Wednesday, September 2, 2015

राजू सिंह गाइड के साथ केवलादेव नेशनल पार्क की सैर

केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान को घूमने के कई तरीकों में से एक है रिक्शा किराये पर लेकर घूमना। उद्यान के मुख्य द्वार पर टिकट खरीदने के बाद आपका सामाना इन रिक्शे वालों से होता है जो आपको रिक्शा पर घूमाते भी हैं और ये उद्यान के गाइड भी हैं। केवलादेव में तकरीबन 140 पंजीकृत रिक्शा चालक और गाइड हैं। इनके रिक्शे के आगे पीले की नंबर प्लेट में रिक्शा का नंबर और नाम लिखा होता है। दरें आमतौर पर तय है 100 रुपये प्रति घंटा। दूरबीन का किराया अलग से। बिना दूरबीन के आप उद्यान में पक्षियों का बेहतरीन नजारा नहीं कर सकते। इन रिक्शा गाइड के पास अच्छी क्वालिटी की दूरबीन होती है। अगर आप अपनी दूरबीन नहीं लेकर गए हैं तो इनसे दूरबीन लेकर नजारा करें। आपको पार्क के बारे मेंअच्छी जानकारी पहले से है और आपके पास दूरबीन भी है तो आप साइकिल किराये पर ले सकते हैं। यह घूमने का सस्ता तरीका है। साइकिल 40 रुपये में दिन भर के लिए किराये पर मिल जाती है। आजकल पार्क में दो तांगे और दो बैटरी वाहन भी चलते हैं। अगर आप समूह में हैं तो ये विकल्प भी चुन सकते हैं।

सभी रिक्शे वाले नंबर से चलते हैं। टिकट लेने के बाद आप रिक्शा वालों के पास पहुंचेंगे तो जिसका नंबर पहले से होगा वही पहले जाएगा। नंबर के लिए रोज सुबह रिक्शावाले लाट्री सिस्टम से पर्चियां निकालते हैं। मंदी के समय दिन भर हर रिक्शा वाले को सैलानी नहीं मिल पाते। इस सूरत में कई रिक्शावाले अलग अलग होटलों में जाकर वहां से सीधे पार्क घूमने वाले सैलानी ढूंढते हैं। रिक्शा यूनियन के लोग आपस में तय करते हैं कि कौन कितने दिन पार्क के गेट पर खड़ा होगा और कौन होटलों से सवारी ढूंढेगा। अगर सारे लोग पार्क के गेट पर ही रहें तो 140 रिक्शा वालों में कई का तो कभी नंबर नहीं आएगा।


पार्क में हमारी मुलाकात राजू सिंह ( रिक्शा नंबर -7,  मोबाइल नंबर 8058464077)  से होती है। सात नंबर रिक्शावाले सरदार राजू सिंह सिंह से मिलना संयोग ही था। ये महज रिक्शावाले गाइड ही नहीं केवलादेव नेशनल पार्क के चलते फिरते इन्साइक्लोपिडिया हैं। तो हमने अपना अगले चार घंटे राजू सिंह के नाम कर दिए। राजू सिंह के बारे में दैनिक भास्कर समूह की पत्रिका अहा जिंदगी में फीचर छप चुका है। कई और पत्रिकाओं में उन्हें कोट किया जा चुका है। पार्क से लौटने के बाद गूगल सर्च से मुझे पता चला कि 3 फरवरी 2012 को अंग्रेजी बिजनेस दैनिक मिंट में उन पर फीचर प्रकाशित हो चुका है। कई विदेशी सैलानी अपने लेखों में उन्हें याद कर चुके हैं। यूनेस्को की रिपोर्ट में उनकी तस्वीर प्रकाशित हो चुकी है।



राजू सिंह बताते हैं किसी जमाने  में पार्क के गेट पर प्रवेश करते ही पक्षियों का कलरव सुनाई देने लगता था। अब पक्षी आधे रह गए हैं। कभी संख्या 375 तक थी अब 200 के आसपास पक्षी हैं। हालांकि प्रवेश द्वार से दो फर्लांग आगे चलने पर आज भी कलरव कानों को कर्णप्रिय लगने लगता है। रास्ते एक हनुमान जी का मंदिर आता है। तकरीबन दो किलोमीटर अंदर आने पर पार्क अंदर अशोक होटल है। यहां 3000 रुपये प्रतिदिन का कमरा है। यहीं तक पार्क में बिजली आई है। इसके आगे सिर्फ प्राकृतिक रोशनी का सहारा है। इसलिए शाम ढलने से पहले पार्क से बाहर होना पड़ता है। देखते देखते हम छह किलोमीटर चलकर पार्क के मध्य में पहुंच चुके थे। बाबा केवलादेव महादेव के दर्शन के बाद हम चढ़ गए बर्ड वाचिंग के लिए मचान पर। इस बीच राजू सिंह अपना टिफिन निकालकर खाने लगे। मंदिर के पास सोलर पंप लगया गया है जिससे बिना किसी आवाज के पानी निकलता रहता है।

राजू सिंह ने हमें कुछ विशाल पक्षी दिखाए जो धूप में अपने पंख सूखा रहे थे। बताया कि भिंगे हुए पंखों से उड़ान भरना मुश्किल होता है। राजू ने इस पार्क में महान पक्षी विज्ञानी सलीम अली को लगातार कई दिनों तक शोध करते हुए देखा है। सलीम अली पक्षियों की पहचान के लिए उनके पांव में रिंग लगाया करते थे। इससे वे उनके पार्क में आने जाने के क्रम पर शोध करते थे।  

सरदार राजू सिंह की उम्र बढ़ती जा रही है। कब तक रिक्शा खींच पाएंगे। बताते हैं दो साल और। उसके बाद गाइड बन जाउंगा। रिक्शा बेटे को दे दूंगा। आगे रब की मरजी है। आप कभी केवलादेव नेशनल पार्क जाएं और राजू सिंह के साथ ही घूमना चाहते हैं तो पहले उन्हें फोन करके हमारा हवाला देकर समय तय कर सकते हैं।  ( राजू सिंह - रिक्शा नंबर -7  मोबाइल नंबर 8058464077)  वैसे इस पार्क में और भी कई सरदार जी रिक्शेवाले हैं। पर आप सात नंबर रिक्शा याद रखिए। 

--- विद्युत प्रकाश मौर्य ( vidyutp@gmail.com)
- राजू सिंह के बार में लाइव मिंट पर पढ़ें। 

( KEOLADEV, NATIONAL PARK, BIRD, GUIDE, RAJU SINGH) 
( केवलादेव  राष्ट्रीय पक्षी उद्यान - 4) 

2 comments:

  1. राजू सिंह गाइड के साथ केवलादेव नेशनल पार्क की सैर करना अच्छा लगा। राजू सिंह के चिर अनुभव का लाभ तो मिलना ही था वर्षों वर्ष एक ही जगह रहते बहुत कुछ सीख जाता हैं इंसान। .

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