Friday, July 31, 2015

एक महान आत्मा से मुलाकात…

छह माह के अनादि सुब्बराव जी के साथ ( जनवरी 2006)
ये 1991 के फरवरी महीने की बात है। मैं काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्रथम वर्ष का छात्र था। राष्ट्रीय सेवा योजना का मैं सक्रिय स्वयंसेवक था। एक बार हमने अपने प्रोग्राम आफिसर आद्या प्रसाद पांडे जी से इच्छा जताई कि मैं किसी राष्ट्रीय शिविर में जाना चाहता हूं। उन्होंने कहा, एनएसएस के राष्ट्रीय शिविर तो कम ही होते हैं। आप महान गांधीवादी सुब्बराव जी द्वारा आयोजित राष्ट्रीय युवा योजना के किसी शिविर में जाना चाहो तो मैं बात करूं। मैंने हामी भर दी। उन्होंने मुझे अजय पांडे से मिलने को कहा। मैं साइकिल चलाता हुआ बनारस के लहरतारा रेलवे कालोनी अजय पांडे जी के घर पहुंचा। अजय जी ने बताया कि अप्रैल 1991 में जम्मू के पास राष्ट्रीय एकता शिविर होगा, आप बीएचयू के अपने पांच दोस्तों का समूह बनाएं और जाएं। मैं तैयार हो गया। पर वार्षिक परीक्षा निकट होने के कारण और कोई मित्र तैयार नहीं हुआ जाने को। इस बीच काशी हिंदू विश्वविद्यालय में उद्यमिता विकास कार्यक्रम का उदघाटन होना था। स्वतंत्रता भवन में होने वाले कार्यक्रम में सुब्बराव जी मुख्य अतिथि बन कर आने वाले थे। मैं इस कार्यक्रम में वालंटियर भी था। यहां सुब्बराव जी से मेरी पहली मुलाकात हुई।


पंजाब के डीएवी स्कूल बिलगा में। ( 2003)
 काशी हिंदू विश्वविद्यालय के तत्कालीन वाइस चांसलर डाक्टर रघुनाथ प्रसाद रस्तोगी ने एक खादी की बुशर्ट और खादी की निक्कर पहने हुए सज्जन का स्वागत किया। उनके चेहरे पर अप्रतिम आभा थी। वे सुब्बराव जी थे। जब उन्हें मंच पर बोलने के बुलाया गया तो उन्होंने संबोधन में कुछ भी कहने से पहले स्वतंत्रता भवन मे मौजूद दो हजार लोगों से कहा, आज के नौजवानों के होठों पर कैसा गीत होना चाहिए...सब लोग मेरे साथ गाएं...  उन्होंने ओजस्वी आवाज में गाना शुरू किया.... युग की जड़ता के खिलाफ एक इन्क्लाब है...हिंद के जवानों का सुनहरा ख्वाब है....भारतीय सांस्कृतिक क्रांति.... कार्यक्रम के दौरान सुब्बराव जी  से मेरा परिचय हुआ। उन्हें ये जानकर खुशी हुई कि मैं जम्मू शिविर में आ रहा हूं। पर मैं जम्मू नहीं जा सका। मई 1991 में वाराणसी में दुर्गा कुंड स्थित अंध विद्यालय में राष्ट्रीय शिविर का आयोजन हुआ। पर मेरी वार्षिक परीक्षाएं थी इसलिए मैं इसमें हिस्सा नहीं ले सका। एक दिन शिविर में गया जरूर। फिर सुब्बराव जी का सानिध्य मिला थोड़ी देर के लिए।

अक्तूबर 1991 में अलीगढ़ में राष्ट्रीय एकता एवं सांप्रदायिक सौहार्द शिविर हुआ जिसमें पहली बार पहुंचा। इस तरह अलीगढ़ मेरा पहला राष्ट्रीय शिविर था। यहां वाराणसी से मेरे साथ बिपिन चंद्र चतुर्वेदी, अजय कुमार सिंह, ओम हरि त्रिपाठी आदि गए थे। 
बूढ़ा केदार (टेहरी) में सुब्बराव जी के साथ। ( 1991)
इसके बाद 1991 के दिसंबर में उत्तराखंड के टेहरी में भूकंप राहत शिविर में जाने का अवसर मिला। इस शिविर में हमारे साथ मनोज कुमार बोस,  बिपिन चंद्र चतुर्वेदी, मुगलसराय के चंद्रभूषण मिश्रा कौशिक, संजय पाठक और मेरे रुम पार्टनर राजीव कुमार सिंह थे। इसके बाद बेंगलुरु में 1992 में आध्यात्मिक युवा शिविर में हमलोग पहुंचे। इस शिविर में मेरे साथ दिग्विजय नाथ सिंह थे। बीएचयू के दोस्तों में राजीव कुमार सिंह, अमिताभ सिंह, संदीप कुमार, आदित्य आदि थे। बेंगलुरु शिविर से पहले मैं बिहार के हाजीपुर शहर में राष्ट्रीय युवा योजना की इकाई शुरू करवा चुका था। हाजीपुर से बेंगलुरु शिविर में पंकज कुमार सिंह, राकेश पाठक, नवीन झा और मनीष चंद्र गांधी पहुंचे थे।

 1992 के जून महीने में मैं मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में संपूर्ण साक्षरता कार्यक्रम में योगदान करने दिग्विजय नाथ सिंह के साथ गया। हमलोग एक महीने से ज्यादा चंबल नदी के किनारे बगदिया गांव के पास कीर का झोपड़ा में रहे। वह अदभुत अनुभव था। इसके बाद अक्तूबर 1992 में यूथ वर्कर्स मीट में पंकज के साथ दिल्ली जाना हुआ। यह सम्मेलन एनवाईपी के सक्रिय कार्यकर्ताओं का था। 1993 में जब सदभावना रेल यात्रा चली तो आठ महीने की इस यात्रा में मैंने शुरुआत के तीन महीने योगदान किया। इस दौरान मेरे पास ऑफिस मैनेजमेंट की जिम्मेवारी थी। इसके बाद में किसी भी शिविर में नहीं जा सका।
दिसंबर 1995 में रेल यात्रा के दौरान जम्मू मे

 एमए और पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद नौकरी में आ गया। लिहाजा कभी शिविर में जाने के लिए समय नहीं निकाल पाया। हां 1994 और 1995 में सदभावना रेल यात्रा के दूसरे और तीसरे चरण में थोड़े थोड़े दिनों के लिए जरूर पहुंचा पर पंजीकृत रेल यात्री के तौर पर नहीं। 1998 के जून महीने में महात्मा गांधी सेवा आश्रम जौरा में हुए सक्रिय कार्यकर्ता सम्मेलन में एक बार फिर मैं व भाई तड़ित प्रकाश गए। नौकरी में आने के बाद भले किसी शिविर में नहीं जा सका। पर तय किया कि अपने पेशे में रहकर एक सुंदर विश्व और एक सुंदर भारत के निर्माण के लिए जो कर सकता हूं करने की कोशिश करूंगा। ये कोशिश जारी है। नौकरी के सिलसेले में पटना, मेरठ, पानीपत, लुधियाना जालंधर और हैदराबाद में रहा। इस दौरान सुब्बराव जी से लगातार संपर्क में रहा। 2011 में सोनीपत में हुए बाल शिविर में एक दिन के लिए अपने बेटे अनादि के साथ गया। तब अनादि छह साल के थे। 
जनकपुर (नेपाल) जून 2015 

बेटे  अनादि को भाई जी का आशीर्वाद पालने में ही मिल गया था। जनवरी 2006 में अनादि छह माह के थे। पटना में नेहरु युवा केंद्र के राष्ट्रीय शिविर में सुब्बराव जी मुख्य मेहमान के तौर पर गए थे। पत्नी माधवी ने मेरी सलाह पर भाई जी से संपर्क किया कि आपसे मिलना चाहती हूं। इससे पूर्व वे मेरे विवाह के बाद जालंधर में 1993 में भाई जी से बिलगा गांव के डीएवी स्कूल में मिल चुकी थीं। भाई जी को जब पता चला कि माधवी विद्युत का छह माह का एक बेटा भी है तो उन्होंने कहा, तुम कहां इस भीड़ में आओगी मैं ही  तुम्हारे घर पहुंचता हूं। पटना के सुनील सेवक के साथ सुब्बराव जी मुसल्लहपुर हाट स्थित मेरे ससुराल हरि निवास पहुंचे और नन्हे अनादि को आशीर्वाद दिया। दो साल के अनादि को हैदराबाद में एक बार फिर भाई जी का आशीर्वाद प्राप्त करने का मौका मिला। सुब्बराव जी बच्चों से मुलाकात में उन्हें गुब्बारा देना नहीं भूलते। उनकी जेब में हमेशा कुछ गुब्बारे रहते हैं। आशीर्वाद में अनादि न जाने उनसे कितने गुब्बारे ले चुके हैं।
दिल्ली गांधी शांति प्रतिष्ठान - कमरा नंबर 11 ( साल 2013)

 दाना-पानी की तलाश में मैं शहर दर शहर बदलता रहा। भाई जी मुझसे हर मुलाकात में पूछते अब कौन से शहर में हो। हर बार मुझे अपनी डायरी में आपका पता बदलना पड़ता है। पर अब मैं 2007 से लगातार दिल्ली में हूं।  और ये बड़े सौभाग्य की बात है कि सुब्बराव जी जैसे महामानव की डायरी में मेरा पता है। वे जब मिलते हैं मेरे सारे भाई बहनों का हाल चाल पूछ लेते हैं। मैं ही क्या जिन लोगों ने भी सुब्बराव का जितना भी सानिध्य पाया है आने वाले दिनों में रश्क करेगे मैं कभी ऐसे महामानव के सानिध्य में था, जो एक सुंदर विश्व के निर्माण का सपना लगातार देखता था और लोगों को सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता रहता था।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com

(BHU, VARANASI, BILGA, PUNJAB, BIHAR, HAJIPUR, PATNA, DELHI, HYDRABAD ) 


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