Sunday, March 29, 2015

कैसे पड़ा दिल्ली नाम

देश की राजधानी दिल्ली। कभी इसका नाम इंद्रप्रस्थ था। कभी शाहजहानाबाद। पर दिल्ली का नाम दिल्ली कैसे पड़ा, इस बारे में कई कहानियां हैं। कहा जाता है कि फारसी शब्द दहलीज से दिल्ली नाम पड़ा। विदेशी इसे भारत की दहलीज मानते रहे। कुछ मानते हैं कि मौर्य सम्राट राजा दिल्लू के नाम से दिल्ली का सफर शुरू हुआ। अंग्रेजों ने तो इसे बिगाड़कर डेल्ही नाम दिया। आज भी इसकी अंग्रेजी की स्पेलिंग बिगड़ी हुई है। दिल्ली के हिसाब से तो DILLI होना चाहिए पर लिखा जाता है DELHI क्यों भला...

कहा जाता है कि दिल्ली का नाम तो दिलेराम उर्फ दिल्लू से बिगड़कर दिल्ली पड़ा। दिलेराम विक्रमादित्य के शासन काल में लगभग 21 वर्षों तक लगातार दिल्ली के राज्यपाल रहे, उन्होंने इसका प्रशासन इतना सुचारु रूप से चलाया कि जनता उनके नाम की ही कायल हो गई। इसी कारण विक्रमादित्य ने खुश होकर इस दिलेराम जाट को दिलराजकी उपाधि से नवाजा था। इनका गोत्र भी ढिल्लों था। याद रहे कभी भी कोई ढिल्लों गोत्री जाट मुस्लिम धर्मी नहीं बना। अधिकतर सिख बने, शेष हिन्दू जाट हैं। हरियाणा में भिवानी जिले के कई गांवों में इस गोत्र के हिन्दू जाट हैं। इसी दिलेराज को लोग इन्हें प्यार और इज्जत से दिल्लू कहने लगे, जिस कारण यह दिल्लू की दिल्ली कहलाई। यह तथ्यों से परिपूर्ण इतिहास सर्व खाप पंचायत के रिकार्ड में भी दर्ज है।

एक अनुश्रुति है कि इसका नाम 'राजा ढीलू' के नाम पर पड़ा जिसका आधिपत्य ईशा पूर्व पहली शताब्दी में इस क्षेत्र पर था। बिजोला अभिलेखों (1170 ई.) में उल्लेखित ढिल्ली या ढिल्लिका सबसे पहला लिखित उद्धरण है। कुछ अन्य लोगों के मतानुसार आठवीं सदी में कन्नौज के राजा दिल्लू के नाम पर इसका नामांकन हुआ है।

वास्तव में इस दिल्ली के दिल्ली का दिल काफी बड़ा है, तभी तो ये हर जगह से आए लोगों को पनाह देती है। खुद में आत्मसात कर लेती है। और बाहरी लोग रंग जाते हैं दिल्ली के रंग में। तभी तो शायर बोल पड़ते हैं – कौन जाए जौक दिल्ली की गलियां छोड़कर.... ( शेख इब्राहिम जौक बहादुर शाह जफर के समकालीन शायर थे) पूरा शेर कुछ इस तरह है-

इन दिनों गर्च-ए-दकन में है बड़ी कद्र-ए-सुखन,
कौन जाए 'जौक' पर दिल्ली की गलियां छोड़कर!


हालांकि कई बार लोगों ने दिल्ली का नाम बदलकर फिर से इंद्रप्रस्थ किए जाने की मांग भी करते हैं पर दिल्ली नाम पूरी दुनिया में फैल चुका है, इसे बदल पाना भला संभव है क्या...

vidyutp@gmail.com

Friday, March 27, 2015

अदभुत, अकल्पनीय, अनिंद्य, अभिराम - मुगल गार्डन

भारत के राष्ट्रपति के निवास स्थान राष्ट्रपति भवन के परिसर में स्थित है मुगल गार्डन। ये बागीचा साल में सिर्फ एक महीने ही आम जनता के लिए खोला जाता है। इसलिए मुगल गार्डन में घूमने का मौका आपको 14 फरवरी से 14 मार्च के बीच ही मिल पाता है। हालांकि वसंत के इस मौसम में फूल शबाब पर होते हैं। इस दौरान ये गार्डन अपने खूबसूरती के चरमोत्कर्ष पर रहता है।

मुगल गार्डन नाम इसलिए है क्योंकि ये मुगल शैली में बनाया गया है। बागों की लोकप्रिय चार बाग शैली। इस शैली का बाग हुमायूं का मकबरा, सफदरजंग का मकबरा, शालीमार बाग आदि में भी देखने को मिलता है। बाग के बीच में रास्ता और पानी की नहरें। मुगल गार्डन में 45 मीटर चौड़ाई वाले दो विशाल लॉन हैं। उद्यान की घास को हर मानसून के पहले हटा दिया जाता है। बारिश के साथ नई घास लगाई जाती है।

उद्यान में चारों तरफ मौलश्री और बकुल के पेड़,  चाइना आरेंज के पेड़, रात की रानी, मोगरा, मोतिया, जूही, गार्डेनिया, हर शिंगार, बागनबेलिया की खुशबू महसूस की जा सकती है।
जब आप मुगल उद्यान में प्रवेश करते हैं तो सबसे पहले आप पहुंचते हैं औषधीय उद्यान में। इस उद्यान में अलग अलग तरह के औषधीय पौधे लगाए गए हैं। यहां इन पौधे का किन बीमारियों में इस्तेमाल होता है इसकी भी जानकारी दी गई है। जैसे मेंथा ( दर्द में इस्तेमाल) लेमन ग्रास, तुलसी और तमाम तरह के पौधे इस उद्यान में लगाए गए हैं।  
बोनसाई गार्डन – इसके बाद आप पहुंच जाते हैं बोनसाई गार्डन में। बोनसाई यानी विशाल पौधों को छोटा रखने की जापानी तकनीक। यहां पर 20 से 40 साल पुराने बोनसाई के पौधे देखे जा सकते हैं जो गमलों में लगे हैं।

म्यूजिकल फाउंटेन – उद्यान में जगह जगह फव्वारे लगे हैं जो शाम होते हैं लोकप्रिय फिल्मी गीतों की धुनों पर जल क्रीड़ा करते नजर आते हैं। हालांकि इन फव्वारों को वृंदावन गार्डन की तरह आप रात की रोशनी में नहीं देख सकते।
वृताकार गार्डन – राष्ट्रपति भवन के पृष्ठ भाग से आगे बढने पर वृताकार गार्डन में आप पहुंच जाते हैं। इस विशाल गोलाकार गार्डन में अलग अलग तरह के फूल लगाए गए हैं। इससे पहले बड़ी संख्या में चाइना संतरे के पेड़ आपका स्वागत करते हैं। इन पर संतरे खूब फले हुए दिखाई देते हैं पर आप इन्हे तोड़ नहीं सकते।


प्राकृतिक आबोहवा वाला नेचर पार्क – यहां पर अलग अलग तरह के पौधे और फूल लगाए गए हैं जिनकी आबोहवा स्वास्थ्यकर है। शरीर के लिए प्राणवायु प्रदान करती है। यहां की बेंच पर आप बैठ गए तो आगे जाने की इच्छा नहीं होती।
नीलम संजीव रेड्डी वीथि – बाहर निकलने वाले मार्ग का नाम दिया गया है नीलम संजीव रेड्डी वीथि। आंध्र प्रदेश के रहने वाले नीलम संजीव रेड्डी अस्सी के दशक में भारत के राष्ट्रपति थे।

प्रणब मुखर्जी पब्लिक लाइब्रेरी – बाहर निकलते समय सफेद रंग का छोटा सा भवन दिखाई देता है प्रणब मुखर्जी पब्लिक लाइब्रेरी। ये पुस्तकालय राष्ट्रपति भवन में रहने वाले परिवारों के लोगो को अध्ययन के लिए बनाया गया है।

यादगारी की खरीददारी – आर्गेनिक तरीके से उगाए गए मसाले यहां से खरीदे जा सकते हैं। महिलाओं के स्व सहायता समूह द्वारा तैयार किए गए इन उत्पादों में हल्दी पाउडर, धनिया पाउडर, मिर्च पाउडर, जीरा आदि उपलब्ध है। इसके अलावा आप राष्ट्रपति भवन की तस्वीरों वाली चाबी रिंग, मैगनेटिक तस्वीर आदि खरीद सकते हैं। राष्ट्रपति भवन की कढ़ाई वाली टोपियां, टी शर्ट और राउंड नेक वाले टी शर्ट भी यहां पर बहुत ही वाजिब दाम पर उपलब्ध हैं। इन उत्पादों को पूरा मुगल गार्डन घूम लेने के  बाद बाहर निकलने से पहले काउंटर पर खरीदा जा सकता है।


मुगल उद्यान का गीत – ये गीत खास तौर पर बच्चों के लिए समर्पित है। गीत की पंक्तियां उद्यान में बच्चों का स्वागत करती हैं।  मुगल उद्यान में अकेले गुलाब की ही 250 से भी अधिक किस्में हैं। मुगल गार्डन की परिकल्पना लेडी हार्डिंग की थी। उन्होंने श्रीनगर में निशात और शालीमार बाग देखे थे, जो उन्हें बहुत पसंद आए थे। वे ऐसा ही उद्यान वायसराय हाउस में बनवाना चाहती थीं।

कैसे पहुंचे - मुगल गार्डन पहुंचने के लिए आप कहीं से भी केंद्रीय टर्मिनल बस स्टैंड पहुंचे। ये गुरुद्वारा रकाब गंज के आगे है। यहां से चर्च रोड होते हुए नार्थ एवेन्यू पहुंचे। यहीं पर राष्ट्रपति भवन के गेट नंबर 35 से मुगल उद्यान के लिए प्रवेश द्वार है। यहां पर पार्किंग की सुविधा उपलब्ध है। अंदर बैगेज और कैमरा लेकर नहीं जा सकते। इन्हें रखने के लिए प्रापर्टी काउंटर यहां बना हुआ है। मुगल उद्यान के अंदर घूमते हुए जगह जगह पीने के पानी के लिए काउंटर और चिकित्सा सहायता के लिए काउंटर खोले गए हैं। प्रवेश के लिए कोई टिकट नहीं है।
 
मुगल गार्डन स्थित वृताकार गार्डन। 
अब सालों भर घूमे राष्ट्रपति भवन – राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सालों भर राष्ट्रपति भवन के अंदर घूमने की सुविधा आरंभ करा दी है। इसके लिए आपको राष्ट्रपति भवन की वेबसाइट पर जाकर बुकिंग करानी पड़ती है। इसमें टाइम स्लाट और तारीख एलाट हो जाता है। प्रवेश शुल्क 25 रुपये है। इसके लिए प्रवेश गेट नंबर 2 या फिर गेट नंबर 37 से है। कई किलोमीटर के दायरे में फैले भारत के राष्ट्रपति भवन में 37 से ज्यादा प्रवेश द्वार हैं।


मुगल गार्डन की कुछ और तस्वीरें - 
हरी हरी घास पर फूलों की शानदार रंगोली 

 
फूल खिले हैं गुलशन गुलशन 

 
दिल को सुकून देते फूल। 



हाल में बना लोटस पौंड। 

Wednesday, March 25, 2015

ओडिशा का अनूठा जैविक उद्यान – नंदन कानन

ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर के बाहरी इलाके में स्थित नंदन कानन उद्यान देश के सुंदरतम चिड़ियाघरों में से एक है। इसके साथ खास बात यह है कि प्राकृतिक वन क्षेत्र में ये जैविक उद्यान बनाया गया है। कुल 990 एकड़ में फैला नंदन कानन पार्क देश का अनूठा चिड़ियाघर है। भुवनेश्वर शहर से 20 किलोमीटर दूर चंदका के जंगलों के एक हिस्से को प्राणी उद्यान में परिणत किया गया है। इस उद्यान की स्थापना 1960 में हुई। यह देश का पहला जू है जो वर्ल्ड एसोशिएशन ऑफ जू एंड एक्वेरियम का सदस्य है।

सफेद बाघों का निवास -  नंदन कानन सफेद बाघों के लिए प्रसिद्ध है। यहां सफेद बाघ 1980 से निवास कर रहे हैं। यहां पर घड़ियालों का भी प्रजनन किया जा रहा है। 1991 से यहां टाइगर सफारी की भी शुरूआत की गई। यहां आप पेंगोलिन और माउस डियर को भी देख सकते हैं। जैविक उद्यान क्षेत्र में राष्ट्रीय महत्व का कांजिया लेक भी स्थित है। नंदन कानन जू के नाम पर अब दिल्ली से ओडिशा के लिए एक ट्रेन चलने लगी है नंदन कानन एक्सप्रेस।

वैसे तो नंदन कानन देखने के लिए भुवनेश्वर में रहकर जाना बेहतर है। ऐसे कार्यक्रम में आप दिन भर नंदन कानन में गुजार सकते हैं। जो सैलानी जगन्नाथ पुरी घूमने जाते हैं। वे अक्सर भुवनेश्वर, कोणार्क और नंदन कानन पार्क घूमते हैं। पुरी से आरंभ होने वाले दिन भर के बस पैकेज टूर में आप नंदन कानन भी घूम सकते हैं। इसमें टूरिस्ट बस के सैलानी तकरीबन दो घंटे ही नंदन कानन की सैर कर पाते हैं।
मुझे 1991 के अपने ओडिशा दौरे की याद आती है। पुरी से हम श्रीराम बस सर्विस में सवार हुए थे। हमारे गाइड जिनका अब मुझे नाम याद नहीं आ रहा है, बडी रोचकता से स्थानों का परिचय करा रहे थे। उन्होंने कहा कि वे नंदन कानन की सैर में गाइड करने के लिए अंदर भी आपके साथ रहेंगे। हमलोग जैविक उद्यान के अंदर प्रवेश करने ही वाले थे कि मेरी सबसे छोटी नन्ही बहन रूठ गई। मैं थक गई हूं अब और नहीं चल सकती। सब लोग आगे बढ़े जा रहे थे। काफी समझाने पर भी वह चलने की तैयार नहीं हुई। थक तो मैं भी गया था इसलिए गोद उठाने में आलस आ रहा था। खैर बहन को गोद उठाना ही पड़ा। हम नंदन कानन के अंदर। गाइड महोदय ने एक हाथी से मिलवाया। वह हाथी उनके हर आदेश को मानता था। हाथी गाने पर डांस करके दिखाता था। नमस्ते करता था। अपने सूंड से पानी निकालकर फेंकता था। गाइड महोदय के कहने पर हाथी ने मेरी एक बहन को चूम लिया। यह मेरी बहन को पसंद नहीं आया। वह घर आने पर महीनों उस कपड़े से दूर रही जिसे हाथी ने चूमा था।
अब नंदन कानन जैविक उद्यान में सुविधाएं और भी बढ़ गई हैं। यहां पर झील में नौकायान यानी बोटिंग का भी आनंद उठाया जा सकता है।

प्रवेश का समय - नंदन कानन जैविक उद्यान में आप सुबह 8 से 5 बजे के बीच जा सकते हैं। ( अक्तूबर से मार्च) शेष काल में 7.30 से 5.30 तक।  हर सोमवार को पार्क बंद रहता है। अब इसे पालीथीन मुक्त जोन घोषित कर दिया गया है। साथ ही यहां बाहरी खाद्य पदार्थ लेकर आना भी मना है। अगर आप समूह में पिकनिक मनाने जाना चाहते हैं तो नंदन कानन प्रशासन उसके लिए आपको मामूली शुल्क पर सुविधाएं प्रदान करता है।  http://www.nandankanan.org/

ऐसा है नंदन कानन

126 प्रजातियों को जानवर है यहां
202 बाड़ों में रखा गया है जानवरों को
812 पक्षी और 134 रेप्टाइल ( सरीसृप) भी देखे जा सकते हैं।
32 विदेशी प्रजाति के जानवर भी हैं यहां

- vidyutp@gmail.com ( NANDAN KANAN ZOO, ODISHA, WHITE TIGER ) 



Saturday, March 21, 2015

सेकेंड क्लास में डबल डेकर ट्रेन फ्लाइंग रानी एक्सप्रेस

मुंबई सूरत की लाइफ लाइन है ये डबल डेकर ट्रेन

नाम है फ्लाइंग रानी एक्सप्रेस। गुजरात के व्यासायिक शहर सूरत को देश की औद्योगिक राजधान मुंबई से जोड़ती है। इसलिए ट्रेन में भीड़ भी खूब होती है। फ्लाइंग रानी देश की पुरानी रेलगाड़ियों में से एक है। ये 1906 से भारतीय रेल की पटरियों पर उड़ान भर रही है। ये वाकई सूरत के लोगों के दिल की रानी है। विश्व युद्ध के दौरान इसका सफर कुछ दिनों के लिए बाधित जरूर रहा था। पर कई दशक से ये सूरत के लोगों को महबूब ट्रेन है।


सुबह सुबह मैं सूरत रेलवे स्टेशन पर उतरा तो सामने के प्लेटफार्म पर फ्लाईंग रानी खड़ी थी। ट्रेन के खुलने में अभी 25 मिनट का समय था। सुबह 5.25 बजे फ्लाइंग रानी ( 12922) मुंबई के लिए टेक आफ करती है। मेरे पास समय था बुकिंग काउंटर पता करके वहां पहुंचा और फ्लाइंग रानी से बिलिमोरा जाने की टिकट ले आया। 

फ्लाइंग रानी की खास बात है कि ये देश की एकमात्र ऐसी रेलगाड़ी है जिसमें सेकेंड क्लास का डबल डेकर कोच लगा है। ट्रेन में कुल 12 डबल डेकर नान एसी कोच लगे हैं। इनमें हर कोच में 138 लोगों के बैठने की जगह है। यानी समान्य सीटिंग कोच से ज्यादा। पर इन डबल डेकर कोचों की बनावट कुछ अलग है। दोनों तरफ के दरवाजे जनरल डिब्बों की तरह बड़े हैं। दरवाजे के बाद स्टैंडिंग स्पेस काफी है। जहां लोकल सवारियां खड़े खड़े भी सफर करती हैं। इसके बाद नीचे के तल के लिए कुछ सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं। 

वहीं उपर के तल पर जाने के लिए कुछ सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। छतों की ऊंचाई थोड़ी कम है इसलिए लंबे लोगों को थोड़ी दिक्कत हो सकती है। भीड़ हो जाने पर फ्लाइंग मेल के कोच में थोड़ी घुटन सी महसूस होती है। 12 कोच में सीटिंग के लिए आरक्षण होता है। छोटी दूरी का सफर है इसलिए फ्लाइंग रानी के डबल डेकर डिब्बों को देखना और उसमें सफर करना सुखद है। ट्रेन के हर कोच में फ्लाइंग रानी का टाइम टेबल चस्पा किया गया है।


वैसे फ्लाइंग मेल में दो वातानुकूलित कोच, 1 फर्स्ट क्लास का कोच और तीन जनरल श्रेणी के कोच हैं। जनरल श्रेणी वाले कोच भी डबल डेकर हैं। मुंबई की ओर से चलने वाली फ्लाइंग रानी शाम को 5.35 में सूरत के लिए रवाना होती है। हालांकि फ्लाइंग रानी नाम की ही फ्लाइंग रानी है इसकी औसत स्पीड किसी मेमू ट्रेन के बराबर ही है। सूरत मुंबई के बीच 263 किलोमीटर का सफर ये 4 घंटा 40 मिनट मे तय करती है। रास्ते में ट्रेन के स्टापेज भी किसी पैसेंजर ट्रेन की तरह ही हैं।

आजकल देश में कई मार्गों पर एसी डबलडेकर ट्रेन चलाई जा रही है। दिल्ली जयपुर, चेन्नई बेंगलुरु, अहमदाबाद मुंबई मार्ग पर एसी डबल डेकर ट्रेनें चलती हैं। पर देश में डबल डेकर ट्रेन 1980 के दशक में मुंबई पुणे मार्ग पर चलाई गई थी। सिंहगाड एक्सप्रेस में सेकेंड क्लास के डबल डेकर कोच लगाए गए थे। पर कुछ सालों बाद इन कोचों को हटा लिया गया।


Thursday, March 19, 2015

…और बड़ौदा तक पहुंची नैरो गेज रेल

एक जुलाई 1880 को नैरो गेज लाइन दभोई से चलकर गोया गेट ( बड़ौदा) तक पहुंची। हालांकि इस लाइन के लिए सर्वे काफी पहले 1860 में ही कर लिया गया था। बीबी एंड सीआई कंपनी ने 1878 में गोया गेटतक लाइन बिछेन की तैयारी की। दभोई से बड़ौदा के बीच नैरो गेज लाइन बिछाने में 1 लाख 31 हजार 652 रुपये का खर्च आया। इस रेलवे लाइन को बिछाने की ठेका मोहनलाल बेचारदास एंड कंपनी को दिया गया। 24 जनवरी 1881 को इस लाइन का विस्तार विश्वामित्री रेलवे स्टेशन तक किया गया। वहां पर ब्राडगेज और नैरोगेज की लाइनें आपस में मिलती थीं। तब गोया गेट कमाई वाला रेलवे स्टेशन था। पहले ही साल 1881 में इस स्टेशन से 51 हजार 164 रुपये की कमाई हुई।

25 मार्च 1919 को गोया गेट ( बड़ौदा) में नैरो गेज के लिए एक वर्कशाप की स्थापना की गई जिसका नींव पत्थर वायसराय लार्ड चेम्सफोर्ड ने रखा था। 1881 में इस नैरो गेज नेटवर्क पर 2 लाख 72 हजार लोग सफर कर रहे थे, जो उस समय के लिए शानदार था। 1923-24 में विश्वामित्री रेलवे स्टेशन ब्राडगेज से जुड गया। तब नैरो गेज और ब्राडगेज के बीच सामान और यात्रियों का आदान प्रदान आसान हो गया। 1930 में जीबीएसआर ( गायकवाड बड़ौदा स्टेट रेलवे) के पास 5927 नैरो गेज वैगन का स्टाक था।

गोया गेट बना प्रतापनगर - प्रतापनगर रेलवे स्टेशन का पुराना नाम गोया गेट हुआ करता था। 24 जनवरी 1881 को गोया गेट से विश्वामित्री खंड के बीच नैरो गेज की पटरियां बिछाई गईं। बड़ौदा शहर में पानी गेट की तरह गोया गेट दूसरा महत्वपूर्ण इलाका हुआ करता था। विश्वामित्री नदी शहर के बीचों बीच बहती है। गोया गेट और जंबुसार के बीच रेल मार्ग पर विश्वामित्री दूसरा स्टेशन है।
गायकवाड बड़ौदा स्टेट रेलवे (जीबीएसआर)
साल 1921 से पहले गुजरात में नैरो गेज नेटवर्क का संचालन बीबी एंड सीआई नामक कंपनी करती थी। बीबी सीआई यानी बांबे बड़ौदा सेंट्रल इंडिया रेलवे कंपनी का गठन 1855 में हुआ था। हालांकि रेलवे लाइन का निर्माण बड़ौदा स्टेट ने ही किया था पर संचालन और रख रखाव का काम बीबी एंड सीआई कंपनी देखती थी। ऐसा प्रतीत होता है कि कंपनी ऑपरेशन के नाम पर बड़ी राशि वसूलती थी। इसलिए कंपनी अक्सर घाटा दिखाती थी। बडौदा रियासत के अत्यंत प्रगतिशील और दूरदर्शी महाराजा सयाजी राव -3 ने नैरो गेज नेटवर्क में आमलूचल बदलाव का फैसला लिया। उनके समय में गोया गेट वर्कशाप, रेलवे कालोनी, जीबीएसआर का दफ्तर आदि का निर्माण हुआ।

एक अक्तूबर 1921 को इसका संचालन महाराजा बड़ौदा के संपूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी गायकवाड बड़ौदा स्टेट रेलवे ( जीबीएसआर) ने ले लिया। बीबी एंड सीआई कंपनी जहां हर साल नैरो गेज नेटवर्क को घाटे में चला रही थी वहीं जीबीएसआर के हाथ में कमान आने के बाद आश्चर्यजनक बदलाव आया। छह हजार तक सालाना घाटे में चलने वाली रेलवे लाइन पहले ही साल 91 हजार के लाभ में आ गई। वहीं नैरो गेज सिस्टम का कुल लाभ बढ़कर 1.59 लाख सालाना हो गया। 1921 में जीबीएसआर के पास 267.83 मील का नैरो गेज रेल नेटवर्क था। पर 1922 में नैरोगेज नेटवर्क की लंबाई बढ़कर 341 मील हो गई। 1940 में जीबीएसआर के पास 355 मील का नैरोगेज नेटवर्क मौजूद था।

साल 1940 में गुजरात का ये नैरो गेज नेटवर्क 8 लाख 28 हजार का शुद्ध लाभ दे रहा था। स्टीम इंजन से चलने वाली नैरोगेज की ट्रेनों की औसत स्पीड 18 से 20 किलोमीटर प्रति घंटे हुआ करती थी। 1930-40 के दशक में ये नैरो गेज नेटवर्क कपास ढुलाई का बहुत बड़ा माध्यम हुआ करता था। रेलवे की कमाई का बहुत बड़ा हिस्सा कपास की ढुलाई से आता था। आजादी के बाद 1949 में जीबीएसआर का विलय बीबी एंड एसआई में दुबारा हो गया। 1951 में बीबी एंड सीआई कंपनी भारतीय रेल में समाहित हो गई। इसके बाद गुजरात का नैरो गेज नेटवर्क भारतीय रेलवे के पश्चिमी रेलवे जोन का हिस्सा बन गया।  
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Wednesday, March 18, 2015

धन्य किहिन विक्टोरिया जिन्ह चलाईस रेल

धन्य किहिन विक्टोरिया जिन्ह चलाईस रेल, मानो जादू किहिस दिखाइस खेल... हिंदी के प्रसिद्ध कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र की पंक्तियां गुजरात के प्रतापनगर रेल संग्रहालय के बाहर लिखी हुई नजर आती हैं।  और भारतेंदु हरिश्चंद्र की ही लिखी गई नए जमाने की मुकरी भी यहां नजर आती है - पैसे लेके पास भगावे, ले भागे मोहि खेले खेल, का सखि साजन,  ना सखि रेल।

वास्तव में दुनियामें रेलगाड़ियों के विकास की कहानी जादू भरी है। वडोदरा के प्रतापनगर में बना ये संग्रहालय नैरो गेज के विकास की दास्तां बयां करता है। इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है कि गुजरात में ही देश की पहली नैरो गेज रेल चली और कभी देश का सबसे बड़ा नैरो गेज नेटवर्क गुजरात में हुआ करता था।  प्रतापनगर में इस रेल संग्रहालय का उदघाटन 27 जनवरी 1997 को रेलवे बोर्ड के सदस्य कार्मिक (रेलवे) वीके अग्रवाल द्वारा किया गया।

यहां जानकारी दी गई है कि नैरो गेज ट्रेनों की शुरुआत यूरोप में कोयला के खानों में हुई। पर बाद में ये सवारी ढोने के लिए भी लोकप्रिय हो गई। जब बड़ौदा के महाराजा ने दभोई और मियागाम के बीच पहली नैरो गेज रेलवे लाइन बिछाई तो देश के दूसरे महाराजाओं ने भी उनका अनुशरण किया। रेलवे ने आम जनमानस पर काफी प्रभाव डाला, जो रेलगाडियों पर लिखी गई कविताओं , लोकगीतों और कहानियों में दिखाई देता है। 

गुजरात का दभोई 19वीं सदी का महत्वपूर्ण व्यापारिक शहर था। वहां से महुआ, कपास, गल्ले आदि का व्यापार होता था। यह धातु के काम, बुनाई के काम और लकड़ी के सामानों के लिए भी जाना जाता था। महाराजा बड़ौदा को ख्याल आया कि इस शहर को बड़ौदा मुंबई रेल मार्ग से जोड़ा जाए। इसी को ध्यान मे रखते हुए दभाई मियागाम के बीच नैरोगेज रेलवे लाइन बिछाने की योजना बनी। 26 मार्च 1860 को बड़ौदा के रेजिडेंट ने गवर्नमेंट ऑफ मुंबई के चीफ सेक्रेटेरी को एक खत लिखा जिसमें उन्होंने बड़ौदा रियासत में रेलवे लाइन बिछाने की जरूरत बताई। पत्र में कहा गया कि महाराजा खंडोराव रेलवे लाइन बिछाने की इच्छा रखते हैं। इसके लिए 2 फीट 6 इंच वाले गेज का चयन किया गया। हालांकि पहला प्रस्ताव इंटौला को बडौदा से जोडने का था लेकिन 1862 में दभोई को मियागाम से जोडा गया। पर इस रेलवे लाइन पर कोच को बैल खींचते थे। 

1863 में लंदन टाइम्स ने अपने संस्करण में विशेष खबर प्रकाशित की, जिसमें इस बात का जिक्र था कि भारत में बड़ौदा के प्रिंस ने अपने खर्च पर भारत में पहली नैरो गेज रेल नेटवर्क का निर्माण किया जिसे बैल खींचते हैं। बैल से खींचे जाने वाले यात्री कोच में 12 लोगों के बैठने का इंतजाम था। इसका कोच 4 पहियों वाला था। इसमें यात्री कोच के साथ मालगाड़ी के छोटे डिब्बे भी जोडे जाते थे। दो बैलों की जोड़ी चार कोच को आराम से खींचती थी। पर बैलों से चलने वाली ये रेलवे लाइन ज्यादा लंबा सफर नहीं कर सकी।

नैरो गेज ट्रेन के लोकोमोटिव के साथ महाराजा बड़ौदा। 
महाराजा मल्हार राव ने दभोई मियागाम लाइन को दुबारा नए सिरे से बनवाने का उपक्रम शुरू किया। इस बार इसे स्टीम इंजन से चलाने की योजना पर काम हुआ। इसके लिए पटरियां बदली गईं। यह भारत के नैरो गेज के इतिहास में ऐतिहासिक दिन था। 8 अप्रैल 1873 को स्टीम लोकोमोटिव से चलने वाले नैरोगेज रेल मार्ग का संचालन दभोई और मियागाम के बीच हुआ। पहले दिन दिनों में इस रेल मार्ग से महज 57 लोगों ने यात्रा की और 1267 मन माल की ढुलाई हुई। अगले हफ्ते यात्रियों की संख्या बढ़कर 244 हो गई। माल की लदान में भी बढ़ोत्तरी हुई। इस तरह रेलवे लाइन लोकप्रिय होने लगी और कमाई में भी इजाफा होने लगा।

 तब निचले दर्जे का किराया 4 पाई प्रति मील और उपर के दर्जे का किराया 8 पैसे प्रति मील था। एक यात्री गाड़ी में कुल 212 लोग सवार हो सकते थे। गाड़ी की अधिकतम स्पीड 8 मील प्रति घंटा हुआ करती थी। वहीं माल ढुलाई की दर 8 पैसे से 40 पाई प्रति मील थी। माल ढुलाई की दर अलग अलग सामान के लिए अलग थी। सबसे कम दर गल्ले और नमक आदि के लिए रखी गई थी।
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Tuesday, March 17, 2015

बड़ौदा शहर में भी है काशी विश्वनाथ मंदिर

वैसे तो काशी विश्वनाथ मंदिर वाराणसी में है। पर इससे मिलते जुलते नाम के कई शहरों में और भी मंदिर बने हैं। गुजरात के बड़ौदा शहर में भी एक काशी विश्वनाथ मंदिर बना है। नाम है काशी विश्वनाथ मंदिर पर इसका डिजाइन पहले ज्योतिर्लिंगम वाले सोमनाथ मंदिर से अभिप्रेरित है। इस मंदिर का निर्माण बड़ौदा राजघराने की ओर से करावा गया। मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है कि यहां शिव के साथ विष्णु की भी पूजा होती है। देश में ऐसे बहुत कम मंदिर हैं जहां शिव के साथ विष्णु की भी पूजा होती हो।
गायकवाड महाराजाओं की काशी विश्वनाथ में बड़ी आस्था थी इसलिए उन्होंने अपने राजमहल के पास काशी विश्वनाथ नाम से मंदिर का निर्माण कराया। बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण बड़ौदा के महाराजा काशीराव गायकवाड (1832 – 1877) ने करवाया। वे महाराज सयाजीराव गायकवाड (तृतीय) के पिता थे। मंदिर पीले रंग में रंगा है। दीवारों पर नक्काशी अदभुत है। मुख्यद्वार के ऊपर शिव (नटराज) की नृत्य मुद्रा में सुंदर प्रतिमा लगी है। इसके नीचे गुजराती में ओम श्री काशी विश्वनाथ महादेवाय नमः लिखा है।  मंदिर के गर्भगृह के ऊपरी दीवार पर विष्णु की लेटी हुई प्रतिमा बनी है। उनकी नाभि से कमल का फूल निकल रहा है। पूरे परिसर में जगह जगह दीवारों पर नृत्यरत प्रतिमाएं बनीं हुई है।। मंदिर परिसर में शिव के सवारी नंदी की सुंदर प्रतिमा है। मंदिर को देखकर गायकवाड घराने के राजाओं की कलात्मक अभिरूचि का पता चलता है। मंदिर का परिसर सुंदर और मनोरम नजर आता है। जगह जगह श्रद्धालुओं के बैठने के लिए बेंच लगाई गई हैं।

गुजरात में भरूच के पास चांदोद में भी नर्मदा तट पर एक काशी विश्वनाथ का मंदिर बना है। वैसे काशी विश्वनाथ का एक मंदिर उत्तराखंड के उत्तर काशी में भी है। बड़ौदा के स्थानीय लोगों में काशी विश्वनाथ को लेकर गहरी आस्था है। सावन के सोमवार और महाशिवरात्रि के मौके पर मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।

कैसे पहुंचे – वडोदरा का काशी विश्वनाथ मंदिर नवापुरा में जवाहरलाल नेहरू मार्ग पर स्थित है। इसे लालबाग रोड के नाम से भी जाना जाता है। रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी 4 किलोमीटर है।
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( JYOTIRLINGAM, TEMPLE, SHIVA) 



सयाजीराव गायकवाड का बड़ौदा शहर

गुजरात का बड़ौदा शहर। अब इसका नाम बदलकर कागजों में वडोदरा हो गया है। पर ऐतिहासिक रुप से ये बड़ौदा है। लोग आम बोलचाल में उच्चारित करते हैं बरोदा। तो आप वडोदरा और बड़ौदा को एक ही समझें। बड़ौदा मैं पहुंचा दूसरी बार तो नेशनल हाईवे नंबर आठ से मुंबई की ओर से। बाइपास पर अजवा में टैक्सी ने उतार दिया। अजवा के बारे में पता चला कि यहां गायकवाड महाराजा द्वारा बनवाया गया विशाल जलाशय है। इस जलाशय से कभी बड़ौदा शहर को पानी की सप्लाई होती थी। अजवा जलाशय अपने समय का जल संचय का सुंदर प्रयास था। आज ये जलाशय पर्यटन का केंद्र बन चुका है। अजवा जलाशय कभी शहर से बाहर हुआ करता था। पर धीरे धीरे शहर विस्तार लेता जा रहा है। अब अजवा शहर के बाहरी हिस्से में आ चुका है।

आटो वाले को बड़ौदा जंक्शन चलने को कहता हूं। वह बोलता डाइरेक्ट जाना है या शेयरिंग में। शेयरिंग में तीस रुपये। थोड़ा मोल जोल पर 20 रुपये में तैयार हुआ। पहला इलाका आया कमला नगर। उसके बाद पानी गेट। मुझे लगता है कभी यहां अजवा जलाशय से आने वाली पानी की नहर का दरवाजा रहा होगा इसलिए इस इलाके का नाम पानी गेट है। इसके बाद हम पहुंच जाते हैं तिलकनगर एमजी रोड होते हुए बड़ौदा के व्यस्त बाजार में। मांडवी। ये नाम बचपन से सुनता आया हूं। बैंक ऑफ बड़ौदा का मुख्यालय है मांडवी में। बैंक की स्थापना बड़ौदा महाराजा ने ही की थी। वैसे आईसीआईसीआई बैंक का पंजीकृत मुख्यालय भी बड़ौदा में ही है। मांडवी शहर का व्यस्त बाजार है। समझो बड़ौदा शहर का दिल है। मांडवी सर्किल बड़ा चौराहा है। यहां से कई जगह के लिए रास्ते जाते हैं। शहर का मुख्य शापिंग एरिया। खूब भीड़ और चिलपों वाला इलाका। 

यहां एक सरोवर में शिव की विशाल प्रतिमा नजर आती है। झील का नाम है सुर सागर लेक। इसमें शिव यानी पतालेश्वर महादेव की प्रतिमा है। पास में ही पद्मावती शापिंग कांप्लेक्स। प्रताप सिनेमा, कोठी रोड , विनोबा भावे रोड होते हुए हम विश्वामित्री नदी के पुल को पार करते हैं। नदी तो अब बस किसी नाले जैसी दिखाई देती है। नदी के बाद शुरू हो जाता है सयाजीगंज का इलाका।

महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय
महाराजा सयाजीराव गायकवाड विश्वविद्यालय। 

सयाजीगंज में ही महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय है। गुजरात का प्रसिद्ध विश्वविद्यालय। महाराजा सयाजीराव गायकवाड काशी हिंदू विश्वविद्लाय के भी बड़े दानदाताओं में से एक थे। उनके नाम पर ही काशी हिंदू विश्वविद्लाय की लाइब्रेरी बनी है। बीएचयू की लायब्रेरी का नाम है सयाजीराव राव गायकवाड लाइब्रेरी। देश की तीसरी बड़ी लाइब्रेरी। जहां मैंने दिन रात पांच साल पढ़ाई की थी। 1990 से 1995 के बीच। सयाजीराव गायकवाड विश्वविद्यालय का परिसर बड़ौदा रेलवे स्टेशन के ठीक सामने से शुरू हो जाता है। देश में शायद ही कोई बड़ा शहर हो जहां रेलवे स्टेशन के ठीक सामने विश्वविद्यालय हो। यहां छात्रों के ट्रेन पकडने में बहुत सुविधा रहती होगी।  सयाजीराव गायकवाड विश्वविद्यालय की परिसर तीन किलोमीटर में फैला है। भवनों के वास्तुशिल्प से राजसी खुशूब आती है।

शानदार बड़ौदा रेलवे स्टेशन 
बड़ौदा रेलवे स्टेशन के आगे की तरफ यानी प्लेटफार्म नंबर एक की तरफ सयाजीगंज इलाका है। जहां स्टेशन के सामने लोकल बस स्टैंड है। जबकि रेलवे स्टेशन के पीछे अलकापुरी का इलाका है। बड़ौदा गुजरात का अति व्यस्त रेलवे स्टेशन है। पर अति व्यवस्थित रेलवे स्टेशन है। स्टेशन की साफ सफाई और उदघोषणा के इंतजाम अच्छे हैं। प्लेटफार्म नंबर एक पर सेंकेंड क्लास और उच्च दर्जे के प्रतीक्षालयों को ग्रीन वेटिंग रुम का दर्जा मिला हुआ है। मैं उच्च श्रेणी के वेटिंग रुम में एक घंटे इंतजार करता हूं। एलइडी स्क्रीन पर समाचार चैनल चल रहे हैं। टायलेट साफ सुथरे हैं। ग्रीन वेटिंग रुम यानी इनमें रोशनी सौर ऊर्जा से की जा रही है। देश के दूसरे रेलवे स्टेशनों को भी इससे प्रेरणा लेनी चाहिए।


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(BHU, BARODA, GUJRAT ) 


Monday, March 16, 2015

एनएच 8 पर सूरत से बड़ौदा वाया गोल्डेन ब्रिज

कोसांबा जंक्शन से मुझे बड़ौदा जाना था। मैंने आगे की यात्रा ट्रेन के बजाय बस से करने की सोची। क्योंकि इस मार्ग पर मैं ट्रेन से तो कई बार आवाजाही कर चुका था। कोसांबा में लोगों ने बताया कि भरुच की तरफ जाने वाली गाड़ियां हाईवे से मिलेंगी। कोसांबा से आटो रिक्शा में बैठकर 5 किलोमीटर दूर बाइपास तक पहुंचा। पर बाइपास पर कोई बस स्टाप नहीं था। 

नेशनल हाईवे नंबर 8 अहमदाबाद से मुंबई के बीच छह लेन का बन चुका है। पर इस फोर लेन हाईवे पर कोई भी बस वाला हाथ देने पर भी रोक नहीं रहा था। फिर लोगों ने सलाह दी की ट्रक से भी आगे जाया जा सकता है। मेरे साथ दो और सहयात्री आ गए। हमें देख एक छोटा ट्रक ( टेंपो) रुका। हम उस खाली टेंपो में सवार हो गए। टेंपो में खड़े होकर एनएच आठ पर अंकलेश्वर की ओर सफर। हाईवे का विहंगम नजारा दिखाई दे रहा है। खड़े होकर सफर करते हुए हाईवे के दोनों तरफ विशाल ढाबे दिखाई दे रहे हैं जिसमें आवासीय होने की भी जानकारी है। सीएनजी गैस के पंप, पेट्रोल पंप की कतार है। दिन हो या रात हाईवे गुलजार रहता है वाहनों से।


कोसांबा से आगे बढ़ते ही नहर पार करने के बाद गुजरात गैस सीएनजी पंप के दूसरी तरफ महुवेज गांव में मुझे विशाल चाकलेट फैक्ट्र नजर आती है। इसमें सेल्स आउटलेट भी बना है। यह शमीन (schmitten) चाकलेट की फैक्ट्री है। स्विटजरलैंड का जाना माना चाकलेट ब्रांड जो अब गुजरात में भी बनने लगा है। भारत में प्रियंका चोपड़ा इसकी ब्रांड एंबेस्डर हैं। सूरत की राजहंस न्यूट्रामिंस ( देसाई- जैन समूह) इन चाकलेट्स का निर्माण करता है। हालांकि मैं चाकलेट लेने के लिए उतर नहीं सका। अंकलेश्वर बाजार में टेंपो वाले ने हमें उतार दिया। किराया लिया 10 रुपये यानी बस से कम।
 भरुच अंकलेश्वर के बीच नर्मदा नदी पर बना ऐतिहासिक गोल्डेन ब्रिज। 

अंकलेश्वर गुजरात का बड़ा औद्योगिक और प्रदूषित शहर है। यहां से हमें भरूच के लिए मारूति ओमनी मिली। जो शेयरिंग में 15 रुपये प्रति सवारी की दर से आगे बढ़ी। भरूच शहर से बाहर निकलने पर नर्मदा नदी दिखाई देने लगती है। थोड़ी देर बाद ही हम ऐतिहासिक गोल्डेन ब्रिज पर थे। ये पुल 1881 का बना हुआ है। पुल बनाने की शुरूआत 1887 में हुई। इस पुल के बनने से पहले गुजरात का मुंबई से संपर्क सिर्फ नाव से ही संभव था। शानदार लोहे का पुल जिसे सुनहले रंग से रंग दिया गया है अब गोल्डेन ब्रिज कहलाता है। 

गोल्डन ब्रिज देश के ऐतिहासिक पुलों में शुमार है। तब इस पुल के निर्माण में 45.65 लाख की लागात आई थी। पुल ने कई बाढ़, भूकंप और संकट झेले हैं पर आज भी सही सलामत है। गोल्डेन ब्रिज अंकलेश्वर से भरुच के बीच लोगों के दैनिक परिवहन का प्रमुख साधन है। पुल पर आजकल भारी वाहनों की आवाजाही पर रोक है। गोल्डेन ब्रिज के ठीक बगल में रेलवे का पुल है। एनएच आठ पर काफी दूर जाकर नर्मदा पर नया पुल बन गया है। गोल्डेन ब्रिज पार करते ही भरूच शहर और रेलवे स्टेशन आ गया। यहां नर्मदा नदी के तट पर एक गुरुद्वारा भी है।
भरुच बाइपास का बस स्टैंड। 

भरुच शहर और आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों के विकास में कांग्रेस नेता अहमद पटेल के बहुत बड़ा योगदान है। अहमद पटेल भरुच से तीन बार लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं। यहां से पहला चुनाव उन्होंने 1977 में जनता लहर के दौरान कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर जीता था। भरुच में चीनी मिलें, उद्योग और रेलवे के विकास के लिए यहां के लोग पटेल को याद करते हैं।

भरूच से बड़ौदा का सफर भी मैंने सडक मार्ग से करने की सोची। शहर से फिर बाईपास आटो में बैठकर आया। बाईपास में बस स्टैंड भी है और मारूति वैन वाले भी बड़ौदा की तरफ जाते हैं। वैन वाले 60 रुपये लिए और सवारी पूरी होने पर चल पड़ा एनएच 8 पर बड़ौदा की ओर। रास्ते में करजन, आलमगीर जैसे पड़ाव आते हैं। बड़ौदा शहर के बाहर से एनएच 8 गुजर जाता है। मैं टैक्सी से अजवा बाइपास पर उतर जाता हूं। अजवा से बड़ौदा जंक्शल के लिए आटो रिक्शा। गुजरात के खूबसूसरत और सांस्कृतिक शहर बड़ौदा या वडोदरा की बातें अगली कड़ी में...


 



Sunday, March 15, 2015

सरपट मंजिल तक पहुंचाती हैं मेमू और डेमू

महानगरों में चलने वाली ईएमयू यानी इलेक्ट्रिकल मल्टीपल यूनिट का बदला हुआ रूप है मेमू ट्रेन सेवा। मेमू यानी मेनलाइन इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट (Mainline Electric Multiple Unit ) । ऐसी रेलगाड़ियां महानगरों से छोटे शहरों के बीच चलाई गई हैं। मेमू ट्रेनों के कोच आपस में जुड़े रहते हैं साथ ही इसमें हर डिब्बे में टायलेट भी बना होता है। यानी ये ईएमयू का परिष्कृत रूप है। पहली मेमू ट्रेन देश में 1995 में बिलासपुर डिविजन में चलाई गई। ये ट्रेन रायपुर दुर्ग, भाटपारा, रायपुर बिलासपुर के बीच चली। अब देश के कई हिस्सों में मेमू ट्रेनें चलाई जा रही हैं। जिन इलाकों में मार्ग विद्युतीकृत नहीं हैं वहां डेमू ट्रेन चलाई जाती है।
शानदार सफर - गोंदिया कटंगी डेमू ट्रेन। 

 डेमू डीएमयू ( डीजल मल्टीपल यूनिट ) का परिष्कृत रूप है। छोटी दूरी में सफर करने वाले लोगों के लिए मेमू और डेमू ट्रेनें सुविधाजनक और सस्ती और त्वरित यात्रा का विकल्प प्रदान करती हैं। मेमू डेमू ट्रेनें औसतन 40 किलोमीटर प्रतिघंटे की गति से लोगों को मंजिल तक पहुंचाती हैं। लिहाजा ये देश के जिन हिस्सों में भी चलती हैं काफी लोकप्रिय हैं। गोंदिया कटंगी डेमू गोंदिया से बालाघाट का 40 किलोमीटर का सफर 1 घंटे में पूरा करती है और किराया है 10 रुपये मात्र। वहीं बिलासपुर गेवरा रोड मेमू बिलासपुर से चांपा जंक्शन का 53 किलोमीटर का सफर महज 1 घंटे 3 मिनट में तय कर लेती है।

मेमू और डेमू के सभी कोच एक दूसरे से इंटरकनेक्ट होते हैं। इन ट्रेनों में लोकों चालित ट्रेनों की तुलना में कम ईंधन व्यय होता है। ट्रेनों के दोनों छोर पर पावर कार होने के कारण इंजन बदलने की आवश्यकता न होने से समय की बचत होती है। लोको पायलट के लिए फ्रंटल व्यू यानी सामने देखने का प्रबंध का प्रावधान होने से चालन अत्यंत संरक्षित होता है। 

क्या है डेमू – डेमू यानी डीजल इलेक्ट्रिक मल्टीपल यूनिट (DEMU, Diesel-Electric Multiple Unit ) में 1400 हार्स पावर क्षमता वाले दो पावर कार तथा छह ट्रेलर कार लगते हैं। स्पीड पकड़ने की क्षमता अधिक होती है। यात्रियों की क्षमता पारंपरिक कोचों के 90 की तुलना में 108 होती है। प्रत्येक पावर कार में भी यात्रियों के बैठने की सुविधा होती है।

अब सीएनडी डेमू भी - 13 जनवरी 2015 को देश की पहली सीएनजी डेमू ट्रेन हरियाणा राज्य के रेवाड़ी से 13 जनवरी 2015 को रवाना किया गया जो रोहतक तक चलती है। हरियाणा देश का पहला ऐसा राज्य बन गया जहां सीएनजी डेमू ट्रेन चलाई गई। कुल 8 डिब्बों वाली 74017 रेवाड़ी-रोहतक डेमू ट्रेनको रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने हरी झंडी दिखाकार रवाना किया। यह ट्रेन डीजल और सीएनजी दोनों सिस्टम से लैस है। डीजल-सीएनजी ट्रेन के लिए रेलवे ने विशेष तौर पर एक 1400 हॉर्सपावर का इंजन तैयार करवाया। इस ट्रेन में दो पावर कोच और छह कोच लगाए गए हैं, जो चेन्नै स्थित कारखाने में बनाए गए हैं। मेमू ट्रेनों का नंबर 6 से आरंभ होता है जबकि डेमू का 7 से आरंभ होता है।




Saturday, March 14, 2015

कभी श्रीलंका तक थी रेल सेवा

रामेश्वरम के पास धनुष्कोडि का समुद्र। - फोटो - विद्युत
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 मार्च 2015 को कोलंबो से तालाईमनार तक जाने वालाी रेल सेवा को हरी झंडी दिखाई। यानी 1964 में ध्वस्त हुई रेलवे लाइन को श्रीलंका ने इरकान की मदद से फिर से चालू कर दिया है। अब अगर भारत की ओर से भी रामेश्वरम धनुष्कोडि लाइन को दुबारा चालू कर दिया जाए तो भारत श्रीलंका के बीच एक बार फिर रेल लिंक चालू हो सकता है। 

 आज भले ही श्रीलंका जाने के लिए हमें फ्लाइट की सेवा लेनी पड़ती हो पर कभी श्रीलंका जाना बहुत आसान हुआ करता था। चेन्नई से श्रीलंका के लिए ट्रेन और स्टीमर की शानदार कनेक्टिविटी हुआ करती थी।

चेन्नई के मद्रास इग्मोर स्टेशन से रामेश्वर द्वीप तक सफर करने के बाद लोगों को धनुष्कोडि जाना पड़ता था। आजकल रामेश्वरम तक ही रेल जाती है पर 1964 तक धनुष्कोडि तक रेल जाती थी। पर 18 दिसंबर 1964 को आए विनाशकारी तूफान में सब कुछ तबाह हो गया। 240 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से आए तूफान में रामेश्वरम से धनुष्कोडि की रेलवे लाइन तबाह हो गई। इस तूफान ने श्रीलंका में भी काफी तबाही मची। 100 पैसेंजरों को लेकर जा रही एक पैसेंजर ट्रेन भी इस तूफान में यात्रियों समेत समुद्र में समा गई थी।

1964 तक यात्री धनुष्कोडि रेलवे स्टेशन पर उतरते थे। यहां से श्रीलंका ( तब सिलोन) जाने के लिए स्टीमर सेवा मिलती थी। सिलोन सरकार ने 1914 में एक मार्च को पोलगावाला से तालाईमनार (Polgahawela to Talaimannar ) तक रेलवे लाइन का विस्तार कर दिया था। वहीं भारत के धनुष्कोडि से तालाईमलार के लिए नियमित स्टीमर सेवा चलाई जाती थी। धनुष्कोडि से तालाईमलार की कुल दूरी महज 22 मील ( 35 किलोमीटर) ही है।

हम जब 1931 में प्रकाशित इंडियन ब्राडशॉ का राष्ट्रीय रेलवे टाइम टेबल देखते हैं तो उसमें मद्रास इगमोर से सिलोन के बीच रेल संपर्क का जिक्र देखते हैं। देश के कई हिस्सों में जहां नदियों पर पुल नहीं थे वहां भी स्टीमर सेवाओं को रेलवे से लिंक किया गया था। ये स्टीमर सेवाएं रेलगाड़ी के आने के साथ चलती थीं। इसी तरह का उदाहरण पटना और पहलेजाघाट के बीच गंगा नदी में स्टीमर सेवा का भी मिलता है। पर मद्रास इगमोर से सिलोन के बीच शानदार अंतरराष्ट्रीय रेल स्टीमर लिंक था। तब बहुत सस्ती दरों पर ही सिलोन ( श्रीलंका) पहुंचा जा सकता था। इस सेवा का इस्तेमाल करने के लिए भारत, सिलोन और ब्रिटेन के नागरिकों को कोई पासपोर्ट की जरूरत नहीं थी। पर जो लोग इन देशों के अलावा कहीं और से आए हों उनके लिए पासपोर्ट और वीजा की जरूरत थी।

स्वास्थ्य जांच – सिलोन जाने वाले लोगों के लिए स्वास्थ्य जांच अनिवार्य था। पहले और दूसरे क्लास में सफर करने वाले लोगों की स्वास्थ्य जांच मंडपम ( सिलोन) में मेडिकल आफिसर करता था, जबकि तीसरे दर्जे में यात्रा करने वालों के स्वास्थ्य जांच मंडपम कैंप में की जाती थी।

सामानों की जांच – पहले दर्जे के यात्रियों के सामान की जांच मारादाना में, दूसरे दर्जे के यात्रियों के सामान की जांच तालाईमनार में और तीसरे दर्जे के लोगों को सामान की जांच मंडपम शिविर में की जाती थी।
टाइम टेबल में मद्रास ते तालाईमनार की दूरी 493 किलोमीटर बताई गई है। जबकि धनुष्कोडि तक की दूरी 422 किलोमीटर है। मंडपम रेलवे स्टेशन धनुष्कोडि से 20 किलोमीटर पहले आता था।

किराया – 1931 में मद्रास से तालाईमनार ( सिलोन) का किराया पहले दर्ज में 42 रुपये, दूसरे दर्जे में 25 रुपये और तीसरे दर्जे में महज 9 रुपये 13 पैसे हुआ करता था।


मंडपम कैंप रेलवे स्टेशन रामेश्वरम ( आजकल आखिरी रेलवे स्टेशन) से 19 किलोमीटर पहले पड़ता है। वहीं रामनाथपुरम ( जिला मुख्यालय) रेलवे स्टेशन से मंडपम कैंप की दूरी 36 किलोमीटर है। वहीं मंडपम स्टेशन मंडपम कैंप से दो किलोमीटर पहले ही स्थित है। मंडपम के ठीक बाद ऐतिहासिक पंबन समुद्री पुल की शुरूआत होती है जो पंबन टापू ( रामेश्वरम) को भारत भूमि से जोड़ता है।
सिलोन और भारत के बीच स्टीमर और रेल मार्ग से अंग्रेजी राज में बड़ी संख्या में प्रवासी श्रमिक भारत में रोजगार के लिए आते थे। मंडपम रेलवे स्टेशन स्थित मंडपम कैंप ऐसे श्रमिकों के लिए ही जाना जाता था।


भारत से श्रीलंका के बीच तूतीकोरीन से भी स्टीमर सेवा चलती थी। पर यह सेवा धनुष्कोडि की तुलना में लंबी थी। धनुष्कोडि से सिलोन का सफर महज दो घंटे का था जबकि तूतीकोरीन से कोलंबो का सफर 12 घंटे का था। 150 मील दूरी के लिए हफ्ते में दो दिन ही फेरी सेवा चलाई जाती थी। हर बुधवार और शनिवार को तूतीकोरीन से फेरी सेवा चलती थी। इसलिए धनुष्कोडि वाली सेवा ज्यादा लोकप्रिय थी।

कई बार धनुष्कोडि तक रेलवे लाइन को फिर से चालू करने की बात उठती है पर इसे अभी तक अंजाम नहीं दिया जा सका है।

-    -    विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com