Wednesday, April 29, 2015

ओझर के विघ्नहर गणपति (अष्टविनायक)

महाराष्ट्र के अष्ट विनायक मंदिर में सबसे लोकप्रिय मंदिरों में है ओझर के गणपति। इन्हें विघ्नहर के नाम से पुकारा जाता है। ये मंदिर ककड़ी नदी के सुरम्य तट पर स्थित है। मंदिर के आसपास सालों भर मेले जैसा माहौल बना रहता है। पहले ओझर जाना हमारी सूची में नहीं था,पर हमारे एसयूवी के ड्राईवर साहब आखिरी पड़ाव में हमें यहां लेकर आ गए।

ओझर के विघ्नहर गणपति का मंदिर का सभागृह 10 फीट लंबा और 10 फीट चौड़ा है। जबकि सभागृह 20 फीट लंबा है। अन्य मंदिरों की तरह यहां भी विघ्नेश्वर का मंदिर भी पूर्वमुखी है। 

यहां एक दीपमाला भी है जिसके पास द्वारपाल खड़े हैं। विघ्नेश्वर की मूर्ति पूर्वमुखी है और साथ ही साथ सिन्दूर औए तेल से संलेपित है। इनकी आंखों और नाभि में हीरा जड़ा है जो गणपति को और भी सुंदर बनाता है। मूर्ति के पीछे रिद्धी और सिद्धी की मूर्तियां देखी जा सकती हैं। ये मंदिर 1833 का बना हुआ है।

कथा - मंदिरों की तरह इस मंदिर के पीछे भी एक मनोरंजक पौराणिक कथा है। कहा जाता है राजा अभिनंदन ने त्रिलोक का राजा होने के लिए यज्ञ शुरू किया। इस दौरान विध्नासुर राक्षस काफी उत्पात मचा रहा था। ऋषि मुनियों ने विघ्नासुर के वध के लिए तब गणेश जी से विनती की। विध्नासुर डर कर गणपति के शरण में गया और उसने अपनी हार मानते हुए आग्रह किया कि यहां जब आपकी पूजा हो तो आपके साथ मेरा भी नाम लिया जाए। 1785 में इस मंदिर में चिमाजी अप्पा ने सोने का कलश चढ़वाया।
नारियल फोड़ने के लिए बिजली से चलने वाली मशीन
मंदिर परिसर में पूजा के लिए हाइटेक इंतजाम है। पहली  बार मैंने यहां नारियल फोड़ने के लिए बिजली से चलने वाली मशीन देखी। ये मशीन मंदिर के पीछे परिक्रमा मार्ग पर लगाई गई है। मंदिर के आसपास छोटा सा सुंदर बाजार भी है। यहां खाने पीने की अच्छी  दुकाने हैं। आप महाराष्ट्रियन थाली के अलावा दक्षिण भारतीय व्यंजन का भी आनंद ले सकते हैं।

रहने का सुंदर इंतजाम - ओझर में श्रद्धालुओं के रहने का सुंदर इंतजाम है। यहां एक समय में 3000 लोगों के रहने का इंतजाम किया गया है। सबसे कम महज 35 रुपये में श्रद्धालु डारमेटरी सिस्टम में ठहर सकते हैं। वहीं 250 से लेकर 350 रुपये में आप डबल बेड के बेहतर कमरों में ठहर सकते हैं।

महा प्रसाद योजना -  मंदिर ट्रस्ट की ओर से रियायती दर पर प्रसाद ( भोजन) का भी इंतजाम है। ये योजना 2004 से चल रही है।इसका समय – 10 से 1 शाम 7.30 से 10.30 तक है। आने वाले श्रद्धालु इसका लाभ उठा सकते हैं।

अष्ट विनायक के दर्शन करने आने वाले श्रद्धालु के रात्रि ओझर में विश्राम जरूर करते हैं। मंदिर आने वाले श्रद्धालु रंग बिरंगे सजे हुए वाहन में यहां पहुंचते हैं। ऐसा ही बिजली से झालरों से सजा हुआ एक बस हमें यहां मंदिर परिसर में दिखाई दिया। मंदिर के बगल में बहने वाली नदी सुंदर जलाशय का निर्माण करती है। इस जलाशय के निर्मल जल में बोटिंग का भी इंतजाम है।

कैसे पहुंचे -  ओझर पुणे जिले की जुन्नर तहसील में पड़ता है। ये मंदिर ककड़ी नदी के मनोरम तट के किनारे स्थित है। नासिक रोड पर जुन्नर से पहले नारायण गांव से ओझर की दूरी 12 किलोमीटर है। नारायण गांव या जुन्नर तक बस से पहुंचे। वहां से निजी ये शेयरिंग वाहनों से ओझर पहुंचा जा सकता है।  ओझर अष्ट विनायक मंदिर की वेबसाइट -  http://shrivighnaharganpatiozar.org/home.html

http://www.varadvinayak.com/Ashtavinayak_Temples_Vigneshwar_Ozhar.aspx
 
ओझर में ककड़ी नदी का किनारा। 

( OZHAR, GANPATI, VIGHNAHAR ) 

Monday, April 27, 2015

लेण्याद्रि की बौद्ध गुफाएं और गणपति

पुणे नासिक रोड पर जुन्नर कस्बे के पास ऐतिहासिक लेण्याद्रि की गुफाएं हैं। यहां कुल 321 खड़ी सीढ़ियां चढ़कर गुफाओं तक पहुंचना पड़ता है। यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से संरक्षित स्मारक है। यहां प्रवेश के लिए 5 रुपये का टिकट खरीदना पड़ता है। दूर से ही लेण्याद्रि की गुफाएं अति सुंदर दिखाई देती हैं। 

आसपास के हरे भरे खेतों में अंगूर की खेती होती दिखाई देती है। लेण्याद्रि गांव कुकड़ी नदी के किनारे स्थित है। लेण्याद्रि में कुल 28 गुफाएं हैं। कहा जाता है इन गुफाएं में बौद्ध भिक्षु रहा करते थे। हालांकि इन गुफाओं में से सिर्फ दो में ही जाने का बेहतर रास्ता है। एक गुफा में स्तूप बना है। जबकि दूसरी गुफा में गणेश जी का मंदिर है। ये गुफाएं काफी हद तक देखने में एलोरा की गुफाओं जैसी ही लगती है।

लेण्याद्रि के गुफाओं तक पहुंचने के लिए कुल 321 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। ये चढ़ाई थोड़ी मुश्किल है। बुजुर्ग लोगों के लिए यहां भी पालकी का इंतजाम है।


रास्ते में सीढ़ियों पर बड़ी संख्या में बंदर हैं जो आते जाते लोगों के सामान की तलाशी लेते हैं। अगर आप सावधान नहीं हैं तो आपका पर्स लेकर फरार हो सकते हैं। अगर आपके पास खाने का कोई सामान है तो बिना लाग लपेट के उन्हें सौंप दें। वर्ना खैर नहीं।

 लेण्याद्रि के गिरिजित्मज गणपति। 
अष्टविनायक का मंदिर – लेण्याद्रि के गणेश जी की गिनती महाराष्ट्र के अष्ट विनायक गणपति में होती है। इन गणपति को गिरिजित्मज नाम से पुकारा जाता है। गिरिजात्मज यानी गिरिजा ( पार्वती) के पुत्र। कहा जाता है इन्ही पहाड़ों पर कभी पार्वती जी निवास करती थीं। यहीं कुंड में वे स्नान कर रही थीं। तभी शिव जी पार्वती जी से मिलने पहुंचे। बाल गणेश ने उनका रास्ता रोका और गुस्से शिवजी ने उनका सिर काट दिया। बाद गणेश जी की सच्चाई पता चलने पर उन्हे हाथी का सिर लगाया गया। यहां श्रद्धालुओं को वह कुंड दिखाया जाता है जहां पार्वती जी स्नान करती थीं।

 इस स्थान का नाम जीर्णपुर या लेखन पर्वत भी मिलता है। यहां गणेश का देव स्थान गुफाओं ( लेणी) के बीच है इसलिए इसका नाम लेण्याद्रि रखा गया। कहा जाता है गणेश जी को पुत्र के रूप में प्राप्त करने के लिए पार्वती ने 12 वर्षों तक कठोर तप किया था। इसके बाद भाद्रपद की चतुर्थी तिथि को गणेश जी पुत्र के रूप  प्रकट हुए। यह भी कहा जाता है कि लेण्याद्रि की आठवीं गुफा में जो गणेश जी की प्रतिमा है वह स्वंभू प्रकट हुई है। ये गुफा 53 फीट लंबी और 51 फीट चौड़ी है

लेण्याद्रि - 321 सीढ़ियां नहीं चढ़ सकते तो पालकी है ना...
यहां गणेश जी ने 15 साल तक बाल लीला की थी। यहां उन्होने कई दैत्यों का संहार भी किया था। जिस गुफा में गणेश प्रतिमा है वहां कोई प्रसाद नहीं चढ़ता। यहां पहुंच कर आप गुफा के अंदर बैठकर शांति से ध्यान कर सकते हैं। मंदिर में गणेश प्रतिमा दक्षिण मुखी है। मंदिर की गुफा में सूर्योदय से सूर्यास्त तक उजाला रहता है। लेणयाद्रि की गुफा के नीचे कुछ दुकाने हैं जहां आपको चाय नास्ता आदि मिल जाता है। श्रद्धालुओं के लिए पेयजल और शौचालय आदि का भी प्रबंध है। गाड़ियों के लिए पार्किंग का भी इंतजाम है।

कैसे पहुंचे - जुन्नर तहसील से लेण्याद्रि की दूरी 7 किलोमीटर है। पुणे शहर से कुल दूरी 120 किलोमीटर है। पुणे से नारायण गांव होते हुए लेण्याद्रि पहुंचा जा सकता है। लेण्याद्रि जाने के क्रम में आप जुन्नर या फिर ओझर में रात्रि विश्राम कर सकते हैं। नासिक से दूरी 140 किलोमीटर है जबकि अहमदनगर से 100 किलोमीटर है।
http://www.ashtavinayak.in/girijatmak.html  

( LENYADRI, PUNE, MANCHAR, OJHAR GANPATI ) 

Saturday, April 25, 2015

शिवनेरी - यहां हुआ था शिवाजी का जन्म

हमलोग भीमाशंकर के बाद पहुंचे हैं शिवनेरी किले में। यह किला महान योद्धा शिवाजी से जुड़ा हुआ है। छत्रपति शिवाजी यानी महाप्रतापी हिंदू सम्राट। शिवाजी का जन्म हुआ था महाराष्ट्र के शिवनेरी के किले में। शिवाजी के पिता शाहू जी महाराज बीजापुर के सुल्तान आदिलशाह की फौज में जनरल थे। उन्हें हमेशा युद्ध पर रहना पड़ता था, लिहाजा उन्होंने गर्भ के दौरान अपनी पत्नी जीजाबाई को सुरक्षित स्थल पर रखने का इंतजाम किया।  इसके लिए सबसे मुफीद जगह शिवनेरी का किला था। यहां पर शिवाजी का जन्म 19 फरवरी 1630 को हुआ। एक ऐसा प्रतापी सम्राट जिसने अपने जीवन काल में दक्षिण पश्चिम भारत के 40 किलों को जीता।

कहा जाता है कि शाहू जी महाराज ने शिवनेरी के किले मे सात दरवाजों का निर्माण कराया। शिवनेरी के किले में ही शिवाजी का बचपन गुजरा। किले के अंदर ही खेलते कूदते शिवाजी बड़े हुए। अपने जीवन का जो भी सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान था उन्होंने यहीं पर प्राप्त किया। 

अपनी माताजी से और अपने प्रशिक्षकों से। किले के अंदर शिवाई देवी का मंदिर है। इस देवी के नाम पर शिवाजी का नाम बचपन में शिवाबा रखा गया। किले के मध्य में एक तालाब है जिसका नाम बादामी तालाब है। किले के  मध्य में अंबरखाना नामक जगह है जहां कभी अनाज का भंडार हुआ करता था।

किले का इंतजाम महाराष्ट्र पर्यटन देखता है। किले के अंदर जगह जगह हरियाली से भरे उद्यान बनाए गए हैं। मार्ग में पेयजल का इंतजाम किया गया है। किले के अंदर गर्मी में आपको नींबू पानी बेचने वाले भी मिल जाएंगे। पर किले पर चढ़ाई का मार्ग आसान नहीं है। कहीं सीढ़ियां तो कहीं उबड़ खाबड़ रास्ते। सबसे ऊपरी स्थान पर पहुंचने का रास्ता थोड़ा मुश्किल भरा है। यहां तक पहुंचते हुए समान्य आदमी की सांसे फूलने लगती हैं। 

 पुणे शहर से 85 किलोमीटर दूर इस किले की ऊंचाई 300 मीटर है। किला एक त्रिकोणात्म पहाड़ी पर स्थित है। किले में सुरक्षा के लिए सात दरवाजे बनाए गए हैं। इन द्वारों के नाम देखिए- हत्ती दरवाजा, गणेश दरवाजा, पिराचा दरवाजा, मैणा दरवाजा आदि। पांचवे दरवाजे में हाथियों को रोकने के लिए नुकीली कीलें लगाई गई हैं। किले के अंदर दो तालाब हैं जिनके नाम गंगा और यमुना हैं। हालांकि किले में अब कुछ ही इमारतें बची हैं। एक अस्तबल और टूटी फूटी मस्जिद देखी जा सकती है। पर किले को देखकर ये अंदाजा लगाया जा सकता है, कि ये इमारत कभी कितनी सुरक्षित और बुलंद रही होगी।

कभी ये किला सातवाहन राजाओं के अधीन था। शिवनेरी पहली से तीसरी शताब्दी के दौरान बड़ा बौद्ध केंद्र  था। शिवनेरी के तीनों तरफ पहाड़ में गुफाओं के अवशेष मिलते हैं। सातवहान के बाद ये किला यादव (शीलाहर्ष) और बहमनी और  मुगलों के अधीन रहा। 1599 में किला शिवाजी के दादा मालोजी भोसलें को दिया गया। शिवाजी को अपने शासन काल के दौरान ये किला मुगलों को दे देना पड़ा, जिसे वे अपने जीवन में वापस नहीं ले सके।

कैसे पहुंचे – शिवनेरी पहुंचने के लिए पुणे से बस या अपने वाहन द्वारा जुन्नर पहुंचे। शिवनेरी का किला महाराष्ट्र के पुणे जिले में जुन्नर कस्बे से दो किलोमीटर की दूरी पर है।

किले के मुख्य द्वार के पास वाहन पार्क करके आप किले पर चढाई कर सकते हैं। शिवनेरी के विशाल किले में प्रवेश के लिए कोई टिकट नहीं है, पर सभी आगंतुकों के नाम पते दर्ज किए जाते हैं। यह किला महाराष्ट्र के राज्य सरकार के पुरातत्व विभाग की ओर से संरक्षित है। जिन लोगों की इतिहास में रुचि है और ट्रैकिंग के शौकीन हैं उन्हें यहां आकर जरूर मजा आएगा। किले के अंदर खाने पीने को कुछ नहीं मिलता। अपना पानी और कुछ पेट पूजा की सामग्री साथ रखें तो अच्छा रहेगा। 
शिवनेरी - शिवाजी का किला । 


( SHIVNERI, SHIVAJEE, PUNE, MANCHAR ) 


Thursday, April 23, 2015

डमरू वाले देवता शिव का भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग (06)

( 12 ज्योतिर्लिंग में छठा) 

शिव के 12 ज्योतिर्लिंग में से तीन महाराष्ट्र में पड़ते हैं। नासिक के पास त्रयंबकेश्वर, औरंगाबाद के पास  घुश्मेश्वर और पुणे के पास भीमाशंकर। पुणे से भीमाशंकर जाने का रास्ता अत्यंत मनोरम है।

भीमाशंकर के मार्ग में आपको सह्याद्रि क्षेत्र की हरियाली के पग पग पर दर्शन होते हैं। ये महाराष्ट्र के सबसे समृद्ध इलाकों में गिना जाता है। यहां वसुंधरा का सबसे खूबसूरत रूप देखने को मिलता है। मंचर के बाद से तो पहाड़ी रास्ता शुरू हो जाता है। छोटी छोटी नदियां और जंगल आते हैं रास्ते में।

भीमाशंकर मंदिर एक छोटे से गांव में हैं जो तीन तरफ से घने जंगलों से घिरा हुआ है।  किसी समय में भीमाशंकर में रात में रुकना संभव नहीं था। पर अब भीमाशंकर में भी आवासीय व्यवस्था बन चुकी है। शाम को देर हो गई तो यहां भी रुका जा सकता है। मंदिर के पास बस स्टैंड
, कार पार्किंग, आवासीय होटल आदि का इंतजाम है। भीमाशंकर न सिर्फ आस्था का स्थल है बल्कि मनोरम वातावरण के कारण ट्रैकिंग करने वालों को भी पसंद है। बड़ी संख्या में पक्षी प्रेमी भी यहां पहुंचते हैं। 


शिव का 12ज्योतिर्लिंग में भीमाशंकर छठे नंबर पर है। डाकिन्या भीमाशंकर मतलब डमरू वाले देवता का मंदिर। डमरु वाले तो हैं ही शिव। भीमाशंकर ग्राम पंचायत भोरागिरी, तहसील खेड जिला पुणे में पड़ता है। मंदिर इतनी ऊंचाई पर है कि यहां से संपूर्ण कोंकण क्षेत्र का नजारा दिखाई देता है। किसी समय में यहां आना मुश्किल हुआ करता था। जंगली जीव ज्यादा दिखाई देते थे। पर पहाड़ियां वन औषधियों से भरी हुई हैं। मंदिर परिसर में आपको तमाम तरह की वन औषधियों की दुकानें मिल जाएंगी।

इस मंदिर के इतिहास के बारे में कहा जाता है कि शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध करने के लिए भीमकाय शरीर धारण किया। इसलिए उनका नाम भीमाशंकर पड़ गया।

भीमा नदी का उदगम -  शिव युद्ध के बाद थकान मिटाने के लिए शिवजी सहयाद्रि के उस ऊंचे स्थान पर विश्राम करने लगे। तब उस समय उनके शरीर से पानी का प्रवाह निकला जिससे भीमा नदी का उदगम हुआ। मंदिर के बगल में ही भीमा नदी का उदगम स्थल देखा जा सकता है। भीमा नदी रायचूर जिले में कृष्णा नदी में जाकर मिल जाती है। 



पूरा मंदिर काले रंग के पत्थरों से बना हुआ है। इस मंदिर के शिखर का निर्माण कई प्रकार के पत्थरों से किया गया है। यह मंदिर मुख्यतः नागर शैली में बना हुआ है। मंदिर में कहीं-कहीं इंडो-आर्यन शैली की झलक भी देखी जा सकती है।
मंदिर परिसर से भी पहाड़ों का सुंदर नजारा दिखाई देता है। पेशवाओं के दीवान नाना फडणवीस ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। साथ ही मंदिर के पास दो कुंड बनवाए। पुणे के चिमणजी नाइक ने मंदिर के पास एक सभामंडप का निर्माण कराया। मंदिर परिसर में विष्णु की दशावतार की मूर्तियां भी देखी जा सकती हैं।

प्रसाद में पेड़ा -  मंदिर परिसर में प्रसाद के रुप में शुद्ध घी में बना हुआ पेड़ा मिलता है। श्री क्षेत्र भीमाशंकर संस्थान मंदिर की व्यवस्था देखता है। आप दिए गए दान की रसीद ले सकते हैं। मुख्य मंदिर के प्रवेश द्वार पहुंचने के बाद आपको मंदिर के  गर्भगृह तक जाने के लिए सैकड़ो सीढ़ियां उतरनी पड़ती है। सालों भर मंदिर परिसर  में श्रद्धालुओं की ज्यादा भीड़ नहीं होती, पर सावन में और शिवरात्रि के समय भीड़ बढ़ जाती है।


कैसे पहुंचें -  श्रीक्षेत्र भीमाशंकर की पुणे से दूरी 120 किलोमीटर है। पुणे के शिवाजी नगर बस स्टैंड से भीमाशंकर के लिए बस सेवा है। सुबह में चलने वाली बस 4 घंटे लगाती है भीमाशंकर पहुंचने में। आप सुबह चलकर भीमाशंकर दर्शन करके शाम को पुणे वापस लौट सकते हैं। वैसे भीमाशंकर का निकटवर्ती बड़ा बाजार पुणे नासिक हाईवे पर मंचर है। मंचर में रहने के लिए अच्छे होटल और खाने पीने की सुविधा उपलब्ध है। मंचर से भी भीमाशंकर की दूरी 65 किलोमीटर है। अगर नासिक की तरफ से आ रहे हैं तो मंचर से पहले नारायण गांव से ही भीमाशंकर जा सकते हैं। अगर आप पुणे से अपनी गाड़ी लेकर चलें तो ज्यादा अच्छा रहेगा।
भीमाशंकर- भीमा नदी का उदगम स्थल। 
( JYOTIRLINGAM, TEMPLE, SHIVA, BHIMA SHANKAR, PUNE ) 
 


Tuesday, April 21, 2015

और चेन्नई एक्सप्रेस से हम पहुंचे पुणे

हमारी औरंगाबाद से आगे बढ़ने की बारी थी। मुंबई जाने वाली जनशताब्दी एक्सप्रेस सुबह 6 बजे औरंगाबाद शहर से खुल गई। हम नियत समय पर कल्याण पहुंच गए। अगली ट्रेन से देर से थी सो बाहर निकलकर थोड़ी से पेट पूजा की। कल्याण रेलवे स्टेशन का विस्तार काफी लंबा चौड़ा है। वापस आकर कर्जत की तरफ जाने वाली लोकल ट्रेन पकड़ी। थोड़ी देर बाद हम नेरल में थे। नेरल से माथेरन। दो दिन बाद माथेरन से फिर नेरल वापस। आगे हमें जाना था कर्जत। पर नेरल में दोनों बार माधवी को यहां की गरमी बरदाश्त नहीं हुई। खैर हम कर्जत पहुंच गए। यहां से पुणे जाने के लिए सिंहगढ़ एक्स्प्रेस शाम को 4 बजे के बाद थी। हम उसी ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। तभी चेन्नई एक्सप्रेस के आने की घोषणा हुई। ये ट्रेन पुणे में सिंहगढ़ एक्स से पहले पहुंच जाएगी।
 हमने अनादि को कहा, इंजन के बाद जनरल डिब्बा आएगा। उस पर नजर रखो अगर उसमें बैठने लायक जगह हुई तो हम इसी ट्रेन में घुसने की कोशिश करेंगे। संयोग से जहां हम खड़े थे वहीं इंजन के बाद वाला डिब्बा आकर लगा।
 ट्रेन चेन्नई जा रही थी पर इसके जनरल डिब्बे में सम्मान जनक जगह थी। हम कर्जत में इस ट्रेन में सवार हो गए। तब याद आया कि चेन्नई एक्सप्रेस नाम की फिल्म बन चुकी है और काफी लोकप्रिय हुई थी। तो क्या यह शाहरुख खान दीपिका पादुकोण वाली ही चेन्नई एक्सप्रेस है। अनादि ने कहा नहीं पापा सिर्फ नाम ही मिलता है।  ये फिल्मी ट्रेन नहीं ये तो असली चेन्नई एक्प्रेस है। 11027 अप चेन्नई एक्सप्रेस मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनस से दोपहर दो बजे डीजल लोको के पावर से चलती है। इसमें गुंतकल तक डीजल इंजन ही लगा रहता है। इसके आगे चेन्नई तक इसे इलेक्ट्रिक लोको लेकर जाता है।

चेन्नई एक्सप्रेस लोनावाला की पहाड़ी वादियों के बीच सिंह गर्जना करती हुई आगे बढती जाती है। खिड़की से सह्याद्रि की हरी भरी वादियां नजर आती हैं। पिंपरी चिंचवड के बाद ट्रेन पुणे में प्रवेश कर जाती है। तभी ट्रेन खड़की नामक स्टेशन पर रुक जाती है। ये पुणे का बाहरी इलाका है। ठहराव सिर्फ एक मिनट का है। मैं अपने दोस्त अभय को तुरंत फोन मिलाकर पूछता हूं...तुम्हारा घर खड़की से पास है क्या..वह बताता है हां...बस हम तुरंत ट्रेन से उतर जाते हैं। हमारा डिब्बा सबसे आगे है। स्टेशन के मुख्य भवन से काफी आगे। पर सामने 10 कदम पर सड़क नजर आती है और वहां खड़े दो आटो रिक्शा। एक आटो रिक्शा हमें महज 10 मिनट में पुराने दिनों के साथी अभय के घर पहुंचा देता है जो बोपोडी में रहते हैं। हम समय से एक घंटे पहले घर पहुंच गए। थैंक्यू चेन्नई एक्सप्रेस।

अभय कुमार के साथ, शिवनेरी, शिवाजी के किले में । कभी हमलोग बीएचयू में साथ साथ थे.....

( CHENNAI EXPRESS, RAIL, MUMBAI, PUNE ) 

Sunday, April 19, 2015

पहाड़ों के देवता - माथेरन का पिसरनाथ मंदिर

माथेरन में मुख्य बाजार से आगे पैदल चलते हुए हमलोग घने जंगलों में पहुंच जाते हैं। रास्ते में होलीक्रास चर्च मिलता है। ये कैथोलिक चर्च है जो 1853 का बना हुआ है। 1906 में इस  चर्च का पुनर्निमाण कराया गया।

 जंगल के रास्ते में लाल मिट्टी वाली पगडंडी और दोनों तरफ ऊंचे ऊंचे पेड़। रास्ते में जगह जगह बंदर हैं। इनसे बचने के लिए अनादि ने एक डंडा ले लिया है। आगे पीछे लोग आते जाते नहीं दिखाई दे रहे हैं। सो अनादि को थोड़ा थोड़ा डर भी लगता है। हम सही रास्ते पर जा तो रहे हैं। मैं कहता हूं कि पगडंडी अगर बनी है तो लोग आते जाते भी होंगे। एक जगह जाकर दो रास्ते दिखाई देते हैं।

हमारे होटल में मौजूद एक स्थानीय सज्जन ने कहा था कि दाहिनी तरफ का रास्ता लिजिएगा। हमारी मंजिल थी शॉरलेट लेक। माथेरन की खूबसूरत झील। चलते चलते पानी का एक स्रोत नजर आया तब लगा कि हम झील के पास पहुंच गए है। पर हमें झील के बगल में एक बोर्ड नजर आया लिखा था - पिसरनाथ मंदिर।



पिसरनाथ मंदिर माथेरन मुख्य बाजार से दो किलोमीटर दूर घने जंगलों के मध्य शिव जी का अनूठा मंदिर है। मंदिर समुद्र तल से 2516 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। इस मंदिर में आकर अदभुत शांति का एहसास होता है। ये माथेरन का अति प्रचीन मंदिर है। मंदिर का सुंदर सा प्रवेश द्वार बना है। लाल रंग की दीवारों वाला मंदिर का भवन जंगल में बड़ा ही मनोरम लगता है। मंदिर का भवन  पैगोडा शैली में बना हुआ नजर आता है। मंदिर के अंदर एक बड़ा ध्यान कक्ष बना है। मंदिर के पुजारी जी ने बताया कि यहां स्वंभू शिव हैं। यानी वे खुद प्रकट हुए हैं ठीक उसी तरह जैसे महाबलेश्वर में शिव हैं।
 परंपरागत मंदिरों की तरह यहां शिवलिंग की स्थापना नहीं की गई है। शिवलिंग अंगरेजी के अक्षर एल आकार का है।  शिवजी का श्रंगार सिंदूर से किया जाता है। शिव जी के साथ शेषनाग को स्थापित किया गया है। पुजारी जी की सातवीं पीढ़ी इस मंदिर में पूजा पाठ करा रही है। पिसरनाथ शिव जी की उपनाम है। पिसरनाथ यानी पहाड़ों के देवता। ये माथेरन के लोगों के ग्राम देवता हैं। इस मंदिर के प्रति लोगों में अटूट आस्था है।  ये शिव जी का बड़ा ही सिद्ध मंदिर है। माथेरन के लोगों की शिवजी में काफी आस्था है। मंदिर के अंदर सिर्फ इंसान ही नहीं बल्कि जीव जंतु भी आस्था से से सीस नवाने आते हैं। मंदिर सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुला रहता है। यहां दर्शन के लिए सूर्यास्त से पहले आना ही ठीक रहता है क्योंकि रात्रि में मार्ग में अंधेरा हो जाता है। मंदिर परिसर में पहुंचकर अद्भुत शांति का एहसास होता है। चारों तरफ जंगल और घाटियां मंदिर के वातावारण को और भी आस्थावान बनाते हैं।

हम दोपहर में मंदिर में पहुंचे थे। यहां मंदिर के ध्यान कक्ष में बैठकर थोड़ी देर हमने ध्यान किया। मंदिर के अंदर जाने पर देखा कुछ लोग अनुष्ठान भी करा रहे थे। ध्यान कक्ष कुछ स्वान (कुत्ते) भी मौजूद थे।

पिसरनाथ मंदिर के बगल में शारलेट झील और झील के किनारे दो-तीन दुकानें हैं, जिसमें चाय नास्ता और जूस आदि मिल जाता है। यहां जंगल में मंगल जैसा माहौल नजर आता है। जंगल में चलते चलते आप थक गए हैं तो यहां थोड़ी से पेट पूजा भी कर सकते हैं। मंदिर के पास ही इको प्वाइंट है और झील के उस पार लार्ड प्वाइंट है।   
vidyutp@gmail.com

(MATHERAN, PISARNATH TEMPLE, SHIVA ) 

Saturday, April 18, 2015

माथेरन में हर सैलानी को देना पड़ता है प्रवेश शुल्क

पहले टैक्स दें फिर आगे जाएं ...
माथेरन देश में एक ऐसा शहर है जहां हर आने वाले सैलानी को प्रवेश शुल्क देना पड़ता है। आजकल हर बाहरी वयस्क के लिए 50 रुपये और बच्चों के लिए 25 रुपये। ये कर माथेरन गिरिस्थान नगर परिषद वसूलती है। इसके काउंटर रेलवे स्टेशन और अमन लाज के पास टैक्सी स्टैंड में बने हुए हैं। टैक्स देने के बाद आप अगले कुछ दिन यहां निवास कर सकते हैं। इस कर की राशि को शहर के ररखाव में खर्च किया जाता है। 

महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित माथेरन 800 मीटर से ज्यादा की ऊंचाई पर है। शहर की आबादी महज 7000 है। इसमें बड़ी संख्या में मुस्लिम है। कई पारसियों की कोठियां भी माथेरन में है जो विरान पड़ी रहती हैं। कभी माथेरन मुंबई के अमीर पारसी लोगों का पसंदीदा हिल स्टेशन होता था। आजकल हर मुंबई वासी यहां सुकुन के कुछ दिन बीताने के लिए आना चाहता है। कभी माथेरन में प्रवेश का कर दो रुपये था जो बढ़ते हुए 50 रुपये हो गया। वैसे महाराष्ट्र के एक और हिल स्टेशन महाबलेश्वर में भी 20 रुपये का प्रवेश कर लगता है।


हमारा ठिकाना हुंजर हाउस - माथेरन में हमारा ठिकाना पहले से ही तय था। स्टेजिला डाट काम से आनलाइन बुकिंग करा रखी थी। रेलवे स्टेशन के बदल में हुंजर हाउस। रंगोली के ठीक सामने। यह माथेरन का किफायती होटल है। बाकी ज्यादातर होटल महंगे हैं। कई में खाना नास्ता के पैकेज के साथ बुकिंग होती है। इस होटल के कमरे से खिलौना ट्रेन आती जाती दिखाई देती है। होटल के लान में दो झूले लगे हैं। यहां अनादि देर तक झूलते रहे। 


माथेरन में घूमने लिए कई प्वाइंट हैं। माथेरन बाजार में राम मंदिर और माधवजी पार्क है। माधव जी प्वाइंट पर फोटोग्राफर मुकीम शेख मिले जिन्होने अपने निकॉन कैमरे से हमारी तस्वीरें उतारी। ( फोन – 9423806509) मुकीम लखनऊ के हैं पर माथेरन को अपना ठिकाना बना लिया है। इस पार्क में ढेर से झूले हैं सो अनादि तो यहीं जमे रहना चाहते थे। पर हमलोग आगे चले। खंडाला प्वाइंट 

एलेक्जेंडर होटल के पास एलेक्जेंडर प्वाइंट। जंगलों के बीच से पदयात्रा करते हुए हमलोग पहुंच गए प्राचीन पिसरनाथ मंदिर। शिव का सुंदर सा मंदिर है झील के किनारे। रास्ते में बंदर बहुत हैं सो उनसे बचने के लिए हमने डंडे रख लिए थे। मंदिर के बगल में शॉरलेट लेक है। बारिश में ये झील और सुंदर हो जाती है। इसके बगल में हैं लार्ड प्वाइंट। झील से थोड़ा आगे चलने पर आ जाता है इको प्वाइंट। यहां पर क्रास द वैली के लिए रोपवे लगा है। किराया 300 रुपये प्रति फेरी। हम आगे बढ़ चले। भूख लगी थी सो जंगल में कच्ची कैरी और बड़ा पाव खाया। इसके बाद आइसक्रीम। दोपहर में होटल वापस।




शाम को सनसेट प्वाइंट जाने का कार्यक्रम बना। हां तो सन सेट तो शाम को ही देखेंगे न.. तीन किलोमीटर जंगलों से पैदल रास्ता। रेलवे स्टेशन के बदल में दिवादकर होटल से रास्ता जाता है।

रास्ते में स्टेट बैंक होलीडे होम और अशोक होटल आते हैं। यहां भी खूब बंदर दिखाई देते हैं। पास में मंकी प्वाइंट भी है।
पर सनसेट प्वाइंट पर शाम को सैकड़ो सैलानी जुटते हैं। डूबते हुए सूर्य के सौंदर्य को निहारने। और ये बन जाती है माथेरन की यादगार शाम। अनादि को गोविंद जैसे दोस्त मिल गए। लौटते हुए रात हो जाती है पर जंगलों में रोशन का इंतजाम है। हमें लगा कि 50 रुपये टैक्स का सदुपयोग हो रहा है।


आ अब लौट चलें - तीसरे दिन दोपहर में हमारी माथेरन से वापसी थी। पर टॉय ट्रेन की टिकट के लिए लंबी लाइन लगी थी। एक रेलवे कर्मचारी की मदद से हमें टिकट मिल सका। उनका धन्यवाद। ट्रेन धीरे धीरे नेरल की ओर उतर रही थी और हमारे जेहन मे ढेर सारी मीठी यादें थीं।
vidyutp@gmail.com
( NERAL MATHERAN RAIL -6)

Friday, April 17, 2015

माथेरन में चलता है कोलकाता की तरह हाथ रिक्शा

पूरे देश में सिर्फ कोलकाता ऐसा शहर है जहां हाथ रिक्शा चलता है। पर दूसरा शहर है माथेरन जहां इस तरह का रिक्शा संचालन में है। ऐसे रिक्शा में दो पहिए होते हैं। तीसरे पहिए की जगह एक इंसान इस रिक्शा को लेकर दौड़ता है। चूंकि माथेरन में कोई डीजल वाहन नहीं चलता इसलिए जो लोग पैदल नहीं चल सकते उनके लिए हाथ रिक्शा या घोड़ा विकल्प है।
वास्तव में माथेरन में घूमने के तरीके तीन हैं। घोडे सेहाथ रिक्शा से या फिर पैदल। माथेरन में 450 घोड़े संचालन में हैं और 94 हाथ रिक्शा को लाइसेंस मिला हुआ है। कोलकाता के बाद माथेरन वह दूसरा शहर है जहां आदमी रिक्शा लेकर दौड़ता है। पर हमने माथेरन में पैदल ट्रैक करना तय किया। यहां सुनने में आया कि एक विदेशी सैलानी लड़की कुछ दिन पहले घोड़े से गिर गई और उसका प्राणांत हो गया। अब प्रकृति के नजारे लेने हैं तो पैदल चलने से बेहतर क्या हो सकता है।
पहले दिन शाम हो चुकी थी। लोगों से पूछकर हमलोग शाम को खाने के लिए  रामकृष्ण भोजनालय पहुंचे। गुजराती प्रोपराइटर के इस भोजनालय का खाना सुस्वादु है। हमने यहां पर आर्डर किया पसंदीदा पनीर बटर मसाला और चपाती। सबको पसंद आया।
पर सुबह के नास्ते के लिए हमने केतकर को चुना। यह भी गुजराती भोजनालय है। यहां का मालपुआ बेटे के इतना पसंद आया कि हम हर रोज खाते रहे। चलते समय मालपुआ पैक कराकर भी ले चले। संयोग रहा कि हमारे माथेरन प्रवास के दौरान दो अप्रैल  की तारीख भी आई जो माधवी का जन्मदिन है। तो यहीं पर सेलेब्रेट किया गया जन्मदिन।

 पर माथेरन का मिसल पाव मुझे नुकसान कर गया। इसमें मिर्च मसाला ज्यादा होता है। इससे पेट खराब हो गया, जो अगले कई दिन तक परेशान करता रहा। माथेरन शहर का पानी हमने पहाड़ो का पानी अच्छा होगा समझ कर पी लिया। पर शायद पानी ने भी अपना कमाल दिखाया। बाद में एक जगह पढ़ने को मिला कि बापू को भी माथेरन में आकर मुश्किल हुई थी। पर कई लोगों को माथेरन इतना पसंद आता है कि साल में कई बार आते हैं। खास कर मुंबई वाले।ऐसे ही एक परिवार से हमारी यहां मुलाकात हुई। 

एक आर्किटेक्ट महोदय तो माथेरन के एक भवन में सालों भर रहते हैं और अपने विदेशी क्लाएंट को यहीं से नक्शे बनाकर भेजते हैं। आप माथेरन शहर से कुछ शापिंग करना चाहें तो यहां से चप्पले खरीद कर ले जा सकते हैं। हां माथेरन में होटल के अलावा बड़ी संख्या में होम स्टे भी हैं। काफी लोग अपने घरों में लोगों को ठहराते हैं हालांकि इनका किराया तय नहीं है। सीजन के हिसाब से उतार चढ़ाव आता रहता है।
-        विद्युत प्रकाश मौर्य
(MATHERAN, MAHARASTRA, NERAL, MALPUA, KETKAR, GUJRATI FOOD ) 


Thursday, April 16, 2015

माथेरन - इस शहर में कोई डीजल वाहन नहीं आ सकता

औरंगाबाद मुंबई जनशताब्दी एक्सप्रेस में 
अजंता एलोरा के बाद हमारा अगला पड़ाव था माथेरन। औरंगाबाद से मुंबई मार्ग पर कल्याण। कल्याण से नेरल फिर नेरल से खिलौना ट्रेन का सफर करके हम पहुंचे माथेरन। माथेरन के प्रदूषण मुक्त हिल स्टेशन है। 12072 औरंगाबाद मुंबई जन शताब्दी एक्स्प्रेस सुबह 6 बजे औरंगाबाद के प्लेटफार्म नंबर एक से खुलती है। यह हमें दोपहर से पहले 11.30 बजे कल्याण स्टेशन पर पहुंचा देती है। हमें नेरल जाना है इसलिए छत्रपति शिवाजी टर्मिनस जाने की कोई जरूरत नहीं। कल्याण भी काफी बड़ा और भीड़ भाड़ वाला स्टेशन है। यहां से नेरल के लिए लोकल हर वक्त मिलती है इसलिए हमलोग थोड़ी सी पेट पूजा करने के लिए स्टेशन से बाहर निकल गए। दोपहर का भोजन कल्याण में लेने के बाद हमने नेरल की लोकल ट्रेन ली। करजत पुणे की तरफ जाने वाली हर लोकल ट्रेन नेरल में रूकती है। पर नेरल से हमारी माथेरन की ट्रेन शाम को है। इसलिए यहां हमें कुछ घंटे इंतजार करना पड़ा। 

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 8 अप्रैल 2015 को राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 10 साल से ज्यादा पुराने डीजल वाहनों पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया है । ऐसा आदेश शहर के पर्यावरण को बचाने को ध्यान में रखते हुए दिया गया है। वाहनों की लॉबी हाय तौबा मचा रही है। पर देश में एक ऐसा पर्वतीय शहर है जहां डीजल या पेट्रोल चलित किसी भी वाहन का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित है। महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में है हिल स्टेशन माथेरन जहां किसी तरह का वाहन शहर के अंदर नहीं जाता। शहर की प्राकृतिक आबोहवा को बचाए रखने के लिए इस तरह का फैसला बहुत साल पहले लिया गया था।

जीरो पल्यूशन हिल स्टेशन - माथेरन शहर की सीमा से बाहर अमन लाज के पास पार्किंग में वाहनों को पार्क करके आगे का सफर पैदल करना पड़ता है। माथेरन एशिया का एकमात्र हिल स्टेशन है जहां पर सिर्फ पदयात्रा करके ही चल सकते हैं। इसलिए इसे सैलानी जीरो पल्यूशन हिल स्टेशन कहते हैं। यहां तक की साइकिल भी यहां नहीं चलती। सामान ढुलाई के लिए घोड़े हैं ना। मुंबई से इस हिल स्टेशन की दूरी 100 किलोमीटर है। यहां स्थानीय लोग भी किसी तरह का डीजल पेट्रोल चलित वाहन नहीं रख सकते। इमरजेंसी के लिए सिर्फ शहर में दो एंबुलेंस हैं। अगर कोई नेता या वीआईपी भी शहर में आता है तो वह भी पदयात्रा ही करता है। बूढे और बीमारों के लिए हाथ रिक्शा का विकल्प मौजूद है। सामान ढोने के लिए लोग महिला और पुरुष कुलियों की सेवाएं लेते हैं।

हालांकि शहर के बीचों बीच बाजार तक खिलौना ट्रेन आती है। उसमें डीजल इंजन लगा है। पर्यावरणविद काफी समय से तर्क दे रहे हैं कि इस ट्रेन को बिजली या फिर सीएनजी इंजन से चलाया जाए, जिससे माथेरन में कोई डीजल लोको भी प्रवेश नहीं कर सके। अगर रेलवे ये सुझाव मान लेता है तो आने वाले दिनों में यहां डीजल लोको का आना भी बंद हो सकता है।
वास्तव में हमें इस नन्हें से शहर से सीख लेने की जरूरत है ताकि हम अपने शहर की आबोहवा बचा सकें। वरना हम आने वाली पीढ़ी को क्या जवाब देंगे।

डीजल ईंजन या जनरेटर से जो धुआं निकलता है उसमें बारीक से बारीक ऐसे ऐसे तत्व होते हैं जो आपकी सांस की नली से होते हुए फेफड़े को ख़राब कर देते हैं।  दिल के आस पास दौड़ने वाली धमनियों को कमज़ोर कर देते हैं, दिमाग की कोशिकाओं को बेकार कर देते हैं। कैंसर, पार्किंसन, अलझाईमर, हार्ट अटैक, सांस की तकलीफ़, बिना बात की खांसी, आंखों में जलन जैसी बीमारियां डीजल प्रदूषण से हो सकती है।

बढ़ता जा रहा है खतरा 
80 हजार से भी ज्यादा डीज़ल वाले ट्रक दिल्ली में रोज रात को प्रवेश करते हैं और इसकी हवा खराब कर जाते हैं। 
16 गुना ज़्यादा हो गई है दिल्ली में डीज़ल की खपत बढ़ने से RSPM यानी रेस्पिरेपल सस्पेंडेट पर्टिकुलेट मैटर की मात्रा तय मानकों से।
2020 तक सभी डीज़ल कारों को बैन कर दिया जाएगा फ्रांस की राजधानी पेरिस में

2019 तक हटा देने की कवायद हो रही है हांगकांग में यूरो फोर डीजल गाड़ियों को। 


मनाली के आगे डीजल वाहन नहीं
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के आदेश के मुताबिक पहली मई 2015 से मनाली से रोहतांग जाने वाले डीजल इंजन पर्यटक वाहनों पर प्रतिबंध लगा दिया है। अब पहली मई के बाद केवल पेट्रोल इंजन वाहनों में ही पर्यटक रोहतांग जा सकेंगे। एनजीटी ने यह आदेश रोहतांग दर्रे के आसपास बढ़ते हुए प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए जारी किए हैं।

हिमाचल प्रदेश का पर्यटक सीजन भी मई और जून में यौवन पर रहता है। उस समय मैदानी इलाकों की भीषण गर्मी से राहत पाने के लिए पर्यटक पहाड़ों का रुख करते हैं। एनजीटी के आदेशों से कुल्लू-मनाली के पर्यटन कारोबारियों में हड़कंप मच गया है। कुल्लू में 80 फीसद पर्यटक वाहन डीजल इंजन हैं और 20 फीसद पेट्रोल इंजन हैं। अकेले मनाली में ही पर्यटक वाहनों की संख्या आठ सौ के करीब है। मई व जून में रोजाना रोहतांग के लिए मनाली से ढाई से तीन हजार पर्यटक वाहन आते-जाते हैं। इन आदेशों के बाद डीजल इंजन वाहन संचालकों की चिंता बढ़ गई है।
 ( 21 अप्रैल 2015 को प्रकाशित एक खबर) 


( NERAL MATHERAN RAIL -5)

Wednesday, April 15, 2015

26 गुफाओं में बुद्ध का जीवन और दर्शन


अजंता में आप एक नंबर गुफा से घूमते हुए आगे की ओर बढ़ते हैं। गुफा नंबर 26 अजंता की आखिरी देखने वाली गुफा है। इनमें कई गुफाओं में बौद्ध चैत्यगृह और स्तूप बने हैं तो कई में पेंटिंग हैं। गुफा नंबर 17 में बुद्ध की जातक कथाओं से संबंधित चित्र बने हैं। न सिर् दीवारों पर बल्कि छत पर भी चित्र बनाए गए हैं। आप सारी गुफाएं देखते हुए आगे बढ़ें। कोई छोड़ने का मतलब नहीं बनता। अजंता की गुफा नंबर 27 से 30 तक जाने के लिए कोई रास्ता मौजूद नहीं है। रास्ता बनाया ही नहीं गया। पुरातत्व सर्वेक्षण का स्टाफ इन गुफाओं में रस्सी के सहारे सफाई के लिए जाते हैं। आम दर्शकों के लिए वहां पहुंचना मुश्किल है।

अजंता की कई गुफाओं में प्राकृतिक रोशनी नहीं जाती। यहां पर किसी जमाने में धूप में बड़े बड़े आइने लगाकर रोशनी रिफ्लेक्टर के माध्यम से भेजी जाती थी। पर कुछ साल पहले जापान सरकार ने यहां पर ऐसी एलइडी लाइटें लगवा दी हैं जिनसे मूर्तियों को कोई नुकसान नहीं होता।

बुजुर्ग लोग जो पैदल चलने में थक जाते हैं उनके घूमने के लिए अजंता में पालकी भी मौजूद है। पालकी किराया 1400 रुपये प्रति व्यक्ति है। आपको प्रवेश द्वार पर अजंता के गाइड मिलते हैं तो 300 रुपये या अधिक राशि की मांग करते हैं। आप समूह में हैं तो गाइडकर सकते हैं। अन्यथा आप अजंता का ब्रोशर ले लें। इस ब्रोशर के सहारे भी घूम सकते हैं। हर गुफा के बाहर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से चौकीदार तैनात हैं वे भी गुफा के बारे में बताते हैं। बाद में वे आपसे थोड़ी बक्शीश की अपेक्षा रखते हैं।

अजंता की गुफाएं देखकर लौटने के बाद थक गए हों तो खाने पीने के लिए आपको यहां एमटीडीसी का रेस्टोरेंट नजर आता है। पर ये रेस्टोरेंट ठेके पर चलाया जाता है। यहां खाना काफी महंगा भी है। अगर आप यहां न खाना चाहें तो शटल बस सेवा से वापस आप जब शापिंग प्लाजा पहुंचेंगे तो वहां भी खाने पीने के लिए दो समान्य से होटल हैं। यहां पर हमें मुरली कृष्ण होटल में सिर्फ 50 रुपये की थाली मिल गई, जिसका खाना संतोष जनक था। इस शापिंग प्लाजा से आप मूर्तियां खरीद सकते हैं। थोड़ा मोलभाव करके सस्ते में मूर्तियां खरीदी जा सकती हैं।


अगर आप अजंता में एक दिन से ज्यादा वक्त गुजारना चाहते हैं तो अजंता की गुफाओं से 3 किलोमीटर आगे जलगांव मार्ग पर फर्दापुर गांव में एमटीडीसी का रेस्ट हाउस है, जहां ठहरा जा सकता है। इसके अलावा अजंता से आठ किलोमीटर आगे पहाड़ी पार करने के बाद अजंता गांव में भी एक दो गेस्ट हाउस हैं।

अजंता घूमते समय सावधानियां  अजंता और एलोरा की गुफाओं में फोटोग्राफी करते समय फ्लैश का इस्तेमाल कत्तई नहीं करें। कलाकृतियों के संरक्षण के लिहाज से यहां फ्लैश का इस्तेमाल प्रतिबंधित है। अपने साथ पानी की बोतल लेकर चलें पर खाने पीने की सामग्री नहीं ले जाएं। ये पालीथीन मुक्त क्षेत्र है इसलिए यहां कचरा नहीं फैलाएं।



कर्मचारियों को महीनों से वेतन नहीं  मैं 31 मार्च 2015 को अजंता पहुंचा। गुफाओं में घूमते हुए कई चौकीदारों से बात हुई, पता चला कि इन चौकीदारों की नौकरी अस्थायी है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने सालों से इन्हे स्थायी नहीं किया है। 

ये भारत सरकार के दैनिक मजदूर  हैं। सबसे बुरी बात तो ये है कि इन्हे वेतन 5 से 6 माह बाद मिलता है। इन कर्मचारियों ने बताया कि दिसंबर के बाद से वेतन नहीं मिला है। इसी तरह यहां निजी कंपनी के सुरक्षा गार्ड लगाए गए हैं।
उन्हे भी छह माह बाद वेतन मिल पाता है। जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इनकी कंपनी को चेक जारी करता तब जाकर सुरक्षा गार्डों को वेतन मिल पाता है। भारत सरकार की इस संस्था में जो हो रहा है वह शर्मनाक है।


अजंता में गौतम बुद्ध 
चलों चलें अजंता की सैर करने..

अजंता - दीवारों पर चित्रकारी....





( WORLD HERITAGE SITE)  

( AJANTA, AURANGABAD, BUDDHA, CAVES, WORLD HERITAGE SITE)  




Tuesday, April 14, 2015

गीत गाया पत्थरों ने - अजंता


यहां पत्थरों में सुनाई देता है संगीत। अनवरत संगीत। प्राणों को झंकृत कर देने वाला संगीत। जो अन्यत्र दुर्लभ है। सैकड़ो साल हजारों कलाकारों की अनवरत तपस्या की परिणति है अजंता की गुफाएं।

अजंता की गुफाओं में बनी कलाकृतियों में हजारों शिल्पियों के श्रम और साधना को महसूस किया जा सकता है। यहां पत्थरों से निकलने वाले संगीत को तो यहां पहुंचकर ही महसूस किया जा सकता है। तभी तो अजंता की गुफाएं विश्व के सर्वश्रेष्ठ दर्शनीय स्थलों में एक हैं। दुनिया भर से लाखों सैलानी हर साल अजंता की गुफाओं में शांति
, आध्यात्म और ज्ञान की तलाश में पहुंचते हैं।आप जिस नजरिए से भी देखें आपको कुछ अदभुत दिखाई देगा यहां....  




काफी लोग ताजमहल को देखकर अद्भुत कहते हैं, पर अजंता की गुफाओं को देखने के बाद ये लगता है कि देश का दुनिया में ऐसी नायाब कृति कहीं नहीं हो सकती। वर्गुना नदी के तीन तरफ पहाड़ों की 20 मीटर गहराई तक काट कर गुफाएं बनाई गई हैं जिसमें गौतम बुद्ध का जीवन दर्शन कलाकृतियों और मूर्ति शिल्प में उतारा गया है। ऐसा लगता है मानो पत्थर गीत गा रहे हों। सारी गुफाएं देखते देखते आप आनंदित होते हैं, रोमांचित होते हैं, अचरज करते हैं, कब शाम ढलने लगती है पता भी नहीं चलता। अजंता की 30 गुफाओं का निर्माण पहली शताब्दी से सातवीं शताब्दी के बीच हुआ है। सह्याद्रि की पहाडि़यों पर स्थित इन 30 गुफाओं में लगभग 5 प्रार्थना भवन और 25 बौद्ध मठ हैं। 1819 से पहले ये गुफाएं सैकड़ो साल तक लोगों की नजरों से ओझल रही हैं।

इन गुफाओं की खोज आर्मी ऑफिसर जॉन स्मिथ व उनके दल द्वारा सन् 1819 में की गई थी। वे यहाँ शिकार करने आए थे, तभी उन्हें कतारबद्ध 29 गुफाओं की एक शृंखला नज़र आई और इस तरह ये गुफाएँ प्रसिद्ध हो गई। घोड़े की नाल के आकार में निर्मित ये गुफाएं अत्यन्त ही प्राचीन व ऐतिहासिक महत्त्व की है।


अजंता - गुफा नंबर 21 के इन स्तंभों पर थपकी देने से निकलता है संगीत। 

गीत गाया पत्थरों ने  इऩ गुफाओं का इस्तेमाल भगवान बुद्ध की शिक्षाओं का अध्‍ययन करने के लिए किया जाता था। एक गुफा ऐसी है जिसके स्तंभ को थपकाने पर संगीत की धुन निकलती है। गुफाओं की दीवारों तथा छतों पर बनाई गई ये तस्‍वीरें भगवान बुद्ध के जीवन की विभिन्‍न घटनाओं और विभिन्‍न बौद्ध देवत्‍व की घटनाओं का चित्रण करती हैं। इसमें से सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण चित्रों में जातक कथाएं हैं, जो बोधिसत्व के रूप में बुद्ध के पिछले जन्‍म से संबंधित विविध कहानियों का चित्रण करते हैं। यूनेस्‍को द्वारा 1983 में अजंता को विश्‍व विरासत स्‍थल घोषित किया गया। यह देश का पहला विश्व विरासत स्थल है।

कैसे पहुंचे  औरंगाबाद से अजंता की दूरी 110 किलोमीटर है। औरंगाबाद सेंट्रल बस स्टैंड से नियमित तौर पर जलगांव की तरफ जाने वाली बसें अजंता में रूकती हैं। पर अगर आपको सिर्फ अजंता जाना हो तो जलगांव में रूक कर भी जा सकते हैं। जलगांव से अजंता की दूरी महज 65 किलोमीटर है। अजंता की गुफाओं से पहले अजंता नामक एक गांव आता है। यहां पर एक दो गेस्ट हाउस बने हैं। इस गांव में भी एक किला नजर आता है।


बारिश में जाएं आनंद आएगा  बारिश के दिनों में अजंता का सौंदर्य बढ़ जाता है। आसपास के पहाड़ों से लगातार झरने बह रहे होते हैं। पहाड़ों की हरियाली कई गुना बढ़ जाती है। आप अपने साथ छाता रखें। गुफा के अंदर तो वैसे भी बारिश से बचाव होगा। बाहर का नजारा नयनाभिराम होगा।
अजंता के प्रवेश द्वार के पास सड़क पर कोई मार्क नहीं बना हुआ है। पर जलगांव औरंगाबाद के बीच चलने वाली बसें यहां रूक जाती हैं। गुफा का स्वागत कक्ष शानदार बना है। यहां पर 15 रुपये का शुल्क देना पड़ता है। यहां एक छोटा सा सुंदर सा बाजार है। जहां खाने पीने और उपहार खरीदने की सुविधा है। इस बाजार को पार करने के बाद एक बस स्टैंड आता है। यहां से अजंता के दूसरे प्रवेश द्वार के लिए बसें चलती हैं। 4 किलोमीटर की दूरी का किराया 15 रुपये है। एसी बस का किराया 20 रुपये है। मुख्य द्वार पर दुबारा प्रवेश का टिकट खरीदना पड़ता है। भारतीय लोगों का टिकट 10 रुपये का है। समूह में 5 रुपये का लाइटिंग का टिकट अलग से लेना पड़ता है। गुफाओं के बीच में जगह जगह पेयजल का इंतजाम किया गया है। 
vidyutp@gmail.com
अजंता में बुद्ध। 
अजंता में एमटीडीसी का रेस्टोरेंट 

तो लो हम पहुंच गए हैं अजंता....

     
चलते चलते कुछ खरीददारी हो जाए....

 आगे पढ़िए - अजंता - 26 गुफाओं में गौतम बुद्ध के दर्शन 


   ( AJANTA, AURANGABAD, BUDDHA, CAVES, WORLD HERITAGE SITE)