Saturday, January 31, 2015

ऊंचे पहाड़ों पर बसती हैं डोंगरगढ़ की मां बमलेश्वरी देवी

देश भर में देवियां पहाड़ो पर बसती हैं जिनके दर्शन के लिए आपको सैकड़ो सीढ़िया चढ़नी पड़ती है। इनमें हिमाचल की नैना देवी और मध्य प्रदेश की मैहर देवी प्रसिद्ध हैं। पर छत्तीसगढ़ की बमलेश्वरी देवी के दर्शन के लिए एक हजार से ज्यादा सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है।

राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ रेलवे स्टेशन के पास मां बमलेश्वरी देवी मंदिर एक पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। यह बड़ी बमलेश्वरी के नाम से भी जाना जाता है। बमलेश्वरी देवी 1600 फीट की चोटी पर माता बमलेश्वरी विराजमान हैं। देवी के दर्शन के लिए लोगों को 1100 से ज्यादा सीढियां चढ़ के जाना पड़ता है। छोटी बमलेश्वरी मंदिर नीचे भू-तल पर ही स्थित है।

मां का मंदिर प्राकृति के अदभुत खूबसूरत नजारों के बीच है। पहाडिय़ों पर घुमावदार सीढियां चढ़ के रोज के श्रद्धालु देवी बमलेश्वरी के दरबार में माथा टेकने पहुंचते हैं। पहले मंदिर तक पहुंचने का रास्ता दुर्गम था। 1964 में खैरागढ़ राजपरिवार ने बमलेश्वरी देवी ट्रस्ट समिति बनाई जिसके बाद मंदिर तक जाने के लिए व्यवस्थित सीढियां बनाई गई। रास्ते में भक्तों के लिए पानी की व्यवस्था की गई।

मंदिर की कथा - कहा जाता है कि 2200 साल पहले डोंगरगढ़ कामाख्या नगरी के तौर पर जाना जाता था। मां बम्लेश्वरी देवी शक्तिपीठ का इतिहास लगभग 2200 वर्ष पुराना है। डोंगरगढ़ से प्राप्त भग्रावेशों से प्राचीन कामावती नगरी होने के प्रमाण मिले हैं। पूर्व में डोंगरगढ़ ही वैभवशाली कामाख्या नगरी कहलाती थी। एक स्थानीय राजा वीरसेन  निःसंतान था और कहा जाता है। उसने  अपने शाही पुजारियों के सुझावों से  देवताओं को पूजा कर विशेष  रूप से शिव पारवती जी की  करके मनौती मानी एक साल के भीतर, रानी वे मदनसेन  नाम एक पुत्र को जन्म दिया। राजा वीरसेन   ने इसे  भगवान शिव और पार्वती की एक वरदान मान उनकी  सम्मान में  मां बमलेश्वरी का मंदिर बनवाया

अब शानदार रोपवे – अब मां बमलेश्वरी तक जाने के लिए रोप वे की व्यवस्था भी की गई है। 2 अक्तूबर 2005 में यहां रोपवे की सुविधा आरंभ हुई। रोपवे सुबह 8 बजे से 1 बजे तक और शाम 3 से 6 बजे के बीच खुला रहता है। ये बंद रोपवे है जिसके हर कार में 4 लोग बैठ सकते हैं। इसलिए ये राजगीर के रोपवे की तरह खतरनाक नहीं है। ये छत्तीसगढ़ राज्य का एकमात्र रोपवे है। रोपवे से चढाई करते समय आसपास के प्राकृतिक नजारे मनमोह लेते हैं। रोपवे का आने जाने का किराया 43 रुपये है। ( रोपवे पूछताछ - 0783-232993)  


नवरात्र में मेला - वैसे तो मंदिर में साल भर दर्शनार्थी पहुंचते हैं। पर यहां दशहरा और रामनवमी के त्योहार पर राज्य भर से भारी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। नवविवाहित जोड़े,  नवजात बच्चों को लेकर देवी का आशीर्वाद दिलाने साल भर यहां आते हैं। दोनों नवरात्र में पहाड़ी के नीचे मेला लगता है, नवरात्र में लाखों श्रद्धालु बमलेश्वरी के दर्शन के लिए आते हैं।

पदयात्रा कर मां के दरबार में - नवरात्रि के समय तो मीलों पैदल चलकर मां के दरबार में श्रद्धालु पहुंचते हैं। प्रदेश के प्राय: सभी क्षेत्रों से लोग नवरात्र शुरू होते ही पैदल डोंगरगढ़ तक की यात्रा करते हैं।

मंदिर सुबह 4.30 बजे से दोपहर 1.30 बजे तक और दोपहर 2.30 बजे से रात्रि 10 बजे तक खुला रहता है। मंदिर परिसर में छिरपानी कैंटीन के पास श्रद्धालुओं के रहने के लिए बमलेश्वरी ट्रस्ट की ओर से निर्मित धर्मशाला उपलब्ध है। इसमें समान्य कमरे से लेकर वातानुकूलित और कूलर वाले कमरे रियायती दरों पर उपलब्ध हैं।

कैसे पहुंचे - मां बमलेश्वरी के दरबार से सबसे निकट का रेलवे स्टेशन डोंगरगढ़ है। यह छतीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 106 किलोमीटर है। यह नागपुर, रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग, राजनांदगांव आदि शहरों से रेल मार्ग से जुड़ा हुआ है। अलावा रायपुर से डोंगरगढ़ सड़क मार्ग से भी पहुंचा जा सकता है। मां बमलेश्वरी ट्रस्ट की वेबसाइट पर जाएं। आप इस मंदिर के एचडीएफसी बैंक की साइट से  ऑनलाइन भी दान कर सकते हैं। 



रायपुर में स्वामी विवेकानंद

विवेकानंद सरोवर शहर के बीचो-बीच स्थित है। बूढापारा तालाब का नया नाम विवेकानंद सरोवर है। कहा जाता है कि यह झील इस शहर के जितनी ही पुरानी है। इसे बूढा झील भी कहा जाता है जिसका मतलब है पुरानी झील। यह रायपुर की सबसे बड़ी झील भी है। तालाब को 600 वर्ष पहले कल्चुरी वंश के राजाओं द्वारा खुदवाया गया था। इतिहासकारों के मुताबिक यह पहले 150 एकड़ में था जो अब मात्र लगभग 60 एकड़ में ही सीमित हो गया है।

इस झील में स्वामी विवेकानंद की 37 फीट ऊँची प्रतिमा बनी हुई है जिसका नाम मूर्तियों का सबसे बड़ा नमूना होने के कारण लिम्का बुक में दर्ज किया गया है। इसका निर्माण 2004 से 2006 के बीच हुआ। इसके वास्तुकार हैं पद्मश्री जे एस नेल्सन।

झील में बोटिंग का मजा
यहां तालाब में आप नौका विहार का आनंद भी ले सकते हैं। नौका विहार की दरें भी काफी सस्ती हैं। महज 40 रुपये में आधे घंटे। एक बोट पर सवार हो सकते हैं चार लोग। शाम के समय तालाब में उभरती दूधिया रोशनी यहां की सुंदरता को बढ़ा देती है। वैसे रायपुर शहर में और भी कई तालाब हैं। शहर में तेलीबंधा तालाब, राजा तालाब, पुराना तालाब, टीकापारा तालाब, महाराजाबंद तालाब हैं। पर इन सबका दायरा अब सिकुड़ता जा रहा है।

विवेकानंद ने गुजारे थे यहां डेढ साल
रायपुर इस बात का गौरव अनुभव करता है कि स्वामी विवेकानंद ने यहां डेढ़ वर्ष से अधिक का समय गुजारे।  हालांकि तब वे स्वामी विवेकानंद नहीं थे बल्कि किशोरवय के नरेन्द्रनाथ दत्त थे जो अपने परिवार के साथ रायपुर आये थे. यहां रहते हुये उनके भीतर जो संस्कार उत्पन्न हुये और उनके ज्ञान का लोहा माना गया जिसने बाद में उन्हें स्वामी विवेकानंद के रूप में संसार में प्रतिष्ठापित किया। 

विवेकानंद के कुछ जीवनीकारों ने लिखा है कि नरेन्द्र एवं उनके घर के लोग नागपुर से बैलगाड़ी द्वारा रायपुर गये, पर नरेन्द्र को इस यात्रा में जो एक अलौकिक अनुभव हुआ। तब रायपुर में अच्छा विद्यालय नहीं था। इसलिए नरेन्द्रनाथ पिता से ही पढ़ा करते थे। डेढ़ वर्ष रायपुर में रहकर विश्वनाथ सपरिवार कलकत्ता लौट आये। तब तक नरेन्द्र का शरीर स्वस्थ, सबल और हृष्ट-पुष्ट हो गया और मन उन्नत। यानी नरेंद्र के विवेकानंद बनने में रायपुर की बड़ी भूमिका है। स्वामी विवेकानंद की याद में रायपुर के एयरपोर्ट का नाम स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट रखा गया है।

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Friday, January 30, 2015

रायपुर में टैक्सी में दौड़ने लगी नैनो

टाटा की नन्ही कार नैनो अब टैक्सी में दौड़ने लगी है।  इसकी शुरूआत हो रही है छतीसगढ़ की राजधानी रायपुर से। रायपुर की रेडियो टैक्सी सेवा में नैनो दौड़ने लगी है। इसके लिए कुछ नैनो टैक्सियां तो रायपुर की सड़कों पर प्रयोग के तौर पर उतर चुकी हैं वहीं 40 टैक्सियां नैनो प्लांट की ओर से बनकर रायपुर में उतर रही हैं। ये सभी नैनो टैक्सियां पेट्रोल चलित हैं। रायपुर शहर का गुरूकृपा मोटर्स इन्हे टैक्सी सेवा में संचालित कर रहा है। इसके लिए राज्य सरकार से अनुमति ले ली गई है।

पूरे देश में रायपुर ऐसा पहला शहर है जहां पर नैनो कार टैक्सी सेवा में दौड़ती हुई नजर आएगी। इसका शुरुआती किराया 50 रुपये है जो एक किलोमीटर के लिए है। इसके बाद 5 किलोमीटर के लिए 98 रुपये वहीं 10 किलोमीटर के लिए 158 रुपये किराया तय किया गया है। नैनो टैक्सी की ये खास बात है कि इसके अंदर सीसीटीवी कैमरा लगा है। यात्रियों की बातचीत की वीडियो और आडियो रिकार्डिंग होगी। साथ ही टैक्सी में पैनिक बटन भी लगाया गया है। इसे महिलाओं के लिए भी पूरी तरह सुरक्षित बनाया गया है। रेडियो टैक्सी में जीपीएस सिस्टम लगा हुआ है। हर टैक्सी की लोकेशन कंट्रोल रूम को लगातार दिखाई देती रहती है। टैक्सी बुलाने के लिए आपको काल सेंटर के नंबर पर फोन घुमाना होगा। सभी नैनो टैक्सियां वातानुकूलित हैं। इनका किराया इतना कम रखा गया है कि यह आटो रिक्शा बुक कराने के बराबर सस्ती हों। हालांकि दिल्ली की सस्ती कैब सेवा से तुलना करें तो इसका प्रारंभिक किराया ज्यादा है। टैक्सी फार श्योर 49 रुपये किराया शुरुआती 4 किलोमीटर के लिए वसूल करती है।

 
रायपुर की नैनो टैक्सी के साथ ड्राइवरों को रोजगार देने और स्वावलंबी बनाने की भी योजना है। कंपनी के साथ अनुबंध पर लगातार 3 साल टैक्सी चलाने के बाद नैनो कार ड्राइवर की अपनी हो जाएगा। इस तीन साल के दौरान एक निश्चित रकम ड्राइवर को हर माह कंपनी को अदा करना है। हालांकि श्रीलंका में साल 2011 से ही नैनो कार टैक्सी के रूप में संचालित की जा रही है। वहां मध्यम वर्ग के लोगों में नैनो टैक्सी काफी लोकप्रिय है।
नगर निगम के सामने लगे आटो एक्सपो में 13 जनवरी को नैनो टैक्सियां मुझे डिस्प्ले में लगीं दिखाई दे गईं। बाद में समाचार पत्रों से मालूम हुआ कि 26 जनवरी को निर्भया टैक्सी सेवा के नाम से इनका संचालन शुरू हो गया है।
-vidyutp@gmail.com






घड़ी चौक से धड़कता है रायपुर का दिल

रायपुर रेलवे स्टेशन की बाह्य नजारा काफी खूबसूरत दिखाई देता है। स्टील के फ्रेम से सजी स्टेशन की इमारत इस बात का संदेश देती है कि राज्य में बड़े स्टील प्लांट हैं। स्टेशन परिसर से शहर के कोने कोने में जाने के लिए सिटी बसें और आटो रिक्शा मिलते हैं। स्टेशन के बाहर देर रात तक चहल पहल रहती है। वहीं स्टेशन के प्लेट फार्म नंबर के एक के आसपास कई अच्छे फूट ज्वाएंट्स भी बन गए हैं। पर शहर का दिल धड़कता है घड़ी चौक से। रायपुर शहर के बीचों बीच स्थित है नगर घड़ी चौक। शहर के हर इलाके से घड़ी चौक के लिए आटो रिक्शा मिलते हैं। इसी तरह घड़ी चौक से शहर के दूसरे सभी कोनों के लिए वाहन मिल जाते हैं।

घड़ी चौक चौक पर कोने में विशाल घड़ी लगी है जिसके चारों तरफ समय देखा जा सकता है। इस घडी की खास बात ये है कि हर घंटे पर जो ध्वनि सुनाई देती है उसमें छत्तीसगढ़ी संस्कृति की खूशबु महसूस की जा सकती है। घंटे के साथ लोकसंगीत की धुन सुनाई दे जाती है। ये है इस घड़ी की खास बात। रायपुर शहर के लोगों के लिए घड़ी चौक उनके जीवन में रचा बसा है पर बाहर से आए लोगों के लिए ये कौतूहल की बात हो सकती है। घड़ी चौक से थोड़ी दूरी पर ही राज्यपाल का निवास है।

रायपुर शहर के पुराने मुहल्लों के नाम में पारा लगा हुआ है। बंगाल के शहरों  पाड़ा लगता रहता है। रायपुर के पुराने मुहल्लों में है रामसागर पारा जहां लोकप्रिय समाचार पत्र देशबंधु का दफ्तर है। इसके अलावा नर्मदा पारा,  लोधी पारा , नवा पारा जैसे मुहल्ले शहर में हैं।

अब रायपुर शहर से बाहर राजिम मार्ग पर नई राजधानी बसाई गई है। रायपुर से 25 किलोमीटर आगे बस रही नई राजधानी का का नाम नया रायपुर दिया गया है। इसे चंडीगढ़ और गांधीनगर की तरह प्लांड सिटी के तौर पर बसाया जा रहा है। शहर को जोड़ने के लिए अच्छी सड़कें और रेलवे लाइन भी बिछाई जाने वाली है।

पांच रुपये में दाल भात
रेलवे स्टेशन से एक किलोमीटर की दूरी पर है रायपुर की सेंट्रल जेल। जेल के मुख्य द्वार के पास माता का मंदिर है। वहीं दूसरी तरफ सरकार की ओर चलाया जाने वाला एक फूड स्टाल है। दाल भात का स्टाल। यहां पांच रुपये में दाल भात मिलती है। सबके लिए। मुझे तमिलनाडु में चलाए जाने वाले अम्मा किचेन की याद आ गई जहां सबके लिए इडली सांभर और चावल रियायती मूल्य पर उपलब्ध कराया जाता है। तो छत्तीसगढ़ में चाउर वाले बाबा रमन सिंह की योजना है पांच रुपये में दाल भात। हालांकि ये भरपेट नहीं है, फिर भी गरीबों को राहत तो देती है। हालांकि राज्य के कई इलाके में शुरू किए गए अन्नपूर्णा दाल भात सेंटर बंद हो चुके हैं। कई जगह योजना लोकप्रिय नहीं हो सकी। छत्तीसगढ़ सरकार ने 2005 में ये योजना आरंभ की थी। थोड़ी मात्रा में दाल भात को काफी लोगों ने पसंद नहीं किया। वहीं राज्य सरकार की दो रुपये किलो की दर से बीपीएल परिवार को चावल देने की योजना के कारण भी ये सेंटर ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो सके।
झारखंड में अर्जुन मुंडा की सरकार ने भी 5 रुपये में दाल भात की योजना शुरू की थी। पर हेमंत सोरन की सरकार ने ऐसे सेंटरों को चावल उपलब्ध कराना बंद कर दिया। लिहाजा वहां भी योजना दम तोड़ रही है। 

-    -  विद्युत प्रकाश मौर्य





Thursday, January 29, 2015

बिलासपुर वाली भौजी...

बिलासपुर यानी छत्तीसगढ़ का दूसरा बड़ा शहर। छत्तीसगढ़ में इसे न्यायधानी कहते हैं क्योंकि यहां राज्य का हाईकोर्ट स्थित है। ये राज्य का चाकचिक्य वाला शहर है। रेलवे स्टेशन अति व्यस्त है। बिलासपुर में मेरे कालेज के दिनों के दोस्त रहते हैं असुरारि प्रसाद। पर समय के अभाव के कारण मैं उनसे मिलने नहीं जा पाया। शाम को हमने यहां से कोरबा मेमू पकड़ी। मेमू ने या मेन लाइन इलेक्ट्रिकल मल्टीपल यूनिट। ऐसी ट्रेन बड़े शहर से आसपास के शहरों को जोडने के लिए चलाई जाती हैं। इसके डिब्बे आपस में जुड़े होते हैं। साथ ही इसमें टायलेट भी होता है। ट्रेन अपने समय से चल पड़ी। हमारे आसपास कई देवर भौजाई सफर कर रहे थे। सो सफर के साथ उनकी चुहलबाजी भी जारी थी। भौजाई बड़ी शोख थीं। वे देवर जी के साथ कोई परीक्षा देकर लौट रही हैं। उन्हें पूरी उम्मीद थी इस सरकारी नौकरी को लेकर। भैया दुखी हो रहे थे जब से शादी हुई है बीवी का हुकुम बजा रहा हूं। अपने मन की बात नहीं कर पाता। इससे तो कुआंरा ही भला था। भौजाई तो ऐसा पति पाकर पुलकित थीं। मुझे याद आया हमारी भी एक भारी बिलासपुर वाली हैं। बड़ी चंचल और शोख। पर अब ले कलकतिया भौजाई बन गई हैं। बातों बातों में चांपा जंक्शन या हमारी मंजिल आ गई। चांपा जंक्शन पर रेलवे बुक स्टाल चलाने वाले सज्जन आरा ( बिहार) के रहने वाले हैं।

बात बिलासपुर की कर रहा था। मुझे याद आता है जब 2007 में मैं ईटीवी के मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ चैनल में हुआ करता था तब बिलासुपुर की खबरें रोज मिलती थीं। बड़ा जिंदादिल शहर है बिलासपुर। वैसे देश में दो और बिलासपुर हैं। एक तो हिमाचल प्रदेश का जिला है बिलासपुर। दूसरा बिलासपुर उत्तर प्रदेश में रामपुर के पास है। छत्तीसगढ़ का बिलासपुर इतिहास में कलचुरि शासकों के अधीन आता था जिनकी राजधानी रतनपुर में थी। शहर में गुरुघासीदास विश्वविद्यालय है। अभी सुंदरलाल शर्मा खुला विश्वविद्यालय की स्थापना भी शहर में हुई है। बिलासपुर अब साउथ इस्ट सेंट्रल रेलवे यानी रेलवे के एक जोन का मुख्यालय भी है।

 इस जोन में छत्तीसगढ, ओडिशा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के स्टेशन आते हैं। बिलासपुर में मुझे रेलवे की उदघोषणा सुनकर सुखद अचरज हुआ। यहां अंग्रेजी हिंदी के अलावा छतीसगढ़ी जुबान में भी आने जाने वाली ट्रेनों की जानकारी दी जाती है।
छत्तीसगढ़ के सरकारी दुग्ध उत्पादक ब्रांड भी पेड़े का निर्माण करता है। इसके पेड़े के ब्रांड का नाम देवभोग है। 160 रुपये में आधा किलो पेड़ा। छत्तीसगढ़ के ज्यादातर रेलवे स्टेशनों पर देवभोग पेडे के स्टाल दिखाई दे जाते हैं। अगर आप छत्तीसगढ़ में हैं इन पेडे का स्वाद जरूर लें।

--- विद्युत प्रकाश मौर्य
बिलासपुर पर केंद्रित एक वेबसाइट - http://www.merabsp.com/


पत्रकार माधवराव सप्रे का शहर पेंड्रा

एक बार फिर पेंड्रा रोड पर था। बिलासपुर पैसेंजर का इंतजार। सोचा थोड़ा पेंड्रा के बाजार में टहल आता हूं। एक मिठाई की दुकान नजर आती है। लिखा है- बेहतरीन गुणवत्ता वाली चीजें कभी सस्ते में नहीं मिल सकतीं। बिल्कुल सही बात है। गुणवत्ता हमेशा कीमत चुकाने से ही मिलती है।

पेंड्रा छोटा सा लेकिन ऐतिहासिक बाजार है। लेकिन पत्रकारिता में इसका अवदान बहुत बड़ा है। महान साहित्यकार और पत्रकार माधवराव सप्रे ने सन 1900 में जब समूचे  छत्तीसगढ़ एक भी प्रिंटिंग प्रेस नही था तब उन्होंने बिलासपुर जिले के एक छोटे से कस्बे पेंड्रा से छत्तीसगढ़ मित्रनामक मासिक पत्रिका निकाली यह पत्रिका  तीन साल तक सफलतापूर्वक चली। सप्रे का जन्म दामोह जिले में हुआ था आज उनके नाम पर भोपाल में विशाल संग्रहालय  है।  माधवराव सप्रे संग्रहालय।  http://www.sapresangrahalaya.com/index.htm उस महान आत्मा को नमन करते हुए फिर स्टेशन वापस आ जाता हूं। हमारी ट्रेन का समय हो गया है। पेंड्रा रोड से ट्रेन चलने के बाद ट्रेन खोडरी, भांवर टोंक, तेंगानमाडा,  बेलगहना, सालका रोड, करगीरोड, कलमीटार, घुटकू और उसलपुर में रूकती है। उसलपुर तो बिलासपुर शहर का बाहरी इलाका है। पेंड्रा के बाद खोडरी के आसपास वन क्षेत्र आता है। बताते हैं कि यहां सड़कों पर भालू आदि जंगलों से निकल कर आ जाते हैं।

जारी है लकड़ी की तस्करी


पेंड्रा के आसपास के जंगलों से लकड़ी की तस्करी का खेल सालों भर बदस्तूर चलता है। गरीब लोग जंगल से लकड़ियां तोड़कर लाते हैं। लकड़ियों के गट्ठर बनाकर शहर के होटलों को ढाबों के बेचते हैं। ये उनकी रोजी रोटी का साधन है। पर है तो वन विभाग के कानून के मुताबिक वनोपज की तस्करी। इसलिए वन विभाग ऐसे लोगों को गाहे बगाहे पकड़ता रहता है। मैंने अमरकंटक में देखा वहां सारे होटल और चाय की दुकानों की भट्ठी लकड़ी से ही चलती है। आसपास के जंगलों से लकड़ियां सस्ती मिल जाती हैं। अमरकंटक के होटल वाले लकड़ी का एक गट्ठर 50 रुपये में खरीदते हैं। बिलासपुर पैसेंजर में खोडरी और उसके बाद महिलाएं लकड़ी के गट्ठर लेकर ट्रेन में चढ़ने लगीं। पैसेंजर के दरवाजे और सभी टायलेट को अंदर बाहर लकड़ियों के गट्ठर से भर दिया। एक महिला ने बताया कि वह जंगल में दूसरे लोगों से लकड़ियां खरीदती है। एक गट्ठर 35 रुपये में। बिलासपुर शहर में होटलों को बेच आती हैं 70 रुपये में। पर हर गट्ठर पर 35 रुपये कमाई में काफी मेहनत है।

जंगल में जो लोग लकड़ियां तोड़ते हैं उन्हें जंगली जानवरों भालू आदि से खतरा रहता है। वहीं ट्रेन में लकड़ी की तस्करी में हमेशा सावधानी बरतनी पड़ती है। एक महिला ट्रेन में सारी लकड़ियां चढ़ा लेने के बाद घूम घूम कर मूंगफली बेचने लगी। यानी एक साथ दो दो कारोबार। पापी पेट के लिए सब कुछ करना पड़ता है। बताने लगी जब वन विभाग वाले लकड़ी पकड़ लेते हैं जो जुर्माना तो नहीं होता पर लकड़ी जब्त हो जाती है। महीने में तीन चार बार ऐसा हो ही जाता है। बिलासपुर आने पहले ये महिलाएं लकड़ियों को ताबडतोड़ रेल से सड़कों पर फेंकने लगीं। वहां उनके साथी इन बंडलों को उठाने से लिए पहले से ही मौजूद रहते हैं। ये रोज का कारोबार है। पर इस तस्करी के कारोबार में में मेहनत भी है और खतरा भी। पर पेट की आग बुझाने के लिए लकड़ी की आग तो जलानी ही पड़ती है।

---- विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com ( MADHAV RAO SAPRE, PENDRA ROAD, WOOD CUTTING FROM FOREST ) 



Wednesday, January 28, 2015

चांपा की कचौड़ी चाट जलेबी के साथ

चांपा छतीसगढ़ के जांजगीर जिले का शहर। मुंबई-कोलकाता मार्ग का प्रमुख रेलवे स्टेशन है। रेलवे स्टेशन के सामने वाली कालोनी में रहते हैं मेरे पुराने दोस्त प्रो. भूपेंद्र पटेल।

 सुबह कालोनी के प्रवेश द्वार पर नास्ते में कचौड़ी खाई। 10 रुपये की कचौडी में सब्जी, दही चटनी डालकर। ये चाट जैसी हो जाती है। इस कचौडी को बनाने वाले बिहार के रहने वाले हैं। पिछले 40 सालों से यहां आकर दुकान चला रहा है। बताते हैं कि उनकी कचौड़ी की इतनी मांग है पूरी कालोनी के लोग घर में पार्टी करने के लिए हमारी दुकान से ही कचौड़ी मंगाते हैं। वाकई स्वाद का जवाब नहीं। दस रुपये मे कचौडी की प्लेट। चाहो तो साथ में जलेबी या चाय भी ले लो।



चांपा में कई साल बाद मिलना हुआ प्रो अश्वनी केशरवानी से। वैसे तो वे कालेज में विज्ञान के शिक्षक हैं पर उनकी रूचि धर्म संस्कृति और छतीसगढ़ के इतिहास में ज्यादा है। उनसे 1992 में दिल्ली में राष्ट्रीय युवा योजना के आर्गनाइजर्स मीट में मुलाकात हुई थी। प्रो केसरवानी छत्तीसगढ़ के इतिहास और लोक संस्कृति पर कई पुस्तकें लिख चुके हैं। उनके घर कई दशक बाद की मुलाकात अविस्मरणीय रहेगी। मैं 1992 में बीए में पढ़ रहा था। अब मैं 40 पार कर रहा हूं तो वे 60 के करीब। केशरवानी जी ने छत्तीसगढ़ पर लिखी अपनी तीन किताबें मुझे भेंट की। 

सुबह मैंने गेवरा रोड गोंदिया जनशताब्दी एक्सप्रेस पकड़ी रायपुर के लिए। जनशताब्दी में करेंट टिकट खरीदने के बाद भी बैठने की जगह बड़ी ही सुगमता से मिल गई। ट्रेन में मेरी बगल वाली सीट पर बैठे थे प्रो रामायण पात्रे जो कोरबा के मिनी माता महाविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर हैं। उनसे छत्तीसगढ़ी भाषा पर वार्ता करते हुए कब रायपुर आ गया पता ही नहीं चला।


गोल्डेन रेस्टोरेंट की 50 रुपये की थाली
रायपुर रेलवे स्टेशन चमचमाता हुआ साफ सुथरा है। स्टेशन के ठीक सामने रहने और खाने पीने के लिए कई होटल हैं जो देर रात का खुले रहते हैं। कई होटलों का मीनू देखने के बाद मैंने गोल्डेन रेस्टोरेंट की थाली खाना पसंद किया। 50 रुपये की थाली में 4 चपाती, दो सब्जियां, दाल और सलाद। सब्जियां भी थोडी नहीं भरपूर मात्रा में। भाई 50 रुपये में शानदार थाली है। वेटरों की सर्विस बहुत तेज है। रेस्टोरेंट में महिलाएं काम करती हैं। वह भी रात 10 बजे तक। वर्दी में तैनात महिलाएं ग्राहकों का का पूरा ख्याल रखती हैं। रेलवे स्टेशन के सामने के होटलों में हर तरह का स्वाद उपलब्ध है। उत्तर भारतीय थाली, दक्षिण का मसाला डोसा, इडली सांभर और बिरयानी भी। ट्रेन पकड़ने वालों के लिए फटाफट पैंकिंग का भी इंतजाम है।



रेलगाड़ी का कोच नहीं जनाब रेस्टोरेंट
 रायपुर की सड़कों पर घूमते हुए नगर निगम के पास वाली सड़क पर शानदार चौपाटी नजर आती है। काफी कुछ इलाहाबाद के सिविल लाइंस की तरह। इस चौपाटी पर फुटपाथ पर एक रेस्टोरेंट है। बिल्कुल किसी रेलगाड़ी के कोच की तरह। पर इसके अंदर बैठकर खाने का सुंदर इंतजाम है। ये रेलवे द्वारा संचालित नहीं है पर जिसकी भी परिकल्पना हो, है काफी सुंदर।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य

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अमरकंटक का दिगंबर जैन मंदिर

अमरकंटक का एक और आकर्षण है भगवान आदिनाथ का जैन मंदिर। दूर से देखने में अमरकंटक का सर्वोदय जैन मंदिर काफी हद अक्षरधाम मंदिर गुजरात की तरह लगता है। चार एकड़ में फैला ये मंदिर जैन समाज का बड़ा प्रोजेक्ट है। इसके निर्माण पर 20 करोड़ से ज्यादा राशि खर्च की जा रही है। इसके डिजाइन और निर्माण में 300 कलाकार लगे हैं। मंदिर में भगवान आदिनात की 24 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित की गई है। वे अष्टधातु के बने कमल सिंहासन पर विराजमान हैं।  इसे आचार्य श्री विद्यासागरजी ने 6 नवम्बर 2006 को विधि-विधान से स्थापति किया गया हैप्रतिमा 28 टन के कमल पुष्प पर विराजित है वो भी अष्टधातु  निर्मित है।  मंदिर के गुंबद की ऊंचाई 144 फीट है।

मंदिर अमरकंटक शहर में पहले से ही सबसे ऊंचे स्थल पर स्थित है। इसके निर्माण में गुलाबी रंग के बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस मंदिर को बनाने में सीमेंट और लोहे का इस्‍तेमाल नहीं किया गया है। मंदिर में स्‍थापित मूर्ति का वजन 24 टन के करीब है। 

अमरकंटक में भी है टेबल लैंड 
श्री सर्वोदय दिगंबर जैन मंदिर, अमरकंटकमध्य प्रदेश में निर्माणाधीन है।  यह भारत में बनने वाला सुंदर मंदिर दुनिया के सबसे बड़े अष्टधातु के मंदिरों में एक होगा। इस मंदिर का निर्माण विगत कई वर्षों से हो रहा है। मंदिर का सिंहद्वार 51 फीट ऊँचा 42 फीट लम्बा होगा। कहा जा रहा कि मंदिर का निर्माम कार्य 2015 तक पूरा हो जाएगा। जैन मंदिर में अतिथियों के रहने के लिए आवास का भी इंतजाम है।

एक टेबल लैंड यहां भी -  हमने इससे पहले महाबलेश्वर में विशाल टेबल लैंड देखा था। टेबल लैंड पहाड़ पर एक समतल जमीन होती है। पर मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि अमरकंटक में भी एक विशाल टेबल लैंड है। ये स्थल जैन मंदिर के पास ही है। ये टेबल लैंड हालांकि महाबलेश्वर की तरह आकार में बड़ा नहीं है। पर है काफी सुंदर।  स्थानीय लोग बताते हैं यहां पर हेलीकाप्टर उतारा जाता है।

तो अब हमारा अमरकंटक का सफर अब खत्म होने वाला था। अब बारी अमरकंटक से विदा होने की थी। मैंने बस स्टैंड से बस की तलाश शुरू की। बस तो नहीं मिली पर छोटे चार पहिया ( टाटा आयरिश) वाले मिल गए। बोले हम आपको पेंड्रा रोड पहुंचा देंगे। आपकी ट्रेन से पहले ही। इस गाड़ी में एक बार फिर मेकाल पर्वत श्रंखला के जंगलों के बीच से सफर आरंभ हुआ। एक तरफ पहाड़ दूसरी तरफ गहरी खाई। 

उनके इस छोटी सी बस पर आगे लिखा था अमरकंटक दर्शन तो पीछे की ओर लिखा था बड़ा ही भावनात्मक संदेश - फिर कब आओगे अमरकंटक....
पढकर जी में यही विचार आया...हम तो बार बार आएंगे अमरकंटक... देखिए कब दुबारा आना होता है इस पवित्र शहर में। 

-     --- विद्युत प्रकाश मौर्य
(AMARKANTAK, SON, JAIN TEMPLE, HILL STATION ) 



Tuesday, January 27, 2015

अमरकंटक का गुरुद्वारा - यहां का संदेश प्यारा

अमरकंटक का रिश्ता सिख धर्म से भी है। सिखों के पहले गुरू गुरुनानक देव जी अमरकंटक आए थे। पहले गुरू ने देश दुनिया में अनंत यात्राएं की थी। उन्होंने मां नर्मदा के साथ साथ भी लंबी यात्रा की थी। नर्मदा के उदगम वाले शहर में उनकी याद में एक गुरुद्वारा भी बना है। ये गुरुवादारा नर्मदा कुंड से बस स्टैंड जाने वाली सड़क पर स्थित है। अमरकंटक का गुरुद्वारा प्रसिद्ध कल्याण आश्रम के ठीक बाद स्थित है। गुरुद्वारे में श्रद्धालुओं के रहने के लिए आवास का भी इंतजाम है। हर रोज यहां गुरु का लंगर चलता है। गुरुद्वारा के ठीक सामने मध्य प्रदेश शासन ने खूबसूरत पार्क बनवा दिया है। इस पार्क में बोटिंग का भी इंतजाम है।


अमरंकटक गुरुद्वारे के सेवादार हैं सरदार एचएस गरेवाल। उनकी उम्र 82 साल है पर उत्साह नौजवानों जैसा है। वे अति आशावादी हैं। रेलवे से अवकाश प्राप्त करने के बाद खुद को गुरु घर की सेवा में लगा दिया। पर उनके विचार जाति धर्म से उपर उठकर मानवतावादी और सर्व धर्म समभाव के हैं। सिर्फ विचार नहीं वे उसे अपनी जिंदगी में जीते भी हैं।

रेलवे के गार्ड पद से रिटायर हुए गरेवाल अपने पेंशन के पूरे 15 हजार समाज को समर्पित कर देते हैं। कहते हैं- बेटे तो कमा ही रहे हैं। भला उन्हें देने की क्या जरूरत है। मेरा पैसा जरूरतमंदों के काम आना चाहिए। एक मई 1933 को लुधियाना में जन्मे गरेवाल ने पंजाब कृषि विश्वविद्यालय से पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान खेल में रूचि थी। फुटबाल पृथ्वीपाल के साथ खूब फुटबाल भी खेला। बाद में रेलवे की सेवा में आए। पर समय से पहले वीआरएस लेकर समाज सेवा में जुट गए। वे 1993 से अमरकंटक गुरुद्वारे की सेवा में हैं। गरेवाल साहब के विचारों के दर्शन अमरकंटक गुरुद्वारे के प्रवेश द्वार से ही होने लगते हैं। प्रवेश द्वार और उसके आसपास राष्ट्रीय एकता और विश्वबंधुत्व के नारे सहज भाषा में लिखे गए हैं।
गुरुद्वारे में कई दर्जन स्थानीय बच्चे शिक्षा पाते हैं। उनका जीवन, दानापानी यहीं से चलता है। अब आईए जानते हैं गरेवाल साहब के संदेश क्या हैं।

हम सदा  सच बोलेंगे 

हम चोरी नहीं करेंगे
हम देश और संसार को  खूबसूरत बनाएंगे
सब इंसान भाई भाई हैं
बड़ों ने दुनिया बिगाड़ी है
अब बच्चों की बारी है
हम सब मुल्कों की हद मिटाएंगे
सब दुनिया को एक बनाएंगे
ना हम हिंदू ना हम मुसलमान
हम सब हैं बस इंसान
हम सब तरफ प्यार ही प्यार फैलाएंगे
इन सबके बाद होता है सत श्री अकाल

इतना ही नहीं समाज को सुधारने के लिए गरेवाल साहब के और भी सपने हैं... वे बढ़ती आबादी को लेकर काफी चिंतित हैं। उनका संदेश है कि आबादी को रोकने के लिए दो बच्चे नहीं बल्कि हर व्यक्ति को सिर्फ एक ही बच्चा करना चाहिए।

अगर चाहते हो देश का कल्याण – बढती आबादी पर दो ध्यान
दो के दो भी हैं ज्यादा- इससे भी नहीं होगा फायदा
बस एक ही हो बच्चा – जो है सबसे अच्छा
लड़की हो या लड़का...इनमें फर्क न हो तिनका

हमारे ऐसे हैं सपने .... सब बच्चों को समझे अपने
मगर अफसोस इंसान हो गया खुदगर्ज
नहीं समझ रहा है अपना फर्ज।

गरेवाल साहब के इस संदेश से आज के नेताओं को सीख लेनी चाहिए जो कभी चार तो कभी दस बच्चे पैदा करने का फरमान बिना सोचे समझे जारी कर देते हैं।

-    ---------- विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com
गुरुद्वारा अमरकंटक की वेबसाइट - http://amarkantakgurudwara.org/contact.aspx


Monday, January 26, 2015

सोन नदी का सुनहला पानी, सुनहला बालू

अमरकंट - सोनमुडा की वादियां।
सोन नदी का पानी सुनहले रंग का होता है और उसका बालू भी सुनहले रंग का होता है। सोन का उदगम मध्य प्रदेश के अमरकंटक से हुआ है पर वह सबसे ज्यादा बिहार और झारखंड प्रदेश के खेतों को सींचित करती है। पटना से ठीक पहले सोन गंगा नदी मे जाकर मिल जाती है। सोन नदी की कुल लंबाई 784 किलोमीटर है। रोहतास जिले के शहर डेहरी का पूरा नाम डेहरी ओन सोन है क्योंकि वह सोन नदी के किनारे है। मध्य प्रदेश का सीधी जिला भी सोन की जद में है। वहीं उत्तर प्रदेश में एक जिले का नाम ही रखा गया है सोनभद्र। बिहार में सोन नदी भोजपुरी और मगही भाषा के बीच सांस्कृतिक विभाजन भी करती है। सोन के पश्चिम तट के लोग भोजपुरी बोलते हैं तो पूरब के लोग मगही।
सोनमुडा जाने का रास्ता। 


डेहरी ओन सोन में सोन पर रेल और सड़क पुल बना है तो पटना आरा के बीच कोईलवर में सोन पर ऐतिहासिक रेल सह सड़क पुल है। सोन पर अब्दुल बारी सेतु का निर्माण 1861 में हुआ था। 2008 में सोन नदी पर अरवल और सहार के बीच एक सड़क पुल का निर्माण हुआ। बिहार मे सिंचाई के लिए सोन पर 1874 में बांध बना कर नहरें निकाली गईं। वहीं 1968 में यहां से 8 किलोमीटर आगे इंद्रपुरी बैराज का निर्माण कराया गया। सोन नदी भोजपुर रोहतास जिले की जीवनधारा है। सोन के जल से शाहाबाद, गया और पटना जिलों के लगभग सात लाख एकड़ भूमि की सिंचाई होती है।

अमरकंटक में है सोन का उदगम

सोन की धारा। 
मैं बचपन से अपने गांव में सोन नदी से आते हुए नहर को देखता आया हूं। इस नहर के पानी से ही हमारे खेत लहलहाते हैं। सोन नहर में पानी न आए तो हमारे खेत बंजर रह जाएं। सोन का पानी ही है जो हमारी मिट्टी से सोना उगाता  है। तो भला मैं अमरकंट पहुंचा था तो सोन के उदगम स्थल को देखे बिना कैसे लौट आता है। 11 जनवरी की सुबह मैंने स्थानीय लोगों से जानकारी ली। नर्मदा कुंड से सोनमुडा ( सोन के उदगम स्थल) की दूरी डेढ किलोमीटर है।  नर्मदा नदी यहां से पश्चिम की तरफ तो सोन नदी पूर्व दिशा में बहती है।

बर्फानी आश्रम में रुकने से पहले हमारे टैक्सी वाले ने अगले दिन अमरकंटक के सभी दर्शनीय स्थलों को घूमाने के लिए कहा था पर वह सुबह 10 बजे से पहले जाने को तैयार नहीं था। इसलिए मैंने सुबह सुबह ही पदयात्रा करने की ठानी। वैसे भी मैं हर शहर में सुबह सुबह घूमना पसंद करता हूं। मुझे उस सोन नदी का उदगम देखने जाना था जिसके पानी के साथ मैंने बचपन में खूब अटखेलियां जो की थीं... नर्मदा कुंड से सोनमुडा का रास्ता जंगलों से होकर जाता है। पक्की सड़क बनी है। यह रास्ता अत्यंत ही मनोरम है।

अदभुत है सोनमुडा में सूर्योदय देखना

अमरकंटक - सोनमुडा की सुबह। 
सोनमुडा जाकर पता चला कि यहां बड़ी संख्या में लोग सूर्योदय देखने आते हैं। यानी सोनमुडा सन राइज प्वांट है। वहां कई गाड़ियां पहले से ही पहुंची हुई थीं। लोग पहुंचे हुए थे। सोनमुडा में बडी संख्या में बंदर हैं, काले मुंह वाले। इनके लिए अगर आप चना लेकर नहीं जाएंगे तो वे आपके ऊपर हमला कर सकते हैं। 

सावधानी से चलते हुए मैं सनराइज प्वाइंट पर पहुंचा। यहां सोन की जल धारा जल प्रपात के तौर पर कई सौ मीटर नीचे घाटी में गिरती हुई दिखाई देती है। नजारा अत्यंत मनोरम है। जल प्रपात से पहले सोन और भद्र की धाराएं मिलती हैं। इसलिए सोन का पूरा नाम सोनभद्र है। सोनमुडा में एक मंदिर भी है। यहां अमरंकटक की घाटियों से मिलने वाली जड़ी बूटियों की का केंद्र भी है। इन जड़ी बूटियों से कई तरह की बीमारियों का उपचार होता है।

चाय वाले भी पत्रकार भी- सोनमुड़ा में कैंटीन चलाने वाले गजानन गर्ग से मेरी मुलाकात होती है। गजानन बताते हैं कि उनके पुरखे यूपी के उन्नाव से आए थे। तीन पीढ़ी पहले। पंडिताई करने। पर अब पंडिताई में इतना लाभ नहीं है। इसलिए चाय की यह कैंटीन खोल ली है। 

गजानन जी चाय बेचने के साथ ही पत्रकारिता भी करते हैं। वे अपना प्रेस कार्ड दिखाते हैं। पत्रकारिता के साथ चाय की कैंटीन को वे बड़े सम्मान से लेते हैं। अब तो उनका गर्व और बढ़ गया है क्योंकि एक चायवाला देश का प्रधानमंत्री बन चुका है। जब मैंने उनसे कहा कि आपकी एक फोटो खींच लूं तो उन्होंने गर्व से कहां हां जरूर लिजिए। 

सीधी जिले में सोन के किनारे मकर संक्रांति का मेला। 
अब बात सोन नदी की। कन्हर, रिहंद, बनास, गोपद, बीजल, सोप जैसी छतीसगढ़ की नदियां सोन में आगे आकर मिल जाती हैं। सोन अमरकंटक से निकलने के बाद मध्य प्रदेश के सीधी जिले से होकर गुजरती है। सीधी जिले के चुरहट शहर से 14 किलोमीटर की दूरी पर नदी का तट है। यहां पर हर साल मकर संक्रांति के मौके पर बड़ा मेला लगता है।

 मध्य प्रदेश के सीधी जिले के लाखों श्रद्धालु सोन नदी मे डुबकी लगा कर मकर संक्रांति पर्व का फल प्राप्त करते हैं। जिले के रामपुर नैकिन थाना के शिकारगंज के भंवरसेन घाट, खैरा घाट, महेशन घाट,  भितरी, कोल्दह, चुरहट, गऊघाट, पिपरोहर पर नदी तट पर मेले का आयोजन होता है।

-    -----विद्युत प्रकाश मौर्य 

( ( AMARKANTAK, SON RIVER, SONMUDA, SUNRISE POINT. SIDHI DISTRICT ) 

Sunday, January 25, 2015

अमरकंटक के प्राचीन मंदिर

अमरकंटक में नर्मदा कुंड के ठीक सामने अति सुंदर मंदिरों का समूह दिखाई देता है। यह एक प्राचीन मंदिर समूह का परिसर है। इस परिसर की देखरेख भारतीय पुरात्तव सर्वेक्षण के अधीन है। सुबके सूर्य की पहली किरण के साथ ये मंदिर समूह दमकते हुए दिखाई देते हैं।

इस परिसर में स्थित मंदिरों का निर्माण कलचुरि शासन काल में दसवीं से 12वीं सदी के बीच हुआ है। इन मंदिरों को देखकर लगता है कि उस काल खंड में अमरकंट अत्यंत प्रसिद्ध धार्मिक क्षेत्र रहा होगा। इन मंदिरों को देखने के लिए सुबह 6 बजे से सूर्यास्त तक देखा जा सकता है। यह पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से कर्मचारी तैनात किए गए हैं। इस परिसर में सबसे प्रमुख मंदिर है पतालेश्वर मंदिर है जो भगवान शिव का मंदिर है। 



इन मंदिरों का निर्माण कलचुरि शासक कर्णदेव ने कराया था। कर्णदेव का काल 1041 से 1073 ईश्वी का रहा है। मंदिर के निर्माण में बलुआ पत्थरों का इस्तेमाल हुआ है। कलचुरि शासक कर्णदेव के काल को स्थापत्य कला की दृष्टि से समृद्ध काल माना जाता है। मुखमंडप, मंडप और गृभगृहों का बनावट अदभुत है। मंडप की बाहरी दीवारें खुली हुई हैं और छतें अलंकृत स्तंभों पर खड़ी हैं।

पतालेश्वर मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण मूल रूप से शंकराचार्य ने आठवीं सदी में कराया था। बाद में राजा कर्णदेव ने उसे शानदार वास्तुकला का रूप प्रदान किया। इस मंदिर में शिवलिंग धरती से 10 फीट नीचे स्थापित है। कहा जाता है कि श्रावण मास के अंतिम सोमवार को शिवलिंग के ऊपर तक जल भर जाता है। कहा जाता है मां नर्मदा खुद भगवान शिव को तब स्नान कराने आती हैं।

यहां दूसरा प्रमुख मंदिर रंग महला है कहा जाता है मां नर्मदा के जब शिशु रूप में थी तब उनके आमोद प्रमोद और खेलने के लिए रंग महल का निर्माण कराया गया। इन मंदिरों को संयुक्त तौर पर कर्ण मठ के नाम से भी जाना जाता है। वैसे पूरे अमरकंटक में नए पुराने मिलाकर कुल 30 मंदिर हैं। 



नर्मदा कुंड से थोड़ी दूरी पर मार्कंडेय आश्रम, गायत्री शक्तिपीठ भी स्थित है। नर्मदा मंदिर से एक किलोमीटर आगे सोनमुडा के रास्ते में शुकदेवानंद जी द्वारा निर्मित श्रीयंत्र महामेरू मंदिर स्थित है। मंदिर का गुंबद 52 फीट ऊंचा है। हालांकि इस मंदिर में जाने पर वीरानगी नजर आती है। मंदिर के अंदर फोटोग्राफी निषेध, मूर्तियों को छूना मना है जैसे कई बोर्ड लगे हुए हैं।

- विद्युत प्रकाश मौर्य  

(AMARKANTAK, OLD TEMPLE, RANG MAHLA, KALCHURI EMPIRE )