Wednesday, May 27, 2015

आस्था का केंद्र - पानीपत का देवी मंदिर

पानीपत का देवी मंदिर मराठों का बनवाया हुआ है। हालांकि मराठे पानीपत की तीसरी लड़ाई में पराजित हो गए थे। पर उनका बनवाया हुआ मंदिर श्रद्धालुओं की असीम आस्था का केंद्र है। 1761 के युद्ध में हार के बाद उत्तर भारत की राजनीति में मराठों का प्रभाव कम हुआ लेकिन उन्होंने उत्तर भारत में संस्कृति और लोककला पर गहरा प्रभाव छोड़ा। इस छाप को ऐताहसिक नगर पानीपत में देखा जा सकता है। इस शहर में ऐसे अवशेष मौजूद हैं, जो मराठों और पानीपत के सांस्कृतिक रिश्तों का संकेत देते हैं। 

मराठा सेनापति ने बनवाया देवी मंदिर - पानीपत शहर में मराठों की स्मृति के रूप मे देवी मंदिर भी मौजूद है। इस मंदिर का निर्माण मराठा सेनापति गणपतिराव पेशवा ने करवाया था। देवी मंदिर पानीपत में मराठों के योगदान का एक प्रमाण है। इस मंदिर में मौजूद हरहरेश्वर की प्रतिमा उपसना में मराठों के योगदान का महत्वपूर्ण प्रतीक है। देवी मंदिर में स्थित हरहरेश्वर की प्रतिमा मध्यकालीन भारत में विकसित वास्तु से प्रभावित है।


 भूरे पत्थर से बनी यह प्रतिमा विष्णु और शिव का संयुक्त रूप है। इस प्रतिमा के दाएं भाग में शिव का रूप है। इसके हाथ में त्रिशूल और अक्षमाला है। प्रतिमा का वाम भाग विष्णु का रूप है। इसके हाथ में शंख और चक्र है। प्रतिमा के दाएं नंदी और बाएं गरुड़ बैठे हैं। पंचरथ पर स्थित प्रतिमा के इर्दगिर्द मध्यकालीन प्रतिमाओं की भांति सेविकाएं बनी हुई हैं। इस मंदिर के पास ही गंगाजी का मंदिर भी है। यहां संत महात्मा शिवगिरी की समाधि है। इस समाधि का निर्माण भी गणपतिराव पेशवा ने ही करवाया था। महात्मा शिवगिरी के अध्यात्मिक प्रभाव का वर्णन तजकरा-ए-गौस अली शाह में भी मिलता है।

अग्रवाल समाज का दावा - हालांकि पानीपत का अग्रवाल वैश्य पंचायत यह दावा करता है देवी मंदिर पानीपत में मराठों के आगमन से पहले का है और 16वीं शताब्दी से ही अग्रवाल पंचायत इसका प्रबंधन कर रही है। अग्रवाल समाज का दावा है कि इस देवी मंदिर का निर्माण लगभग 600 वर्ष पूर्व लाला मथुरादास के पूर्वजों द्वारा किया गया था। यह भी दावा है कि यहां पर बना तालाब पहले मथुरादास वाला तालाब के नाम से जाना जाता था और इसमें यमुना नदी का जल आता था।

हालांकि अग्रवाल समाज ने पिछले कुछ सालों में मंदिर के सौंदर्यीकरण के लिए काफी काम किया है। मंदिर का प्रवेश द्वार भव्य बनाया गया है। मंदिर के अंदर भवन को मजबूती प्रदान करने के साथ ही परिसर में हरियाली और साफ सफाई के इंतजामात किए गए हैं। मंदिर परिसर में साधुओं का निवास रहता है। 

सालों भर सूखा रहता है तालाब - आज देवी मंदिर के परिसर में स्थित विशाल तालाब सालों भर सूखा रहता है। हालांकि ये तालाब अत्यंत सुंदर है। तालाब के चारों तरफ टहलने के लिए पथ बना हुआ है। चारों तरफ से तालाब में उतरने के लिए सीढ़िया भी बनी हैं। पर तालाब में पानी नहीं रहता। दशहरे के समय तालाब के अंदर विशाल मेला लगता है। बाकी के साल तालाब के सूखे क्षेत्र में बच्चे क्रिकेट खेलते हुए नजर आते हैं। वास्तव में इस तालाब को जीवित करने की आवश्यकता है। 

अगर ये तालाब जिंदा हो गया तो इसका सौंदर्य और बढ़ जाएगा। इस हालात में तालाब के जल में बोटिंग आदि के इंतजाम भी किए जा सकते हैं। कई बार प्रतीत होता है मानो ये तालाब अभिशिप्त है। कहा जाता है कि पानीपत की तीसरी लड़ाई के समय इस तालाब में पानी के आने का इंतजाम था। ये पानी यमुना नदी से नहर बनाकर लाया गया था। इस तालाब में मराठा रानियां स्नान किया करती थीं। तालाब के ही पानी से मराठा सेना का भोजन आदि बनाया जाता था।


इस तरह का एक सूखा हुआ तालाब जालंधर शहर के बीच भी है। अपेक्षाकृत छोटा ये तालाब भी सालों भर सूखा ही रहता है। इसी के नाम पर जालंधर में सूखा तालाब मुहल्ला है। पर हमें जरूरत है देश के किसी भी शहर में ऐसे तालाब को हम जीवित करें। पानीपत के लोगों को इस तालाब को जिंदा करने की कोशिश करनी चाहिए। 
vidyutp@gmail.com

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