भरोसा नहीं था लिहाजा माधो सिंह खुद वेश बदलकर जय प्रकाश नारायण से मिलने गए थे। उनके आश्वासन के बाद सरेंडर को तैयार हुए। कई हत्याएं और पकड़ (अपहरण) करने वाले अजमेर सिंह बताते हैं सरेंडर के बाद हमें सात साल ग्वालियर जेल में रखा गया। पर  जेल में हर तरह की सुविधाएं थी। जिसे तंबाकू चाहिए मिलता था। जिसे सिगरेट, बीडी चाहिए मिल जाता था। पर जेल से बाहर आने के बाद राज्य सरकार ने जो वादे किए थे वे चार दशक बाद भी पूरे नहीं हुए। अजमेर सिंह को सरकार ने जहां जहां जमीन आवंटित की थी उस पर उन्हें आज तक कब्जा नहीं मिला। लिहाजा बच्चे गाड़ियां चलाने पर मजबूर हैं।

चंबल की बंदूके गांधी के चरणों में - चंबल घाटी में वर्ष 1960 से 1976 तक यहां 654 दस्युओं ने आत्मसमर्पण किया था। 1960 में बागियों ने बिनोबा भावे की मौजूदगी में हथियार डाले थे। 1972 के  सरेंडर की घटना पर एक रिपोतार्ज पुस्तक लिखी गई है। चंबल की बंदूके गांधी के चरणों में ( प्रकाशक - गांधी शांति प्रतिष्ठान, लेखक – श्रवण कुमार गर्ग, प्रभाष जोशी और अनुपम मिश्र)  इन तीनों पत्रकारों ने 1972 में चंबल के बीहड़ो की खाक छानी और इस शानदार रिपोतार्ज का सृजन किया।
जौरा के पास मानपुर गांव में वह जगह जहां 186 बागियों ने हथियार डाले। 

समर्पण स्थल पर कोई स्मारक नहीं – जौरा के जिस मानपुर गांव के खुले मैदान में सरेंडर हुआ था वहां पर अब डिग्री कालेज बन गया है। इसी आश्रम के मैदान में एक मंच बना है, जो 1972 के सरेंडर की महान घटना की याद दिलाता है। पर यहां कोई यादगारी शिलापट्ट नहीं है। पुराना गांधी आश्रम की दीवारें बदहाल हैं। उसके चारों तरफ बडी बड़ी घास उग आई है। काफी कोशिश के बाद भी यहां कोई स्मारक नहीं बनाया जा सका है। जौरा के बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन या मुरैना के रेलवे स्टेशन पर इस ऐतिहासिक घटना की जानकारी देने वाला कोई बोर्ड नहीं लगाया गया है। देश भर से आए युवाओं ने इस मुद्दे पर बड़ी निराशा जताई और मध्य प्रदेश शासन को लिखने का तय किया। कई राज्यों से आए लोगों का विचार था कि यहां इस तरह का स्मारक बनना चाहिए जिससे इस महान अहिंसक क्रांति से आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा मिल सके।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य  vidyutp@gmail.com

( JOURA, MAHATMA GANDHI SEVA ASHRAM, SN SUBBARAO, BAGI SURRENDER, MADHO SINGH, MOHAR SINGH ) 

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