Friday, June 19, 2015

कभी डाकू थे अब शांति का संदेश देते हैं....

नेत्रपाल सिंह, कभी चंबल के बीहड़ में आतंक था इनका।

उनका नाम नेत्रपाल सिंह। कभी चंबल के नामी डकैतों में शुमार थे। उनकी बड़ी बड़ी मूंछे आज भी इस बात की गवाही देती है कि जवानी के दिनों में कैसे खूंखार लगते होंगे। गांधीवादी एसएन सुब्बाराव की अगुवाई में सीतामढ़ी में आयोजित राष्ट्रीय एकता शिविर ( 10 से 15 जून 2015) के दौरान उनसे मेरी मुलाकात हो गई। कई पुरानी यादें ताजा हो गई। दरअसल 1995 से 1995 के मध्य चली सदभावना रेल यात्रा में भी वे कुछ दिनों के लिए शामिल हुए थे। अब उम्र 77 पार हो गई है पर जोश उसी तरह कायम है।

नेत्रपाल सिंह गर्व से कहते हैं कि डाकूओं की मंडली में में उन्हें नेत्रा डाकू के नाम से जाना जाता था। कैसे डाकू बने, कितनों को मारा ऐसी बातों पर अब वे ज्यादा चर्चा नहीं करना चाहते। पर वे कहते हैं कि चंबल के बीहड़ में रहने वाले डाकूओं के भी अपने वसूल होते थे। वे हर किसी को नहीं मारते थे। किसी बहु बेटियों की इज्जत नहीं लूटते थे। और हां फिल्मों जैसा डाकूओं को दिखाया जाता है घोडे पर दौड़ते हुए चंबल के बीहड़ के डाकू कभी घोडे पर नहीं दौड़ते थे। 
नेत्रपाल सिंह जब किसी शिविर में आते हैं, देश के अलग अलग राज्यों के युवाओं के परिचय कराने के दौरान सुब्बराव जी नेत्रपाल सिंह का भी परिचय कराते हैं। वे बोलते हैं – हम चंबल से आए हैं...शांति का संदेश लाए हैं। कभी चंबल में डाकूओं का आतंक था। अब शांति है। पर जैसे डाकू चंबल की घाटियों में थे उससे ज्यादा खतरनाक तो अब सभ्य समाज के बीच में चोला बदलकर बैठे हुए हैं। ऐसे डाकूओं से हमें खतरा ज्यादा है।
नेत्रपाल सिंह के साथ जनकपुर में। 
नेत्रपाल सिंह उन 654 डाकूओं की फेहरिस्त में शामिल हैं जिन्होंने 1972 और 1976 में महात्मा गांधी सेवा आश्रम जौरा ( मुरैना) में सरेंडर किया था। वे सुब्बराव जी का बड़ा सम्मान करते हैं। डाकूओं के सरेंडर को लेकर किए गए उनके प्रयासों को याद करते हैं। सरेंडर के बाद वे उत्तर प्रदेश के शिकोहाबाद में रहते हैं। वे कहते हैं कि शिकोहाबाद रेलवे स्टेशन के बाहर मेरा नाम ले लेना, कोई भी मेरे पास पहुंचा देगा। रेल यात्रा के दौरान नेत्रपाल सिंह से मेरी लंबी लंबी बातें होती थीं। कभी गोलियां चलाने वाले नेत्रपाल बातें फेंकने में भी माहिर हैं।

जौरा आश्रम के दौरा के क्रम में मेरी एक सरेंडर डकैत राम सनेही पंडित से मुलाकात हुई थी। वे भी सरेंडर के बाद खेती किसानी में लग गए थे। वहां हमने माधो सिंह, मोहर सिंह की जोड़ी में से मोहर सिंह को भी देखा था। अब दोनों इस दुनिया में नहीं है। पर नेत्रपाल सिंह को राष्ट्रीय एकता शिविरों में आना और देश भर के नौजवानों से मिलना अच्छा लगता है। नई पीढ़ी के युवा भी उनसे मिलकर उनकी जुबां से शांति मैत्री का संदेश सुनकर खुश होते हैं।


नेत्रपाल  ऐसे बने थे डाकू
जनकपुर शिविर में नेत्रपाल सिंह युवाओं के साथ। 
नेत्रपाल के सिर पर कभी 50 से ज्यादा हत्याओं के मुकदमे थे। वे एक समय लाखन गैंग का दायां हाथ थे। कभी चंबल के बीहड़ में उनकी दहशत थी। यूपी जनपद फिरोजाबाद के थाना मखनपुर क्षेत्र के गांव हिम्मतपुर के रहने वाले नेत्रपाल के पिता का नाम अकबर सिंह था। 1954 में हाईस्कूल की परीक्षा पास कर 1955 में सेना में भर्ती हो गए, लेकिन सात माह कि बाद वह सेना की नौकरी छोड़कर आ गए।  वे 1956 में पटवारी बन गए। सन 1958 में गांव के ही एक परिवार ने रंजिशन उनके परदादा की हत्या कर दी। तब नेत्रपाल ने सरकारी नौकरी छोड़ दी और चंबल के मशहूर डाकू लाखन सिंह के गिरोह में शामिल हो गए।

1960 में अपना गिरोह बनाया 
पर पुलिस मुठभेड़ के दौरान 1960 में लाखन सिंह का पूरा गिरोह मारा गया, केवल नेत्रपाल किसी तरह जिंदा बच गए। फिर उन्होंने अपने नाम से एक नया गिरोह बनाया और 18 सालों तक अपने गिरोह कि साथ मिलकर 53 लोगों को मौत के घाट उतारा। वे गर्व से बताते हैं कि गरीबों को सताने वाले 176 साहूकारों के यहां पर डकैती डाली और इस दौरान 87 अपहरण किए। 


दोनों तरफ से चल रही थीं दनादन गोलियां 

नेत्रपाल सिंह एक बार बताते हैं - तीन जून 1976 की दोपहर थी। पुलिस की वर्दी में उनका गिरोह डकैती डालने जा रहा था। उधर से पुत्तन बागी और जगन्ननाथ का गिरोह पुलिस की वर्दी पहनकर आ गया। दोनों गिरोह ने एक-दूसरे को पुलिस मान लिया और मुठभेड़ शुरू हो गई। उधर से गांधीवादी सुब्बाराव आगरा जिले के इसी गांव में बागियों से संवाद करने आए थे। सुब्बाराव इस फायरिंग के बीच एक पेड़ के नीचे बैठ गएजबकि दोनों तरफ से गोलियां चल रही थी। मुठभेड़ के बाद दूसरा गिरोह भाग निकला। तब डाक्टर सुब्बाराव से पूछाउन्हें डर नहीं लगा। तब उन्होंने कहा कि अहिंसा के हथियार में बहुत ताकत होती है। मैंने उसी दिन समझा यह कोई महान आत्मा है। और मेरे मन में सरेंडर करने का विचार आने लगा।

 और बदल गई जिंदगी 

इसी साल 1976 में डॉ. एसएन सुब्बाराव की बातों ने उनके दिमाग को बदलकर रख दिया। इसी साल डॉ. सुब्बाराव के नेतृत्व में 413 डाकुओं का गिरोह उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी से मिला। सरकार ने उनकी सरेंडर संबंधी सभी 20 शर्ते मान लीं। समर्पण के बाद नेत्रपाल सिंह को 10 साल की कैद हुई। जेल काटने के बाद वे 1986 में बरी होकर बाहर आ गए। तब से लोगों को शांति का संदेश देने में जुटे हैं।

नहीं रहे बागी नेत्रपाल सिंह  - साल 2016 के अगस्त महीने में एक दिन मनहूस खबर आई। नेत्रपाल सिंह नहीं रहे। 8 अगस्त 2016 को वे इस दुनिया को छोड़ गए। जीवन के आखिरी दिनों में नौजवानों की तरह सक्रिय नेत्रपाल सिंह बटेश्वर में एक राष्ट्रीय शिविर का आयोजन करवाना चाहते थे। उनकी इच्छा अधूरी रह गई। उन्होंने मुझे कई बार शिकोबाद आने को कहा भी था, पर उनका आमंत्रण भी उनके साथ ही चला गया। नेत्रपाल भाई को श्रद्धांजलि। 
vidyutp@gmail.com  

( BAGI NETRAPAL SINGH, SHIKOHABAD, SUBBARAO )

No comments:

Post a Comment