Wednesday, July 29, 2015

12 मार्च 1993 - जब मुंबई दहल उठी...

12 मार्च 1993 को मुंबई में 13 सिलसिलेवार धमाके हुए जिसमें 257 लोग मारे गए और 700 से ज्यादा लोग घायल हुए। इसी दिन से मुंबई में राष्ट्रीय युवा योजना का राष्ट्रीय शिविर शुरू होना था। इस शिविर में मुझे भी जाना था पर मैं पारिवारिक कारणों से नहीं जा सका। पर मेरे बीएचयू के पांच दोस्त, हाजीपुर से राष्ट्रीय युवा योजना ईकाई से शिवपूजन कुमार की अगुवाई में सात लोगों की टीम गई थी। इस टीम में दो बहनें भी थीं। सोनपुर की रजनी और प्रियंका। जैसे सुबह 10 बजे हाजीपुर के साथियों की ट्रेन मुंबई पहुंची वहां धमाके होने लगे। यहां खास तौर पर लड़कियों के माता पिताओं की चिंता बढ़ गई। वे मेरे पास आए। तब फोन संपर्क का कोई साधन नहीं था। मैं सिर्फ आत्मविश्वास के आधार पर कह पा रहा था कि सभी भाई बहन सुरक्षित हैं। पर मुझे भी नहीं पता था कि वे मुंबई में किस हाल में हैं। उस समय पिताओं को दो दिन बाद एक साथी का फोन आने पर कुशल क्षेम पता चला। इसी समूह में वाराणसी से गए हमारे एएनडी होस्टल के साथी विद्या कुमार चौधरी ने मुंबई धमाके के दिन को याद किया है। पढ़िए... उन्ही की जुबानी....

बॉम्बे धमाका और मैं !

विद्या कुमार चौधरी  ( लेखक इन दिनों बिहार के एक सम्मानित कॉलेज में राजनीति विज्ञान के व्याख्ता हैं)

लगभग 24 घंटे की उबाऊ रेल यात्रा के बाद 12 मार्च 1993 को अपने दो बनारसी मित्रों के साथ मैं विक्टोरिया टर्मिनल स्टेशन पर सुबह 6 बजे पंहुचा। आल इंडिया कम्युनल हारमोनी कैंप में भाग लेना तो एक बहाना था असली मकसद था बॉम्बे घुमना। स्टेशन से कुछ ही दूर एक ख़ाली रेलवे गोदाम में राष्ट्रीय युवा योजना का कैंप लगा था। मैं अपने मित्रों के साथ BHU और बनारस का प्रतिनिधि बनकर गया था। भाई जी यानी सुब्बाराव जी से मिलकर यात्रा की सारी थकान छू मंतर हो गई और हम कैंप की विभिन्न गतिविधियों में शामिल हो गए । कैंप की शुरुआत में सर्व धर्म प्रार्थना हो रही थी शायद ...जब पहला धमाका हुआ........! 


कुछ ही अंतराल में कई धमाके हुए । भाई सुब्बाराव जी ने देश भर से आये लगभग 300 से ज्यादा युवाओं को स्थिति की गंभीरता से अवगत कराया और 10-10 लोगों का 20 ग्रुप बनाने का आदेश दिया। आधे घंटे के अंदर एक ग्रुप का हिस्सा बनकर मैं BSE (शेयर मार्किट) के उजड़े इमारत के सामने खड़ा था। क्या करना चाहिए ये सोच ही रहा था कि NYP का परिचय पत्र देखकर एक एम्बुलेंस वाले ने मुझे बुलाया। एम्बुलेंस के बगल में फायर ब्रिगेड वाले घायलों और लाशों को लाकर रख रहे थे। उसने मुझसे मराठी में कुछ करने को कहा....मेरी दिक्कत समझकर उसने बम्बइया हिंदी में कहा..."मुँह क्या देख रहे हो जो मर गए हैं उन्हें छोड़ दो जो ज़िंदा हैं उन्हें एम्बुलेंस में डालों।"
राजनीति विज्ञानं में स्नातक कर रहे 20 साल के एक लड़के के लिए यह जीवन का सबसे कठिन काम था।लगभग 20 जिन्दगियों का फैसला उस दिन मैंने किया। उनमे से कितने आज जिन्दा हैं मुझे पता नहीं ।लेकिन एक अपराधबोध की आशंका से मैं आज भी ग्रस्त हूँ... उस दिन घायलों को चुनकर एम्बुलेंस में डालने और लाशों को सड़क पर छोड़ने में मुझसे कोई गलती तो नहीं हुई थी ?
शायद कल सुबह से यह अपराधबोध मेरा पीछा छोड़ दे... बॉम्बे धमाके में एक और 'लाश' बढ़ने वाला जो हैं ।


कैंप कैसे पहुंचा -  होली की छुट्टी थी शायद....ज्यादातर लोग घर गए थे। जहाँ तक मुझे याद हैं कैंप में Vidyut Prakash Maurya को जाना था ...लेकिन उसे भी घर जाना था ....इसलिए उसने मुझे भेज दिया था ।  
( विद्या के फेसबुक वाल से साभार)  

(BHU, VARANASI, UTTAR PRADESH, NYP CAMP, MUMBAI ) 

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