Friday, July 10, 2015

सालों बाद नानी जी के गांव में

कई सालों बाद नानी के गांव में जाना हुआ। अब नानी नहीं रहीं तो वह मामा का गांव है। भला मामा के गांव में जाना किसे अच्चा नहीं लगता। बचपन में मन कुलांचे मारता था ममहर जाने के लिए। कई दिन पहले से उस तारीख का इंतजार रहता था जब हम ननिअउरा पहुंचे। पर अब बड़े होने के रोटी दाल के जुगाड़ के आपाधापी में नानी का गांव कहीं बिसर गया था।
इस बार छोटे भाई की शादी में मामा मिले तो उलाहना दिया – तू हमनी के गांव भूला गइल। भला भूला कहां था। बचपन की खटमिठी स्मृतियां भूलती हैं भला।

कुसुम्ही गांव की एक सुहानी सुबह। 
सो इस बार पटना जाने पर तय किया चाहे कितनी भी गरमी हो मामा गांव जरूर जाना है। तो हमारे मामा का गांव है भोजपुर जिले में। आरा से 40 किलोमीटर आगे पीरो बाजार आता है। पीरो से छह किलोमीटर पूरब गांव है कोइल के बगल में कुसुम्ही। बचपन में जब हम नानी के गांव आते थे तब पीरो से टैक्सी या बस से सहार रोड पर फतेपुर आना पड़ता था। फतेपुर से नहर पकडकर पैदल पैदल तीन किलोमीटर चलने के बाद आता था कोइल गांव। मुझे नानी गांव की आखिरी यात्रा बार बार याद आती है। सावन का महीना था। फतेपुर उतरने के बाद अंधेरा हो गया था। मेरे पास टार्च नहीं था। नहर पकड़कर अंधेरे में नानी के गांव के लिए चल पड़ा। पहला पुल आने के बाद नहर के साथ चलती सड़क लोगों ने काट डाली थी। नहर में भी तेज पानी था। इस पानी को पार करके आगे बढ़ा। थोड़ी दूर आगे और भी बड़ा कटाव था। यहां पानी गहरा मालूम होता था। मैं किनारे बैठ गया। सोचा वापस लौट जाऊं। पर रात में फतेपुर में भी रहने का कोई इंतजाम नहीं था। तभी अंधेरी रात में एक बुजुर्ग मेरे आगे आया। उसने कहा, पानी ज्यादा नहीं है। मेरे पीछे पीछे आ जाओ। मैं पार कर गया। पर ये क्या मेरे आगे के बुजुर्ग गायब थे। शायद मेरी मदद के लिए आए थे।

मैं कमर तक भींगा हुआ रात के 9 बजे नानी के गांव सीवान में पहुंचा था। लालटेन की रोशनी देख जान में जान आई। वरना अंधेरी रात में कहीं और भी भटक सकता था। तब मैं एमए में पढ़ रहा था। मामा के गांव में इस बार बदलाव था। नानी धरती छोड़ चुकी थीं। हमारी स्नेहिल छांव खत्म थी। तीनों मामा के परिवारों में बंटवारा हो गया था। इस बार मुझे बचपन का अल्हड मस्ती भरा नानी का गांव बदला हुआ सा लगा। इसके बाद मैं सालों नानी के गांव नहीं गया। पर मैं गलत था। 2015 के जून में नानी गांव के सफर में काफी कुछ बदला हुआ था। मामा ने कहा पीरो रेलवे स्टेशन पहुंचने पर फोन कर देना। मामा के बेटे बाइक से मुझे लेने स्टेशन पहुंच गए थे। नीतीश कुमार के राज में नानी के गांव तक तीन तरफ से सड़के बन गई हैं। गांव में बिजली नहीं पहुंची है। पर सोलर लाइटों से सारा गांव रोशन हो रहा है। हर घर में एलईडी की रोशनाई है। अब लालटेन युग खत्म हो चुका है।

नानी के गांव की सबसे बड़ी विशेषता गांव के बीचो बीच विशाल दलान है। ये दो मंजिला पक्का दलान पूरे गांव ने मिलकर बनवाया था। सत्तर के दशक में। दलान के बाहर विशाल आंगन है जिसके चारों तरफ लोगों के घर है। बीच में एक अशोक का पेड़ है जिसके चबूतरे पर गांव के लोग बैठ कर सुस्ताते हैं। गप्पे लड़ाते हैं। इसके बगल में एक कुआं है जिससे कभी सारा गांव पानी भरता था। अब हर घर में हैंडपंप लग गए हैं। गांव भर के आने वाले मेहमान इसी साझीदारी के दलान में रुकते हैं। गांव के सारे बड़े इसी दलान में ढिबरी और लालटेन में पढ़ाई कर बड़े हुए हैं। कई शहर में जाकर बस गए हैं। पर दलान उसी तरह शान से खड़ा है। शादी विवाह होने पर कई बार भोज भी इसी दलान में होता है। मुझे बचपन याद आता है। इसी दलान में होली की महफिलें सजती थीं। ढोलक, झाल, मजीरे के साथ पूरा गांव होली गाता था। अशोक के पेड़ के पास बारात सजती थी और इस मौके पर घोड़ा नाच होता था।
नानी गांव पहुंचने पर जगन मामा की बहुत याद आती है। मैं तब नन्हा सा था। हर साल जब नानी गांव पहुंचता तो मुझे दूर से देखकर ही मीठी आवाज में हाक लगाते थे – पछिमहवा आ गोइल बा का रे.... मेरी मां की शादी दूर पश्चिम में हुई थी इसलिए मैं उनकी नजर में पछिमहवा था। आज जगन मामा नहीं है। पर उनकी आवाज मेरी कानों में गूंज रही है। उनको क्या मालूम की मैं अब और पश्चिम चला गया हूं जहां से कई सालों बाद पहुंचा हूं। पर तुम तो बैकुंठ धाम चले गए। वो भी क्या दिन थे। गांव में किसी भी मामा के खेत से गन्ने तोड़ कर दिन भर ऊख चाभते रहते थे। गांव के सारे लोग ही मेरे मामा थे। सारे खेत मामा के ही थे। कोई भेदभाव नहीं। मैं को कुसुम्ही गन्ना चूसने ही आता था।

गांव के दक्षिण में कई किलोमीटर लंबा आहर। आहर के किनारे आम महुआ और गूलर के पेड़। चांदनी रातों में महुआ की मस्त खुशबू आती थी। आहर के पानी से खेतों की सिंचाई होती थी। लोग मछलियां भी मारते थे। आज आहर है पर सड़क बनाने के लिए सभी पेड़ कट गए हैं। आहर पर एक नया सफेद मंदिर बन गया है। जो स्कूल पेड के नीचे लगता था उसका अब भवन बन गया। वहां मिड डे मील भी मिलता है।

मैं शहरी होकर मिनरल वाटर पीने लगा हूं। पत्नी ने हिदायत थी गांव में जाकर वहां का पानी मत पीना। बीमार पड़ जाओगे। पर नानी के गांव का पानी भला कैसे नहीं पीता। पानी बिल्कुल मीठा है। खूब पानी पीया और बिल्कुल बीमार नहीं पड़ा। हैंडपंप का पानी 30 से 35 फीट पर आ जाता है। गांव के लोग बताते हैं पानी इतना अच्छा है कि खाना आसानी से पच जाता है। इसके सामने बोतलबंद पानी की क्या बिसात। गांव के हर घर से लोग शहर में रहते हैं उन्हें भी गांव का पौष्टिक पानी याद आता है। जून की दोपहरी में हैंडपंप के ठंडे पानी से नहाने में इतना मजा आया कि बस लगता था नहाते ही रहो। हां अब कुएं वो रहंट नहीं चलती जिसके पानी में उछल कूद कर बचपन में नहाया करता था। जब मामा साबुन लगाने की बात करते तो डर कर मचान पर चढ़ जाता था।

गांव के सारे मामा को मैं याद था। मिड्ल स्कूल के हेडमास्टर रामदर्शन भैया, होमियोपैथी के डाक्टर राम सुरेश, भरत मामा, रामजी मामा, फौज से रिटायर होकर आए रामबचन मामा, बसु मामा के मेरी बचपन की सारी बातें याद थीं। सभी सालों से मेरी बाट जोह रहे थे। मैं ही रास्ता भूल गया था। बागीचे आम के पेड़ पर कच्चे आम लटक रहे थे जिन्हें मैं बचपन में ढेला चलाकर तोड़ लेता था। अब ऐसा नहीं कर सकता था पर आम खाने की इच्छा खत्म नहीं हुई। मामा ने लग्गी लगाकर आम तोड़े, हमने मामी से उसकी चटनी बनवाई। ताजे हरे आम की चटनी खाकर मजा  आ गया। अब बस....





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