Thursday, June 25, 2015

लौरिया-नंदनगढ़ के बौद्ध स्तूप

बेतिया जिले के लौरिया में अशोक स्तंभ के अलावा एक और ऐतिहासिक दर्शनीय स्थल है नंदनगढ़ का बौद्ध स्तूप। लौरिया चौक से बौद्ध स्तूप बायीं तरफ है। लौरिया बाजार को पार करके गांव के अंदर एक विशाल टीला आता है जहां पर ये स्तूप स्थित है।

1880 में इतिहास सर एलेक्जेंडर कनिंघम ने नंदनगढ़ को ढूंढा। गैरिक ने इसी साल यहां खुदाई कराई। ये बौद्ध स्तूप दूर से देखने में एक विशाल टीले सा नजर आता है। कुछ लोगों का मत है कि ये कोई किला रहा होगा। पर कई इतिहासकारों का कहना है कि किला इतना कम दायरे में नहीं हो सकता। 1880 के खुदाई के दौरान यहां तीन मिट्टी के द्वीप मिले जिस पर अशोक कालीन अभिलेख मिले हैं। 

इतिहासकार स्मिथ के मुताबिक ये बौद्ध अस्थि स्तूप हो सकता है। हालांकि इतिहासकार ब्लाच इसे प्राचीन दुर्ग यानी किला ही मानते हैं।  1935-36 में इतिहासकार एनजी मजूमदार ने इस स्थल पर सिलसिलेवार ढंग से खुदाई कराई जो 1942 तक जारी रही। यहां दो स्तूपों में खुदाई के दौरान राख और आदमी की जली हुई हड्डियां पाई गई थीं। यहां सोने के पत्तर पर बनी हुई देवी की मूर्ति भी मिली थी। ऐसी ही मूर्ति बस्ती जिले के पिपरवा के बौद्ध स्तूप में मिली थी।

खुदाई के दौरान यहां ईंट से बने हुए 24.38 मीटर ऊंचे स्तूप के अवशेष प्राप्त हुए। नंदनगढ़ की संरचना बहुकोणीय है। यह पांच वेदिकाओं के ऊपर अवस्थित है। इसमें तीन वेदियों पर परिक्रमा करने योग्य रास्ता बना हुआ है। दीवार के सामने ईंटो पर शानदार काम किया गया है। बौद्ध स्तूप पर कुल 13 किनारे नजर आते हैं। किले की पूरी संरचना वृताकार है। संरक्षण के लिहाज से इसकी बाउंड्री की गई है। आप पूरे स्तूप का वृताकार परिक्रमा करके नजारा कर सकते हैं। 

प्रवेश के लिए कोई टिकट घर नहीं है। यहां सुबह से लेकर शाम तक जाया जा सकता है। सुबह सुबह मुझे फौज में भर्ती होने वाले नौजवान किले के चारों तरफ दौड़ लगाते हुए नजर आए। मजूमदार इसे बौद्ध स्तूप ही मानते हैं। सिक्के एवं मुद्रांकों से ये पता चलता है ये बौद्ध स्तूप पहली शताब्दी के आसपास बना होगा।

नंदनगढ़ के दो तरफ आम के विशाल बाग नजर आते हैं तो एक तरफ चीन मिल और खेत देखे जा सकते हैं। इतिहास में रूचि रखने वाले लोगों को नंदनगढ़ जरूर पहुंचना चाहिए। बौद्ध स्तूप को चारों तरफ से घूम कर देखा जा सकता है। इसके ऊपर चढ़ने की मनाही है।

कैसे पहुंचे – लौरिया के मुख्य बाजार से यहां तक पैदल या फिर अपने निजी वाहन से पहुंचा जा सकता है। ये स्तूप चीनी मिल के ठीक पीछे स्थित है। लौरिया बाजार से रास्ता पूछते हुए मैं नंदनगढ़ की ओर चला। पूरा बाजार पार करने के बाद पगड़ंडियों वाला रास्ता आता है। दोनों तरफ खेत और आम के पेड़ दिखाई देते हैं। 

नंदनगढ़ के स्तूप की तराई में छोटा सा गांव भी है। लौरिया में ठहने के लिए होटल उपलब्ध नहीं है। पर चाय नास्ता मिल जाता है। आप यहां नास्ते में पूरियां या दही चूड़ा खा सकते हैं।
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( LAURIA NANDAN GARH, BAUDH STUPA ) 


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