Monday, August 31, 2015

आइए बुला रहे हैं मेहमान परिंदे

केवला देव पक्षी उद्यान में घूमने का बेहतरीन तरीका है कि आप सुबह सुबह पहुंचे। आप सारी रात सफर करके सुबह भरतपुर पहुंच जाएं। या फिर एक दिन पहले भरतपुर पहुंचे। पार्क के आसपास किसी होटल में ठहरें। अगले दिन सुबह छह बजे ही सैर के लिए निकल जाएं। अगर आप नवंबर से फरवरी के बीच जाते हैं तो आपकी सबसे ज्यादा विदेशी प्रवासी पक्षियों से मुलाकात हो सकती है। दूसरा लाभ यह होगा कि आप सुबह की प्रदूषण मुक्त हवा में उद्यान का सैर कर सकेंगे। धूप भी कम मिलेगी। उद्यान में पक्षी सुबह के वक्त सबसे ज्यादा सक्रिय नजर आते हैं।

उद्यान के अंदर थोड़ी दूर चलने पर पक्षियों का कलरव सुनाई देने लगता है। उद्यान को घूमना बड़ा आसान है। छह किलोमीटर लंबी सड़क है जिस पर चलते हुए आप उद्यान के बीचों बीच पहुंच जाते हैं। सड़क के दाहिने और बाएं तरफ कहीं कहीं ट्रैक बने हैं जहां आप अलग अलग तरह के परिंदों का बसेरा देख सकते हैं। सड़क पर चलते हुए आपको गोह ( लिजार्ड) के दर्शन हो जाते हैं। वही गोह जिसे शिवाजी ने पाला था।

यूनेस्को की साइट के मुताबिक केवला देव में 364 प्रजाति के पक्षी पाए जाते हैं। इसे 1982 में राष्ट्रीय पक्षी उद्यान घोषित किया गया। यहां साइबेरिया, तीन, तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान आदि देशों से प्रवासी पक्षी हर साल उड़ान भरकर आते हैं। यह प्रवासी पक्षियों का महत्वपूर्ण प्रजनन केंद्र ( ब्रिडिंग सेंटर) है। कुल 2873 हेक्टेयर भूमि पर फैले इस उद्यान की खास बात यह है कि यहां, घास के मैदान, तालाब, जंगल, नम भूमि (वेटलैंड) सब कुछ है। इस तरह का पक्षियों के लिए निवास क्षेत्र दुर्लभ है। आपको रास्ते में चलते हुए किंगफिशर, वुड पिकर ( कठफोड़वा) पेंटेड स्ट्रोक ( जांघिल), उल्लू जैसे सैकड़ो भारतीय पक्षियों को दर्शन होते जाएंगे। पानी में कछुए भी दिखाई दे जाते हैं। इन पक्षियों को करीब से देखने के लिए आपके पास बेहतरीन क्वालिटी की दूरबीन होनी चाहिए। यहां पक्षी अपने बच्चों को खाना खिलाते हुए उन्हे उड़ना सिखाते हुए, कई बड़े पक्षी अपने भींगे हुए पंखों को सुखाते हुए देखे जा सकते हैं। यहां आप स्ट्रोक परिवार के कई पक्षियों को देख सकते हैं। केवलादेव पार्क के मध्य में कई बर्ड वाचिंग सेंटर ( मचान) बनाए गए हैं। इनपर चढ़कर आप अपनी दूरबीन से दूर दूर तक का नजारा कर सकते हैं। अगर पक्षियों से प्रेम करते हैं तो आप सारा दिन यहां गुजार सकते हैं। कई पक्षी प्रेमी तो यहां आकर हफ्ते पर रुकते हैं और पक्षियों को देखते रहते हैं। स्कूली बच्चों के ज्ञान बढाने के लिहाज से इस पार्क की यात्रा बड़ी लाभकारी हो सकती है। वहीं अगर आप जीव विज्ञान के छात्र हैं या शोधार्थी हैं तो आपको लिए ये बेहतरीन जगह हो सकती है।
सारस क्रेन  ( सौ - WWF) 

सारस क्रेन - दुनिया के सबसे बड़े उड़ने वाले पक्षी सारस क्रेन के आपको यहां पर दर्शन हो सकते हैं। मादा सारस 35 से 40 किलो की होती है तो नर सारस 40 से 45 किलो का होता है। आम तौर पर यह जोड़े में दिखाई देता है या फिर तीन या चार के समूह में। यह जीवन भर अपने जोड़े के प्रति वफादार रहता है। यह मानसून के समय प्रजनन करता है।

गर्मी के दिनों में पार्क में कम पक्षी दिखाई देते हैं। पर बरसात के बाद यहां कलरव बढ़ जाता है। अगर आप अक्तूबर तक जाते हैं तो विदेशी प्रवासी मेहमान परिंदे नहीं मिलेंगे। पर अक्तूबर मध्य के बाद उनकी आमद शुरू हो जाती है। सर्दी के दिनों में यहां 20 हजार के करीब पक्षी अपना घोसला बनाते हैं। तब केवलादेव गुलजार हो उठता है देशी- विदेशी रंग बिरंगे मेहमान परिंदों के कलरव से।
vidyutp@gmail.com

( KEOLADEO NATIONAL PARK, BIRDS, WATER, BHARATPUR, RJASTHAN, CRANE)
( केवलादेव  राष्ट्रीय पक्षी उद्यान - 2) 



Sunday, August 30, 2015

केवलादेव – चलो परिंदों की जुबां समझें

अगर आप प्रकृति और पशु पक्षियों से प्रेम करते हैं तो आपके लिए घूमने के लिए केवलादेव नेशनल पार्क शानदार जगह हो सकती है। राजस्थान के भरतपुर शहर के बाहरी इलाके में स्थित इस पार्क को घाना पक्षी उद्यान भी कहते हैं। घाना इसलिए कि कभी यहां घने जंगल हुआ करते थे। केवलादेव को संयुक्त राष्ट्र विश्व धरोहर स्थल का दर्जा मिला हुआ है। पक्षी उद्यान 27 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। कभी यहां घना जंगल हुआ करता था। 1964 में यहां शिकार पर रोक लगी। 1982 में इसे राष्ट्रीय पक्षी उद्यान का दर्जा मिला। 1985 में यह विश्व धरोहर की सूची में शामिल हुआ। आजकल यहां 200 प्रजाति के पक्षी देखे जा सकते हैं।

इससे पहले यह कई सदी का राजाओं की शिकारगाह हुआ करती थी। भरतपुर के महाराजा ही नहीं बल्कि उनके आमंत्रण पर आसपास के कई राजा ब्रिटिश अधिकारी यहां शिकार करने आते थे। गवर्नर जनरल लार्ड कर्जन समेत कई गवर्नर भी यहां शिकार कर चुके हैं। पार्क के अंदर सभी शिकार करने वालों की सूची लगाई गई है। कर्जन ने 1902 में और 1907 में यहां शिकार किया था। पर 1964 से यहां शिकार बंद हो गया। इस पूरे क्षेत्र को पक्षियों के लिए संरक्षित कर दिया गया। इसमें भरतपुर के राज परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण रही। इस पार्क का नाम पार्क के बीचोंबीच स्थित भगवान शिव के मंदिर केवलादेव के नाम पर है।

पिछले चार साल केवलादेव में पानी की कमी थी। पर अब यहां गोवर्धन से पानी लिया गया है। पार्क एक बार फिर पक्षियों से गुलजार है। अगर आप केवलादेव घूमने जाना चाहते हैं तो इसके लिए अगस्त से मार्च तक का महीना बेहतर है। नवंबर से फरवरी तक का महीना सबसे बेहतर है।

प्रवेश टिकट - पार्क में प्रवेश टिकट 75 रुपये का है। यह दर भारतीय व्यस्क के लिए है। बच्चों के लिए दर कम है। विदेशियों के लिए और भी ज्यादा है। पार्क सुबह 6 बजे से शाम को अंधेरा होने तक खुला रहता है। पार्क के बाहर बस, कार और बाइक के लिए पार्किंग उपलब्ध है। प्रवेश टिकट घर के पास से आप पक्षियों पर पुस्तकें पार्क की स्मृति में बनी टोपियां, टी शर्ट, जैकेट आदि भी खरीद सकते हैं। ये सब वाजिब दाम पर हैं। इस उद्यान का प्रबंधन राजस्थान सरकार का वन विभाग करता है।  

कैसे घूमें – पार्क घूमाने के लिए साइकिल रिक्सा उपलब्ध है। कुल 140 रिक्सा वाले हैं। उनकी दरें 100 रुपये प्रतिघंटा है। कम से कम 4 घंटे का समय तो रखे हीं। रिक्शा वाले आपको दूरबीन भी देते हैं। बिना दूरबीन के पक्षी बेहतर तरीके से नहीं देख सकते। दो घोड़ागाड़ी और कुछ बैटरी रिक्शा भी पार्क में चलते हैं। आप 40 रुपये में साइकिल भी किराए पर ले सकते हैं। 

कैसे पहुंचे - केवलादेव नेशनल पार्क भरतपुर में आगरा हाईवे पर स्थित है। दिल्ली से तकरीबन 180 किलोमीटर की दूरी पर है भरतपुर। मथुरा और आगरा से इसकी दूरी 55 किलोमीटर है। अगर अपनी गाड़ी से हैं और आप आगरा में हैं तो फतेहपुर सीकरी घूमने के बाद भरतपुर जा सकते हैं। फतेहपुर सीकरी से भरतपुर की दूरी महज 22 किलोमीटर है।


आप अपना टूर प्लान मथुरा वृंदावन, आगरा और भरतपुर का बना सकते हैं। दिल्ली से आप भरतपुर ट्रेन या बस से जा सकते हैं। रास्ता 4 घंटे का है। बस से जाना हो तो मेट्रो रेल से फरीबाद के एस्कार्ट मुजेसर मेट्रो तक जाएं वहां से आगरा जाने वाली बस लें। मथुरा में भरतपुर बाईपास पर उतर कर भरतपुर की बस ले लें। आप भरतपुर के साथ डीग महल, गोवर्धन आदि का भी कार्यक्रम बना सकते हैं।
( KEOLADEO NATIONAL PARK, BIRDS, WATER, BHARATPUR, RJASTHAN, CRANE)

( केवलादेव  राष्ट्रीय पक्षी उद्यान - 1)  REMEMBER IT IS A WORLD HERITAGE SITE LISTED IN 1985.  


Wednesday, August 26, 2015

एक चार मीनार.... रंग हजार

हैदराबाद शहर की पहचान चारमीनार से है। तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद का सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण स्मारक है चार मीनार। 400 साल से ज्यादा हो गए, चार मीनार शान से खड़ा है। चार मीनार  को मुहम्मद कुली कुतुब शाह ने बनवाया था। सुल्तान मुहम्मद कुली कुतुब शाह, कुतुब शाही राजवंश का पांचवां शासक था। इसका निर्माण 1591 ई में हुआ। 
अल्लाह को धन्यवाद - कहा जाता है कि एक बार हैदराबाद शहर में प्लेग जैसी जानलेवा बीमारी फैल गई। इसमें काफी लोगों की मौत हुई। तब कुली कुतुब शाह प्रार्थना की थी कि हे अल्लाह, इस शहर की शांति और समृद्धि के प्रदान सभी जातियों के लोगों का कल्याण करो। शाह की अल्लाह ने सुन ली। इसके बाद उन्हें धन्यवाद देने के लिए चारमीनार का निर्माण शहर के बीचोंबीच कराया गया।

इसमें कुल चार अलंकृत मीनारें इसलिए इसका नाम चार मीनार है। यह स्‍मारक ग्रेनाइट के मनमोहक चौकोर खम्‍भों से बना है, जो उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम दिशाओं में स्थित चार विशाल आर्च पर निर्मित किया गया है। यह आर्च कमरों के दो तलों और आर्चवे की गेलरी को सहारा देते हैं। चौकोर संरचना के प्रत्‍येक कोने पर एक छोटी मीनार है जो 24 मीटर ऊंची है। चारमीनार की कुल ऊंचाई 54 मीटर है। चारमीनार की मूसी नदी के पूर्वी तट पर बना है। हालांकि अब मूसी नदी अपने अस्तित्व को खोती जा रही है।

चार मीनार पर चढ़ने के लिए अंदर से सीढ़ियां बनी हुई हैं। इन घुमावदार सीढ़ियों से आप इसकी मुंडेर पर जा सकते हैं। पुरातत्व विभाग इसके लिए 5 रुपये का टिकट लेता है। चार मीनार की मुंडेर मक्का मसजिद का सुंदर नजारा दिखाई देता है, साथ ही इसके चारों ओर हैदराबाद शहर के बाजारों का नजारा दिखाई देता है। इसके मेहराब में हर शाम रोशनी की जाती है जो एक अविस्‍मरणीय दृश्‍य बन जाता है।
चारमीनार सड़क के बीचोंबीच स्थित है। इसके चारों तरफ चार रास्ते शहर के अलग अलग हिस्सों में जाते हैं। चारमीनार के आसपास के बाजार में आपको हैदराबाद शहर का परंपरागत नजारा दिखाई देता है। बुरके में खरीददारी करती महिलाएं। स्ट्रीट फूड का मजा लेते लोग। आदि आदि...


अपने सुनहरे दिनों में, चारमीनार के आसपास 14 हजार दुकानें थी। आज चारमीनार के आसपास शहर का प्रसिद्ध लाह की चूड़ियों का बाजार और मोतियों का बाजार पथरगट्टी मौजूद है। इन बाजारों पर्यटक आभूषण की खरीददारी करने आते हैं। वहीं स्थानीय लोगों भी खूब खरीददारी करने आते हैं।

सुरंग की कहानी - ऐसा कहा जाता है कि कभी ऐतिहासिक गोलकुंडा किला और चारमीनार के बीच 15 फुट चौड़ी और 30 फुट ऊंची एक भूमिगत सुरंग थी। इस सुरंग को सुल्तान मोहम्मद कुली कुतुब शाह ने बनवाया था। माना जाता है कि इस सुरंग में शाही परिवार ने अपना शाही खजाना छुपाया था। हैदराबाद की गलियों में ये किस्सा मशहूर की ये खजाना आज भी सुरंग में मौजूद है। 1936 में निजाम मीर ओसमान अली ने एक सर्वे कराया था और साथ ही नक्शा भी बनवाया था। हालांकि उस दौरान यहां खुदाई नहीं कराई गई थी।

कैसे पहुंचे - नामपल्ली ( हैदराबाद रेलवे स्टेशन ) से चारमीनार की दूरी 7 किलोमीटर है। हैदराबाद के एमजी बस स्टैंड से इसकी दूरी पांच किलोमीटर है। भारतीय नागरिकों के लिए प्रवेश शुल्क 5 रुपये हैं। विदेशी नागरिकों के लिए यह शुल्क 100 रुपये है। यह सुबह 9.30 से शाम 5.30 तक खुला रहता है।
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Monday, August 24, 2015

दशरथ मांझी ने की थी गया से दिल्ली तक 1400 किलोमीटर की पदयात्रा

पहाड़ का सीना चीर कर सड़क बनाने वाले दशरथ मांझी के जीवन पर अत्यंत खूबसूरत फिल्म बनी है मांझी द माउंटेन मैन। मांझी ऩे अपने जीवन काल में एक बार रेलवे ट्रैक से होते हुए पैदल ही गेहलौर से दिल्ली की 1400 किलोमीटर की दूरी तय की थी। उनकी दिल्ली तक की यात्रा का उद्देश्य था वजीरगंज से अपने गांव तक सड़क का निर्माण करवाना। फिल्म में उनकी इस यात्रा को दिखाया गया है। वे सासाराम जंक्शन पर और सासाराम के प्रसिद्ध शेरशाह के मकबरे के बैकड्राप में यात्रा करते हुए दिखाई देते हैं। इस तरह केतन मेहता की इस फिल्म में सासाराम का ऐतिहासिक शेरशाह का मकबरा दिखाई देता है। दशरथ मांझी को अपनी दिल्ली तक की इस पैदल यात्रा में दो महीने का समय लगा। तकरीबन 60 दिन में 1400 किलोमीटर यात्रा यानी एक दिन में औसतन 25 किलोमीटर की यात्रा। कहा जाता है कि माझी गया से दिल्ली पैदल इसलिए गए क्योंकि उनके पास रेल टिकट खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। यात्रा के मार्ग का पता नहीं था इसलिए रेलवे लाइन के साथ साथ चलते हुए दिल्ली पहुंचे।

कबीरपंथी मांझी - इस दौरान उन्होंने रास्ते में पड़ने वाले सभी स्टेशन मास्टरों के हस्ताक्षर भी लिए थे। संत कबीर के अनुयायी मांझी अक्सर ट्रैक्टर के खराब हो चुके टायरों का जूता पहनते थे। उनके जैकेट रिसाइकल्ड जूट बोरों से बनाए हुए होते थे। उनके गले में कबीर पंथी माला देखी जा सकती थी।

अब शानदार फिल्म -  बॉलीवुड के अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दकी ने दशरथ मांझी की भूमिका अपने शानदार अभिनय से जीवंत कर दिया है। निश्चय ही वे इस साल के बेस्ट एक्टर के दावेदार हैं और ये फिल्म साल की सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए। उनकी पत्नी फगुनिया की भूमिका में पूणे कि अत्यंत सुंदर अभिनेत्री राधिका आप्टे खूब फबी हैं। फिल्म की ज्यादातर शूटिंग गया के पास दशरथ मांझी के गांव में ही हुई है। कुछ दृश्य सासाराम, वाराणसी, आगरा, दिल्ली और वाई (महाराष्ट्र) में फिल्माए गए हैं। माझी- माउंटेन मैन साल 2015 की सबसे अच्छी फिल्मों में हैं। हर वर्ग के लोग जरूर देखें प्रेरणा मिलेगी।


अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है - दशरथ मांझी
वैसे तो कहावत है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता। पर अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है, ये दशरथ मांझी ने कर दिखाया था।  दशरथ ने अपने गांव में पहाड़ को चीरकर उसमें रास्ता बनाने के लिए अपनी बकरी को बेचकर छेनी और हथौड़ा खरीदा और 22 साल की कड़ी मेहनत के बाद एक असंभव सा दिखने वाला कारनामा कर दिखाया। गया जिले में गेहलौर उन 2000 से ज्यादा मुसहर समुदाय के लोगों का घर है जो कभी अपनी आजीविका के लिए चूहे खाते थे। पर अब वहां का नजारा बदल चुका है। आज उनकी बदौलत गांव में स्कूल, बिजली और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र आदि पहुंच चुके हैं।

पत्नी की मौत से मिली प्रेरणा
वर्ष 1960 में दशरथ मांझी की पत्नी फगुनी देवी गर्भावस्था में पशुओं के लिए पहाड़ से घास काट रही थी कि उसका पैर फिसल गया। दशरथ उसे लेकर शहर के अस्पताल गयापर दूरी के कारण वह समय पर नहीं पहुंच सकेजिससे पत्नी की मृत्यु हो गई। बात दशरथ के मन को लग गई। निश्चय किया कि जिस पहाड़ के कारण मेरी पत्नी की मृत्यु हुई हैमैं उसे काटकर रास्ता बनाऊंगाजिससे भविष्य में किसी अन्य बीमार को अस्पताल पहुंचने से पहले ही मृत्यु का वरण न करना पड़े।

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पहाड़ मुझे उतना ऊंचा कभी नहीं लगा जितना लोग बताते हैं। मनुष्य से ज्यादा ऊंचा कोई नहीं होता। 

हमें कभी ईश्वर के भरोसे नहीं बैठना चाहिए, क्या पता भगवान ही हमारे भरोसे बैठा हो।
-    ----- दशरथ मांझी

दशरथ मांझी - 1934 –  17 अगस्त 2007

माउंटेन कटर ने काटा पहाड़ – 

360 फीट ऊंचा, 30 फीट चौड़ा और 25 फीट गहरा

कितना वक्त लगा – 22 साल

1960 में काम आरंभ हुआ, 1982 में रास्ता बना डाला

2011 में बिहार सरकार ने वहां सड़क बनवा डाली।

55 किलोमीटर की दूरी घटकर हुई 15 किलोमीटर ( अतरी से वजीरगंज की)



(हिंदी दैनिक हिन्दुस्तान के संवाददाता विजय कुमार से हुई दशरथ मांझी से बातचीत ) 

पर्वत को काटकर रास्ता बनाने का विचार कैसे आया?
मेरी पत्नी (फगुनी देवी) रोज सुबह गांवसे गहलौर पर्वत पारकर पानी लाने के लिये अमेठी जाती थी। एक दिन वह खाली हाथ उदास मन से घर लौटी। मैंने पूछा तो बताया कि पहाड़ पार करते समय पैर फिसल गया। चोट तो आई ही पानी भरा मटका भी गिर कर टूट गया। बस मैंने उसी समय गहलौर पर्वत को चीर रास्ता बनाने का संकल्प कर लिया।

पहाड़ को काटने की दृढ़ इच्छाशक्ति और ताकत कहाँ से आई?
लोगों ने मुझे सनकी करार दिया। कभी-कभी तो मुझे भी लगता कि मैं यह क्या कर रहा हूँ? क्या इतने बड़े पर्वत को काटकर रास्ता बना पाऊंगा? फिर मेरे मन में विचार आया ,यह पर्वत तो सतयुग,द्वापर और त्रेता युग में भी था।उस समय तो देवता भी यहाँ रहते थे।उन्हें भी इस रास्ते से आने-जाने में कष्ट होता होगा,लेकिन किसी ने तब ध्यान नहीं दिया। तभी तो कलयुग में मेरी पत्नी को कष्ट उठाना पड़ रहा है।मैंने सोचा, जो काम देवताओं को करना था ,क्यों न मैं ही कर दूँ। इसके बाद न जाने कहाँ से शक्ति आ गई मुझमें । न दिन कभी दिन लगा और न रात कभी रात। बस काटता चला गया पहाड़ को।

आपने इतना बडा़ काम किया पर इसका क्या लाभ मिला आपको?
मैंने तो कभी सोचा भी नहीं कि जो काम कर रहा हूं, उसके लिए समाज को मेरा सम्मान करना चाहिये। मेरे जीवन का एकमात्र मकसद है ‘आम आदमी को वे सभी सुविधायें दिलाना ,जिसका वह हकदार है।पहले की सरकार ने मुझ करजनी गांव में पांच एकड़ जमीन दी,लेकिन उस पर मुझे आज तक कब्जा नहीं मिल पाया। बस यही चाहता हूँ कि आसपास के लोगों को इलाज की बेहतर सुविधा मिल जाये। इसलिये मैंने मुख्यमंत्री से करजनी गांव की जमीन पर बड़ा अस्पताल बनवाने का अनुरोध किया है।
मुख्यमंत्री ने आपको अपनी कुर्सी पर बैठा दिया। कैसा लग रहा है? मैं तो जनता दरबार में फरियादी बन कर आया था। सरकार से कुछ मांगने ।मेरा इससे बड़ा सम्मान और क्या होगा कि बिहार के मुख्यमंत्री अपनी कुर्सी मुझे सौंप दी। अब आप लोग (मीडियाकर्मी) मुझसे सवाल कर रहे हैं। मेरी तस्वीर ले रहे हैं। मुझे तो बड़ा अच्छा लग रहा है।
( 2006 के जुलाई में दशरथ मांझी पटना में नीतीश कुमार के जनता दरबार में कुछ मांग लेकर पहुंचे थे।)
 शानदार,  जबरदस्तजिंदाबाद....

इस फिल्म की कहानी सुनते ही मैने फिल्म के लिए हां कर दी थी। फिल्म में बिहार के महान सपूत दशरथ मांझी का किरदार निभाकर मैं काफी गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। यह मेरे फिल्मी कैरियर का अब तक का सबसे चैलेजिंग और यादगार किरदार रहा है। फिल्म की शुटिंग के लिए गया जिले के गहलौर गांव में मैने करीब 2 महीने बिताएं और उस पहाड़ को नजदीक से देखा जिसे एक अकेले व्यक्ति ने काटकर रास्ता बना दिया था।

 - नवाजुद्दीन सिद्दकी ( अभिनेता) 

- vidyutp@gmail.com
( DASHRATH MANJHI, MOUNTAIN MAN, MOVIE, STONE CUTTER, GAYA, SASARAM, RAIL, TRAVEL, DELHI)

Sunday, August 23, 2015

बिना लहसुन प्याज वाली दिल्ली 6 की सुस्वादु थाली...

प्याज बहुत महंगा हो रहा है तो हाय तौबा क्यों मचा रहे हैं। क्या आपको पता नहीं है कि यूपी के पंडितों के परिवारों में सदियों से बिना लहसुन और प्याज के खाने का चलन है। मारवाड़ी भोजन की थाली भी बिना लहसुन प्याज के तैयार होती है। खाने की थाली में परोसे गए व्यंजन इतने स्वादिष्ट होते हैं कि आपको खाते वक्त एहसास नहीं होता कि आप बिना लहसुन और प्याज के खा रहे हैं। आप घर में भी बिना लहसुन प्याज के भोजन बना सकते हैं। दिल्ली में आपको ऐसे भोजन की थाली का स्वाद लेना है तो चांदनी चौक इलाके में आदर्श वेजिटेरियन पहुंचे। 

अगर आप दिल्ली में शाकाहारी थाली का स्वाद लेना चाहते हैं तो दिल्ली 6 यानी पुरानी दिल्ली का रूख कर सकते हैं। हाल में दिल्ली की सड़कों पर घूमते हुए हमलोग आदर्श वेजिटेरियन पहुंचे। यहां है 150 रुपये में शाकाहारी थाली। पर ये थाली है भरपेट थाली। यानी काफी कुछ दक्षिण भारतीय थाली की तरह। पर इस थाली का मीनू है शुद्ध राजस्थानी। खाने से हिंग की भीनी खुशबू।



क्या है थाली में  तीन तरह की सब्जियां, कोफ्ता, आलू शिमला मिर्च, बड़ियां और मटर, हिंग वाली दाल, चपाती घी लगी हुई, इसके साथ पराठे, पराठे भी अपनी पसंद के चुन सकते हैं- आलू पराठा,  मूली पराठा, पनीर पराठा और मिस्सी रोटी।
थाली में बासमती चावल भी होता है। साथ में सलाद, चटनी और इन सबके साथ पापड़ और मिठाई के तौर पर सुस्वादु खीर। इतना सब कुछ खाना वह भी उतना खाएं जितनी की आपकी पेट की क्षमता हो। तो भला इससे बढ़िया बात क्या हो सकती है।

स्वाद पुरानी दिल्ली का - आदर्श वेजीटेरियन में सुबह 10 बजे से रात 11 बजे तक लगातार भोजन उपलब्ध होता है। दिन में कभी छुट्टी नहीं। अगर आप चांदनी चौक इलाके में शापिंग के लिए पहुंचे हैं तो यहां के खाने का स्वाद ले सकते हैं।


पुरानी परंपरा - ये भोजनालय 1989 से चल रहा है। इसके संचालक रामबाबू शर्मा हैं , जो समय समय पर खुद ग्राहकों की भोजन पर प्रतिक्रिया लेते रहते हैं। उनका लक्ष्य भोजनालय में आने वालों को घर जैसा स्वाद और ऐसा खाना उपलब्ध कराने की है जिसे खाकर आपकी सेहत पर कोई बुरा असर नहीं पड़े। तो अगली बार आप पुरानी दिल्ली पहुंचे तो एक बार यहां खाने का स्वाद लेने की योजना बना सकते हैं।

कैसे पहुंचे- आदर्श वेजीटेरियन फव्वारा चौक से फतेहपुरी मस्जिद की तरफ जाते समय बल्लीमारान से थोड़ा आगे बायीं तरफ गली में है। नीचे भोजनालय और ऊपर आदर्श अतिथि निवास ( http://hoteladarshniwas.com/) भी है। यह पुरानी दिल्ली में रहने के लिए वाजिब दरों पर सुंदर व्यवस्था उपलब्ध कराता है। आदर्श वेजिटेरियन का वातानुकूलित डायनिंग हाल है। पीने का पानी तांबे के जग में परोसा जाता है। रसोई घर में साफ सफाई का पूरा ध्यान रखा जाता है। चांदनी चौक इलाके में ये रेस्टोरेंट होम डिलेवरी भी प्रदान करते हैं।
-  विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com

Hotel Adarsh Niwas
483, Ist Floor, Haider Kuli Corner, Chandni Chowk, Delhi-110006
Telephone: +91(11) 23987576, 23929139, 23961667 +91 9013002160


Thursday, August 13, 2015

चले जाना साइकिल मैन ऑफ इंडिया का...

ओम प्रकाश मुंजाल ( 1928 -2015)
साल 2000 की कोई तारीख थी। मैं अमर उजाला जालंधर में शिक्षा बीट पर संवाददाता हुआ करता था। जालंधर नकोदर रोड पर एक रिजार्ट में रविवार की सुनहरी दोपहर में कई स्कूलों का एक संयुक्त आयोजन था जिसका स्पांसर कंपनी हीरो साइकिल थी। सैकड़ों बच्चे हीरो की नई नई साइकिलों पर रिजार्ट के अंदर फुदक रहे थे। अंतर विद्यालीय प्रतियोगिता के लिए मंच तैयार हो रहा था। मैं पत्रकार होने के नाते सबसे अगली पंक्ति में जाकर बैठ गया। थोड़ी देर बाद एक बुजुर्ग सज्जन मेरे पास आए। अपने दो तीन मेहमानो को बिठाने के लिए उन्होंने मुझे उठकर पीछे वाली सीट पर जाने को कहा। मैं पत्रकार होने की ठसक में था। मैंने कहा, मैं क्यों ये सीट छोड़ूं। आपकी तारीफ...उन्होंने कहा, मैं एक जेंटिलमैन हूं। मैने जवाब दिया- तो मैं भी जेंटिलमैन हूं। उसके बाद वे मुझसे आगे उलझे बिना चले गए। बाद में मंच पर जब सभी आयोजक और मुख्य अतिथि अवतरित हुए तो मुझे पता चला कि जिन सज्जन से मैं उलझा था वे हीरो साइकिल्स के चेयरमैन ओम प्रकाश मुंजाल ( OM PRAKASH MUNJAL) थे। आज साइकिलमैन  ओपी मुंजाल इस दुनिया से जा चुके हैं तो मुझे जालंधर की वो घटना बार बार याद आती है।

आम आदमी की सवारी - साइकिल
रोजाना 19 हजार साइकिलें बनाने वाली कंपनी हीरो साइकिल्स के संस्थापक अध्यक्ष ओम प्रकाश मुंजाल का 13 अगस्त 2015 को लुधियाना में निधन हो गया। 86 साल के मुंजाल को लुधियाना के दयानंद मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पीटल के हीरो हर्ट इंस्टीट्यूट में अंतिम सांस ली। सात भाई बहनों के परिवार में ओम प्रकाश मुंजाल सबसे छोटे थे। इसी साल 22 फरवरी को उनकी पत्नी सुदर्शन मुंजाल का निधन हो गया था। सुदर्शन उनकी पत्नी के साथ ही उनकी कविताओं की प्रेरणा थीं। सात भाई बहनों में सबसे छोटे थे ओपी मुंजाल। खत्री परिवार से आने वाले मुंजाल सक्रिय आर्य समाजी थे।
आम आदमी की सवारी क्या है। साइकिल। देश में साइकिल को जन जन में लोकप्रिय किसने बनाया। हीरो साइकिल ने। हीरो से पहले देश में हरक्यूलिस, रेले और फिलिप्स जैसी कंपनियों की साइकिलें विदेश से आती थीं, जो काफी महंगी होती थीं। पर हीरो एक सस्ती और स्वदेश विकल्प बनकर लोगों के बीच आई। ओपी मुंजाल को देश में साइकिल उद्योग का जनक के रूप में जाना जाता है।

अमृतसर में कारोबार की शुरुआत
1944 में ओपी मुंजाल ने अमृतसर में अपने अपने तीन भाइयों-बृजमोहन लाल मुंजाल, दयानंद मुंजाल और सत्यानंद मुंजाल के साथ एक साइकिल स्पेयर पार्ट्स का कारोबार शुरू किया। तब ओम प्रकाश 16 साल के थे। हालांकि, भारत का बंटवारा हुआ, जिसका बुरा असर अमृतसर में कारोबार पर पड़ा। इस कुछ सालों बाद ओपी मुंजाल भाइयों को लेकर लुधियाना आ गए। लुधियाना का प्रसिद्ध डीएमसी हास्पीटल उनके भाई दयानंद मुंजाल के नाम पर बना है जो काफी पहले ही स्वर्ग सिधार गए थे।

हीरो का सफर
1956 में हीरो साइकिल्स का कारखाना स्थापित हुआ था। इसके लिए बैंक से 50 हजार रुपये का कर्ज लिया गया था। तत्कालीन पंजाब के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरो ने मुंजाल परिवार को कारोबार बढ़ाने के लिए प्ररेरणा दी थी। तब उसकी उत्पादन क्षमता रोजाना 25 साइकिलों की थी। अब इसमें रोज करीब 19 हजार साइकिलें बनती हैं।ओम प्रकाश व्यापार में धुन के इतने पक्के थे कि एक बार उनकी हीरो साइकिल फैक्ट्री में हड़ताल हो गई तो  वे खुद फैक्ट्री में नई साइकिलों पर पेंट करने के काम में लग गए। एक बार ट्रक आपरेटरों ने हड़ताल कर दी तो साइकिलों को बस में बुक करके भिजवाने लगे।

गिनिज बुक में नाम- दुनिया की नंबर वन कंपनी 
हीरो साइकिल को 1980 में दुनिया की सबसे अधिक साइकिल बनाने वाली कंपनी के रूप में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में शामिल किया गया था। देश के साइकिल बाजार में हीरो कंपनी की करीब 48 फीसदी हिस्सेदारी है। ओपी मुंजाल के परिवार में एक बेटा पंकज मुंजाल और चार बेटियां हैं। बंटवारे से पहले कमालिया (अब पाकिस्तान में) में ओपी मुंजाल का जन्म हुआ था। 

2010 में हीरो परिवार में बंटवारा
देश में बड़ी बिजनेस फैमिली में बंटवारा सही तरीके से हो जाए, ऐसा होता नहीं है। लेकिन हीरो ग्रुप ने 2010 में ये कर दिखाया। बीस से ज्यादा कंपनियां चलानेवाले मुंजाल भाइयों ने बिजनेस को चार हिस्सों में बांट लिया और कोई हंगामा नहीं हुआ।  बंटवारे में सबसे बड़े भाई बृजमोहन लाल मुंजाल और उनके बेटों - पवन , सुनील और स्वर्गीय रमनकांत मुंजाल के परिवार के हिस्से में फ्लैगशिप कंपनी हीरो होंडा आई । साथ में हीरो कॉरपोरेट सर्विसेज, हीरो। टीईएस, हीरो माइंडमाइन और ईजीबिल पर भी उनका कंट्रोल में रहा। बीएम मुंजाल के भाई ओपी मुंजाल के हिस्से आई बिजनेस को मजबूत बुनियाद देनेवाली हीरो साइकिल। साथ में हीरो मोटर्स। स्व. दयानंद मुंजाल के बेटों को हीरो एक्सपोर्ट्स और सनबीम कंपनियां मिलीं। सत्यानंद मुंजाल को मुंजाल ऑटो, मुंजाल शोवा और मैजेस्टिक ऑटो मिली ।
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REFRENCE -
BOOK - ‘The Inspiring Journey of a Hero’ by Priya Kumar (Penguin 2014)

( OM PRAKASH MUNJAL, HERO, CYCLE, LUDHIYANA, AMRITSAR, JALANDHAR, AMAR UJALA)


Friday, August 7, 2015

दिल्ली में लें चेन्नई का सच्चा स्वाद

अगर आप दिल्ली में रहकर सच्चे दक्षिण भारतीय व्यंजनों का स्वाद लेना चाहतें और खासकर चेन्नई का तो पहुंचे सरवणभवन। सरवण भवन दिल्ली के दिल कनाट प्लेस में स्थित है। चेन्नई शहर में सरवण भवन के 20 के करीब ब्रांच हैं। पर अब चेन्नई का ये प्रसिद्ध रेस्टुरेंट न सिर्फ दिल्ली बल्कि दुनिया के कई देशों तक पहुंच चुका है।

दिल्ली में सरवण भवन में सुबह नास्ता, दोपहर का खाना या रात के डिनर के समय जा सकते हैं। मसाला डोसा  के अलावा आप यहां पर मिनी टिफिन का स्वाद लें। 125 रुपये की थाली में एक मिनी डोसा, चार मिनी इडली, उपमा और रवा केसरी ( यानी सूजी हलवा)। साथ में सांभर, चटनी तो होगी ही। ये एक टिकट में कई तमाशा जैसा डिश है। इसके अलावा यहां आप पारंपरिक तमिल थाली का भी आनंद ले सकते हैं जो 195 रुपये की है। मसाला डोसा 120 रुपये का है। डोसा का स्वाद बिल्कुल चेन्नई जैसा है। हालांकि दिल्ली में इसकी दरें चेन्नई से महंगी हैं। लेकिन उसी तरह प्लेट में परंपरागत केले के पत्ते पर व्यंजन परोसे जाते हैं। सभी दरों पर वैट और टैक्स अलग से लगता है। आप यहां पेमेंट क्रेडिट कार्ड से भी कर सकते हैं। सरवण भवन ने टेक अवे और होम डिलेवरी का भी यहां पर इंतजाम किया हुआ है। आमतौर पर दिल्ली के सरवण भवन में शाम को हमेशा भीड़ रहती है। खास तौर पर परिवार के साथ खाने वाले यहां खूब पहुंचते हैं। सरवण भवन के सांबर बनाने का अपना स्टाइल है जो उनके नाम से ही प्रसिद्ध है। यह ज्यादा तीखा नहीं होता,  इसलिए बच्चे भी आराम से खा लेते हैं।

दक्षिण भारत में सरवण भवन की 31 रेस्टोरेंट खुल चुके हैं जबकि उत्तर भारत में दो। दिल्ली में कनाट प्लेस में जनपथ और शिवाजी स्टेडियम के पास इनकी मौजूदगी है। वे साल 2003 से दिल्ली में हैं। तमिलनाडु में चेन्नई के अलावा कांचीपुरम, तूतीकोरीन में भी उनकी मौजूदगी है। विदेशों में दुबई, ओमान, मस्कट, हांगकांग समेत 12 देशों में 46 से ज्यादा आउटलेट फ्रेंचाइजी स्तर पर काम कर रहे हैं।
सरवण भवन का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है। इसकी शुरुआत 1981 में एक रेस्टोरेट के तौर पर हुई थी। इसकी शुरुआत तमिलनाडु के तूतीकोरीन के रहने वाले पी राजगोपाल ने की थी। अब उनकी दूसरी पीढ़ी रेस्टोरेंट का कारोबार देखती है। राजगोपाल के पिता किसान थे और प्याज का कारोबार करते थे। 1973 में चेन्नई आकर उन्होंने केके नगर में  एक जनरल स्टोर खोला। बाद में 1981 में इसी इलाके में पहला सरवण भवन नामक रेस्टोरेंट खोला जो आज दुनिया का बड़ा ब्रांड बन चुका है। लोकप्रियता का ये आलाम है कि कई शहरों  सरवण भवन नाम से रेस्टोरेंट खुल गए हैं जो मूल सरवण भवन के हिस्सा नहीं हैं।  ( http://www.saravanabhavan.com/)



Sunday, August 2, 2015

सारनाथ – आइए यहां इतिहास से संवाद करें

सारनाथ - मूलगंध कुटी।
वाराणसी घूमने गए हों तो सारनाथ न जाएं ये कैसे हो सकता है। सारनाथ भारत के ऐतिहासिक विरासत का जीता जागता उदाहरण है। भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के पश्चात अपना प्रथम उपदेश यहीं दिया था। बौद्ध धर्म के इतिहास में इस घटना को धर्म चक्र प्रवर्तन ( Turning of the Wheel) का नाम दिया जाता है।

सारनाथ को जैन धर्म एवं हिन्दू धर्म में भी महत्व है। जैन ग्रंथों में इसे सिंहपुर कहा गया है और माना जाता है कि जैन धर्म के ग्यारहवें तीर्थंकर श्रेयांसनाथ का जन्म यहां से थोड़ी दूर पर हुआ था। यहां पर सारंगनाथ महादेव का मन्दिर भी है जहां सावन में मेला लगता है।

कहा जाता है कि सारनाथ का प्राचीन नाम ऋषिपतन (इसिपतन या मृगदाव) (हिरनों का जंगल) था।  मुहम्मद गजनवी ने 1017 में आक्रमण कर सारनाथ के पूजा स्थलों आक्रमण कर नष्ट कर दिया था। सन 1905 में पुरातत्व विभाग ने यहां खुदाई करवाई। आप सारनाथ में धमेक स्तूप के पास खुदाई के अवशेष और सुरंगें देख सकते हैं। सारनाथ में खुदाई से मिली कई सामग्री कलकाता के इंडियन म्युजिम में देखी जा सकती हैं।  गुप्तकाल में सारनाथ कला का बड़ा केंद्र था। खुदाई के दौरान ही यहां अशोक स्तंभ और कई शिलालेख मिले।

सारनाथ का धमेक स्तूप। 
मूलगंध कुटी – मूलगंध कुटी गौतम बुद्ध का मंदिर है। सातवीं शताब्दी में भारत आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इसका वर्णन 200 फुट ऊंचे मूलगंध कुटी विहार के नाम से किया है। इस मंदिर पर बने हुए नक्काशीदार गोले और छोटे-छोटे स्तंभों से लगता है कि इसका निर्माण गुप्तकाल में हुआ होगा। मंदिर के बदल में गौतम बुद्ध के अपने पांच शिष्यों को दीक्षा देते हुए मूर्तियां बनाई गई हैं।

धमेक स्तूप – इसे धर्माराजिका स्तूप भी कहते हैं। इसका निर्माण अशोक ने करवाया था। दुर्भाग्यवश 1794 में जगत सिंह के आदमियों ने काशी का प्रसिद्ध मुहल्ला जगतगंज बनाने के लिए इसकी ईंटों को खोद डाला था। खुदाई के समय 8.23 मीटर की गहराई पर एक संगरमरमर की मंजूषा में कुछ हड्डियां एवं सवर्ण पात्र, मोती के दाने एवं रत्न मिले थे, जिसे तब लोगों ने गंगा में बहा दिया।

चौखंडी स्तूप – चौखंडी स्तूप सारनाथ का अवशिष्ट स्मारक है। इस स्थान पर गौतम बुद्ध की अपने पांच शिष्यों से मुलाकात हुई थी। बुद्ध ने उन्हें अपना पहला उपदेश दिया था। बुद्ध ने उन्हें चार आर्य सत्य बताए थे। उस दिन गुरु पूर्णिमा का दिन था। बुद्ध 234 ई. पूर्व में सारनाथ आए थे। इसकी याद में इस स्तूप का निर्माण हुआ। इस स्तूप के ऊपर एक अष्टपार्श्वीय बुर्जी बनी हुई है। यहां हुमायूं ने भी एक रात गुजारी थी।

भारत का राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ है यहां
सारनाथ का संग्रहालय भारतीय पुरातत्‍व सर्वेक्षण का प्राचीनतम स्‍थल संग्रहालय है। इसकी स्थापना 1904 में हुई थी। यह भवन योजना में आधे मठ (संघारम) के रूप में है। इसमें ईसा से तीसरी शताब्दी पूर्व से 12वीं शताब्दी तक की पुरातन वस्तुओं का भंडार है। इस संग्रहालय में मौर्य स्‍तंभ का सिंह स्‍तंभ शीर्ष मौजूद है जो अब भारत का राष्‍ट्रीय प्रतीक है। चार शेरों वाले अशोक स्तंभ का यह मुकुट लगभग 250 ईसा पूर्व अशोक स्तंभ के ऊपर स्थापित किया गया था।  इस स्तंभ में चार शेर हैं, पर किसी भी कोण से तीन ही दिखाई देते हैं। 
अशोक स्तंभ का मॉडल।
कई मुद्राओं में बुद्ध की मूर्तियों के अलावा, भिक्षु बाला बोधिसत्‍व की खड़ी मुद्रा वाली विशालकाय मूर्तियां, छतरी आदि भी प्रदर्शित की गई हैं। संग्रहालय की त्रिरत्‍न दीर्घा में बौद्ध देवगणों की मूर्तियां और कुछ वस्‍तुएं हैं। तथागत दीर्घा में विभिन्‍न मुद्रा में बुद्ध, वज्रसत्‍व, बोधित्‍व पद्मपाणि, विष के प्‍याले के साथ नीलकंठ लोकेश्‍वर, मैत्रेय, सारनाथ कला शैली की सर्वाधिक उल्‍लेखनीय प्रतिमा उपदेश देते हुए बुद्ध की मूर्तियां प्रदर्शित हैं।

सारनाथ वाराणसी के बाकी पर्यटक स्थलों की तुलना में खुला खुला और हरा भरा है। यहां आप छोटा सा चिडियाघर (डियर पार्क) भी देख सकते हैं। यहां घूमने के लिए आधे दिन का समय जरूर निकाल कर रखें। अपने पांच साल के वाराणसी प्रवास के दौरान हमलोग अनगिनत बार सारनाथ गए पिकनिक मनाने। हालांकि गरमी  की दोपहरी में सारनाथ घूमने में परेशानी हो सकती है। यहां सर्दियों में जाना बेहतर है।
कैसे पहुंचे - वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन से आठ किलोमीटर की दूरी पर है सारनाथ। सारनाथ नाम का रेलवे स्टेशन भी है जो वाराणसी से औरिहार जंक्शन जाने वाली लाइन पर है। आप वाराणसी कैंट से आटो रिक्सा से सारनाथ जा सकते हैं। हाल ही में बीएसएनएल ने यहां सैलानियों के लिए फ्री वाईफाई सुविधा शुरू कर दी है।
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वाराणसी में और क्या देखें -  दश्वाश्वमेध घाट, काशी विश्वनाथ मंदिर. जंतरमंतर. रामनगर का किला, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, संकट मोचन मंदिर, मानस मंदिर, दुर्गा कुंड मंदिर। भारत माता मंदिर, भारत कला भवन (बीएचयू)। 
( SARNATH, VARANASI, BANARAS, UTTRAR PRADESH)