Thursday, July 16, 2015

शेखावटी में लें मारवाड़ी खाने का स्वाद

जयपुर की एक सुबह। सिंधी कैंप के बाहर एक होटल मे नास्ते में एक पराठा लेकर आगे के सफर पर चल पड़ता हूं। वैसे राजस्थान में लोग मिर्ची खूब खाते हैं। सुबह में यहां पर मिर्च के बड़े-बड़े पकौड़े मिलते हैं। दुकानदार इसे काटकर कई टुकड़े कर प्लेट में पेश करते हैं। पर मुझे मिर्च पसंद नहीं है। मिठास पसंद है। दोपहर हो गई है तो खाटू श्याम में लस्सी पीना पसंद करता हूं। मिट्टी के करूआ में लस्सी। महज 20 रुपये में। स्वाद भी काफी कुछ बनारस की लस्सी के ही जैसा। गन्ने का जूस तो हर जगह मिलता है जो गर्मियों में प्यास बुझाता है। खाटू श्याम से सीकर के लिए बस लेता हूं। बस ग्रामीण इलाकों से होती हुई पलसाना पहुंचती है। यहां पर रींगस सीकर एक्सप्रेस वे आता है। यहां पर शेक मिल रहा है। इसमें मैंगो के साथ खरबूजा भी मिला हुआ है। इसका अपना अलग स्वाद है। गरमी में तरावट तो देता ही है। रानौली, रैवासा धाम होते हुए बस सीकर पहुंचती है।

दोपहर हो गई लिहाजा भूख लगी है। सीकर के एक भोजनालय में 50 रुपये की थाली है। इसमें राजस्थानी घी चुपड़े फुलके हैं। दाल और दो सब्जी के साथ। फुलके की गिनती नहीं है चाहे जितनी खाओ। खाने के बाद मैं अगली बस लेता हूं सालासर के लिए। चैलासी, सेवद बड़ी, कछावा, सुतोद होते हुए बस सालासर पहुंचती है लगभग दो घंटे में। दूरी है 55 किलोमीटर। सालासर में बालाजी के दर्शन के साथ रात्रि विश्राम है। रात के भोजन के लिए पहुंचता हूं गंगानगर सेवा सदन में। यहां 50 रुपये की थाली है। मारवाडी बासा की तरह नीचे बैठकर जीमने का इंतजाम। यहां भी चपाती चाहे जितनी भी खाओ। सालासर के कई सेवा सदनों में शाकाहारी भोजनालय संचालित होते हैं। जहां आप पेटभर खा सकते हैं।

अगले दिन सालासर से आगे बढ़ता हूं। झूंझनू ने के लिए सीधी बस नहीं मिलती। बस स्टैंड से मुंकुदगढ़ की बस मिलती है। रास्ते में नांगलूणा, जाजोद के बाद लक्ष्णणगढ़ नामक कस्बा आता है। यहां एक किला दिखाई देता है। शहर के बीच में मुरली मनोहर मंदिर के पास बस रुकती है। लक्ष्मणगढ़ में निजी क्षेत्र का मोदी विश्वविद्यालय खुल गया है। http://www.modyuniversity.ac.in/ फिलहाल लक्ष्मणगढ़ मीटरगेज रेलवे लाइन पर है। बस यहां से आगे बढ़ती है। बराला के बाद मुकुंदगढ़ चौराहे पर बस मुझे उतार देती है। यहां से दूसरी बस मिलती है झुंझनू के लिए। मुकुंदगढ़ से कोई 30 किलोमीटर दूरी है झुंझनू की। झुंझनू में मोरारका कालेज समेत कई शिक्षण संस्थान है। अब वहां जेजेटीयू यानी जगदीश प्रसाद झाबरमल टीबडेवाला यूनीवर्सिटी खुल गई है। (http://jjtu.ac.in/) ये विश्वविद्यालय चुडाला में चुरू रोड पर ( स्टेट हाईवे नंबर 37) स्थित है।

झुंझनू में रानी सती मंदिर के दर्शन के बाद वहां के प्रसाद गृह (भोजनालय) का कूपन खरीदता हूं। 70 रुपये का कूपन है। मंदिर के मुख्य द्वार से प्रवेश के बाद बायीं तरफ भोजनालय है। चप्पल निकालकर भोजनालय में प्रवेश के बाद गर्म पानी के नल पर हाथ धोने की सलाह दी जाती है। खाने की थाली सामने है। भिंडी की सब्जी, दो और सब्जियां, दाल, रायता, घी चुपडी चपातियां और चावल। सब कुछ चाहे जितना खाओ। विशुद्ध मारवाडी खाना। स्वाद ऐसा कि लंबे समय तक न भूले। तो राणीसती मंदिर का दिव्य प्रसाद लेकर हम आगे बढ़े। झुंझनू से दिल्ली की बस में। बागड धाम के बाद आता है चिड़ावा। यहां के पेड़े खूब मशहूर हैं। हालांक हमने खरीदे नहीं। इसके बाद आता है सिंघाना। फिर पचेड़ी। ये हरियाणा की सीमा है। यहां पर खुली है निजी क्षेत्र की सिंघानिया यूनीवर्सिटी। http://singhaniauniversity.co.in/ इसके बाद बस नारनौल की ओर दौड़ रही है। हरियाणा के शहर नारनौल में कई जगह जल कुटीर दिखाई दिए लोग यहां निःशुल्क पानी पिलाते हैं।





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