Thursday, September 3, 2015

रुठते परिंदे - 2002 में आखिरी बार आया था साइबेरियन क्रेन

सारस क्रेन ( फोटो सौ - यूनेस्को ) 
विश्व पटल पर लंबे समय तक केवलादेव नेशनल पार्क की पहचान साइबेरियन क्रेन के कारण रही है। यहां हर साल साइबेरियन क्रेनों का जोड़ा सर्दियों से बचने के लिए और अपनी नई पीढ़ी को जन्म देने के लिए आया करता था। पर बदलते पर्यावरण के कारण एक वक्त आया जब साइबेरियन क्रेनों ने अपनी राह बदल ली। इस कदर रूठे कि दुबारा यहां का रुख नहीं किया। भारत में पक्षी-विशेषज्ञ साइबेरियन क्रेन या साइबेरियाई क्रौंच के नाम से जानते-पहचानते हैं। यह पक्षी आज इतना दुर्लभ हो गया है कि इसका नाम दुर्लभ जीवों की रूसी लाल किताब में तो शामिल कर लिया गया है।

केवलादेव नेशनल पार्क मे साल 2006 में महान पक्षी विज्ञानी सलीम अली के नाम पर एक पेवेलियन बनवाया गया है। इसका उदघाटन राजस्थान की तत्कालीन राज्यपाल प्रतिभा पाटिल ने किया था। इस पेवेलियन में लिखा गया है कि वह आखिरी बार साइबेरियन क्रेन यहां पांच साल पहले देखा गया। पार्क में घूमने के दौरान गाइड सरदार राजू सिंह ने बताया कि आखिरी बार उन्होंने साइबेरियन क्रेन यहां साल 2002 में देखा था। पहले भी घना में साइबेरियन क्रेन अक्टूबर माह में ही 6 हजार किलोमीटर की यात्रा तय करके आती थी और मार्च माह में विदाई लेती थी।
साइबेरियन क्रेन को प्रेम और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। क्रेन के नर और मादा युगल एक दूसरे के प्रति पूरी तरह समर्पित होते हैं। एक बार जोड़ा बनाने के बाद ये जीवन भर साथ निभाते हैं। अगर किसी दुर्घटना में किसी एक साथी की मृत्यु हो जाए तो दूसरा अकेले ही रहता है। या कहा जाता है कि दूसरा जोड़ा भी अपनी जान दे देता है। आम तौर पर बारिश के दिनों में इनका प्रजनन काल होता है। इनके प्रणय का आरंभ सुंदर नृत्य से होता है। नृत्य के आरंभ से पहले ये पक्षी अपनी चोंच को आसमान की ओर कर के विशेष प्रकार की तेज आवाज निकालते हुए सुने जाते हैं।

साइबेरियन क्रेन ( फोटो - नेशनल ज्योग्राफिक) 

 पर्यावरणविद मानते हैं कि  सिमटते जंगल, कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग और आसपास में मानव की बढ़ती आबादी के कारण साइबेरियन क्रेन ने यहां आना छोड़ दिया। गाइड सरदार राजू सिंह बड़ी ही गूढ बात कहते हैं। पूछते हैं आपको अगर एक रेस्टोरेंट का खाना अच्छा नहीं लगता तो आप किसी दूसरे का रूख कर लेते हैं ना। ठीक ऐसा ही साइबेरियन क्रेन के साथ हुआ। जब उसे केवलादेव की आबोहवा रास नहीं आई तो उसने आना छोड़ दिया। आजकल केवलादेव उद्यान के ठीक बाहर से आगरा भरतपुर हाईवे गुजरता है। उस पर दिन रात वाहनों की चिल्लपों रहती है। हाईवे के दूसरी तरफ शहर की कालोनियां बन गई हैं। हालांकि केवलादेव के 500 मीटर के दायरे में आबादी का निषेध होना चाहिए पर इस नियम का पालन कड़ाई से नहीं हुआ।


कहा जाता है कि 1981 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी को जब यह पता लगा कि सफेद सारसों की संख्या तेजी से घट रही है तो उन्होंने राजस्थान में भरतपुर के निकट घाना पक्षी विहार को केवलादेव अभ्यारण्य के रूप में मान्यता दे दी, जहां आम तौर पर ये पक्षी सरदियां गुजारते हैं।
पर साल 2011 में मध्य प्रदेश के देवास में एक बार फिर भारत में प्रवासी साइबेरियन क्रेन के जोड़े नजर आए। कई हजार किलोमीटर का सफर तय करके अनुकूल हालात की तलाश में साइबेरियन क्रेन देवास जिले के टोंक खुर्द ब्लॉक स्थित निपानिया में डेरा डालने पहुंचे।

साल 2012 में राजस्थान वन विभाग, वर्ल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया व बोम्बे नेच्यूरल हिस्ट्री सोसायटी के संयुक्त तत्वावधान में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया के सौजन्य से आयोजित वर्कशॉप में साइबेरियन क्रेन संबंधित एक रिपोर्ट तैयार करके एक बार फिर से घना में साइबेरियन क्रेन लाने की कवायद शुरू की गई। भरतपुर के सालिम अली व्याख्यान केंद्र में  विशेषज्ञों ने साइबेरियन सारसों को घना से जोडने की योजना पर विचार किया। इस बीच तय किया गया कि घना में साइबेरियन क्रेन रिसर्च एवं ब्रीडिंग सेंटर की स्थापना बहुत जरूरी है।

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vidyutp@gmail.com
( SIBERIAN CRANE, BIRD, KEOLADEV, BHARATPUR, WETLAND )
( केवलादेव  राष्ट्रीय पक्षी उद्यान - 5) 



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