Saturday, February 28, 2015

गुजरात की एक और सुस्त ट्रेन - कौसंबा -उमरपाडा नैरो गेज

गुजरात के सूरत जिले में एक और सुस्त नैरो गेज ट्रेन सौ साले से अधिक समय से चल रही है। ये गुजरात में तीसरा नैरोगेज नेटवर्क जो संचालन में है वह है कोसंबा उमरपाडा के बीच। कोसांबा सूरत जिले का एक छोटा व्यापारिक शहर है। वहीं उमरपाडा सूरत जिले का ही एक तालुका है।
 उमरपाडा सूरत शहर की भीड़भाड़ से दूर एक प्रदूषणमुक्त कस्बा है। यहां पास में देवघाट में खूसरत झरना है जिसे देखने आसपास के सैलानी पहुंचते हैं। उमरपाडा के  आसपास वन क्षेत्र है जिसका सौंदर्य मन मोह लेता है। उमरपाडा से देवघाट की दूरी 10 किलोमीटर है। घने जंगलों के बीच स्थित झरने के उस पार स्थानीय आदिवासियों को मानना है कि उनके देवता का वास होता है। देवघाट में नाइट कैंप का इंतजाम है। पर इसके लिए वन विभाग सूरत से अनुमति लेनी पड़ती है।

कोसंबा उमरपाडा रेल मार्ग 62 किलोमीटर लंबा है। दोनों स्टेशनों के बीच कुल 9 मध्यवर्ती स्टेशन हैं। इस मार्ग पर दिन भर में सिर्फ एक पैसेंजर ट्रेन का संचालन होता है। आमतौर पर इसमें तीन से पांच डिब्बे लगाए जाते हैं। इसे जेडडीएम सीरीज का लोको खिंचता है। इस मार्ग पर जेडडीएम 528, जेडडीएम 529, जेडीएम 537 लोको संचालित किए जा रहे हैं। इस रेलमार्ग पर इतनी भीड़ होती है कि कई बार लोग नैरो गेज ट्रेन की छत पर भी सफर करते हुए दिखाई दे जाते हैं।

कोसंबा वैसे तो ब्राडगेज का भी रेलवे स्टेशन है, पर यहां नैरोगेज भी है। सुबह 9.30 बजे 52047 नैरोगेज पैसेंजर कोसंबा जंक्शन से खुलती है। ये ट्रेन हौले हौले चलते हुए दोपहर 1.45 बजे उमरपाडा पहुंचती है। यानी कुल 62 किलोमीटर का सफर 4 घंटे 15 मिनट में तय करती है। औसत गति हुई 15 किलोमीटर प्रति घंटे से भी कम। तो ये प्रतापनगर जंबुसार की तरह ही सुस्त गति से चलने वाली ट्रेन है। रेल यात्री सलाहकार समिति इस ट्रेन की स्पीड बढ़ाने की कई बार मांग कर चुकी है। पर अपेक्षित सफलता नहीं मिली है।

कोसंबा उमरपाडा मार्ग के स्टेशन -  कोसंबा जंक्शन ,  वेलाछा, लिंबाडा, आसरमा, सिमोधरा, कोसाडी हाल्ट, मोटा मियां मांगरोल, वानेकाल, जानखाव, केवडी, उमरपाडा। 

ये है कोसांबा में इंजन को डीजल देने का इंतजाम। 
इतनी दूरी के लिए किराया है 15 रुपये। कोसांबा जंक्शन रेलवे स्टेशन मुंबई बड़ौदा ब्राडगेज मुख्य मार्ग पर स्थित है। यहां रेलवे स्टेशन पर एक बोर्ड लगा है जिस पर लिखा है कि उमरपाडा जाने के लिए गाड़ियां यहां बदलिए। कोसंबा जंक्शन पर एक प्लेटफार्म नैरो गेज के लिए निर्धारित है। कोसांबा गुजरात के सूरत जिले के मंगरोल कस्बे में आता है। ये शहर नर्मदा नदी के किनारे स्थित है। इस रेलवे लाइन के समानांतर स्टेट हाईवे नंबर 166 चलता है। कोसांबा उमरपाडा पैसेंजर मोटा मियां मांगरोल कस्बे के पास किम नदी पर बने पुल को पार करती है। इस मार्ग पर बीच में पड़ने वाला मोटा मियां मांगरोल बड़ा कस्बा आता है जिसकी कुल आबादी 2 लाख के आसपास है। कोसांबा उमरपाडा रेल मार्ग पर सफर के दौरान गुजरात के हरे भरे खेत नजर आते हैं। मार्ग में कुछ तीखे मोड़ भी आते हैं। वास्तव में ये ट्रेन सूरत जिले के एक बड़े हिस्से का आपको दर्शन कराती हुई चलती है।




कोसांबा में लोको शेड - कोसांबा रेलवे स्टेशन पर नैरो गेज के लिए छोटा सा शेड बना हुआ है। यहां नैरो गेज के लोकोमोटिव में डीजल भरने के लिए इंतजाम किया गया है। संरक्षा को लेकर भी मुस्तैदी दिखाई देती है। आग से बचाव के लिए बालू की बाल्टियां भर कर रखी गई हैं। शेड में लगे एक नोटिस बोर्ड पर लिखा गया है कि आग लगने की स्थिति में इन नंबरों पर सूचित करें। छोटी लाइन के प्लेटफार्म पर भी एक यात्रियों के लिए छोटा सा शेड बनाया गया है। स्टेशन परिसर में पुराना रालिंग स्टाक दिखाई देता है। एक पर बीबी एंड सीआईआर द्वार 1889 में लंदन में निर्माण की जानकारी दी गई है। इस लाइन के पुराने कोच में अंदर की सीटें लकड़ी की हुआ करती थीं। स्टेशन पर कुछ पुराने कोच दिखाई देते हैं। इनमें कुछ कोच ऐसे हैं जिनमें खिड़की की तरफ बेंच नुमा लंबी सीटें लगाई गई हैं जिससे खड़े होने के लिए ज्यादा यात्रियों को जगह मिल सके। पर अब चलने वाली रेल में सीटों को अरामदेह बना दिया गया है। 

इतिहास -  इस रेलवे लाइन का निर्माण 1900 ईश्वी में गायकवाड बड़ौदा स्टेट रेलवे के तहत ही किया गया। इसके वास्तुकार थे ब्रिटिश इंजीनियर एई थॉमस। रेलवे लाइन बिछाने का ठेका मिला था गुजरात के ठेकेदार रामजी धनजी को। हालांकि इस लाइन के निर्माण में रामजी धनजी को एक लाख रुपये का घाटा हुआ। उस समय के हिसाब से ये बड़ा घाटा था, फिर भी उन्होंने रेलवे लाइन को समय पर पूरा करके दिया। इससे ब्रिटिश इंजीनियर इतने प्रभावित हुए कि उन्हें पूरे आगरा बीना खंड में पटरी बिछाने का काम प्रदान कर दिया।

ब्राड गेज में बदलने की मांग - 16 जुलाई 2014 को नवसारी लोकसभा से भाजपा के सांसद सीआर पाटिल ने लोकसभा में कोसांबा उमरपाडा नैरो गेज लाइन को ब्राडगेज में बदले जाने का मुद्दा जोर शोर से उठाया। साथ इस लाइन का विस्तार नानदरबार तक किए जाने की मांग की।


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( GUJRAT NARROW GAUGE, KOSHAMBA UMARPADA -  4) 

Friday, February 27, 2015

पर्यावरण बचाने का संदेश देती है बिलिमोरा वघई लाइन

अंबिका नदी के तट पर बसे नवसारी जिले के शहर बिलिमोरा से दिन भर में दो ही नैरोगेज रेलगाड़ियां वघई के लिए खुलती हैं जो आपको गुजरात के एकमात्र हिल स्टेशन सापूतारा की ओर ले जाती हैं। बिलिमोरा के मुख्य रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर ये जानकारी दी गई है कि सापूतारा जाने के लिए गाड़ी यहां बदलें। हालांकि इन गाड़ियों में सीटों के आरक्षण का कोई इंतजाम नहीं है। छोटी लाइन का बिलिमोरा में जंक्शन के प्लेटफार्म वाले हिस्से में भीड़भाड़ नहीं दिखाई देती है। 

छोटी लाइन है तो स्टेशन की इमारत भी बड़ी लाइन की तुलना में छोटी सी है। इस लाइन के पास जेडीएम 5 सीरीज का 523 नंबर और 511 नंबर  का लोको इस मार्ग पर अपनी सेवाओं के लिए मौजूद है। हिल स्टेशन की ओर जाने वाली ट्रेन के कुछ कोच को नीले रंग से रंगा गया है जिस पर हरे भरे पौधों की आकृतियां हैं। हरियाली के संग हिचकोले खाते हुए मस्ती में चलते हैं। इन कोचों पर पर्यावरण और इंधर बचाने के संदेश भी लिखे गए हैं।

बिलिमोरा में नैरो गेज के लिए अलग से सिनियर सेक्सन इंजीनियर का दफ्तर है। यहां पर नैरो गेज ट्रेन का छोटा सा वर्कशाप भी है जो वघई के बीच चलने वाली ट्रेन की जरूरतें पूरी करता है। साथ ही यहां नैरो गेज रेलवे स्टाफ का बड़ी कालोनी है। इस कालोनी में काफी हरियाली दिखाई देती है। कालोनी के फ्लैटों के आसपास हरे भरे पेड़ लहलहा रहे हैं।

वघई लाइन पर शानदार सैलून - बिलिमोरा का नैरोगेज प्लेटफार्म ब्राडगेज के बगल में ही है। पर यहां पर कोई खास भीड़भाड़ नहीं दिखाई देती है। प्लेटफार्म पर एक टी स्टाल है जो बंद रहता है। इस नैरो गेज के स्टेशन पर शेड में नैरो गेज पर चलाया जाने वाला एक सैलून खड़ा दिखाई देता है। चमचमाते हुए इस सैलून को देखकर लगता है कि पश्चिम रेलवे ने इसे बिल्कुल मेनटेन करके रखा है। इसे देखकर लगता है कि इसमें कभी कभी अधिकारी और मेहमान वघई लाइन का दौरा करते होंगे।
1930 का बना हुआ मालगाड़ी का डिब्बा - यहां पर एक गुड्स ट्रेन का छोटा डिब्बा भी है जो समान्य मालगाड़ी के डिब्बे से भी आकार में आधा है। इस डिब्बे की छत पर किसी घर की छत की तरह टाइलें लगाई गई हैं। इसके निर्माण के बारे में जानकारी लिखी गई है उसके मुताबिक के 1930 का बना हुआ है। तब इसका इस्तेमाल स्क्रैप सामग्री की ढुलाई के लिए किया जाता था।


यूटीएस प्रणाली से टिकट – बिलिमोरा के नैरोगेज टिकट के काउंटर के बाहर इस बात की घोषणा बड़े शान से की गई है कि ये भारत का पहला नैरो गेज नेटवर्क है जहां यूटीएस प्रणाली से टिकट मिलता है। रेलवे की यूटीएस प्रणाली में किसी भी स्टेशन से कहीं का भी साधारण टिकट तीन दिन पहले भी बुक कराया जा सकता है।

बिलिमोरा वघई के बीच के स्टेशन -  1. बिलिमोरा जंक्शन, 2 गणदेवी, 3. चिखली रोड, ( चिखली बाईपास के पास है ये स्टेशन) 4. रानकुवा, 5 धोलीकुवा, 6 अनावल, 7 उनाई वसुंदा, 8. केवड़ी रोड, 9 डूंगरदा और 10. वघई ( आखिरी रेलवे स्टेशन )


बिलिमोरा में मोरारजी देसाई की प्रतिमा 
कभी था सामरिक महत्व – 18वीं सदी में बड़ौदा स्टेट ने बिलिमोरा में अपना नौ सेना का स्टेशन बनाया था. यहां हमेशा 50 के करीब नावें तैयार रहती थीं जो  पुर्तगाली, डच और फ्रांसिसी कालोनियों के साथ कारोबार करती थीं। यहां से तिजारत में मिले सामानों के परिवहन में ये नैरोगेज काफी सहायक थी। किसी समय में बिलिमोरा में बड़ी संख्या में पारसी आबादी रहती थी।
 शहर के अगियारी मुहल्ला पारसी बहुल हुआ करता था।

कभी था गुजरात का मैनेचेस्टर -  किसी समय में बिलिमोरा को गुजरात का मैनेचेस्टर कहा जाता था। आज भी यहां 40 के करीब कंपनियां उत्पादन में लगी हैं। लोकप्रिय फिल्म मदर इंडिया के निर्देशक महबूब खान बिलिमोरा के रहने वाले थे। उन्होंने फिल्म मदर इंडिया के कई दृश्यों की शूटिंग बिलिमोरा के आसपास की थी। 

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( GUJRAT, NARROW GAUGE, BILIMORA, WAHGAI SECTION ) 

Thursday, February 26, 2015

बंदरगाह को जोड़ती थी ये रेलवे लाइन -बिलीमोरा-वघई नैरोगेज लाइन

गुजरात में एक और नैरो गेज रेल संचालन में है बिलीमोरा जंक्शन और वघई के बीच।ये लाइन इस मायने में ऐतिहासिक है कि ये बड़ौदा रियासत के एकमात्र बंदरगाह बिलीमोरा को शेष गुजरात से जोड़ती थी। दोनों स्टेशनों के बीच एक जोड़ी ट्रेनों का रोज संचालन होता है।

दोनों स्टेशनों के बीच कुल दूरी 63 किलोमीटर है। कुल 9 मध्यवर्ती स्टेशन हैं बिलीमोरा और वघई के बीच। गणदेवी, चिखली रोड, रानकुवा, ढोलीकुवा, आंवल, उनानी, केवडी रोड, काला अंब और डूंगरडा बीच के स्टेशन हैं जहां पैसेंजर ट्रेन रूकती हुई जाती है। 52001 पैसेंजर सुबह 10.20 बजे बिलीमोरा से चलकर 1.20 बजे वघई पहुंचती है। यानी तीन घंटे में 63 किलोमीटर का सफर। औसत गति की बात करें तो 20 किलोमीटर प्रति घंटे से थोड़ा सा ही ज्यादा है। वहीं शाम को 7.40 बजे 52003 बिलीमोरा से वघई के लिए दुबारा चलती है। इसी तरह दो जोड़ी रेलगाड़ियां वघई से बिलीमोरा की ओर वापस भी आती हैं। दोनों स्टेशनों के बीच किराया है 15 कुल रुपये।


बिलीमोरा गुजरात के नवसारी जिले का एक छोटा सा शहर है। ये शहर अंबिका नदी के किनारे स्थित है। यह गणदेवी तालुका का हिस्सा है। कभी ये क्षेत्र बडौदा रियासत का हिस्सा हुआ करता था। इस रेलवे लाइन का निर्माण भी बड़ौदा रियासत ने करवाया था। दरअसल बिलीमोरा बड़ौदा रियासत का प्रमुख नौसेना केंद्र हुआ करता था। यहां पर बिलीमोरा बंदर का निर्माण कराया गया था। इसलिए माल ढुलाई के लिए खास तौर पर नैरो गेज रेलवे लाइन का निर्माण कराया गया था। यानी ये रेलवे लाइन बड़ौदा रियासत के लिए सामरिक महत्व वाला था।


वहीं वघई गुजरात के डांग जिले का एक छोटा सा शहर है। यह शहर अपने बोटानिकल गार्डन और कृषि महाविद्यालय के लिए जाना जाता है। पर बिलीमोरा वघई नैरो गेज ट्रेन भी इस क्षेत्र का प्रमुख आकर्षण हो सकता है। 

हिल स्टेशन सापूतारा जाने का मार्ग -  वघई गुजरात के एकमात्र हिल स्टेशन सापूतारा जाने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन है। हालांकि सापूतारा जाने वाले लोग इस नैरो गेज का इस्तेमाल कम ही करते हैं क्योंकि ये हौले होले पहुंचाती है। वैसे सापूतारा आप महाराष्ट्र के नासिक रोड रेलवे स्टेशन से भी जा सकते हैं। नासिक रोड से सापूतारा का दूरी महज 70 किलोमीटर है। वहां से सापूतारा महज दो घंटे में पहुंचा जा सकता है। वहीं बिलीमोरा जंक्शन से सापूतारा जाने में अपेक्षाकृत ज्यादा वक्त लग जाता है।
   
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( GUJRAT NARROW GAUGE, BILIMORA WAGHAI SECTION -  5)


Wednesday, February 25, 2015

प्रतापनगर - यहां देखिए नैरो गेज का इतिहास

प्रताप नगर  रेलवे स्टेशन की दूरी बड़ौदा रेलवे स्टेशन से 5 किलोमीटर है। हालांकि दोनों स्टेशन रेलवे लाइन से भी संपर्क में हैं। पर अगर आपको प्रताप नगर कभी भी पहुंचना हो तो वडोदरा रेलवे स्टेशन से आटो रिक्शा से जाना पड़ता है। सयाजीराव गायकवाड रेलवे ओवर ब्रिज के बाद लंबे लाल बाग उद्यान के बाद आता है प्रताप नगर रेलवे स्टेशन। इस रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक से नैरो गेज की रेलागाड़ियों का संचालन होता है। नैरोगेज यानी छोटी लाइन को गुजराती में नानी लाइन कहते हैं। जबकि प्लेटफार्म नंबर दो और तीन से बड़ी लाइन यानी मोटी लाइन की ट्रेन चलती हैं। प्रतापनगर में रेलवे स्टेशन के पास ही बडोदरा का डीआरएम आफिस और बड़ी रेलवे कालोनी है। प्लेटफार्म नंबर एक के पास ही बना है नैरो गेज का रोलिंग स्टाक पार्क। इस पार्क में गुजरात के नैरोगेज नेटवर्क से जुड़ी हुई ऐतिहासिक धरोहरों को सहेज कर रखा गया है।
  
इस पार्क में अलग अलग तरह के कोच, क्रेन, क्रांसिंग आदि के नमूने देखे जा सकते हैं। प्रतापनगर शेड में नैरो गेज पर चलने वाली रीलिफ वैन खड़ी दिखाई देती है। इसमें मेडिकल कंपार्टमेंट, स्टोर, स्ट्रेचर रखने की जगह और सहायता में जाने वाले स्टाफ के लिए बैठने की जगह होती थी। इस शेड में एक जेनरेटर वैन भी खड़ा है जो कभी इस्तेमाल में था।

किसी समय में गुजरात के नैरो गेज नेटवर्क पर मालगाड़ियां बड़ी संख्या में चलाई जाती थीं। बड़ी लाइन के नेटवर्क से आने वाले सामान को छोटी लाइन से गुजरात के तमाम शहरों तक पहुंचाया जाता था। यहां पुरानी मालगाड़ी के कोच भी संभाल कर रखा गया है। ये कोच 1961 का बना हुआ है। इसकी क्षमता 15.3 टन सामान ढोने की है। सिर्फ मालगाड़ियां ही नहीं नैरो गेज नेटवर्क डीजल पेट्रोल और दूसरे तेल को भी सप्लाई करने का काम ये नैरोगेज नेटवर्क करती थी। इस डिब्बे का निर्माण 1951 में हर्स्ट निल्सन एंड कंपनी ने किया था।
प्रतापनगर शेड में एक नैरोगेज का आयल टैंकर भी पटरियों पर आराम फरमा रहा है। कई बार ये डिब्बा पेयजल सप्लाई के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। यहां पर प्रदर्शित किए गए इस डिब्बे का निर्माण 1907 में लीड्स फोर्स कंपनी लिमिटेड ने किया था। इसकी क्षमता 12 हजार लीटर पानी ढोने की है। यहां मालगाड़ी के साथ लगने वाला गार्ड का नन्हा सा डिब्बा भी देखा जा सकता है।

अनूठा हैंड क्रेन - प्रतापनगर शेड में 1883 का बना हुआ अनूठा हैंड क्रेन देखा जा सकता है। काउन शिल्डन एंड कंपनी, इंग्लैंड द्वारा निर्मित ये क्रेन 5 टन वजन का सामान इधर उधर कर सकता है। इसका दयारा 10 फीट का है। 1915 में इसे भरूच में लगाया गया था। यह ब्राड गेज और नैरो गेज के कोच से भारी सामान को उतारने का काम करता था।

इंजन के लिए रोटेटर - रेलगाड़ी के लोकोमोटिव को अपनी जगह पर घूमा कर वापस उल्टी दिशा में करने के लिए रोटेटर का इस्तेमाल किया जाता था। ऐसा ही एक रोटेटर प्रतापनगर में लगा हुआ दिखाई देता है। 

बीबी एंड सीआई रेलवे के लिए इस रोटेटर यंत्र का निर्माण 1874 में ओरेमरोड क्रिरेशन एंड कंपनी ने किया था। ये मैनचेस्टर, लंदन का बना हुआ है। नैरोगेज के तमाम नेटवर्क पर लोकोमोटिव की दिशा बदलने के लिए इस तकनीक का खूब इस्तेमाल किया जाता था। इस रोटेटर पर इंजन को लाकर खड़ा कर देने के बाद कुछ लोग मिलकर पूरे इंजन को दूसरी दिशा में आसानी से घूमा देते थे। 


डायमंड क्रासिंग  रेल को एक पटरी से दूसरी पटरी के बीच क्रास कराने के लिए क्रासिंग बनाई जाती थी।  ऐसी क्रासिंग की जरूरत अक्सर रेलवे जंक्शन पर पड़ती है, जहां दो मार्ग एक दूसरे को क्रास करते हैं। यहां पर जिस क्रासिंग को प्रदर्शित किया गया है वह टिंबा रेलवे स्टेशन पर 1919 में बनाया गया था। 

क्रासिंग वाली जगह पर पटरी में एंगल और दो पटरियों के बीच जगह का ध्यान रखना पड़ता है। क्योंकि गर्मियों में लोहा गर्म होता है तब पटरियां फैलती हैं। प्रतापनगर शेड में नैरो गेज की डायमंड क्रासिंग भी देखी जा सकती है। डायमंड क्रासिंग में ब्राड गेज और नैरो गेज की दो पटरियां एक दूसरे को किसी सड़क के चौराहे की तरह क्रास कर जाती हैं। रोलिंग स्टाक पार्क के सामने सड़क की दूसरी तरफ रेलवे हेरिटेज संग्रहालय का निर्माण किया गया है जो गुजरात में नैरो गेज के विकास की कहानी बयां करता है। 
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( GUJRAT, PRATAP NAGAR, NARROW GAUGE, RAIL ) 

Tuesday, February 24, 2015

मस्ती भरा सफर- प्रतापनगर जंबुसार नैरो गेज

गुजरात में दभोई-मियागाम के अलावा गुजरात में प्रतापनगर (वडोदरा) और जांबुसार जंक्शन और कोसांबा उमरपाडा, बिलिमोरा वाघाई के बीच अभी भी नैरो गेज रेल नेटवर्क संचालित हो रहा है। प्रतापनगर से जंबुसार नैरो गेज रेलवे लाइन की कुल लंबाई 51 किलोमीटर है। पहले ये लाइन सामनी तक जाती थी जिसकी कुल दूरी 75 किलोमीटर थी। पर अब यह प्रतापनगर तक ही सीमित हो गई है। प्रतापनगर और जांबुसार के बीच 13 रेलवे स्टेशन हैं।

रेलगाड़ी के साथ ही चलता है टिकट घर

मजे की बात है कि ये देश का अनूठा रेलवे नेटवर्क इस मायने में हैं कि इसमें रेलवे का टिकट घर साथ साथ ही चलता है। प्रताप नगर से जंबुसार के बीच पड़ने वाले रेलवे स्टेशनों पर टिकट बिक्री के लिए काउंटर नहीं हैं। सुबह शाम चलने वाली ट्रेन जब स्टेशन पर आती है तो रुकने पर चढ़ने वाले यात्री ट्रेन के ही एक कोच में मौजूद टिकट काउंटर से लोग टिकट खरीदते हैं। इन्हें पुराने आकार के पीले रंग के गत्ते वाले टिकट दिए जाते हैं। आमतौर पर बसों में टिकट बेचने वाला कंडक्टर बस के साथ साथ चलता है। पर ये एक ऐसी ट्रेन है जिसमें टिकट घर रेलगाड़ी के ही साथ साथ चलता है। 2012 में इस ट्रेन पर यात्रा करने वाली लिपिका हैदर अपने यात्रा के मजेदार संस्मरण साझा करती हैं। उन्होंने इसे दुनिया की सुस्त ट्रेन और सफर को बोरियत भरा करार दिया है। प्रतापनगर जंबुसार जंक्शन के बीच चलने वाली नैरो गेज ट्रेन के एक डिब्बे में 36 यात्रियों के बैठने की जगह है।

  
ये है दुनिया का सबसे सुस्त नेटवर्क

प्रतापनगर और जांबुसार के बीच दोनों स्टेशनों के बीच दो जोड़ी पैसेंजर ट्रेनों का संचालन होता है। 52036 पैसेंजर प्रतापनगर से सुबह 10 बजे चलती है जो 1 बजे जांबुसार पहुंचती है। वहीं 52034 पैसेंजर शाम 6.10 बजे जांबुसार के लिए चलती है जो रात को 9.10 बजे जांबुसार पहुंचती है। यानी 50 किलोमीटर के सफर के लिए तीन घंटे से ज्यादा का वक्त। औसत गति 15 से 17 किलोमीटर प्रतिघंटा की। एक साइकिल वाला भी औसतन 20 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से साइकिल दौड़ाता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जेडीएम 5 लोको से चलने के बावजूद ये ट्रेन इतनी सुस्त क्यों है। वैसे जेडीएम 5 की अधिकतम स्पीड 50 किलोमीटर प्रति घंटे तक होती है। प्रताप नगर जंबुसार नैरोगेज लाइन पर भी रेलगाड़ियों को सीमित संसाधनों के बीच कम खर्च में चलाया जा रहा है। आसपास में सड़कों का बेहतर नेटवर्क मौजूद होने के कारण ये रेलवे लाइन स्थानीय लोगों के बीच ज्यादा लोकप्रिय नहीं है। लेकिन शाम को बड़ौदा से अपने गांव  की ओर जाने वाले लोग बड़ी संख्या में इस रेलवे लाइन का इस्तेमाल करते हैं।

इस मार्ग पर सफर के दौरान आपको गुजरात के गांव दिखाई देते हैं। कपास, तंबाकू और अलसी के हरे भरे खेतों के साथ चलता है 50 किलोमीटर का सफर। कहीं घर के आगे बंधी हुई भैंसे दिखाई देती हैं तो कहीं पेड़ों पर बंदर चहलकदमी करते तो राष्ट्रीय पक्षी मोर नाचते हुए दिखाई दे जाते हैं। सफर सुस्त है तो प्रकृति के नजारों का मजा लिजिए।

प्रतापनगर जंबुसार मार्ग पर भी रायपुर धमतरी की तरह ही हर सड़क पर आने वाली क्रासिंग से पहले रेलगाड़ी रूक जाती है। रेल से खलासी उतर कर जाता है गेट को बंद करता है। रेलगाड़ी चलती है गेट क्रास करने के बाद फिर रूक जाती है। खलासी वापस जाकर गेट को खोलता है फिर ट्रेन आगे बढ़ती है। खलासी के अलावा लोको पायलट, असिस्टेंट लोको पायलट और एक गार्ड ट्रेन में चलते हैं। 
प्रतापनगर जंबुसार के बीच चलने वाली नैरो गेज ट्रेन 1997 से पहले 45 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से भी दौड़ती थी। पर रेलवे क्रासिंग से गार्ड हटाए जाने के बाद इसकी गति सुस्त पड़ गई। वहीं दभाई के आसपास वाली नैरोगेज ट्रेनें आज भी 35 किलोमीटर तक की गति से चलती हैं। शाम को प्रतापनगर से जंबुसार के बीच चलने वाली ट्रेन में कोई सुरक्षा भी नहीं है।



प्रतापनगर (वडोदरा) में है नैरो गेज का विशाल वर्कशाप

कभी इस्तेमाल होती थी ऐसी क्रेन
नैरो गेज ट्रेनों के रख रखाव और मरम्मत के लिए बड़ौदा के पास प्रतापनगर में वर्कशाप की स्थापना की गई। स्टीम लोको के लिए इस वर्कशाप की स्थापना की गई थी। 25 मार्च 1919 को वायसराय लार्ड चेम्सफोर्ड ने प्रतापनगर वर्कशाप की आधारशिला रखी। 1922 में यहां नियमित तौर पर कामकाज शुरू हो गया था। 1949 तक यह गायकवाड बड़ौदा स्टेट रेलवे ( जीबीएसआर) का हिस्सा था। 1949 में भारतीय रेलवे में समाहित होने के बाद ये अब भारत सरकार के स्वामित्व में है। वडोदरा रेलवे स्टेशन से प्रतापनगर डीजल शेड की दूरी 4 किलोमीटर है।
गायकवाड वडोदरा स्टेट रेलवे (जीबीएसआर) के लिए लोको यानी इंजन की सप्लाई का काम शुरुआती दौर में डब्लू जी बागनाल लिमिटेड नामक कंपनी करती थी। जबकि सवारी डिब्बों और मालगाड़ी के डिब्बों के निर्माण गुजरात में ही स्थानीय स्तर पर किया जाता था। बडौदा स्टेट रेलवे के बाद देश में 1880 में दार्जिलिंग हिमालयन रेल दूसरी नैरो गेज लाइन बिछाई गई जिसके पटरियों की चौड़ाई दो फीट थी।

सन 1990 में बडौदा शहर के प्रतापनगर नैरोगेज शेड को पूरी तरह डीजल लोकोशेड में बदल दिया गया। आजकल ये देश का सबसे बड़ा नैरोगेज का डीजल लोकोशेड है। 25,600 वर्ग मीटर में फैले इस प्रतापनगर वर्कशाप के पास आज कुल 26 नैरोगेज के डीजल लोको हैं। ये जेडीएम- 5 सीरीज के हैं। हालांकि यहां 50 लोको को रखने की कुल क्षमता है। 

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( GUJRAT NARROW GAUGE, PRATAPNAGAR JAMBUSAR, DABHOI  ) 

Monday, February 23, 2015

कभी नैरो गेज का मक्का था दभोई जंक्शन

गुजरात में नैरो गेज नेटववर्क के विकास के क्रम में बडौदा जिले का शहर दभोई नैरो गेज रेलवे का प्रमुख जंक्शन बन गया। वास्तव में दाभोई को नैरो गेज का मक्का कहें तो कुछ गलत नहीं होगा। महाराजा गायकवाड के राज्य में दभोई प्रमुख व्यापारिक शहर था। इस शहर से मियागाम करजन के बीच 2 फीट 6 इंच चौड़ाई वाले नैरो गेज रेलवे लाइन की शुरुआत कर महाराजा ने इसे विश्व मानचित्र पर ला दिया। वास्तव में महाराजा ने 1860 में ही दभोई और बड़ौदा के नैरो गेज लाइन से जोड़ने के बारे में सर्वे शुरू करा दिया था। दो साल बाद 32 किलोमीटर के इस मार्ग का निर्माण किया गया।

दभोई से मोती कोराल वाया मियागाम करजन


नैरोगेज के मक्का कहे जाने वाले दभोई से मियागाम होकर मोती कोराल तक आज भी नैरो गेज नेटवर्क संचालन में है। दभोई नेशनल हाईवे नंबर 8 पर स्थित वडोदरा जिले का छोटा सा व्यापारिक शहर है। वडोदरा से दभोई की दूरी 32 किलोमीटर है।

दभोई में ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण एक मन्दिर के प्राचीन अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। दभोई वडोदरा का एक कस्बा है, जिसे पहले दर्भावती नाम से जाना जाता था। इस प्रचीन शहर का गिरनार के जैन धर्मग्रथों में बहुत महत्व है। दभोई का किला हिंदू सेना की वास्तुशिल्प का एक दुर्लभ उदाहरण है, जिसे आज भी देखा जा सकता है। छोटे से शानदार किले के कारण भी दभोई शहर को जाना जाता है।

गुजरात में नैरो गेज का दभोई रेलवे स्टेशन की उम्र 150 साल से ज्यादा हो चुकी है। मालसर- मियागाम करजन- दभोई- चंदोद नैरोगेज मार्ग की कुल लंबाई 90 किलोमीटर है। मालसर नर्मदा नदी के किनारे एक छोटा सा शहर है। सुबह 6.10 में दाभोई से चलने वाली 52046 पैसेंजर 12.15 बजे मोती कोराल पहुंचती है। इस मार्ग पर कुल 15 रेलवे स्टेशन हैं। दभोई से मियागाम करजन होते हुए मालसर तक नैरो गेज रेल जाती है। वहीं दभोई से दूसरा नैरोगेज रेलमार्ग चंदोद तक जाता है। मियागाम करजन बड़ौदा मुंबई मुख्यमार्ग पर ब्राडगेज का रेलवे स्टेशन है। मियागाम करजन से दभोई की दूरी 32 किलोमीटर है। वहीं दभोई से चंदोद की दूरी 19 किलोमीटर है। अब वडोदरा से दभोई होते हुए छोटा उदयपुर के लिए ब्राडगेज रेलवे लाइन बन चुकी है।


दभोई से जुड़ा नैरो गेज नेटवर्क –


चंदोद से दभोई - 19 किलोमीटर
दभोई से मियागाम करजन – 32 किलोमीटर
मियागाम करजन से मालसर – 38 किलोमीटर


vidyutp@gmail.com 

( GUJRAT NARROW GAUGE, DABHOI   1) 


Sunday, February 22, 2015

पहली नैरोगेज लाइन गुजरात में – बैल खींचते थे रेलगाड़ी

दभोई का स्टीम शेड ( एक ब्रिटिश फोटोग्राफर के कैमरे से) 
नैरोगेज की बात करें तो इसका मतलब 2 फीट 6 ईंच ( 762 एमएम) पटरियों के बीच की चौड़ाई वाली रेलवे लाइन। हालांकि कुछ नैरो गेज लाइनों की चौड़ाई दो फीट भी है। भारत में पहली नैरोगेज लाइन गुजरात में 1862 में दभोई से मियागाम के बीच बिछाई गई। ये 762 एमएम की नैरो गेज लाइन गायकवाड बडौदा स्टेट रेलवे ने बिछाई। इस रेलवे लाइन की योजना बनाई थी बड़ौदा के महाराजा सर खांडेराव गायकवाड ने। यह रेलवे बड़ौदा के गायकवाड रियासत के अंतर्गत आती थी। इस लाइन को बिछाने का ठेका नीलसन एंड कंपनी ने लिया था। वडोदरा जिले के दभोई से मियागाम के बीच बिछाई गई इस रेलवे लाइन की कुल लंबाई 20 मील ( 30 किलोमीटर ) थी। हालांकि यहां रेलगाड़ी की बोगियों को खींचने के लिए बैलों को इस्तेमाल किया जाता था। अगले एक दशक तक बैल ही इस्तेमाल किए जाते रहे। बाद बैलों की अलोकप्रियता को देखते हुए 1873 रेल की पटरियों में बदलाव कर यहां भारी पटरियां बिछाई गईं तब इन्हें लोको ( इंजन) से खींचने के लिए स्टीम इंजन लाए गए। पहले बिछाई गई पटरियां हल्की थीं, लिहाजा वे स्टीम इंजन चलाए जाने के अनुकूल नहीं थीं। स्टीम इंजन से चलने वाली रेलवे के लिहाज से भी 1873 में ये देश की पहली नैरोगेज रेलवे लाइन थी।

कभी गुजरात में था नैरोगेज रेलवे का बड़ा नेटवर्क
कभी गुजरात में था सबसे लंबा ढाई फीट का नैरो गेज नेटवर्क। 
बड़ौदा के महाराजा गायकवाड ने अपनी कंपनी जीबीएसआर ( गायकवाड बडौदा स्टेट रेलवे) के तहत नैरो गेज रेलों का एक बड़ा जाल बिछाया। उनका उद्देश्य राज्य के सभी प्रमुख शहरों को बड़ी लाइन के नेटवर्क ( बांबे बड़ौदा सेंट्रल रेलवे) से नैरोगेज के संपर्क मार्गों से जोड़ने का था। इस मार्ग दभोई नैरोगेज का बड़ा केंद्र बन गया। बाद में इस नैरोगेज मार्ग का विस्तार चांदोद, जांबुसार, छोटा उदयपुर, टिंबा जैसे शहरों तक किया गया। जीबीएसआर के नेटवर्क के तहत पेटलाड से दूसरे नैरोगेज लाइन का भी निर्माण कराया गया। वहीं नवसारी में दूसरे नैरोगेज लाइन का निर्माण कराया गया। यहां कोसांबा से उमरपाडा और बिलीमोरा से वघई के बीच नैरोगेज लाइनें बिछाई गईं। 

वहीं बोदेली छोटा उदयपुर रेलवे कंपनी गायकवाड और छोटा उदयपुर महाराजा की संयुक्त स्वामीत्व वाली कंपनी थी। एक फरवरी 1917 को बोदेली और छोटा उदयपुर के बीच रेलवे लाइन का संचालन शुरू हुआ। 36.48 किलोमीटर लंबी लाइन के निर्माण में तब 10 लाख रुपये का खर्च आया था। अब इस क्षेत्र के कई रेल मार्ग ब्राड गेज में बदले जा चुके हैं फिर भी गुजरात में 260 किलोमीटर से ज्यादा लंबा नैरो गेज रेलमार्ग संचालन में है।
    

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( GUJRAT NARROW GAUGE, DABHOI   1) 

Saturday, February 21, 2015

जनशताब्दी एक्सप्रेस का सुहाना सफर – जबलपुर से इटारसी

मध्य प्रदेश का शहर जबलपुर। इसे मध्य प्रदेश के लोग संस्कार धानी कहते हैं। पर रेलवे स्टेशन के दोनों तरफ मुआयना करने पर कोई ऐसी बात नजर नहीं आती। रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक की तरफ बाहर निकलो तो काफी दूर जाकर बाजार है। वहीं प्लेटफार्म नंबर छह के बाहर की सड़क पर गंदगी का आलम है।

 दोनों तरफ शराब की दुकानें और टूटी फूटी सड़के शहर को लेकर प्रथम दृष्टया प्रभाव को खराब करती हैं। रेलवे स्टेशन दोनों तरफ कोई आवासीय होटल लाज आदि नहीं है। अगर आपको शहर में रात गुजारनी है तो बस स्टैंड जाना होगा। बड़ी मुश्किल से प्लेटफार्म नंबर छह की तरफ बाहर आने पर होटल विक्रम नजर आया। पर होटल के कमरे बुरी हालत में थे। सुबह सुबह ट्रेन पकड़नी थी इसलिए इसी में ठिकाना बनाना पड़ा।

सुबह जबलपुर से भोपाल जनशताब्दी एक्सप्रेस की टिकट लेने पहुंचा। एक खास काउंटर पर पीले रंगे के पुराने गत्ते वाले टिकट के दर्शन हुए। सबसे अच्छी बात की टिकट के पीछे कोच नंबर और बर्थ नंबर लिख कर दिया जा रहा था। पता चला कि एक कोच की पूरी टिकटें रेलवे स्टेशन से करंट में मैनुअल तरीके से बुक की जाती हैं। ये बड़ी अच्छी बात रही मेरे हक में। मुझे इटारसी जाने के लिए तुरंत फुरंत आरक्षित टिकट मिल गया।

जनशताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन प्लेटफार्म नंबर 5 से समय पर खुली। ट्रेन के आगे बढ़ने पर उगते हुए सूर्य के दर्शन हुए। नरसिंहपुर के पास सुहानी सुबह देखने को मिली।
उगता सूरज...नरसिंहपुर मध्य प्रदेश - फोटो - विद्युत 

थोडी देर बाद पिपरिया स्टेशन आया। पिपरिया मध्य प्रदेश के खूबसूरत हिल स्टेशन पचमढ़ी जाने के लिए सबसे निकट का रेलवे स्टेशन है। यहां से पचमढी 55 किलोमीटर है। ट्रेन ने सही समय पर इटारसी पहुंचा दिया। इटारसी वह स्टेशन है जहां से मैं अनगिनत बार गुजर चुका हूं। सबसे अच्छा लगता है इस स्टेशन पर मिलने वाला सस्ता और अच्छा खाना। कभी यहां मैंने खाई थी 30 पैसे की रोटियां। अभी भी यहां 20 रुपये का खाना मिल जाता है।

इस बार मैं इटारसी स्टेशन से बाहर निकला। नास्त में लिया पोहा और जलेबी। मध्य प्रदेश का सदाबहार नास्ता। 15 रुपये में। वैसे यहां कई जगह 5 रुपये का पोहा भी मिलता है। मुझे लगता है ये देश का सबसे सस्ता और अच्छा नास्ता है।

मुझे जाना है बैतूल। पर वहां के लिए जाने वाली ट्रेन देर से है। मैंने इस सफर बस से करने की सोची। इटारसी रेलवे स्टेशन के बगल में ही बस स्टैंड है। मध्य प्रदेश में तो सरकारी बसें चलती ही नहीं है। बैतूल के लिए निजी बस जाने को तैयार थी। मिनी बस थी। जगह मिल गई।

हालांकि बस में काफी भीड़ थी, पर रास्ते में लोग उतरते जा रहे थे। 90 किलोमीटर का सफर। कसला, सुखतवा, भौरा, शाहपुर, बरठा, नीमपानी पाढर के बाद आ गया बैतूल। अब बैतूल की बातें अगले अध्याय में।



( JABALPUR TO ITARSI, JAN SHATABDI EX.  ) 

Friday, February 20, 2015

बंद हुई जबलपुर –नैनपुर नैरोगेज - हो गया मेगा ब्लॉकेज

और सतपुड़ा एक्सप्रेस का रोमांचक सफर हमेशा के लिए थम गया। एक अक्टूबर 2015 से जबलपुर-नैनपुर खंड छोटी लाइन को बंद कर दिया गया है। ऐसे में इस पटरी पर रोजाना दौड़नेवाली 24 ट्रेनों का सफर हमेशा के लिए खत्म हो गया है। इसके साथ ही 111 साल का शानदार सफर इतिहास बन गया।न सिर्फ सतपुड़ा एक्सप्रेस बल्कि तमाम ट्रेनें अब इतिहास के पन्नों का हिस्सा बन चुकी हैं। एशिया का सबसे बड़ा नैरोगेज का जंक्शन नैनपुर भी अब इतिहास बन चुका है। इसी साल जनवरी में मुझे सतपुड़ा एक्सप्रेस से सफर करने का सौभाग्य मिला था। तब रास्ते में जगह जगह आमान परिवर्तन का काम दिखाई  दे रहा था। तब ये उम्मीद नहीं थी इतनी जल्दी एक सतपुड़ा के जंगलों के बीच से सबसे छोटी लाइन की छुक छुक बंद हो जाएगी।
सतपुड़ा एक्सप्रेस लोगों के बीच इतनी लोकप्रिय थी कि इलाके के लोग हम बड़ी लाइन में भी सतपुड़ा एक्सप्रेस देखना चाहते हैं इस तरह की मांग के समर्थन में अभियान चला रहे हैं। लोग चाहते हैं कि भविष्य में जब बड़ी लाइन चालू हो तो ट्रेन का नंबर भी वही रहे।


 5 जुलाई 1904 को इस ट्रेन ने जबलपुर से अपने सफर की शुरुआत की थी। आखिरी दिनों में लोग बंद हो रही छोटी लाइन के सफर को अनुभव के रूप में लिए यात्रा की होड़ में लगे दिखाई दिए। लोग इस यादगार लम्हों को अपनी यादों में सहेज लेना चाहते थे। रेलवे इस मार्ग के किसी एक स्टेशन पर नैरोगेज का म्युजिम बनाने पर विचार कर रहा है। यह नैनपुर में बनाया जा सकता है। 

वहीं एक नवंबर से नैनपुर और बालाघाट के बीच भी छोटी लाइन बंद हो जाएगी। इस लाइन पर आमान परिवर्तन करके बड़ी लाइन दौड़ने में दो साल लग सकते हैं। दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे में अब सिर्फ नागपुर नागभीर लाइन ही एक मात्र नैरोगेज लाइन के रूप में बची है।
नैनपुर जबलपुर के बीच चलने वाले लोगों के लिए 30 सितंबर 2015 का दिन भावनों से भरा हुआ था। लोग अपनी महबूब ट्रेन का आखिरी सफर देखर रहे थे। कोई सेल्फी ले रहा था तो कोई ड्राईवर से गले मिल कर  रो रहा था। मुश्किलें भी तो होंगी अगले कुछ साल इस मार्ग पर बिना रेल के सफर करना पड़ेगा। ( 01 अक्तूबर 2015 को बालाघाट जबलपुर रेलवे लाइन इतिहास के पन्नों में समा गई ) 
-         विद्युत प्रकाश मौर्य  vidyutp@gmail.com

( SATPURA NARROW GAUGE, BALAGHAT, JABALPUR, NAINPUR JN - 6)

Thursday, February 19, 2015

इतिहास के पन्नों में समा जाएगा सतपुड़ा नैरो गेज

नागपुर से छिंदवाड़ा की इस ऐतिहासिक नैरोगेज रेलवे लाइन को ब्राडगेज में परिवर्तित किया जा रहा है। इसमें कुछ रेलवे स्टेशनों का स्थान बदला भी जा रहा है। 2007-08 में इस लाइन को ब्राडगेज में बदलने का काम शुरू हुआ था। लक्ष्य 2011 में इसे पूरा कर लेने का था। पर काम धीमी गति से चलता रहा। इससे प्रोजेक्ट की लागात में भी इजाफा हुआ। इस लाइन पर सौंसर के पास 69वें किलोमीटर पर एक सुरंग का भी निर्माण किया जा रहा है। इस मार्ग पर भिमालगोंडी और भंडाराकुंड के बीच काफी घने जंगल और घाटियां हैं। 

निर्माण में आ रही मुश्किलों और चुनौतियों के कारण ये प्रोजेक्ट कई साल लेट हो चुका है। इस मार्ग पर रामाकोना के पास कानहन नदी पर नए पुल का निर्माण किया गया है। जब 2007 में इस आमान परिवर्तन परियोजना की शुरुआत हुई तो इसकी लागात 663.66 करोड़ रुपये आंकी गई थी, पर अब देरी के कारण इसके लागात में इजाफा होता जा रहा है।

इसी तरह जबलपुर से बालाघाट तक 177 किलोमीटर के मार्ग को ब्राडगेज में बदलने का काम जारी है। पर यह काम भी धीमी गति से चल रहा है। जबलपुर से नैनपुर रेल खंड पर शुरुआत के 40 किलोमीटर तक तो ब्राडगेज लाइन बिछाई भी जा चुकी है। इस रेल मार्ग में कई जगह पुराने मार्ग में बदलाव किया गया है। जबलपुर से आगे नर्मदा नदी के तट पर ग्वारीघाट का नया स्टेशन पुराने स्टेशन से एक किलोमीटर आगे बनाया गया है। इस मार्ग पर ब्राडगेज परिवर्तन के दौरान रेलवे को जमीन अधिग्रहण और वन विभाग से क्लियरेंस लेने में भी दिक्कते आईं। इन सब कारणों से परियोजना का समय आगे बढ़ता जा रहा है। इस मार्ग पर ब्राडगेज बनने के बाद जबलपुर और गोंदिया के बीच पुराने 29 रेलवे स्टेशनों की जगह 31 रेलवे स्टेशन बनाए जा रहे हैं। इनमें निधानी और गढ़ा दो नए स्टेशन होंगे।

उपेक्षित है नागपुर नागभीड नैरो गेज
नागपुर जंक्शन से नागभीड नैरो गेज लाइन सबसे ज्यादा उपेक्षा का शिकार है। 109 किलोमीटर के इस मार्ग पर 19 रेलवे स्टेशन हैं। सुबह 5.55 में चलने वाली 58843 नागपुर नागभीड पैसेंजर सुबह 10.35 बजे नागभीड पहुंच जाती है। इसी तरह नागभीड से सुबह 6.15 में 58844 पैसेंजर नागपुर के लिए चलती है। दोनों स्टेशनों के बीच तीन जोड़ी रेलगाड़ियां रोज चलाई जाती हैं। ये महाराष्ट्र की सबसे लंबी नैरो गेज रेलवे लाइन है।
पर रेलवे के लिए ये घाटे की रेलवे लाइन है। इसके आमान परिवर्तन की कोई योजना नहीं है। नागभीड महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले में आता है। इलाके के लोग कई बार इस रेल मार्ग को भी बड़ी लाइन में बदलने की मांग कर चुके हैं। पर योजना आयोग ने इस पर कभी ध्यान ही नहीं दिया। हालांकि गोंदिया से नागभीड मार्ग के ब्राडगेज हो जाने के कारण नागभीड बड़ी लाइन पर आ चुका है, पर नागभीर से नागपुर की नैरो गेज लाइन उपेक्षित पड़ी है।

 2011 के रेल बजट के दौरान तत्कालीन रेल मंत्री ममता बनर्जी ने जिन 190 परियोजनाओं को 12वीं पंच वर्षीय योजना में शुरू करने की बात कही थी उसमें नागपुर नागभीड लाइन का भी नाम था। पर इस लाइन पर कोई प्रगति नहीं हो सकी। जुलाई 2014 में रेल बजट से पहले गोंदिया भंडारा के भाजपा सांसद नाना पटोले ने नागपुर नागभीड लाइन को ब्राडगेज में बदले जाने की मांग एक बार फिर उठाई थी।
-vidyutp@gmail.com



Wednesday, February 18, 2015

सतपुड़ा एक्सप्रेस का रोमांचक सफर

सतपुड़ा की हरी भरी वादियों के बीच नैरोगेज की पटरियों पर चलने वाली कई ट्रेनों के बीच सतपुड़ा एक्सप्रेस इस क्षेत्र की सबसे लोकप्रिय ट्रेन है। ये एक्सप्रेस ट्रेन सात घंटे में आपको जबलपुर से बालाघाट पहुंचाती है। 10002 जबलपुर-बालाघाट सुबह 5.30 बजे चलने वाली ट्रेन दोपहर 12 बजे बालाघाट पहुंच जाती है। वहां से वही रैक वापसी में चलती है जबलपुर के लिए 10001 बनकर। बालाघाट से जबलपुर के बीच 187 किलोमीटर का सफर तय करती है सतपुड़ा एक्सप्रेस। आजकल सतपुड़ा एक्सप्रेस में जेडीएम सीरीज का लोको (इंजन) लगा हुआ है।
अतीत में सतपुड़ा एक्सप्रेस जबलपुर से गोंदिया के बीच जेडई सीरीज के स्टीम लोको से संचालित होती थी। पर अब बालाघाट से गोंदिया के बीच ब्राडगेज लाइन बिछाए जाने के बाद जबलपुर से बालाघाट के बीच ही चलती है।

इस नैरोगेज की एक्सप्रेस ट्रेन में कुल 10 कोच होते हैं। इसमें बीच में एक प्रथम श्रेणी का भी कोच लगा होता है। वास्तव में जिस कोच को फर्स्ट क्लास का डिब्बा बनाया गया है यह अतीत में अधिकारियों का इंस्पेक्सन कोच हुआ करता था। इसमें एक हिस्सा अधिकारियों का विश्रामालय था तो दूसरा हिस्सा रसोई घर। रसोई घर और विश्रामालय जाने के लिए अलग अलग दरवाजे होते थे। अब इनमें मामूली बदलाव कर यात्रियों के बैठने के लिए बना दिया गया है। लेकिन रसोई यान वाले हिस्से और मुख्य हिस्से के बीच अंदर से कोई संपर्क नहीं है। सातपुड़ा एक्सप्रेस में प्रथम श्रेणी का किराया 400 रुपये है। इसके प्रथम श्रेणी में बैठकर आपको ऐसा एहसास होता है मानो आप किसी घर के ड्राइंग रूम में बैठकर सफर कर रहे हों। इस श्रेणी में सफर के लिए रेलवे की वेबसाइट पर अग्रिम आरक्षण कराया जा सकता है। वहीं द्वितीय श्रेणी में सतपुड़ा एक्सप्रेस में बालाघाट से जबलपुर का किराया 70 रुपये है। बालाघाट से जबलपुर के बीच कुल 24 मध्यवर्ती स्टेशन हैं पर सतपुड़ा एक्सप्रेस सिर्फ 9 स्टेशनों पर रुकती है। पर पहाड़ों की ये रानी ट्रेन आपको 27 से 30 किलोमीटर प्रतिघंटे की औसत रफ्तार में जबलपुर पहुंचाती है। अगर आप सातपुड़ा के घने जंगलों को देखने की तमन्ना रखते हैं तो सतपुड़ा एक्सप्रेस में बैठकर सफर करने से बेहतरीन तरीका और कुछ नहीं हो सकता है।

सतपुड़ा एक्सप्रेस जबलपुर से निकलने के बाद ग्वारीघाट में नर्मदा नदी पर बने पुल से गुजरती है। ये लोहे का पुल 100 साल से ज्यादा पुराना है जो आज भी पूरी तरह से बेहतर हालत में है।
बालाघाट मध्य प्रदेश का ऐसा जिला है जो महाराष्ट्र की सीमा से लगा हुआ है। शहर बिल्कुल शांत नजर आता है। रेलवे स्टेशन कभी शहर के बाहर हुआ करता था। पर अब स्टेशन के बाहर वाली सड़क पर चाय नास्ता की दुकानें और ठहरने के लिए लॉज आदि उपलब्ध है। हालांकि ये छोटी लाइन और बड़ी लाइन का स्टेशन है पर स्टेशन पर भीड़भाड़ नजर नहीं आती। बालाघाट स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर कैंटीन है जिसे साफ सफाई और सज्जा के लिए रेलवे महाप्रबंधक की ओर से सम्मान पत्र मिल चुका है। इस कैंटीन में नास्ते के लिए 10 रुपये में पोहा और 5 रुपये प्रति पीस समोसे उपलब्ध हैं।
बालाघाट जंक्शन – बालाघाट जंक्शन का प्लेटफार्म नंबर एक नैरोगेज ट्रेन के लिए है, जबकि दो नंबर पर ब्राडगेज वाली ट्रेनें आती हैं। यहां से नैरोगेज पैसेंजर और एक्सप्रेस ट्रेनें आमतौर पर हर रोज समय पर खुलती हैं। स्टेशन पर रेलवे स्टाफ पूरे अनुशासन में दिखाई देते हैं।

समनपुर – सातपुड़ा एक्सप्रेस बालाघाट जंक्शन को छोड़ती है उसके बाद ही सतपुडा की हरी भरी वादियां मन मोहने लगती हैं। नदी, पहाड़, जंगल, खेत सब कुछ नजर आते हैं। कहीं कहीं रेलवे लाइन के साथ साथ सड़क भी कदमताल मिलाती नजर आती है। 17 वें किलोमीटर पर समनपुर रेलवे स्टेशन आता है जो सातपुड़ा एक्सप्रेस का पहला ठहराव है।

   
चारेगांव 30वें किलोमीटर पर चारेगांव रेलवे स्टेशन आता है। स्टेशन पर इन बीच के स्टेशनों पर बहुत बड़ी भीड़ चढती उतरती हुई नहीं दिखाई देती है। 

लामता – 40वें किलोमीटर पर लामता रेलवे स्टेशन है। ये बालाघाट जिले का आखिरी बड़ा रेलवे स्टेशन है। बरसात के दिनों में अगर आप सातपुड़ा एक्सप्रेस के सफर पर हैं तो बारिश और हरियाली के बीच आनंद और भी बढ़ जाता है।
नगरवारा – 357 मीटर की ऊंचाई पर स्थित नगरवारा रेलवे स्टेशन से मंडला जिले की शुरुआत हो जाती है। आप बालाघाट से 50 किलोमीटर की दूरी तय कर चुके हैं।

नैनपुर जंक्शन - बालाघाट से 77वें किलोमीटर पर नैनपुर जंक्शन आता है। यहां सतपुड़ा एक्सप्रेस 20 मिनट रुकती है। इस दौरान इसका लोको इंजन यहां कई बार बदला जाता है।
 
पिंडरई – समुद्र तल से 455 मीटर की ऊंचाई पर पिंडरई बालाघाट से 89वें किलोमीटर पर स्थित है। दूरी के लिहाज से ये बालाघाट और जबलपुर के बीच का स्टेशन हो सकता है।

घनसौर – 565 मीटर की ऊंचाई पर बना ये नैरोगेज नेटवर्क के सबसे ऊंचे रेलवे स्टेशनों में से है सतपुड़ा एक्सप्रेस के मार्ग पर। घनसौर सिवनी जिले में पड़ता है।

शिकारा – सतपुड़ा एक्सप्रेस शाम को 5.40 के आसपास शिकारा पहुंचती है। ये जबलपुर से 45 किलोमीटर की दूरी पर और बालाघाट की तरफ से 133 किलोमीटर की दूरी है। कहा जाता है कि यहां घने जंगलों में कभी जबलपुर से लोग शिकार करने आते थे। इसलिए इस जगह का नाम शिकारा पड़ गया। आजकल भी यह जबलपुर के निकट का पिकनिक स्पाट है। शिकारा रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर नारियल के सुस्वादु लड्डू बिकते हुए नजर आए। नास्ते के लिए समोसे और जलेबी भी यहां मिल जाती है।

बरगी – बालाघाट से 159 किलोमीटर की दूरी पर बरगी जबलपुर जिले का रेलवे स्टेशन है। यहां पास में नर्मदा नदी पर बांध बनाया गया है। बरगी के बाद ग्वारीघाट में नर्मदा नदी पर ऐतिहासिक पुल आता है। यहां नदी के तट पर गुरुद्वारा और आश्रम बने हैं। बड़ी संख्या में लोग यहां नर्मदा में स्नान के लिए आते हैं।

हाउबाग जबलपुर – ग्वारीघाट के बाद ट्रेन जबलपुर शहर में प्रवेश कर जाती है। हाउबाग जबलपुर वास्तव में जबलपुर शहर में नैरोगेज का बड़ा स्टेशन है। यहां मालगोदाम और ट्रेन के रखरखाव आदि की सुविधा उपलब्ध है। वास्तव में हाउबाग नैरोगेज नेटवर्क का बड़ा डिपो है। जबलपुर शहर जाने वाले यात्री बड़ी संख्या में हाउबाग में ही उतर जाते हैं। यहां से बस स्टैंड और अन्य इलाके में जाने की सुविधा भी उपलब्ध है।

जबलपुर  – सतपुड़ा एक्सप्रेस बड़ी ही शान से जबलपुर मुख्य रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर पहुंचती है। यहां वह रात भर आराम फरमाती है क्योंकि सुबह फिर उसी पुराने सफर पर जो निकल जाना है।

सतपुड़ा एक्सप्रेस के द्वितीय श्रेणी के कोच में बैठने के लिए कुल 44 सीटें हैं। सीटें आरामदायक हैं। हर कोच में टायलेट भी है। एक बैठने की सीट बिल्कुल टायलेट और कोच के प्रवेश द्वार के बीच बनाई गई है। कोच में लगेज रखने के लिए सीट के ऊपर प्रयाप्त जगह प्रदान की गई है।

सतपुडा एक्सप्रेस में जलपिहरी बेचते बच्चे। 
ये जलपिहरी क्या है - शिकारा रेलवे स्टेशन पर सतपुड़ा एक्सप्रेस के प्लेटफार्म पर ट्रेन के पहुंचते ही ढेर सारे बच्चों का हुजुम हर कोच के पास पहुंच गया। ये बच्चे चिल्ला चिल्ला कर जलपिहरी बेच रहे थे। मैंने कौतुहल वश जानना चाहा कि ये जल पिहरी क्या है.. बच्चों ने बताया नदी से ढूंढकर निकालते हैं। एक किस्म की जडी बूटी है। इसकी तासीर गर्म है। तवे पर भून कर पानी या शहर के साथ खा लें। सर्दी जुकाम खत्म हो जाएगा। मैंने भी जलपिहरी खरीद ली। पांच रुपये में दो पुडिया। बाद में दूसरे बच्चे आए वे पांच में तीन देने की बात कहने लगे। तो हमारे सहयात्री ने तीन जलपिहरी खरीद ली।

Tuesday, February 17, 2015

सतपुड़ा नैरोगेज रेल- शताब्दी का सफर

सतपुड़ा की वादियों में नैरोगेज रेल सेवा की शुरुआत बंगाल नागपुर रेलवे के द्वारा बीसवीं सदी के प्रारंभ में की गईं। पहाड़ी इलाका होने के कारण इस रेल मार्ग में कई तीखे मोड़ पड़ रहे थे लिहाजा कम खर्च में पहाड़ों के लिए मुफीद गेज नैरो गेज का चयन किया गया। ये लाइन 2 फीट 6 इंच यानी 762 एमएम की है। सतपुड़ा के घने जंगलों के बीच ज्यादातर रेलवे लाइनें 1901 से 1910 से बीच बिछाई गईं। रेल लाइन बिछाने का ठेका गुजरात के गुर्जर क्षत्रिय ठेकेदारों को मिला। इस मार्ग में ज्यादातर रास्ते पहाड़ी हैं। कई जगह छोटी-छोटी नदियों पर पुल बनाए गए हैं। वहीं नैरोगेज ट्रेन मार्ग में कई जगह घुमाव लेती है जहां बड़ा ही दिलकश नजारा दिखाई देता है। प्रारंभ में इस क्षेत्र में रेलवे लाइन के निर्माण के लिए कई कंपनियां बनाई गईं जिन्हें बाद में सतपुड़ा रेलवे में समाहित कर दिया गया।

सन 1920 में नागपुर-छिंदवाड़ा रेलवे और गोंदिया-चांदा रेलवे को मिलाकर सतपुड़ा रेलवे की स्थापना की गई। सतपुड़ा रेलवे भारत सरकार के स्वामित्व में था जिसका संचालन बंगाल नागपुर रेलवे कर रहा था। 14 अप्रैल 1952 को सतपुड़ा रेलवे को पूर्व रेलवे का हिस्सा बना दिया गया। गोंदिया से नैनपुर जंक्शन लाइन ( 77 मील) पर सेवा 18 अप्रैल 1903 को शुरू हुई। इसमें गोंदिया से बालाघाट का मार्ग ब्राड गेज में परिवर्तित हो चुका है।

नैनपुर जंक्शन से जबलपुर लाइन
नैनपुर से बरगी ( 51 मील) - 05 जुलाई 1904 को शुरुआत
बरगी से हाउबाग जबलपुर  ( 16 मील) 7 जुलाई 1905
हाउबाग जबलपुर से जबलपुर (1 मील)  15 सितंबर 1905

नैनपुर से छिंदवाड़ा लाइन ( 87 मील)
नैनपुर से सिवनी (47 मील) – 12 फरवरी 1904 को शुरुआत
सिवनी से चुराई ( 19 मील) – 27 जुलाई 1904 को शुरुआत
चुराई से छिंदवाड़ा ( 21 मील) – 1 सितंबर 1904 को शुरुआत हुई
नैनपुर जंक्शन से गढ़ मंडला लाइन ( 22 मील) की शुरुआत 15 फरवरी 1909 को हुई। 
बालाघाट जंक्शन के बड़ी लाइन का प्लेटफार्म नंबर 2

नागपुर-छिंदवाड़ा नैरोगेज लाइन  - नागपुर छिंदवाड़ा के बीच 147 किलोमीटर लंबे नैरोगेज लाइन की शुरूआत 1 जनवरी 1911 को हुई। इसकी कुल लंबाई 88 मील है। इतवारी जंक्शन से लोधीखेड़ा ( 39 मील) मार्ग 1 जनवरी 1911 को चालू हुआ। लोधीखेडा से सौसर ( 7 मील) लाइन की शुरुआत 10 मई 1911 को हुई। सौसर से छिंदवाड़ा तक 42 मील लाइन की शुरुआत 20 अक्तूबर 1913 को हुई।

नागपुर नागभीर नैरोगेज - नागभीर नागपुर लाइन ( 62 मील) – नागभीर से इतवारी जंक्शन तक के लाइन की शुरुआत 10 नवंबर 1908 को हुई। इतवारी से मोतीबाग लाइन ( 4 मील) की शुरुआत 1 जून 1909 को हुई। मोतीबाग से नागपुर जंक्शन ( आधा मील) लाइन की शुरुआत 1 जुलाई 1925 को हुई। नागभीर से गोंदिया जंक्शन के बीच नैरोगेज लाइन को 2005 में ब्राडगेज में बदला जा चुका है।


( SATPURA NARROW GAUGE, BALAGHAT, JABALPUR, NAINPUR JN - 3)