Saturday, June 27, 2015

भितिहरवा आश्रम – यहां से बापू ने दी ब्रिटिश सत्ता को चुनौती

मोहनदास करमचंद गांधी द्वारा 1917 में संचालित चंपारण सत्याग्रह न सिर्फ भारतीय इतिहास बल्कि विश्व इतिहास की एक ऐसी घटना है, जिसने ब्रिटिश साम्राज्यवाद को खुली चुनौती दी थी।

चंपारण की इस पवित्र धरती को वह गौरव प्राप्त है जहां से महात्मा गांधी ने ब्रिटिश राज को चुनौती दी। इसके साथ ही आधुनिक भारत के इतिहास में गांधी युग की शुरुआत होती है।

1917 का वह साल जब देश के आजादी के आंदोलन के इतिहास के केंद्र में महात्मा गांधी आ जाते हैं। देश में बापू के दो प्रमुख आश्रम हैं अहमदाबाद में साबरमती और महाराष्ट्र में वर्धा। पर भितिहरवा आश्रम का गौरव इन सबसे कई मामलों में ज्यादा है।

भितिहरवा में बापू के हाथों से बनाई गई कुटिया।
दक्षिण अफ्रीका में बापू रंगभेद के खिलाफ आंदोलन कर चुके थे। पर ब्रिटिश राज के खिलाफ कोई उग्र विरोध नहीं किया था। बापू के रंगभेद के खिलाफ आंदोलन की कहानी मीडिया में आई थी। पर देश में कम लोग ही इससे वाकिफ थे। चंपारण में बड़े पैमाने पर नील खेती की जा रही थी। इसमें स्थानीय किसानों और मजदूरों का शोषण हो रहा था।  चंपारण के बड़े किसान राजकुमार शुक्ल चाहते थे कि बापू आकर नील किसानों के आंदोलन का नेतृत्व करें। पर बापू ने दो बार राज कुमार शुक्ल को मना कर दिया था। पर तीसरी बार में उनका आग्रह मान लिया।

27 अप्रैल 1917 का दिन था जब बापू राजकुमार शुक्ल के आग्रह पर पश्चिम चंपारण के भितिहरवा गांव में पहुंचे। भितिहरवा की दूरी नरकटियागंज से 16 किलोमीटर है। बेतिया से 54 किलोमीटर है। बापू यहां देवनंद सिंह, बीरबली जी के साथ पहुंचे। बताया जाता है कि बापू सबसे पहले पटना पहुंचे थे जहां वे डाक्टर राजेंद्र प्रसाद के बंग्ले में रुके थे। वहां से आकर मोतिहारी में रुके।मोतिहारी से बेतिया आए।बेतिया के बाद उनका अगला प्रवास कुमार बाग में हुआ। कुमार बाग से हाथी पर बैठकर बापू श्रीरामपुर भितिहरवा पहुंचे थे। गांव के मठ के बाबा रामनारायण दास द्वारा बापू  को आश्रम के लिए जमीन उपलब्ध कराई गई। 16 नवंबर 1917 को बापू ने यहां एक पाठशाला और एक कुटिया बनाई।
1917 का खुदा वह कुआं जिससे बा और बापू पानी निकालते थे। 

20 नवंबर 1917 को भितिहरवा में कस्तूरबा गांधी,गोरख बाबू, जनकधारी प्रसाद, महादेव बाबू, हरिशंकर सहाय, सोमन जी, बालकृष्णजी और डा.देव का भितिहरवा आगमन हुआ। बापू का यहां रहना ब्रिटिश अधिकारियों को बिल्कुल गवारा नहीं था। एक दिन बेलवा कोठी के एसी एमन साहब ने कोठी में आग लगवा दी। उनकी साजिश बापू की सोते हुए हत्या करवा देने की थी। पर संयोग था बापू उस दिन पास के गांव में थे। इसलिए बच गए। बाद में सब लोगों ने मिलकर दुबारा पक्का कमरा बनाया। जिसकी छत खपरैल है। इस कमरे के निर्माण में बापू ने अपने हाथों से श्रमदान किया। 

आज यह कुटिया मुख्य स्मारक जिसे दूर दूर से लोग देखने आते हैं। इस कमरे में कस्तूरबा द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला जांता देखा जा सकता है। बा इसमें गेहूं पिसाई करती थीं। यहां बापू द्वारा निर्मित टेबल भी है। बापू इस पर पढाई लिखाई करते थे और इसी पर सो भी जाते थे। यहां बापू के पाठशाला की घंटी भी देखी जा सकती है। आश्रम परिसर में 1917 में बना कुआं भी देखा जा सकता है, इस कुएं का इस्तेमाल बापू और कस्तूरबा करते थे।

2 अक्तूबर 1974 तक भितिहरवा आश्रम का संचालन गांधी स्मारक निधि द्वारा होता रहा।  1974 से 30 अक्तूबर 1985 तक इस आश्रम का संचालन स्थानीय मुखिया स्व. मुकुटधारी प्रसाद और स्वतंत्रता सेनानी स्व. सत्यदेव प्रसाद वर्मा द्वारा होता रहा। 31 अक्तूबर 1985 को भितिहरवा आश्रम बिहार सरकार के कला एवं संस्कृति मंत्रालय के तहत आ गया। बिहार सरकार द्वारा हाल में आश्रम परिसर में नए भवनों का निर्माण कर आश्रम को भव्य रुप प्रदान किया गया है।

कैसे पहुंचे – पश्चिम चंपारण में नरकटियागंज जंक्शन भितिहरवा आश्रम से निकटतम बाजार है। नरकटियागंज ने निजी वाहन से या फिर शेयरिंग आटोरिक्शा से यहां पहुंच सकते हैं। नरकटियागंज में पुरानी बाजार के थाना चौक से गवनहा की तरफ जाने वाले आटो रिक्शा भितिहरवा आते हैं। मुख्य सड़क से आश्रम  आधा किलोमीटर पूरब में स्थित है।




10 अप्रैल, 1917 को गांधी जी बिहार की राजधानी पटना पहुंचे  
15 अप्रैल, 1917 को गांधी जी मोतिहारी पहुंचे और गोरख प्रसाद के घर में ठहरे
18 अप्रैल, 1917 को मोतिहारी के जिस अदालत में बापू की पेशी हुई


1 मई, 1918 को गांधी जी के अथक प्रयासों ने अंग्रेज़ सरकार को चंपारण ऐगरेरियन ऐक्ट लागू करने पर मजबूर कर दिया। इसी के परिणाम स्वरूप तीनकठिया लगान हमेशा के लिए खत्म हो गया। 

भितिहरवा आश्रम में लिखा संदेश। 



भितिहरवा आश्रम का प्रवेश द्वार  ( अंदर की ओर से ली गई तस्वीर)



---vidyutp@gmail.com 
( BHITIHARWA,  GANDHI,  CHAMPARAN) 



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