Sunday, June 28, 2015

चंपारण में बापू के भितिहरवा आश्रम की ओर

सुबह सुबह मैं नरकटियागंज के पुरानी बाजार के थाना चौक पहुंचता हूं। यहां से कई ग्रामीण क्षेत्रों में जाने के लिए आटो रिक्शा चलते हैं। गवनहा तक जाने वाले आटो रिक्शा भितिहरवा जाते हैं। किराया है 20 रुपये। 
नरकटियागंज से भिखनाठोरी जाने वाली मीटरगेज लाइन पर भितिहरवा आश्रम हाल्ट स्टेशन आता है। पर  रेल सेवा 24 अप्रैल 2015 को बंद कर दी गई है। इसलिए अब आटो ही विकल्प है। पूरी सवारी हो जाने पर आटो चल पड़ा। गांव की सड़के अच्छी हालत में हैं। कुछ हरे भरे गांव के बाद आता है अमोलवा। माधोपुर बैरिया के बाद एक नहर आता है जिसके बाद आ गया भितिहरवा गांव। मैं आटो से उतर जाता हूं। सड़क के किनारे एक इमारत बनी है। महात्मा गांधी शोध संस्थान भितिहरवा।

 साल 2009 में इसके निर्माण में 11 लाख रुपये खर्च किए गए, लेकिन बापू पर यहां कितना शोध हुआ नहीं मालूम। संस्थान में ताला लटक रहा है। यहां से 500 मीटर की दूरी पर है बापू का आश्रम। साल 2014 -15 में आश्रम का जीर्णोद्धार कार्य 61 लाख 65 हजार 774 रुपये की राशि से कराया गया है। बापू की मूल कुटिया के आसपास कई भवनों और प्रदर्शन हॉल का निर्माण हुआ है। आश्रम में बापू के जीवन पर चित्र प्रदर्शनी के अलावा कुछ खास नहीं है। आश्रम की ओर से किसी नियमित गतिविधि का संचालन नहीं किया जाता है। बिल्कुल ग्रामीण इलाके में होने के कारण आश्रम में हर रोज सैलानी भी कम ही आते हैं। बिहार सरकार की ओर से आश्रम में चार कर्मचारी पदस्थापित हैं। पर वे सभी हर  रोज समय से नहीं पहुंचते। आश्रम में कई पुराने शिलापट्ट टूटे फुटे हालात में दिखाई दे रहे हैं।
यह देख निराशा होती है कि भितिहरवा आश्रम की ओर से किसी गतिविधि का संचालन नहीं होता है। अगर आश्रम में के पास या आश्रम के परिसर में कोई कौशल विकास केंद्र खोल दिया जाए तो यहां रौनक बढ़ सकती है वहीं बापू के ग्राम स्वराज से सपनों को भी आगे बढ़ाया जा सकता है।  आश्रम के पास 1986 में स्थापित कस्तूरबा कन्या उच्च विद्यालय है। पर भितिहरवा में कोई बड़ा शैक्षणिक संस्थान नहीं खोला गया जिससे ये गांव चंपारण के मानचित्र में विकास की कुलांचे भर सके।

सावित्रि वर्मा का दर्द... ये कैसे अच्छे दिन आए...
भितिहरवा आश्रम में मेरी मुलाकात 80 की बुजुर्ग महिला सावित्रि वर्मा से होती है। वे स्वतंत्रता सेनानी स्व. सत्यदेव प्रसाद वर्मा की पत्नी हैं। वही सत्यदेव वर्मा जी जिन्होंने 1974 से 1985 तक आश्रम का संचालन किया। सावित्रि वर्मा रोज आश्रम में आकर अपनी सेवाएं निःशुल्क देती हैं। उनके पति की यादें इस आश्रम से जो जुड़ी हैं। पर सावित्रि वर्मा को सरकार से काफी शिकायत है। नवंबर 2014 से उनका पेंशन रुका हुआ है। उन्हें स्वतंत्रता सेनानी की पत्नी होने का पेंशन मिलना चाहिए। वे नौकरी से रिटायर हुईं उसका पेंशन भी रुक गया। उनकी शिकायत है सरकार कहती है कोई एक ही पेंशन मिलेगा। पर पिछले छह माह से एक भी पेंशन नहीं मिल रहा है। सरकारी लालफीताशाही का आलम है कि उनके आवेदन पर अफसर उनकी नहीं सुन रहे। वे दुखी होकर कहती हैं अब क्या स्वतंत्रता सेनानी कटोरा लेकर भीख मांगे। वे पूछती हैं ये कैसे अच्छे दिन आए। अब सरकार स्वतंत्रता सेनानियों को भी सम्मान नहीं देती।

मैं आश्रम की मिट्टी को नमन कर आगे बढ़ता हूं। दो परिवार के लोग अपने वाहन से आश्रम देखने पहुंचे हैं। आश्रम के बाहर चौक पर चाय नास्ते की तीन दुकाने हैं। यहां चाय, दही चूड़ा आदि मिल जाता है। मुझे थोड़े इंतजार के बाद नरकटियागंज जाने के लिए आटो रिक्शा मिल जाता है। नरकटियागंज रेलवे स्टेशन के पूरब तरफ रेलवे गुमटी के पास बेतिया के लिए बस मिल जाती है। चनपटिया होते हुए बस बेतिया शहर पहुंच जाती है। 


क्या थी तीन कठिया प्रथा

चंपारण में 1916 में लगभग 21,900 एकड़ जमीन पर तीनकठिया आदि प्रथा लागू थी। तीन काठिया मतलब एक बीघा में तीन कट्ठा नील की खेती करना अनिवार्य था। चंपारण के किसानों से मड़वन, फगुआही, दषहरी, सट्टा, सिंगराहट, धोड़ावन, लटियावन, शरहवेशी, दस्तूरी, तवान, खुश्की समेत करीब छियालीस प्रकार के अवैध करवसूले जाते थे। 
- vidyutp@gmail.com

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