Sunday, November 30, 2014

हरे हरे सहजन में इतने सारे गुण

सहजन या मुनगा ऐसी वनस्पति है जो जड़ से लेकर पत्ती और फूल तक इंसान के काम आती है। यथा बंगाल में 'सजिना', महाराष्ट्र में 'शेगटा', तेलगु में 'मुनग', और हिंदी पट्टी में 'सहजन' के अलावा 'सैजन' 'मुनग' कहा जाता है। दक्षिण भारत के प्रायः हर भोजन में सहजन की मौजूदगी अनिवार्य मानी जाती है। दक्षिण में हर घर में इसे सांबर में जरूर डाला जाता है। 

सहजन यानी Drumstick tree  का वानस्पतिक नाम मोरिंगा ओलिफेरा ( Moringa oleifera)  है।  एक एक बहुत उपयोगी पेड़ है। इसे हिन्दी में सहजना, सुजना, सेंजन और मुनगा आदि नामों से भी जाना जाता है। हम इसके महत्व को नहीं जानते हैं. यह फ़ूड नहीं सुपर फ़ूड है।

आयुर्वेद में 300 रोगों का सहजन से उपचार बताया गया है। इसकी फली, हरी पत्तियों व सूखी पत्तियों में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्शियम, पोटेशियम, आयरन, मैग्नीशियम, विटामिन-ए, सी और बी कॉम्पलैक्स प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
इस पेड़ के विभिन्न भाग अनेकानेक पोषक तत्वों से भरपूर पाये गये हैं सहजन के पेड़ के लगभग सभी भागों में औषधीय गुण पाया जाता हैं। यह औषधीय गुण कई बीमारियों के उपचार में विशेष रूप से फायदेमंद होते हैं। सहजन के पत्ते, छाल, फूल, फल सभी उपयोगी हैं। यह जहां सर्दी में गरमी का अहसास देता है, वहीं भोजन में पाचन में भी मदद करता है।

त्वचा की कई समस्याओं का इलाज सहजन में छिपा है। इनमें कई तरह के हारमोन्स और प्राकृतिक तत्व होते हैं, जो त्वचा की सेहत के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। इसके फूल, पत्तों की कई स्वास्थ्य संबंधी लाभ है। यह मानव शरीर के यौन शक्ति को बढ़ाने में प्रधान रूप से काम करता है। जो पुरूष लो लिबीडो (कम सेक्स की इच्छा) और इरेक्टाइल डिसफंक्शन (स्तंभन दोष), सेक्स में अरूचि जैसे मर्ज को दूर करता है। सहजन की छाल का पावडर रोज लेने से वीर्य की स्थिरता तथा पुरुषों में शीघ्रपतन की समस्या भी दूर होती है।

बनाएं अचार - एकदम कच्ची और बिना बीज वाली नरम-नरम सहजन की फलियों से इस आचार को बनाया जाता हैजो खाने में बहुत स्वादिष्ट होता है। सहजन की फली जब एकदम नरम होती है, उनके अन्दर बीज नहीं बन पाते तब ऐसी ही एकदम कच्ची नरम मुलायम सहजन की फली से ही अचार बनता है।


-        ---  विद्युत प्रकाश मौर्य

Saturday, November 29, 2014

दिल का लिए लाभकारी बुरांश का जूस

उत्तराखंड की हसीन वादियों में खिलने वाला चमकदार और खूबसूरत बुरांश का फूल सुस्वादु तो होता ही है, दिल के बीमारी की अचूक दवा भी है। यह अप्रैल और मई के दौरान खिलता है। बुरांश फूलों की कम से कम 24 विभिन्न किस्में मौजूद हैं। शिव के शृंगार के लिए प्रयुक्त होने वाला बुरांश उत्तराखंड की सामाजिक सांस्कृतिक जनजीवन में रचा बसा है। इसे राज्य वृक्ष का गौरव प्राप्त है।

कहां होता है बुरांश - 1400 से 3300 मीटर से अधिक ऊंचे स्थानों में पाये जाने वाले सुन्दर फूलों बुरुंश या बुरांश भी एक है जिसे नेपाली में गुरांस, अंग्रेज़ी में रोडोडेंड्रोन (Rhododendron) और एज़लीया (Azalea) भी कहते हैं। साल 2006 में नेपाल के राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह के तौर पर लाली गुरांस को स्थान मिला है। रोडोडैंड्रोन की इस लाली गुरांस प्रजाति का बॉटैनिकल नाम रोडोडैंड्रोन आर्बोरियम (Rhododendron Arboreum) है।
बुरांश के फूल खूबसूरत होने के साथ औषधीय महत्व का है। इसके जूस का सेवन ह्दय संबंधी बीमारियों से बचा ही सकता है साथ ही शरीर में खून की कमी और लीवर संबंधी बीमारियों के लिए भी यह काफी फायदेमंद है। इसके फूल से बना जूस ह्दय संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए रामवाण है। यह हाई ब्लड प्रेशर में भी यह अचूक दवा है। बुरांश के जूस में पोली फैटी एसिड अधिक मात्रा में पाया जाता है जिसके कारण यह शरीर में कॉलेस्ट्रॉल नहीं बनने देता है। जो ह्दय संबंधी बीमारियां का खतरा कम हो कर देता है। बुरांश के फूलों से तैयार जूस व अन्य उत्पादों के सेवन से हृदय रोग नियंत्रण, खून बढ़ने के साथ शारीरिक विकास होता है। । हृदय रोग से पीड़ित लोग यदि प्रतिदिन एक गिलास बुरांश का जूस पिएं तो रोग जड़मुक्त हो जाएगा। जबकि शारीरिक विकास व खूनी की कमी में बुरांश का जूस व इससे तैयार उत्पाद अचूक औषधि का काम करती है।
प्राचीन काल से ही बुरांश को आयुर्वेद में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। बुरांश में लाल, सफेद, नीले फूल लगते हैं। लाल फूल औषधीय गुणों से भरपूर हैं। 
विटामिन बी कॉम्पलैक्स व खांसी, बुखार जैसी बीमारियों में भी बुरांश का जूस दवा का काम करता है। इस बार जमकर हुई बर्फबारी व बारिश ने बुरांश के जंगलों में वर्षो पुरानी रौनक लौटा दी है। पहाड़ी क्षेत्रों के अनुकूल वातावरण में उगने वाला बुरांश की पत्ती, लकड़ी भी बहुउपयोगी है। इसकी पत्तियां जैविक खाद बनाने में उपयोग होती है जबकि लकड़ियां फर्नीचर बनाने में काम आती है।
उत्तराखंड के रीतिका मधुमक्खी पालन उद्योग से जुडे अशोक रावत ( 9411712603, 0135-2417287) बुरांश के जूस का निर्माण करते हैं। प्रगति मैदान में सरस मेले में अपना स्टाल लेकर आए अशोक रावत बताते हैं कि वे स्क्वैश बोतल की तरह बुरांश के जूस तैयार करते हैं। 90 रुपये की बोतल से 25 ग्लास जूस तैयार किया जा सकता है। उनकापता है बसंत निवास, बडकोट, डांडी देहरादून।

-          -  विद्युत प्रकाश मौर्य 

Friday, November 28, 2014

बन-मस्का और ईरानी चाय का लुत्फ

अपने देश भारत के कुछ शहरों में आप ईरानी चाय का लुत्फ ले सकते है। खास तौर पर तेलंगाना के हैदराबाद, तमिलनाडु के मदुरै, चेन्नई, मामल्लापुरम और रामेश्वरम जैसे शहरों में आपको ईरानी चाय के स्टाल देखने को मिल जाते हैं।

ईरान में चाय पीने का बहुत रिवाज है। चाय बनाने के लिए एक विशेष पात्र, 'समवार' का प्रयोग किया जाता है। वास्तव में यह रूसी सभ्यता की ईरान को देन है। अगर हम इतिहास में झांके तो ईरान में चाय का रिवाज 15वीं सदी में आया। इसके पहले वहां कॉफी पीने के रिवाज ज्यादा था। ईरानी में चाय का उच्चारण चा ई जैसा होता है। हिंदी भाषा में चाय शब्द ईरानी से ही आई है।
महाबलीपुरम में समवार में बनती है ईरानी चाय। ( फोटो- विद्युत)


अगर आप किसी ईरानी के घर में मिलने जाते हैं तो वह आपको वेलकम ड्रिंक के तौर पर चाय परोसता है। वैसे ईरानी न सिर्फ सुबह में बल्कि हर खाने के बाद चाय पीते हैं। ईरानियों के चाय बनाने का अपना स्टाइल है।

चाय बनाने का तरीका अलग -  ईरानी चाय खास तौर बरतन में बनाई जाती है जिसे समवार कहते हैं। ईरानी चाय के लिए चाय पत्ती, पानी, चीनी, दूध और गुलाब की पंखुडियां चाहिए।

पहले पानी में उबाल आने तक उसे गर्म किया जाता है। इसके बाद दूसरे टी पॉट में चाय पत्ती डाली जाती है फिर इसमें खौलता हुआ पानी डाला जाता है। इसके बाद चाय को 10 से 15 मिनट तक मद्धिम आंच पर पकाया जाता है। चाय बनाने वाले वेंडर इस खौलते हुए चाय को अपने अंदाज में बार बार घुमाते हैं। ईरानी चाय और समान्य चाय में बनाने के तरीके में अंतर है। ईरानी चाय में चाय अलग बरतन में और दूध को अलग बरतन में खौलाया जाता है। जब चाय परोसानी होती है उस समय दूध और चाय को मिलाया जाता है। पहले कप में दूध और चीनी डाली जाती है उसके बाद उसमें चाय छन्नी से चाय उड़ेली जाती है। आप अपनी मन मुताबिक चीनी ले सकते हैं। कुछ और जगहों पर इस स्टाइल में चाय बनाई जाती है। पर ये तरीका ईरानी चाय के तौर पर लोकप्रिय है। ईरानी चाय में स्वाद बढ़ाने के लिए ईरानी चाय में कई बार गुलाब की पंखुड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है।

पुराने हैदराबाद में मिलती है ईरानी चाय - हैदराबाद शहर के पुराने ईलाके ( ओल्ड सिटी) में दर्जनों स्थानों पर आज भी ईरानी चाय बनाने वाले देखे जा सकते हैं। कहा जाता है कि ईरानी चाय बनाने का तरीका हैदराबाद में ईरान से वाया मुंबई और पुणे चल कर आया। यहां आने वाले ईरानी लोग चाय बनाने का तरीका भी लेकर आए। यहां से ये दक्षिण भारत के कुछ और शहरों तक फैल गया। ईरानी चाय को सुबह सुबह बन और मस्का के साथ लिया जाए तो इसका स्वाद और बढ़ जाता है।
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विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
  ( IRANI TEA, MILK, ROSE, SAMWAR, HYDRABAD)   




Thursday, November 27, 2014

बूढ़ा केदार –पांडवों को गोत्रहत्या के पाप से मुक्ति मिली ( 05)

उत्तराखंड का केदारनाथ शिव के 12 ज्योतिर्लिंग में पांचवे स्थान पर आता है। पर यहां पंच केदार की संकल्पना है। पांच केदार में से एक है बूढ़ा केदार। 
उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से जाना जाता है। बदरीकेदार, गंगोत्री और यमुनोत्री चार धामों के यहां स्थित होने से यह देश भर के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र भी है, लेकिन राज्य में ऐतिहासिक, पौराणिक मंदिरों की श्रेणी में एक है बूढ़ा केदार मंदिर। श्री बूढ़ा केदार मंदिर टिहरी गढ़वाल जिले में है। वास्तव में उत्तराखंड में पंच केदार मंदिरों के दर्शन का विशेष महत्त्व है। इनमें से एक यहां एक बूढ़ा केदार मंदिर भी हैं।

बालगंगा और धर्मगंगा का संगम -  बूढ़ा केदार में बालगंगा व धर्मगंगा नदियों की संगमस्थली भी है। यह मंदिर बालखिल्या पर्वत और वारणावत पर्वत की परिधि में स्थित सिद्धकूट, धर्मकूट, यक्षकूट और अप्सरा गिरी पर्वत श्रेणियों के मध्य सुरम्य बालगंगा और धर्मगंगा के संगम पर स्थित है। प्राचीन समय में यह स्थल पांच नदियों बालगंगा, धर्मगंगा, शिवगंगा, मेनकागंगा व मट्टानगंगा के संगम पर था। पर अब तीन नदियां दिखाई नहीं देतीं।

बालगंगा और धर्मगंगा के संगम में स्नान करना पुण्यदायी माना गया है। संगम में आरती भी होती है। आगे बढ़कर यही नदी भिलंगना का रूप धारण कर लेती है। यह क्षेत्र हमारे देश का सीमांत क्षेत्र है। इस क्षेत्र को कभी टिहरी रियासत की दूसरी राजधानी के नाम से जाना जाता था। आज भी यह घाटी खेतीबाड़ी की लिहाज से काफी उर्वर  है।

बूढ़ा केदार मंदिर का शिवलिंग। 
उत्तराखंड के चार पवित्र धामों के बीच में स्थित वृद्ध केदारेश्वर मंदिर की यात्रा आवश्यक मानी गई है। प्राचीन काल में तीर्थाटन पर निकले यात्री बूढ़ा केदारनाथ के दर्शन करने जरूर आते थे। कहते हैं बूढ़ा केदारनाथ के दर्शन से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है।

पांडवों को दिया था वृद्ध रूप में दर्शन
वृद्ध केदारेश्वर की चर्चा स्कन्द पुराण के केदारखंड में सोमेश्वर महादेव के रुप में मिलती है। भगवान बूढ़ा केदार के बारे में मान्यता है कि गोत्रहत्या के पाप से मुक्ति पाने हेतु पांडव इसी मार्ग से स्वर्गारोहण हेतु हिमालय की ओर गए। यहीं पर भगवान शंकर ने बूढ़े ब्राहमण के रुप में बालगंगा-धर्मगंगा के संगम पर पांडवों को दर्शन दिया था। दर्शन देने के बाद शिव शिला रुप में अन्तर्धान हो गए। वृद्ध ब्राहमण के रुप में दर्शन देने के कारण ही सदाशिव भोलेनाथ वृद्ध केदारेश्वर या बूढ़ा केदारनाथ कहलाए।

मान्यता के मुताबिक यही वह स्थान है, जहां कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद पांडवों को गोत्र हत्या के पाप से मुक्ति मिली थी। बूढ़ा केदार के बारे में कहते हैं कि बाबा केदार यहां कुछ समय तक रुके थे। एक बंगाली रचनाकार ने बूढ़ा केदार को सागरमाथानाम देकर भी अलंकृत किया है।

विशालकाय शिवलिंग है यहां
बूढ़ा केदारनाथ मन्दिर के गर्भगृह में विशाकाय लिंगाकार फैलाव वाले पाषाण पर भगवान शंकर की मूर्ति और लिंग विराजमान है। कहा जाता है इतना बड़ा शिवलिंग शायद देश के किसी भी मंदिर में नहीं दिखाई देता। मंदिर में  श्रीगणेश जी एवं पांचो पांडवों सहित द्रौपदी के प्राचीन चित्र उकेरे हुए हैं। मंदिर में ही बगल में भू शक्ति, आकाश शक्ति और पाताल शक्ति के रूप में विशाल त्रिशूल विराजमान है।
 नाथ संप्रदाय के होते हैं पुजारी बूढ़ा केदार मंदिर में पुजारी ब्राह्मण नहीं होते बल्कि नाथ जाति के राजपूत होते हैं। नाथ जाति के सिर्फ वही लोग ही पूजा कर सकते हैं, जिनके कान छिदे हों।

मार्गशीष माह में मेला - बूढ़ा केदार में हर साल मार्गशीष माह में मेला आयोजित होता है। कई बार स्थानीय लोग इस मंदिर क्षेत्र को विकसित करने की मांग कर चुके हैं। बूढ़ा केदार में रहते हुए ट्रैकिंग और पक्षियों को नजारा करने का लुत्फ भी उठाया जा सकता है। मंदिर के आसपास कई तरह के रंग बिरंगे पक्षी देखे जा सकते हैं। हर साल बूढ़ा केदार मंदिर में हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं। दर्शन करने आज भी सैकड़ों पैदल तीर्थ यात्री हर साल आते हैं।

कैसे पहुंचे - उत्तराखंड में नई टिहरी शहर से बूढ़ा केदार की दूरी 60 किलोमीटर है।
ऋषिकेश और नई टिहरी से बस से यहां पहुंचा जा सकता है। हालांकि टिहरी से बूढ़ा केदार पहुंचने के लिए बहुत अच्छी सड़क नहीं है। घनसाली से यहां के लिए जीप भी मिल जाती है। समुद्रतल से 4400 फीट की ऊंचाई पर स्थित बूढ़ा केदार में सालों भर हल्की सर्दी रहती है इसलिए  गर्म कपड़े लेकर जरूर आएं।

कहां ठहरें - बूढ़ा केदार में ठहरने के लिए लोक जीवन विकास भारती के आश्रम के अलावा कोई और उचित स्थान फिलहाल नहीं है। आप टेहरी में ठहरने का ठिकाना बनाकर बूढ़ा केदार जा सकते हैं।

-           विद्युत प्रकाश मौर्य - vidyutp@gmail.com 


श्री वृद्धकेदार स्रोत्रम
श्री वृद्धकेदारेश्वरस्तवं आदि केदारेश्वरः प्रभो ।
रुद्राक्षमाल सुविमल लोचन श्री वृद्धकेदारेश्वरम् ।।1
त्रिःशक्ति त्रिशूल विशाल रम्ये,स्थापितं तव सन्निधौः।
अखण्ड दीप प्रज्वल वामे, शोभितं तवः विग्रहम् ।।2
महा शिला पुरस्थः द्रष्टं पंचवक्त्र त्रिलोचनम् ।
चतुः श्पादोपरि स्थितं लिंगाकार महेश्वरम् ।।3
श्री वृद्धकेदार पृष्ठ भागे पंच पाण्डवाः लक्षितम् ।
उपरि शैय्यासने रम्येः धर्म राज युधिष्ठिरम् ।।4
पयःक्षीरः घृतस्नात्वा, गौर सर्षप पूजितम् ।
तस्य सर्वाभीष्ट सिद्धि, श्री बृद्ध केदारेश्वरम् ।।5
यः पूजितं इदं लिंगं,भाव-शक्ति समन्वितम् ।
गोत्र-हत्या-ब्रह्माहत्या स्पर्श मात्रेण मुच्यतम् ।।6
धर्म गंगा-बाल गंगे, कपिल भैरव सुस्थिरम् ।
पंच वाद्यैःघोष शब्दौः श्री बृद्ध केदारेश्वरम् ।।7

प्रातः,सन्ध्या समय निशिदिन देवपूजक वन्दितम् ।
धूप पात्रः घण्ट नादम् चतुर्दिश सुशोभितम् ।।8

( JYOTIRLINGAM, TEMPLE, SHIVA) 

Wednesday, November 26, 2014

प्रभु यीशू यहां भोजपुरी में सुनते हैं प्रार्थना

उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वाराणसी में सौ साल से ज्यादा पुराना एक ऐसा गिरिजाघर है जहां प्रभु ईसा की प्रार्थना भोजपुरी में की जाती है। वाराणसी के छावनी क्षेत्र में लाल गिरिजाघर ( C.N.I . LAL GIRJA VARANASI 1879 )   की स्थापना सन् 1879 में रेव्हटन एलबर्ट ने की थी। 18वीं सदी के यूरोपीय शैली में बने गिरिजाघरों की तर्ज पर इस वेस्लेयन मेथोडिस्ट चर्च (Wesleyan Methodist church ) को बाद में चर्च नॉर्थ ऑफ इंडिया गिरजाघरों में शामिल किया गया। लाल रंग से रंगे होने के कारण इसका नाम लाल गिरजा पड़ा। हर साल गिरिजाघर की क्रिसमस के पहले लाल रंग से पुताई की जाती है।

लाल गिरिजाघर में आसपास के गांवों के लोगों को सहजता से समझाने के लिए सरल भोजपुरी भाषा में प्रार्थना की जाती है। फादर ने दलितों और समाज के पिछड़े लोगों के साथ काम करते हुए भोजपुरी भाषा अपना कर उनको मुख्य धारा से जोडऩे के लिए ये कदम उठाया था। हर रविवार को भोजपुरी में प्रार्थना सुनने के लिए बड़ी संख्या में लोग यहां आते हैं। इस गिरिजाघर के स्थापना के बाद से ही प्रार्थना तथा अन्य आयोजन भोजपुरी भाषा में ही किए जाते रहे। हर रविवार को ईसाई समुदाय के लोग यहां प्रार्थना के लिए आते हैं। रविवार को यहां प्रार्थना सुनने स्थानीय लोग भी जुटते हैं। प्रार्थना कुछ इस तरह से की जाती हैः 

प्रभु जी हम बेसराहा हंई,
हमनी का सहारा देई,
संसार में हमनी के लोग निर्बल समझेला,
 तोहार दृष्टि में हमनी के मूल्य अधिक होला..।

भले ही दुनिया भर में काशी की पहचान महादेव की नगरी के रूप में हो लेकिन अपने घाटों, पंडों,गलियों और अल्हड़ मस्ती के लिए मशहूर वाराणसी में यीशु के भक्तों के लिए कुछ न कुछ खास जरूर है। यहां का लाल गिरिजाघर वाराणसी के तमाम विशेषताओं में एक और अध्याय जोड़ता है।

हालांकि एक दौर ऐसा भी आया था जब लाल गिरिजाघर में भोजपुरी का चलन कम होने लगा था। चर्च की स्थापना के बाद से ही प्रार्थना और अन्य आयोजन भोजपुरी भाषा में ही किए जाते रहे थे। मगर बाद में बीच के दौर में लोगों का विरोध बढ़ा तो भोजपुरी का चलन भी कम होता गया। मगर 1991 में चर्च की 112 वीं सालगिरह के बाद फादर सैम जोशुआ सिंह के कार्यभार ग्रहण करते ही यहां हर रविवार और विशेष अवसर पर भोजपुरी कलीसिया (प्रार्थना) का आयोजन फिर से किया जाने लगा। फादर मानते हैं भोजपुरी में प्रार्थना के आयोजन से स्थानीय लोगों का जुड़ाव बढ़ता है।
-          
----विद्युत प्रकाश मौर्य

http://cniredchurch.com/about-us
( VARANASI, BANARAS, UTTRAR PRADESH)

Tuesday, November 25, 2014

पेठा – आगरा की अनूठी मिठाई

आगरा शहर की पहचान ताजमहल के बाद वहां की प्रसिद्ध मिठाई पेठा के कारण भी है। पूरे आगरा में आपको हर ओर पेठा की दुकानें मिल जाएंगी। पर इन पेठा के बीच शहर की सबसे प्रसिद्ध दुकान है पंछी पेठा की। पंक्षी पेठा के आगरा में छह शो रूम हैं। इनका मुख्य स्टोर नूरी गेट एरिया में है। आगरा में भगवान टाकीज के पास भी पंछी पेठा की प्रसिद्ध दुकान है। कोई आगरा से आता है तो वहां का मशहूर पंछी पेठा लाना नहीं भूलता।

मुख्य रूप से पेठा आगरा में ही बनाया जाता है। अच्छे पके पेठे से ही पेठे पेठे की मिठाई बनाई जाती है। पके हुए फ़ल का छिलका सख्त होता है। वास्तव में पेठा एक पारदर्शी नरम कैंडी है। पेठा बनाने में घी या तेल का प्रयोग बिलकुल भी नहीं किया जाता। पेठे की मिठाई इतनी अधिक प्रसिद्ध है कि इसे पेठा नाम से ही पुकारते हैं। पेठा की खास बात है कि इसे एक महीने तक भी कंटेनर में संभाल कर रखा जा सकता है। किसी जमाने में पेठा मिट्टी के बरतनों में बेचा जाता था पर आज वह मिठाई के डिब्बे की तरह शानदार पैकिंग में उपलब्ध है।
आजादी के आसपास यानी 1950 से पहले के दशक में एक या दो प्रकार का पेठा आगरे के बाजार में मिलता था पर अब पेठे में इतने प्रयोग हुए हैं कि अब इसकी विभिन्न क़िस्में बाज़ार में उपलब्ध हैं। पर हम पेठे को दो हिस्सों में बांट सकते हैं। ड्राइ पेठा और अंगूरी पेठा। ड्राई पेठा लंबे वक्त तक खराब नहीं होता है, जबकि अंगूरी पेठा यानी रसीला पेठा को कुछ दिनों तक ही रखा जा सकता है।
आगरा के धौलपुर हाउस स्थित पंक्षी पेठा का स्टोर। 

कभी पेठा आयुर्वेदिक औषिधि के रूप में तैयार किया जाता था। इसका उपयोग वैद्य लोग अम्ल वित्त, रक्तविकार, वात प्रकोप और जिगर कि बीमारी के लिए करते थे। पेठा फल को अंग्रेजी में Ash Gourd or White gourd कहते हैं। पेठा या सफ़ेद कोहड़ा या कोड़ा कद्दू से थोड़ा छोटा सफेद रंग का फल होता है जिससे इसके कच्चे फल से सब्जी और पके हुए फल से हलवा और पेठा मिठाई (मुरब्बा) बनाई जाती है।
आगरा के प्रसिद्ध पंछी पेठा की दुकान में आप कई किस्म के पेठा खरीद सकते हैं। इनमें कांचा पेठा, केसर अंगूरी पेठा, केसर पेठा, ड्राई चेरी पेठा, लाल पेठा, कोकोनट पेठा, पान पेठा, रसभरी पेठा, सैंडविच पेठा,  संतरा पेठा, डोडा पेठा, चाकलेट पेठा, चेरी मैंगो पेठा जैसे स्वाद का आनंद ले सकते हैं।
पंछी पेठा की स्थापना पंचम लाल गोयल ने 1950 से पहले की थी। उन्हें पंछी गोयल नाम से जाना जाता है। वैसे तो पेठा बनाने की कोशिश आगरा के अलावा अन्य शहरों में भी की गई। पर आगरा जैसा स्वाद कहीं नहीं आता। आगरा मे 15 हजार से ज्यादा लोग पेठा बनाने के कारोबार से जुड़े हुए हैं। आगरा के बाजार में पेठा 60 रुपये किलो से लेकर 400 रुपये किलो तक उपलब्ध है।

- विद्युत प्रकाश मौर्य



Monday, November 24, 2014

बहुत याद आता है गांव का छठ

हर साल दिल्ली के रेलवे स्टेशनों पर छठ से पहले घर जाने के लिए रेलगाडियों में मारामारी होती है। मैं किसी साल अब छठ में गांव नहीं जा पाता। पर गांव का छठ तो जेहन में बसा हुआ है। गांव के पूरब मे बहता सोन नहर। नहर के किनारे पीपल का पेड़। पेड़ की छांव में बने घाट पर होता छठ। सारा गांव नहर के किनारे जुट जाता था। शाम को अर्घ्य देने के बाद हमलोग घर वापस नहीं जाते थे शहर की तरह। सारी रात वहीं गुजरती थी। सुबह का इंतजार और छठ के गीत।


कोई नाच गाना या संगीत कार्यक्रम नहीं, माई और चाची, दादी के कंठ से फूटता था छठ का गीत। एक समूह गाते गाते रूक गया तो दूसरा समूह शुरू हो जाता था। हमारी ड्यूटी थी दीपक में तेल भरने की। सारी रात जलता रहता था दीया। उम्मीदों का दीया। आस्था का दीया। गुनगुनी ठंड में नहर के किनारे सारी रात। किसी की भी आंख में नींद नहीं। प्रातः अरुण के आगमन का इंतजार। सुबह होते ही चाचा गाय का दूध लेकर पहुंच जाते। सुबह का अर्घ्य तो दूध से दिया जाता है ना। 


एक बार तय हुआ कि इस बार छठ नानी के गांव में होगा। भोजपुर जिले में पीरो से पूरब कोईल के पास कुसुम्ही गांव। गांव के दक्षिण में आहर। पेड़ों की लंबी कतार और उसके साथ नदीनुमा जल की धारा। बड़ा ही मनोरम दृश्य था उस आहर के किनार छठ का। वहीं भी गांव की सारी महिलाएं सारी रात जागकर उग ना सूरूज देव गाती रहतीं...वहां कभी कभी लोकनृत्य का भी आयोजन होता था। बड़ों के लिए पूजा थी। आस्था थी पर हमें तो इंतजार रहता था छठ के प्रसाद का। सुबह के अर्घ्य के बाद मां के हाथों से घाट पर प्रसाद पाने का इंतजार। अब मां की उम्र बढ़ती जा रही है वे अब छठ नहीं कर पातीं। पर उम्मीद है गांव में आज भी उसी तरह छठ होता होगा। और छठ पूजा का एक गीत...

कांच ही बांस के बहंगिया,
बहंगी लचकत जाय...
बहंगी लचकत जाय...
बात जे पुछेले बटोहिया
बहंगी केकरा के जाय ?
बहंगी केकरा के जाय ?
तू त आन्हर हउवे रे बटोहिया,
बहंगी छठी माई के जाय...

( विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com) 

Sunday, November 23, 2014

दाल रोटी घर दी...दिवाली अमृतसर दी...

पूरे पंजाब में ये कहावत मशहूर है। दाल रोटी घर दी...दिवाली अमृतसर दी...और होता भी यही है हर साल दिवाली के दिन पंजाब के अलग अलग जिलों से लाखों लोग अमृतसर का रूख करते हैं।
अमृतसर का स्वर्ण मंदिर इस दिन साल के अन्य दिनों की तुलना में ज्यादा प्रकाशमान होता है। इसकी छटा देखने के लिए लोग रात भर जगकर स्वर्ण मंदिर का नजारा करते है। खासकर मंदिर के सरोवर के चारों तरफ भक्तगण मोमबत्तियों से रोशनी करते हैं। लाखों दीपक जल उठते हैं तो उनका अक्श मंदिर के सरोवर में दिखाई देता है जो बड़ा ही नयनाभिराम दृश्य प्रस्तुत करता है। 

वैसे तो देश भर में दिवाली पर रोशनी की जाती है। पर स्वर्ण मंदिर की दिवाली यादगार होती है। इस दिवाली को देखने के लिए देश भर से लोग पहुंचते हैं। वहीं बड़ी संख्या में विदेशी भी दिवाली देखने यहां पहुंचते हैं। 



लाखों लोगों का मेला स्वर्ण मंदिर के आसपास होता है। दिवाली के दिन आपको पंजाब के हर जिले के लोगों की जमघट स्वर्ण मंदिर परिसर में मिल जाएगी। मंदिर प्रशासन की ओर से भी दिवाली के आयोजन की कई दिन पहले तैयारी की जाती है।

सिख धर्म में दिवाली पर्व का खास महत्व है। ठीक उसी तरह जैसे हिंदू धर्म में। दिवाली के साथ स्वर्ण मंदिर की कई कथाएं जुड़ी हुई हैं। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में दिवाली का त्योहार दिवाली से दो दिन पूर्व आरम्भ होकर दो दिन पश्चात समाप्त होता है।


इसी दिन सन 1577 में अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ था। वहीं दिवाली ही के दिन ही 1619 में सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को कारागार से रिहा किया गया था। गुरु हरगोबिन्द जी गुरु नानक देव जी के विचारों को प्रफुल्लित करने में जुटे थे, जो मुगल बादशाह जहांगीर को बर्दाश्त नहीं था। गुरु जी की यश गाथा सुन कर जहांगीर ने गुरु हरगोबिन्द जी को ग्वालियर के किले में बन्दी बना लिया। 

श्री गुरु हरगोबिन्द जी मध्य प्रदेश के ग्वालियर के किले से 52 राजाओं के साथ रिहा हुए थे। सिक्ख इतिहास में गुरु अर्जुन देव जी के सुपुत्र गुरु हरगोबिन्द साहिब की दल-भंजन योद्धा कहकर प्रशंसा की गई है। 


गुरु हरगोबिन्द सिंह ने सिख धर्म को जरूरत के समय शस्त्र उठाने की ऐसी सीख दी जो आज भी सिख धर्म की पहचान है। उन्होंने अपने श्रद्धालुओं को न किसी से डरो ना किसी से डराओ की प्रेरणा देते हुए एक बहादुर कौम की स्थापना की थी।  गुरु हरगोबिंद सिंह ने ही सिखों को अस्त्र-शस्त्र का प्रशिक्षण लेने के लिए प्रेरित किया। 
vidyutp@gmail.com


Saturday, November 22, 2014

सोनवा के कटोरिया में दूध भात

नन्हे मुन्ने बच्चे जिनके दूध के दांत अभी नहीं टूटे वे बच्चे दूध भात ही खाते हैं और उनकी माताएं उन्हें लोरी गाकर खिलाती और सुलाती हैं। भोजपुरी समाज की अति प्रसिद्ध लोरी है चंदा मामा आरे आव पारे आव...लाखों माताओं ने अपने बच्चों को ये लोरी सुनाई होगी। पर ये लोरी वास्तव में एक फिल्म से ली गई है। 

1953 में आई फिल्म भौजी में लता मंगेशकर ने इस प्यारी सी भोजपुरी लोरी को गाया था। इसे संगीतबद्ध करा था चित्रगुप्तने। चित्रगुप्त का संबंध बिहार के छपरा शहर से था। यानी खांटी भोजपुरिया। तो इस गाने के बोल लिखे थे मजरूह सुल्तानपुरीने। मजरूह साहब उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर शहर से आते थे। उनके रगों में भी भोजपुरी रक्त दौड़ता था। और ये लोरी अमर हो गई। गीत बोल कुछ इस प्रकार हैं-

चंदा मामा आरे आव.. पारे आव
नदिया किनारे आव.. ।
सोनवा के कटोरिया में दूध भात ले ले आव...
बबुआ के मुंहवा में घुटूं ।।

आव हो उतरी आव हमारी मुंडेर
 कब से पुकारिले भईल बड़ी देर ।
भईल बड़ी देर हां बाबू के लागल भूख ।
ऐ चंदा मामा ।।

मनवा हमार अब लागे कहीं ना
रहिले देख घड़ी बाबू के बिना
एक घड़ी हमरा के लागे सौ जून ।
ऐ चंदा मामा ।।

यू ट्यूब पर मौजूद इस गाने का लिंक - https://www.youtube.com/watch?v=R7zBQmlKb60

हालांकि भौजी हिंदी फिल्म थी पर इस लोरी के बोल विशुद्ध भोजपुरी में हैं। एक शब्द में भी कोई बनावटीपन नहीं है। लता जी की मीठी आवाज में ये लोरी दिल को छू जाती है। बार बार सुनो..बार बार गुनगुनाओ तो भी जी नहीं भरता। इस गीत संवेदनाओं को अदभुत वेग है।

अब बात चंदा मामा की ही हो रही है त चंदा मामा पर एक लोरी फिल्म वचन में भी है। 1955 में आई इस फिल्म गीता बाली और बलराज सहनी थे। गीत के बोल हैं चंदा मामा दूर के पुए पकाएं गुर के...आप खाएं थाली में...मुन्ने को दें प्याली मे...प्याली गई टूट मुन्ना गया रूठ। दोनों ही गीतों में चंदा मामा हैं। यहां खाने में पूए हैं तो दूध भात। बच्चों को ये दोनों गीत खूब पसंद आते हैं।

-          विद्युत प्रकाश मौर्य


Saturday, November 15, 2014

क्या सैलाब पीड़ितों के लिए राहत लेकर आएगा ये चुनाव

तीन महीने पहले सैलाब में डूबे श्रीनगर शहर में चुनावी बयार बह रही है। सैलानियों से गुलजार रहने वाले डल झील के शिकारों पर चुनावी पोस्टर लगे हैं। कहीं केसरिया रंग है तो कहीं इंद्रधनुषी छटा है। सैलाब में अपने जीवन की बड़ी कमाई गंवा चुके लोगों को इस चुनाव से काफी उम्मीदे हैं।

श्रीनगर शहर की विधानसभा सीटें ( 8) – अमीरकदाल, हब्बाकदाल, हजरतबल, जैदीबल, ईदगाह, खानियार, सोनावर, बटमालू ।

अमीर कदाल - कदाल का मतलब पुल। और अमीर कदाल श्रीनगर शहर में झेलम का पहली पुल माना जाता है। इसका निर्माण 1774 में मो अमीर ने करवाया था। तब ये पुल लकड़ी का था। अब 1982 में शेख अब्दुल्ला ने इस कंक्रीट का पुल बनवा दिया है। अमीर कदाल नाम से ही श्रीनगर शहर का एक विधानसभा क्षेत्र है। इसके तहत रामबाग, सनतनगर, रावलपोरा, मेहजूर नगर, बागे मेहताब जैसे इलाके हैं। झेलम का कहर सितंबर में इन इलाकों में सबसे ज्यादा फूटा था। इस विधानसभा क्षेत्र  का इलाका बडगाम जिला के अलावा बटमालू, खनियार और सोनवार विधानसभा क्षेत्रों को छूता है। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में सिख मतदाता भी हैं। यहां 2008 में महज 14.98 फीसदी मत पड़े थे।

हब्बा कदाल - हब्बा कदाल दूसरा सबसे पुराना पुल है। इसे 1551 में हबीब शाह ने बनवाया था। 1893 के बाढ में ये पुल बह गया था। 2001 में पुराने पुल के पास फारुक अब्दुल्ला ने एक नया पुल बनवाया। हब्बा कदाल श्रीनगर शहर का दूसरा विधानसभा क्षेत्र है। ये दोनों ऐसे इलाके हैं जहां श्रीनगर शहर की स्थानीयता को बड़े निकट से महसूस किया जा सकता है।

हजरतबल विधानसभा क्षेत्र भी श्रीनगर शहर का मानो दिल है। डल झील के आसपास के इलाके इस विधानसभा क्षेत्र में हैं। डल के दायरे में बसा रैनावाड़ी मुहल्ला भी इसी क्षेत्र में आता है। ऐतिहासिक हजरतबल मस्जिद के नाम पर इस विधानसभा क्षेत्र का नाम रखा गया है। ऐसा विश्वास है इस मस्जिद में मुहम्मद साहब के बाल रखे हुए हैं।


जैदीबल- श्रीनगर शहर का एक और विधानसभा क्षेत्र है। यहां का इमामबाड़ा प्रसिद्ध है। ये कश्मीर घाटी का सबसे पुराना इमामबाड़ा माना जाता है। काजी चक ने इसे 1518 में बनवाया था।
ईदगाह – वैसे तो श्रीनगर शहर में कई ईदगाह हैं। पर लाल चौक से तीन किलोमीटर आगे ऐतिहासिक जियारत बाबा बुड्ढा शाह ईदगाह है। के नाम पर शहर का एक और विधानसभा क्षेत्र है। पर ये इलाका भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है। 1983 से इस विधानसभा सीट पर नेशनल कान्फ्रेंस का कब्जा है।

खनियार – श्रीनगर शहर के मुख्य इलाके में शामिल है। खनियार, नौहट्टा, ख्वाजा बाजार, नोवापाड़ा जैसे इलाके आते हैं। 2008 में नेकां के अली मोहम्मद सागर महज 806 वोटों से जीते थे। पिछले तीन चुनावों से ये सीट नेशनल कान्फ्रेंस के पास है।
सोनवार – श्रीनगर शहर की इस सीट पर फारुक अब्दुल्ला प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। वहीं ये सीट 1996 के बाद लगातार जम्मू कश्मीर नेशनल कान्फ्रेंस के खाते में जाती रही है। इस बार उमर अब्दुल्ला यहां से चुनाव लड़ रहे हैं।

बटमालू – श्रीनगर शहर का बाहरी इलाका है। शहर का आटोमोबाइल हब है। सितंबर 2014 में आए सैलाब में बटमालू के ज्यादातर इलाके डूब गए थे। अब बटमालू के लोगों को विधानसभा चुनाव से नई उम्मीदे हैं।

-         - ---- विद्युत प्रकाश मौर्य
(KASHMIR, FLOOD )


Friday, November 14, 2014

इस बरबादी से भी नहीं सीखा तो एक दिन कुछ नहीं बचेगा... ((आखिरी))

श्रीनगर में डल झील के किनारे हल्की बारिश के बीच।
( जन्नत में जल प्रलय 62 )
पहले 2005 में मुंबई फिर 2013 में उत्तराखंड और 2014 में कश्मीर में प्रकृति ने जल प्रलय का एक ट्रेलर दिखाया है। हम 1995 में प्रदर्शित हॉलीवुड की फिल्म वाटर वर्ल्ड को याद करें। केविन कास्टनर की इस विज्ञान फिल्म में उस हालात का लोगों को सामना करते हुए दिखाया गया है जब पूरी धरती पानी में डूबने लगती है। पर लगता है श्रीनगर में साल 2014 में इस जल प्रलय से हमने अभी सबक नहीं लिया है।
सैलाब के बाद भारत सरकार झेलम की धारा को श्रीनगर शहर से बाहर करने का प्रस्ताव पर विचार कर रही है। 30 सितंबर 2014 को इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के मुताबिक सरकार ने इस मामले में विशेषज्ञों से राय मांगी है। ये विचार जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के उस पत्र के बाद आया है जिसमें उन्होंने श्रीनगर शहर को भविष्य में सैलाब से बचाने के लिए झेलम के लिए एक वैकल्पिक चैनल बनाने पर विचार करने को लिखा है। इस मामले में केंद्र सरकार ने केंद्रीय जल आयोग के विशेषज्ञों से सलाह मांगी है। क्या कोई वैकल्पिक चैनल श्रीनगर शहर के बाहर से बनाकर शहर को भविष्य में बाढ़ से रोका जा सकता है। बारिश के दिनों में झेलम नदी के पानी को मोड़ने के लिए ऐसे वैकल्पिक चैनल बनाए जाने का प्रस्ताव बहुत पुराना है। इस पर 8500 करोड़ रुपये का खर्च आने का अनुमान है। हालांकि इस प्रस्ताव पर कभी बात आगे नहीं बढ़ सकी। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि ऐसा कोई चैनल बनाकर हम छोटे मोटे बाढ़ से तो शहर को सुरक्षित कर सकते हैं पर जितना बड़ा सैलाब 2014 में आया, इससे निपटने के लिए कोई वैकल्पिक चैनल बनाना भी पर्याप्त नहीं होगा। 
वास्तव में ये प्रस्ताव बड़ा ही अव्यवहारिक है। नदियों के किनारे पहले इंसान ने शहर बसाया। नदी के डूब क्षेत्र पर कब्जा किया। उसके जल प्रवाह के सारे रास्ते बंद किए। अब संकट आया तो अपनी सुरक्षा के इंतजाम करने के बजाय नदी को ही वहां से हटाने के बारे में विचार कर रहा है। अगर झेलम ने कहर ढाया है तो इसमें झेलम का कोई कसूर तो था नहीं, हमने पानी के लिए रास्ते बंद कर डाले थे।

कहा जाता है कि कई हजार साल पहले पूरा श्रीनगर शहर की सतीसर नामक विशाल झील हुआ करती थी। अब इस इलाके में साढ़े 12 लाख से ज्यादा की आबादी रहती है। इस सैलाब से सबक लेकर हमें इस आबादी के सुरक्षित स्थल की ओर शिफ्ट करने के बारे में सोचना चाहिए। न की झेलम नदी की मुख्य धारा को ही शहर से बाहर ले जाने के बारे में। सरकार में इस प्रस्ताव पर विचार हो रहा है कि 8000 करोड़ से ज्यादा राशि खर्च करके झेलम नदी को शहर के बाहरी इलाके से गुजारा जाए। क्या इससे अच्छा ये नहीं होगा कि इतनी राशि खर्च करके राजधानी के सचिवालय और अन्य भवन ही सुरक्षित स्थानों पर बनाएं जाएं, और नदी को अविरल बहने दिया जाए।
राज्य  के बाढ़ नियंत्रण विभाग को नहीं मालूम की आपदा के असली कारण क्या थे। इतना सब कुछ गुजर जाने के बाद राज्य का बाढ़ नियंत्रण विभाग ये नहीं जान सका है कि ये सब कुछ हुआ कैसे। पढिए समाचार पत्र ग्रेटर कश्मीर में 29 सितंबर को प्रकाशित बाढ़ नियंत्रण विभाग के सचिव पवन कोटवाल का बयान-
हम अभी तक ये आकलन करने मे सफल नहीं हुए हैं कि 6-7 की दरम्यानी रात को क्या हुआ। झेलम में पानी का तेज बहाव आया जिसने नदी के किनारे बने बांध को तोड़ डाला। इसके बाद शहर दाहिनी तरफ से और पीछे की तरफ से बाढ़ में डूब गया।
...और अंत में मशहूर शायर अली सरदार जाफरी की रचना जो उन्होंने झेलम दरिया पर लिखी है...

झेलम का तराना

मानिंद जू ए ज़िंदगी शाम ओ सहर बहता हू मैं।
हर दम रवां, हर दम दवां, हर दम जवां रहता हूं मैं..
वादी में लहराता हुआ
सब्ज़ से इठलाता हुआ         
सौ पेच ओ खम खाता हुआ
हंसता हुवा गाता हुआ

मौजों की जुफें खोलता
क़तरों के मोती रोलता
माशूक़ा-ए-कश्मीरी के
पहलू में इतराता हुआ

खेतों के दामन में यहां
बागों के साए में वहां
अपनी शराब-ए-नब के
सागर को छलकाता हुआ

मानिंद जू ए ज़िंदगी शाम ओ सहर बहता हूं मैं
हर दम रवां हर दम दवां, हर दम जवां रहता हूं में...

( अली सरदार जाफरी )


जन्नत में जल प्रलय की ये आखिरी कड़ी है। हजारों लोगों ने 62 कड़ियों कश्मीर के संस्मरण और रिपोर्ताज को पढ़ा और प्रतिक्रियाएं दीं उनका आभारी हूं।