Friday, October 31, 2014

एक बार फिर लंबी लाइन और इंतजार

( जन्नत में जल प्रलय - 46 )
दस सितंबर की रात जब माधवी और अनादि चले गए मेरी एक मजदूर से बात हुई, बोला चार दिन से हेलीपैड पर लिफ्टिंग का इंतजार कर रहा हूं। अभी तक मेरा नंबर नहीं आया। रोज लाइन लगाता हूं पर अगले दिन उस लाइन से एक भी आदमी लिफ्ट नहीं हो पाता है। पता नहीं मेरा नंबर कब आएगा। उस मजदूर के मन में निराशा भर रही थी। विदेशी नागरिक, महिलाएं और बच्चे तो प्राथमिकता पर थे ही। पर बाकी बचे लोगों के लिए कोई नियम नहीं बनाया गया था। इन बाकी बच्चे लोगों में बुजुर्ग, गरीब मजदूर और श्रीनगर घूमने आए खाते पीते घरों के लोग थे।


इनमें कोई बैंक या दूसरे विभाग में काम करने वाला बड़ा अधिकारी था तो कोई बड़ा व्यापारी। सभी अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। हमने बीएसएफ के उस अधिकारी को बात करके समझाने की कोशिश की, आप महिलाओं और विदेशी नागरिकों के अलावा बाकी बचे हुए लोगों के लिए टोकन जारी कर दें। उस टोकन के हिसाब से जिसका जब नंबर आ जाएगा उनकी लिफ्टिंग हो जाएगी। इससे लोगों को सारी रात भंयकर सर्दी में लाइन लगाकर बैठने की जरूरत तो नहीं रह जाएगी। आप वैष्णो देवी या तिरूपति बालाजी मंदिरों की तरह की व्यवस्था क्यों नहीं लागू कर देते। पर मेरी बातों का उन पर कोई असर नहीं हुआ।

फिर सर्द रात में लाइन लगी - 10 सितंबर की रात को भी एक दिन पहले की तरह लोगों ने रात 12 बजे से ही लंबी लाइन लगा दी। मुझे लग रहा था कि ये कल की तरह ही होने वाला है।इनमें से किसी का नंबर आने की उम्मीद नहीं है क्योंकि बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे फिर आ गए हैं। पर रामपुर के मसूद भाई को उम्मीद थी, वे बड़ी मश्कक्त करके लाइन में सबसे आगे लगे हुए थे। 11 सितंबर की सुबह हुई तो कुछ बीएसएफ के जवानों ने और कुछ पीडित स्वंयसेवकों ने मिलकर लाइन में लगे लोगों को टोकन जारी कर दिया। इस टोकन में मेरा नंबर 298 नंबर पर था। हमलोग सुबह से शाम तक लाइन में लगे रहे। सुबह साढ़े सात बजे लिफ्टिंग शुरू हुई। सुबह लिफ्टिंग की गति तेज जरूर रही, पर महिलाएं बच्चे और विदेशी नागरिकों का ही नंबर आ रहा था।


लाइन में लगे लोग बार बार आग्रह कर रहे थे इस लाइन से भी लिफ्टिंग करो पर ऐसा अधिकारी करने को राजी नहीं थे। बाद में उन्होंने वादा किया दोपहर 12 बजे से इस लाइन के लोग लिफ्ट किए जाएंगे। थोड़ी देर बाद ये समय दो बजे हो गया। पर दो बजे भी इस लाइन से कोई लिफ्टिंग नहीं हुई। वायुसेना के हेलीकाफ्टर तो अपनी गति से उड़ान भर रहे थे पर लिफ्टिंग विदेशी नागरिकों महिलाओं बच्चों और सिफारिशी लोगों की रही थी। चार, पांच दिन से इंतजार कर रहे लोगों का नंबर नहीं आ रहा था।

एक बार फिर हंगामा - लोगों को सब्र का बांध टूट गया तो लोगों ने एक बार हंगामा और नारेबाजी शुरू कर दी। पुलिस ने एक बार फिर लाठियां भांजी। लोगों पर लाठियां बरसाने में जम्मू एंड कश्मीर पुलिस के कुछ बड़े अफसर भी आगे थे। सैलाब के पीड़ित वक्त के मारे हुए लोग मजबूर थे। शाम होने को आई और लिफ्टिंग बंद होने का समय हो गया था। बड़ी मुश्किल से लाइन में लगे लोगों में से सिर्फ आगे से 25 लोगों की लिफ्टिंग हो पाई। इसमें सरस मेले में आए रामपुर के मसूद भाई का नंबर आ गया। वे खुश किस्मत थे। पर पंजाब के व्यास से आए बलराज सिंह और मेरे जैसे हजारों लोगों का नंबर नहीं आया। रात हो गई और हम और निराश हो गए। आज ये तीसरी रात थी जो मैं भूखे पेट गुजारने जा रहा था।

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Thursday, October 30, 2014

सेवा में जुटे बीएसएफ के जवान

( जन्नत में जल प्रलय - 45)

10 सितंबर 2014 – राजभवन के हेलीपैड में मौजूद सैकड़ो बीएसएफ के जवान पूरी मुस्तैदी से आपदा पीड़ितों की सेवा में जुटे थे। इस टीम में कई राज्यों के बीएसएफ के ऐसे जवान थे जिनकी अपने घर भी कई दिनों से बात नहीं हो सकी थी। श्रीनगर की टेलीफोन सेवाएं बंद हो जाने के बाद उनके फोन भी नहीं काम कर रहे थे। एक जवान ने कहा, कई दिनों से घर नहीं बात कर पाया हूं, पता नहीं घर वालों को ये भी मालूम हो कि हम सुरक्षित हैं या नहीं। कई दिनों से मोबाइल फोन तो खिलौना बने हैं। पर आपदा पीड़ितों की मदद करके थोड़ी दिल को तसल्ली हो रही है। बीएसएफ के एक अधिकारी राम कुमार बड़े स्नेह भाव से जगह जगह पीड़ितों से मिलते हैं और उनकी हर संभव मदद की कोशिश करते हैं।

बच्चों के लिए दूध - भले ही बीएसएफ का एक अधिकारी आपदा पीड़ितों के दर्द का मजाक उड़ा रहा हो पर बाकी सभी जवान लोगों का दर्द खूब समझ रहे हैं। 10 सितंबर की दोपहर में राहत सामग्री में मिल्क पाउडर के कुछ पैकेट आ गए हैं। बीएसएफ के जवानों ने बड़े से कड़ाह में पानी को खौलाया और मिल्क पाउडर से दध तैयार किया। इस दूध को लेकर वे लोग पूरे हेलीपैड क्षेत्र में जहां कहीं भी बच्चे थे उनको बांटना शुरू किया। भूख से तड़प रहे बच्चों के लिए ये दूध राहत बनकर आया। पूरे परिसर में मौजूद बच्चों को दूध मिल गया तो यही दूध उन्होंने बुजुर्गो और बड़े लोगों को भी बांटना शुरू कर दिया। दूध बनाने का ये क्रम 11 और 12 सितंबर को भी जारी रहा। लोगों की सेवा में जुटे इन बीएसएफ के जवानों को बार बार सलाम।

खाने के लिए पर्याप्त सामग्री नहीं - पूरे परिसर में मौजूद लोगों के लिए पर्याप्त खाने पीने की सामग्री मौजूद नहीं थी। पर शायद बीएसएफ, सेना और जम्मू कश्मीर पुलिस के बड़े अधिकारी इस सच्चाई से अपने अफसरों को अवगत कराते तो यहां और भी खाद्य सामग्री उपलब्ध कराई जा सकती थी जिससे लोगों को थोड़ी राहत मिल पाती। पर शायद वे ऐसा नहीं कर पा रहे थे।

बाहर भी भूखे लोग कर रहे हैं इंतजार - सिर्फ हेलीपैड का इलाका ही नहीं बल्कि हेलीपैड के बाहर हजारों लोग सड़कों पर बैठकर अंदर आने का इंतजार कर रहे हैं। उन बाहर बैठे लोगों को खाने में कुछ नहीं मिल पा रहा है। जो लोग प्रवेश द्वार के पास खड़े हैं इस इंतजार में कि कभी गेट खुलेगा और वे हेलीपैड परिसर में प्रवेश कर जाएंगे, वे भी भूख से तड़प रहे हैं। इन भूखे लोगों को देखकर बीएसएफ के जवानों को दया आ जाती है। वे गेट से बाहर कुछ केले कुछ बिस्कुट तो कभी दूध भिजवा देते हैं। इन सामग्री को लूटने के लिए लोगों में होड लग जाती है।


हम भिखारी बन गए हैं - कभी बिस्कुट या नमकीन का पैकेट बंटने वाला होता है तो लंबी लाइन लग जाती है। दो बार मेरे हाथ में आए हुए नमकीन के पैकेट किसी और ने झटक लिया ...और मैं हाथ मलता रह गया। इस तरह छोटे से पैकेट के लिए लाइन में खुद को लगा हुआ देखकर...मन ही मन खूब रोना आया...हमारा क्या हाल बन गया है...आखिर हम भिखारी ही तो बन गए हैं...


Wednesday, October 29, 2014

हमारी हालत भिखारियों जैसी हो गई...

( जन्नत में जल प्रलय - 44 )
10 सितंबर 2014 – शाम हो गई और हेलीकाप्टर लिफ्टिंग बंद हो गई थी। वायुसेना के इन हेलीकाप्टरों में नाइट विजन नहीं है इसलिए ये रात होने पर या दिन में भी ज्यादा मौसम खराब होने पर उडान नहीं भर सकते।

माधवी और अनादि हेलीपैड से जा चुके थे। अब मैं अकेला रह गया था। वानी परिवार भी निकल चुका था। रामपुर वाले मसूद भाई का अभी नंबर नहीं आया था। दिन भर से कुछ खाने को नहीं मिला था। हेलीपैड पर मौजूद हजारों लोग भूखे थे। जो हेलीकाप्टर लोगों को एयरपोर्ट तक लिफ्ट करके ले जा रहे थे, उन्ही हेलीकाप्टर से वापसी के समय कुछ रीलिफ मैटेरियल यानी खाद्य सामग्री आती थी। ये आने वाली खाद्य सामग्री वहां मौजूद लोगों के लिए नाकाफी थी। कभी छोटे छोटे नमकीन के पैकेट ( पांच रुपये साइज वाले), कभी बिस्कुट के छोटे पैकेट और केले आ रहे थे। पर ये हेलीपैड पर मौजूद सभी लोगों को नहीं मिल पाते थे।

इसी दौरान हमें पता चला कि करीब 200 रोटियों के पैकेट आए हैं। बीएसएफ के अस्सिटेंट कमांडेंट साहब खुद रोटियों के पैकेट बांटने लगे। हेलीपैड पर बड़ी संख्या में मजदूर मौजूद थे जिन्हें कई दिनों से एक भी अन्न का दाना नहीं मिला था। इसलिए उन्होंने रोटियों के इन पैकेट के लिए भीड़ लगा दी। इस भूख से बेहाल भीड़ देखकर इस अफसर को पता नहीं कैसी अनुभूति हुई। 

उसने पूछा – बताओ रोटियों के पीछे आखिर कौन भागता है... भीड से कुछ लोगों ने जवाब दिया... कुत्ते... इस पर अफसर महोदय बहुत खुश हुए.. उन्होंने कहा...हां तुम सब कुत्ते जैसे ही तो हो...यह कहते हुए उन्होंने रोटियों के पैकेट को हवा में उछाल दिया...और कई दिन से भूख से बिलबिलताते पेट वाले  लोग इन रोटियों को लूटने में जुट गए।

मैं असहाय भूखे लोगों का ये अपमान देखता रहा। इतने के बाद इस अफसर महोदय ने रामलीला के रावण की तरह बड़ा अट्टहास लगाया। किस्मत के मारे लोग जो श्रीनगर के इस आपदा में फंस गए। क्या अमीर क्या गरीब सभी भूखे थे। सरकार रिलीफ मैटेरियल भिजवा रही थी। पर गरीबों की गरीबी का ऐसा अपमान...

इतना ही नहीं ये बीएसएफ के अफसर महोदय के पास जब भी कोई अपनी मजबूरी लाचारी लेकर याचक बनकर पहुंच जाता था, ये सबसे पहले गंदी गंदी गालियों से उसका स्वागत करते थे। पढ़े लिखे लोग तो इनसे बात करने में शर्म महसूस करने लगते थे। एक बार तो इन्होंने याचना कर रही महिलाओं के समूह को भी अपनी गंदी जुबान से गालियां देनी आरंभ कर दी। पर वह महिला बहादुर थी। उसने भी प्रत्तुत्तर में इन्हें जमकर खरी खोटी सुनाई। उस महिला की खरी खोटी वे अपमानित होकर सुनते रहे। पर जाते जाते अपने जूनियर को बोलकर गए कि अगर ये महिला चुप नहीं होती है तो इसे गेट से बाहर कर देना।

बीएसएफ के तमाम जवान और अधिकार बड़े दिल से आपदा पीड़ितों की सेवा में जुटे थे, पर एकमात्र अधिकारी के कारण आपदा प्रबंधन का सिस्टम चरमराया हुआ था। वह ऐसे काम कर रहा था जैसे उसके शब्द ही कानून हों। न कोई अनुशासन न नियम बद्धता न ही कोई पंक्ति लगाने का सिस्टम। पांच दिन से इंतजार कर रहे लोगों का नंबर नहीं आता था। तो कई बार दो घंटे पहले आए लोगों का नंबर आ जाता था। ऐसे में लोगों की निराशा बढ़ती जा रही थी। मन में गुस्सा था पर करें क्या। इन गड़बड़ियों को लेकर अगर कोई गुहार लगाने जाता था तो ये अफसर कहते थे, नेता बनते हो. इसको किनारे करो जी, इसको चार दिन बाद यहां से भेजा जाएगा।

एक निराश युवक ने अपना हेलीकाप्टर लिफ्टिंग के लिए नंबर नहीं आने पर कहा, लगता है यहां से हमारी डेड बॉडी ही जा पाएगी। इस पर अफसर बोले- अगर दो दिन और बारिश होती रहती तो तेरी ये इच्छा भी पूरी हो जानी थी। एक बार वे अपने मुखारविंद से गालियां निकाल रहे थे। मैं अपने कैमरे से तस्वीर ले रहा था...वे बोल पड़े- ए लड़के रिकार्डिंग बंद कर नहीं तो तेरा कैमरा तोड़ दूंगा।
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Tuesday, October 28, 2014

माधवी और अनादि को ले गया वायुसेना का हेलीकॉप्टर

( जन्नत में जल प्रलय - 43 )
10 सितंबर को हेलीपैड पर अपनी बारी के लिए माधवी और अनादि बार बार दौड़ लगा रहे थे। मुझे ये उम्मीद थी वे लोग लाइन में सबसे आगे लगे हैं तो उनका नंबर जल्द ही आ जाएगा। ये सोचकर मैं उनसे विदाई लेकर भीड़ से दूर इधर उधर विचरण कर रहा था। हेलीपैड के करीब जाने वाले मर्द लोगों पर जम्मू कश्मीर पुलिस लाठियां बरसा रही थी। सुबह के तीन घंटे तो सचिवालय कर्मचारियों के आंदोलन में बर्बाद हो ही गया था।


दोपहर के तीन बजे थे। एक बार मैं हेलीपैड पर लाइन लगाए महिलाओं और बच्चों के पास गया। ढूंढते ढूंढते मेरी नजर गई तो देखा माधवी और अनादि वहीं खड़े हैं निराश और असहाय से। दिल्ली की रिचा और कई हमारे परिचितों की लिफ्टिंग हो गई थी पर माधवी और अनादि का अभी तक नंबर नहीं आया था। अनादि ने बताया कि हमलोग कई बार लाइन में सबसे आगे होते हैं। अपना बैग लिए दौड़कर हेलीकाप्टर तक जाते हैं। पर दूसरे लोग चढ़ जाते हैं। हमारा नंबर नहीं आता हम लौट आते हैं। फिर बीएसएफ वाले भिंडर अंकल हमें धक्का देकर पीछे भेज देते हैं। अपनी बारी के लिए दौड लगाते लगाते माधवी और वंश थक गए थे। वे बोले लगता है हमारा आज नंबर नहीं आएगा। हमने कहा थोड़ा धैर्य रखो,  क्या पता शाम ढलने तक नंबर आ ही जाए।

अनादि एक बार फिर दौड़ कर मेरे पास आया। वह गले लगकर रोने लगा। बोला- नहीं पापा मैं आपको यहां अकेला छोड़कर नहीं जाऊंगा। मैंने एक बार फिर अपने नन्हें जिगर के टुकड़े को समझाने की कोशिश की। बेटा चले जाओ दिल्ली। मेरा भी नंबर आएगा औ मैं भी आ ही जाउंगा पीछे से। अनादि ने मेरे गालों पर अत्यंत भावुक होकर प्यार किया। मुझे भी प्रत्युतर में ऐसा ही करने को कहा। पिता पुत्र का भावुक होकर यूं बिछुड़ना। मैं फट पड़ा और बहुत ऊंचाई पर रोने लगा। पर ऐसा करना ठीक नहीं था। आंसू पोंछ बेटे को समझाया। 


बार बार पीछे की ओर देखता हूं अनादि एक बार फिर जाकर अपनी लाइन में लग गया कि मेरा नंबर शायद आज आ ही जाए। मां बेटे के बार फिर दौड़ लगाने लगे। दिन भर के संघर्ष के बाद आखिरकार शाम के पांच बजे के बाद एक हेलीकाप्टर में माधवी और अनादि भी बैठने में सफल हो गए। अनादि ने बताया कि वे जिस हेलीकाप्टर में बैठे उसका नंबर था ZP – 5179 था।

वायुसेना के एमआई 17 हेलीकॉप्टर के को पायलट ने सभी लोगों का नाम पूछकर अपनी रिकॉड में दर्ज किया। कोई दस मिनट का सफर रहा होगा जब ये हेलीकॉप्टर श्रीनगर शहर के बाढ़ से घिरे तमाम मुहल्लों को पार करता हुआ वायु सेना के एयरपोर्ट पर पहुंच गया। अनादि को हेलीकॉप्टर से श्रीनगर शहर के पानी में डूबे हुए घर दिखाई दे रहे थे। पर ये सुकुन था कि कई दिन से आपदा में घिर हमलोग अब बाहर निकल पाने में सफल हो गए हैं। पर मेरे पापा, पापा तो अभी तक वहीं फंसे हुए ही हैं। आखिर उनका नंबर कब आएगा।
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(KASHMIR, FLOOD, MI17 ) 


Monday, October 27, 2014

इंतजार...आखिर कब आएगा हमारा नंबर

( जन्नत में जल प्रलय - 42 )
नौ सितंबर की रात को 12 बजे हमने देखा कि सैकड़ो लोगों ने जिसमें बड़ी संख्या में बिहार यूपी के मजदूर वर्ग के लोग थे उन्होंने लाइन लगा दिया। सर्द रात में वे लोग लाइन लगाकर  बैठे गए थे इस उम्मीद के साथ कि शायद कल उनका नंबर आ जाए हेलीकाप्टर लिफ्टिंग के लिए। पर मुझे हकीकत का अंदाज हो गया था। बीएसएफ के उस अस्सिटेंट कमांडेंट ने कह दिया था कि हम महिलाओं को प्राथमिकताके तौर पर भेजेंगे। शिविर में महिलाओं बच्चों की संख्या ही एक हजार के करीब थी, लिहाजा हमारा नंबर नहीं आने वाला था।

हमने माधवी और अनादि को रात में मिलकर समझाने की कोशिश की। अगर महिलाओं और बच्चों की पहले लिफ्टिंग हो रही है तो आप लोग पहले चले जाओ। माधवी इसके लिए तैयार नहीं थी। 

वंश भी बोला पापा आपको तो छोड़कर हरगिज नहीं जाउंगा। मैंने माधवी को समझाया. यहां खाना नहीं मिल रहा है खुले आसमान के नीचे सर्द रात गुजारनी है। आपको अगर मौका मिल रहा है तो आप पहले चली जाओ। श्रीनगर एयरपोर्ट से सुना है कि दिल्ली तक भेजने का इंतजाम है। आप पहले चली जाओगी तो दोस्तों रिश्तेदारों को हमारा कुशल क्षेम मिल जाएगा। फिर वहां से आप मेरी सही लोकेशन बता कर हमारी लिफ्टिंग के लिए भी कुछ प्रयास कर सकोगी। यहां भूखे प्यासे, खुले आसमान में रहकर वंश और आपकी तबीयत बिगड़ सकती है। मैं बचपन में गांव में रहा हूं तो थोड़ा और वक्त इस मुश्किल घड़ी में भी गुजार सकता हूं।

काफी समझाने पर माधवी और अनादि अकेले भी जाने को तैयार हो गए। हम सबके पास अलग अलग बैग पहले से ही था। 10 सितंबर की सुबह  वे लोग अपनी लिफ्टिंग के लिए लाइन में लग गए और अपनी बारी का इंतजार करने लगे। वानी साहब के परिवार के महिलाएं और बच्चे और सरस मेले कुछ शिल्पी परिवार के परिचित लोग भी इन लाइन में थे। पर लाइन में लगने को लेकर कोई नियम कानून नहीं था। तीन घंटेका वक्त को जम्मू कश्मीर सरकार के सचिवालय के कर्मचारियों ने बर्बाद कर डाला था। जब दोपहर में वायुसेना के हेलीकाप्टर आने लगे तब बीएसएफ के अधिकारी लाइन में लगे लोगों को हेलीकाप्टर की ओर बुलाते थे। एक हेलीकाप्टर में जगह तो थी 26 लोगों के लिए। लेकिन वे हेलीकाप्टर की ओर 40 लोगों को दौड़ा देते थे। लिहाजा हेलीकाप्टर में चढ़ने के लिए धक्का मुक्की हो जाती थी। 

कुछ लोगों को लेकर हेलीकाप्टर उड़ जाता था। बाकी लोग निराश होकर वापस लौट आते थे। जो लोग लौट आते थे उन्हें अगले चौपर में सबसे आगे जगह मिलनी चाहिए थी पर ऐसा नहीं होता था। ये पुलिस वाले डंडा बरसा कर इन महिलाओं और बच्चों को पीछे धकेल देते थे। यानी महिलाओं बच्चों के साथ भी गुंडागर्दी का खेल जारी था। परेशान महिलाएं और बच्चे अपनी व्यथा के साथ पुलिस और बीएसएफ के लोगों के साथ बकझक कर रहे थे। पर ग्राउंड मैनजमेंट देख रहे लोग मौज मजे से इंतजामात देख रहे थे। कुल मिलाकर मत्स्य न्याय के हालात थे। महिलाओं और बच्चों में भी निराशा थी। उनका नंबर कब आएगा, वे इसको लेकर निश्चिंत नहीं थे।
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Sunday, October 26, 2014

खुले आसमान के नीचे कई दिन से बारी का इंतजार

( जन्न्त में जल प्रलय - 41)

राजभवन के हेलीपैड के अंदर और बाहर खुले आसमान के नीचे हजारों लोग अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं, कब उनका नंबर आएगा और उन्हें वायुसेना का हेलीकॉप्टर उठाकर सुरक्षित स्थान तक पहुंचा देगा। 7 सितंबर की सुबह झेलम दरिया ने जो तांडव दिखाया उसके बाद 80 फीसदी श्रीनगर शहर तबाह हो चुका है। धरती का स्वर्ग कहे जाने वाले इस शहर के तमाम सड़कों पर अभी भी 8 से 15 फीट तक पानी भरा है। शहर का राजबाग, लाल चौक, इंदिरा नगर, बंटवारा जैसे इलाके आठ दिनों से पानी  में डूबे हुए हैं। शहर से श्रीनगर एयरपोर्ट जाने के लिए तीन रास्ते हैं पर तीनों में पानी भरा हुआ है।
श्रीनगर एयरपोर्ट से नियमित उड़ानें जारी हैं पर एयरपोर्ट पहुंचे तो कैसे... वहीं जम्मू-श्रीनगर हाईवे खुलने में अभी कई दिन लगेंगे। 25 हजार से ज्यादा विदेशी नागरिक, पर्यटक, बाहर से आकर श्रीनगर में नौकरी करने वाले, दूसरे राज्यों के मजदूर अभी भी आपदा में फंसे हुए बाहर निकलने के लिए दिन भर उम्मीद भरी निगाहों से अपनी बारी का इंतजार करते हैं पर शाम ढल जाती है और उनका नंबर नहीं आता।  

रामपुर के मोहम्मद मसूद का नंबर तीन दिनों के बाद आया। सैकड़ो लोग चार दिन पांच दिन से अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं पर उनका नंबर नहीं आ रहा। जिन लोगों का नंबर आ गया मानो उन्हें नई जिंदगी मिल गई। जिनकी बारी नहीं आ रही है उनके मन में जिंदगी को लेकर निराशा बढ़ रही है। पता नहीं घर पहुंच भी पाएंगे या नहीं।

फंसे हुए लोगों को निकालने के लिए राजभवन के नेहरु हैलीपैड से उड़ान भरने वाले वायु सेना के हेलीकाप्टर रोज 500 से 1500 लोगों को ही बचाकर एयरपोर्ट पहुंचा पा रहे हैं। शुरुआती तीन दिन कुप्रबंधन के कारण कम लोगों की लिफ्टिंग हो सकी। सभी लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए हेलीकाप्टर के फेरे बढ़ाने जरूरी हैं।

राजभवन के बाहर हजारों लोग खुले आसमान के नीचे श्रीनगर की सर्द रातें गुजारने को मजबूर हैं। पीड़ित लोगों के लिए जो राजभवन के आसपास अपनी बारी का इंतजार करने वालों के लिए खाने-पीने की सामग्री आ रही है वह नाकाफी है। बच्चे भूख से बिलबिला रहे हैं। लोग तेजी से बीमार पड़ रहे हैं। पीने के पानी की कमी है। सीमा सुरक्षा बल ने कई जगह रैन बसेरों का इंतजाम जरूर किया है, पर ये रैन बसेरे बेघर हुए लोगों के लिए कम पड़ रहे  हैं। वहीं जम्मू कश्मीर सरकार की ओर से कहीं राहत शिविर चलता हुआ दिखाई नहीं देता।

( 13 सितंबर 2014 की रिपोर्ट, हिन्दुस्तान नई दिल्ली में प्रकाशित ) 



Saturday, October 25, 2014

खतरनाक सफर पर निकला वानी परिवार

( जन्नत में जल प्रलय - 40 )
राजभवन के हेलीपैड पर जुटी हजारों लोगो की भीड़ को देखकर आफताब वानी को लगा कि यहां से हेलीकॉप्टर से लिफ्टिंग में काफी वक्त लग जाएगा। 9 तारीख की रात राजभवन हेलीपैड पर जुटी भीड़ को देखकर वे आशंकित थे कि उनका नंबर कब आएगा। 10 तारीख को दोपहर तक अपनी बारी का इंतजार करने के बाद उन्होंने हेलीपैड से बाहर जाकर अपने रास्ते खुद तलाशने का फैसला लिया। आफताब वानी और गुलाम रसूल वानी के परिवार में कुल 12 सदस्य थे। इसमें दो बच्चे भी थे जिनकी उम्र 8 से और 11 साल की थी।

वानी जम्मू के पास राजौरी जिले के रहने वाले हैं। दोनों भाई कारोबार के सिलसिले में अक्सर श्रीनगर आते रहते हैं इसलिए ये श्रीनगर शहर उनके लिए जाना पहचाना है। मुश्किल घड़ी में उन्होंने मुश्किल फैसला लिया, शोपियां से होकर सड़क मार्ग से राजौरी जाने का। पर हेलीपैड छोड़ते समय मुश्किल घड़ी में दोस्त बने आफताब वानी और उनके बड़े भाई गुलाम रसूल वानी से मेरी मुलाकात नहीं हो सकी। बाद में फोन पर बातचीत होने पर उन्होंने अपनी यात्रा की दर्द भरी दास्तां सुनाई।

हेलीपैड से निकलने पर वे लोग एक बार फिर 8 किलोमीटर पैदल चलकर डल गेट इलाके में गए। यहां टूरिस्ट रिसेप्शन सेंटर से लाल चौक के आगे जाने के लिए उन्होंने एक नाव किराये पर ली। 3500 रुपये किराया दिया पर एक स्थानीय व्यक्ति ने गलत सलाह दे दी थी। पूरा परिवार आगे जाकर फंस गया। वे लोग 1200 रुपये देकर किसी तरह वापस डल गेट लौट आए। पैदल चलकर सारे लोग दुबारा राजभवन के पास स्थित आर्मी कैंप के करीब पहुंचे। 

यहां से टाटू ग्राउंड बछवारा क्षेत्र में दो किलोमीटर के करीब पानी में सफर करते हुए सारा परिवार पंथा चौक के पास पहुंचा। पंथा चौक हाईवे पर भी पानी जमा था। इस पानी से चलकर वे लोग बाईपास पहुंचे। यहां से 12 हजार रुपये में एक वाहन करके वे लोग पटन पहुंचे। पटन में फिर कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। पटन से किसी तरह 3000 रुपये देकर वे लोग अनंतनाग पहुंचे।
अनंतनाग से हीरपुरा का रास्ता 15 मिनट का है। पर रास्ते पर पानी जमा था। एक टैक्सी वाले ने गांव से होकर लंबे रास्ते से पहुंचाने के लिए 2500 रुपये लिए। हीरपुरा से पैदल चलकर सारे लोग पुलवामा पहुंचे। पुलवामा से फिर 4700 रुपये में गाड़ी तय कर शोपियां पहुंचे। वानी परिवार की काफी रिश्तेदारियां शोपियां जिले में है। इसलिए वहां लोगों की खूब खातिरदारी हुई। एक दिन रिश्तेदारों के घर गुजारने के बाद 13 सितंबर की सुबह के बार फिर सारा परिवार आगे के सफर के लिए चल पड़ा। लेकिन रास्ते में पता चला कि शोपियां से राजौरी तक की सड़क रास्ते में कई जगह बाढ़ की भेंट चढ़ चुकी है। एक सूमो किराये पर कर वे लोग डुबही तक पहुंचे। डुबही में इसी नाम की एक दरिया बहती है। 60 मीटर चौड़ी दरिया में तीन फीट गहरा पानी था। पर ये पानी पहाड़ों के ग्लेसियर का था, जो हाड़ को कंपा देने के लिए काफी था। आफताब वानी ने बारी-बारी से अपने दो भतीजों और कई महिलाओं को कंधे पर बिठाकर नदी पार कराया। नदी पार करने के बाद पूरा परिवार पैदल चलकर पीर गली पहुंचा। पीर गली कश्मीर के खूबसूरत स्थल में से एक है। यहां लंगर में पूरे परिवार को सब्ज चाय पीने को मिली तब थोडी राहत मिली।

पीर गली से से रेत की बजरी ढोने वाला एक टिपर मिला। टीपर पर चढकर पूरा परिवार चंडीमड़ पहुंचा। पीर गली से चंडीमड की दूरी 35 किलोमीटर है। वानी बताते हैं कि रास्ते में कई जगह सड़क 50 से 100 मीटर तक बह गई है। जहां तक नजर जाती है सिर्फ रेत और बजरियां दिखाई देती हैं। चंडीमड से वे लोग पैदल चलकर बफलियाज पहुंचे क्योंकि टीपर चंडीमड तक ही जा रहा था। बफलियाज से फिर सूमो तय किया और शाम तक राजौरी जिले के थाना मंडी पहुंचे। इस तरह श्रीनगर से जो सफर 10 घंटे में तय होना था उसे तीन दिन में तय कर घर तो पहुंच गए। पर इस सफर में 50 हजार रुपये से ज्यादा किराये में खर्च हो गए।

पुंछ जिले के बफलियाज से पीर की गली होते हुए शोपिंया तक का 84 किलोमीटर का रास्ता ऐतिहासिक मुगल रोड कहलाता है। यह जम्मू से श्रीनगर पहुंचने का वैकल्पिक रास्ता है। यह बनिहाल दर्रे की तुलना में ज्यादा ऊंचाई से होकर गुजरता है। तो वानी परिवार इसी ऐतिहासिक मुगल रोड से होकर गांव पहुंचा था। पर ये सड़क भी सैलाब के कहर से बदरंग हो चुकी थी।

मुझे लगता है कि वानी परिवार ने बहुत बड़ा खतरा मोल लेने वाला फैसला लिया था इस तरह से सफर कर घर पहुंचने का। अल्लाह का शुक्र है कि वे लोग महफूज घर पहुंच गए। पर घर पहुंचने पर बरबादी के और भी नजारे उनका इंतजार कर रहे थे।

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------ विद्युत प्रकाश मौर्य   vidyutp@gmail.com

Friday, October 24, 2014

अलाव के सहारे रात और धरना प्रदर्शन

( जन्नत में जल प्रलय – 39)

9 सितंबर 2014 – सर्द अंधेरी रात में कुछ जगह जल रहे अलाव थोड़ी उष्णता प्रदान कर रहे थे। आग से निकल रही रोशनी के साथ हल्की सी जीने की उम्मीद थी। कई दिन से भूखे प्यासे लोग अलाव के इर्द गिर्द खडे होकर अपनी रामकहानी बयां कर रहे थे।
हम भी उनकी कहानी मौन रहकर सुन रहे थे। तभी एक जगह से नारेबाजी की आवाजें आने लगी। रात के 12 बजे थे। एक जगह कई सौ लोग जमा थे। उन्होंने नारा लगाया- साडा हक्के इत्थे रख। हम अपना हक लेके रहेंगे। इंडियन आर्मी – जिंदाबाद, जम्मू कश्मीर सरकार – मुर्दाबाद मुर्दाबाद, उमर अब्दुल्ला मुर्दाबाद मुर्दाबाद, जम्मू एंड कश्मीर सेक्रेटारियट इंप्लाइज यूनियन- जिंदाबाद जिंदाबाद। 


अब पता चला कि ये लोग जम्मू कश्मीर सचिवालय के कर्मचारी थे। वे मांग कर रहे थे कि यहां से हमारी हेलीकाप्टर लिफ्टिंग पहले होनी चाहिए। वास्तव में सैलाब आने के समय जम्मू कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में थी। सैलाब में जम्मू कश्मीर सचिवालय के तीन हजार कर्मचारी भी फंस गए है। राजधानी श्रीनगर में आने पर ये लोग होटलों में रहते हैं। सैलाब में सरकार पंगु हो गई है तो ये लोग भी अपने घर लौटना चाहते हैं। 
पर यूनियन नारेबाजी के बीच इनकी मांग है कि हमारी लिफ्टिंग पहले होनी चाहिए। कुछ कर्मचारियों ने बताया कि हम भी सैलानियों की तरह पीड़ित हैं। जम्मू में हमारा परिवार भी इंतजार कर रहा है हमे भी घर जाने का हक है। सारी रात नारेबाजी करने के बाद इन लोगों ने रणनीति बनाई कि सुबह हेलीपैड पर कब्जा कर लेना है। हमारी लिफ्टिंग नहीं हुई तो किसी और की भी लिफ्टिंग नहीं होने देना है। किसी तरह इंतजार करते करते इस रात की सुबह हुई। ये तीसरी रात थी जो हमने जगते हुए गुजारी थी। माधवी और अनादि भी भीड़ में दुबक कर बैठे रहे।

10 सितंबर 2014 – हैलीपैड पर सुबह छह बजे सूरज की हल्की हल्की रोशनी आ गई थी। यह श्रीनगर की एक नई सुबह थी। थोड़ी उम्मीदें थीं...पर सुबह उठकर ब्रश करने, टायलेट जाने का कोई मतलब नहीं था। न यहां इंतजाम थे न खाने पीने के लिए कुछ मौजूद था।

नारेबाजी और हैलीपैड पर कब्जा - जैसा तय था वही हुआ। सुबह हेलीपैड पर जम्मू कश्मीर सरकार के सचिवालय के कर्मचारियों ने कब्जा कर लिया और नारेबाजी शुरू कर दी। वे लोग पीछे हटने को तैयार नहीं थे। सेना पहले महिलाओं बच्चों और विदेशी नागरिकों को भेजना चाहती थी। पर कर्मचारी ऐसा होने देने को राजी नहीं थे। सेना का पहला हेलीकाप्टर आया और हंगामा होता देख लौट गया। नीयत समय पर लिफ्टिंग शुरू ही नहीं हो सकी। सचिवालय कर्मचारियों को समझाने की कोशिश की गई पर वे नहीं माने। उन्होने नया प्रस्ताव रखा एक समूह हमारे कर्मचारियों का जाए तो दूसरा समूह सैलानियों का। पर सेना को ये मंजूर नहीं था। केंद्र सरकार के निर्देश के मुताबिक उनकी प्राथमिकता में विदेशी नागरिक महिलाएं और बच्चे थे।

और हो गया लाठीचार्ज - पुलिस के पास आखिरी ऊपाय था। बल प्रयोग का हेलीपैड पर भीषण लाठीचार्ज शुरू हो गया। भगदड़ मच गई। लिफ्टिंग का इंतजार कर रहे महिलाएं और बच्चे पीछे भागे। कई कर्मचारियों को काफी चोटें आई। पर इस अफरातफरी के माहौल में दोपहर के 12 बज गए और  एक भी चौपर लोगों को हेलीपैड से लिफ्ट नहीं कर सका। इसके बाद आंदोलनकारियों का भी जोश ठंडा हो गया। 
vidyutp@gmail.com
 ( RAJ BHAWAN SRINAGAR, FLOOD  ) 

Thursday, October 23, 2014

मुश्किल में गुजरी राजभवन में पहली रात

( जन्नत में जल प्रलय – 38)
9 सितंबर 2014 - राजभवन में एक बीएसएफ के जवान से बात हुई। उन्होंने बताया कि 8 सितंबर से यहां फंसे लोगों की लिफ्टिंग हो रही है। इन्हें सेना के हेलीकाप्टर लिफ्ट करके श्रीनगर वायुसेना के एयरपोर्ट पर छोड़ रहे हैं। वहां से आगे जाने के लिए वायुसेना के विमानों का इंतजाम है। पर 8 को 500 तो 9 को 700 लोगों की लिफ्टिंग हो पाई है। राजभवन के अंदर ही दो हजार से ज्यादा लोगों की भीड़ जमा है। बड़ी संख्या में लोग सडक पर भी खडे हैं जो लिफ्टिंग के लिए अंदर आने का इंतजार कर रहे हैं।

भीड़ को देखकर निराशा हुई कि अगले दिन हमारी यहां से लिफ्टिंग हो पाएगी या नहीं। मैंने ये जानकारी पाने की कोशश की आखिर लिफ्टिंग की मैकेनिज्म क्या है। बीएसएफ यहां पर ग्राउंड मैनजमेंट देख रही है। जबकि वायुसेना के हेलीकाप्टर लिफ्टिंग में लगे हैं। बीएसएफ के एक अस्सिटेंट कमांडेंट स्तर के अधिकारी भीड़ के बीच खड़े थे। वे लोगों के सवालों का जवाब दे रहे थे- हमारी प्राथमिकता में महिलाएं, बच्चे और विदेशी नागरिक हैं। हम कल पहले उन्हें लिफ्ट कराएंगे। मैंने पूछा – ऐसे में तो महिलाओं के चले जाने से उनका परिवार अलग हो जाएगा। श्रीनगर एयरपोर्ट से आगे घर का सफर महिलाएं आगे कैसे तय करेंगी। मेरी ही तरह की आशंका तमाम लोगों की थी जो अपने परिवार के साथ थे। उस अधिकारी ने मेरे सवाल पर बड़े ही बदतमीजी से जवाब दिया – क्या तुम अपनी बीवी के साथ हमेशा चिपके रहते हो..वह कभी अकेले बाजार नहीं जाती...क्या शादी से पहले वह अकेली नहीं थी...क्या वह पहले किसी और के साथ नहीं घूमती होगी... इसके आगे और भी गंदी बातें जिसे यहां लिखा नहीं जा सकता... इस अधिकारी से तर्क करना फिजूल था। अंधेरा छाने लगा। पूरे श्रीनगर शहर में बिजली नहीं थी। तो राजभवन में भी बिजली नहीं थी। चारों तरफ अंधेरा छाया था।

भूखे रहने को हुए मजबूर -  रात गहराने लगी तो पेट में चुहे दौड़ने लगे। दिन में भी ठीक से निवाला नहीं मिला था। हजारों इंतजार कर रहे लोगों के लिए यहां कुछ भी खाने का इंतजाम नहीं था। कुछ केले के पैकेट आए। कुछ सौ लोगों को एक एक केला मिल सका। पर हमारी बारी नहीं आई। हमारे बैग में बिस्कुट के कुछ पैकेट थे। हमने दो चार बिस्कुट बांट बांट कर खा लिया। एक दिन पहले कच्चे चावल खाने से इनकार करने वाली माधवी से वानी साहब मजाक कर रहे हैं। जरा माधवी से पूछो तो आज हमारे नसीब में तो कच्चे चावल भी नहीं है।

हेलीपैड के बगल में स्थित हैंगर जहां राज्यपाल के हेलीकाप्टर रात को आराम फरमाता है वह आज बड़े एयरपोर्ट पर चला गया है। इसलिए इसके अंदर कुछ सौ लोगों ने अपने सोने के लिए जगह बना ली। बाकी लोग खुले आसमान के नीचे। गुलाम रसूल वानी साहब भी खुले आसमान के नीचे चादर बिछाकर सो गए। दिल्ली में दिसंबर में जितनी ठंड पड़ती है, रात को यहां उतनी ही ठंड थी। गुलाम भी ने हमारा स्वेटर पहना और सोने की कोशिश करने लगे। पर मैं, आफताब भाई और रामपुर वाले मसूद भाई सारी रात इधर उधर घूमते रहे। नए नए लोगों से बातें करते रहे। उनका दर्द उनकी आपबीती जानने की कोशिश में लगे रहे। रात गुजारने का इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता था। कई जगह जंगल की लकड़ियां लाकर अलाव जला चुके थे।
-    vidyutp@gmail.com  ( RAJ BHWAN, SRINAGAR, FLOOD ) 


   

Wednesday, October 22, 2014

भीड़ का रेला आया और हम दब गए

( जन्नत में जल प्रलय - 37 )
लंबी पदयात्रा के बाद हमारी टांगे दर्द से कराहने लगी थीं। पर रास्ते और भीड़ हमारा साथ दे रही थी। चारों तरफ दिलकश हरियाली और पहाड़ियां...पर इनका सौंदर्य हमें रास नहीं आ रहा था। जब आप भूखे हों तो कुछ अच्छा लगता है क्या..श्रीनगर का राज्यपाल निवास कई किलोमीटर में फैला हुआ है। राज निवास की सीमा आरंभ हो चुकी है। मुख्य द्वार से अंदर प्रवेश करने के बाद ज्येष्ठा माता का मंदिर आता है। यह श्रीनगर के प्राचीन ऐतिहासिक मंदिरों में से एक है। हमलोग आगे बढ़ते जाते हैं।

राजभवन के हेलीपैड क्षेत्र में प्रवेश करने के दो रास्ते हैं। एक समान्य द्वार और दूसरा वीआईपी गेट। वीआईपी गेट से वाहनों का प्रवेश होता है। गेट पर अनियंत्रित बड़ी भीड़ जमा थी। वहां सुरक्षा में मौजूद एक जवान ने अनादि को एक सेब दिया। अनादि ने ले लिया। तभी गेट से अंदर से एक वाहन निकलने वाला था। इसके लिए गेट खोल दिया गया। हमलोग गुलाम रसूल वानी साहब की अगुवाई में गेट से अंदर घुसने की कोशिश में लग गए। हमें सफलता को मिल गई। पर पीछे से आ रही भीड़ ने तेजी से धक्का मारा। बहुत सारे लोग एक दूसरे के ऊपर गिरने लगे। मैं अनादि का हाथ जोर से पकड़े हुए था। पर माधवी भीड़ से आए धक्के से नीचे गिर पड़ी। हमलोग कोशिश करके माधवी को उठाने लगे। इस दौरान एक फौजी ने मुझे मारने की कोशिश की...मैंने उसे समझाया मैं अपनी पत्नी को उठाने कोशिश कर रहा हूं। उसने मुझे झिड़की दी..अपनी पत्नी को भी नहीं संभाल सकता।

राजभवन के हेलीपैड पर, एक और इंतजार...
खैर हमलोग राजभवन के अंदर प्रवेश कर चुके थे। कई एकड़ में फैले हेलीपैड क्षेत्र में बड़ा हेलीपैड। हेलीकॉप्टर रखने के लिए हैंगर। इंतजार करने के लिए बरामदे सहित दो बड़े कमरे बने हैं।

पूरा हेलीपैड़ पहाड़ों की तलहटी में बना है। हैंगर के ऊपर एक वीआईपी अतिथि गृह बना है। इसके अलावा सुरक्षा बलों के लिए आवास और हेलीपैड क्षेत्र में एक मंदिर भी है।

हमें यहां पर बीएसएफ, सीआरपीएफ और जम्मू एंड कश्मीर पुलिस के जवान चहल कदमी करते हुए दिखाई दिए। एक जगह एनडीआरएफ के जवानों की एक टुकड़ी अपने लाव लश्कर के साथ दिखाई दी। ये लोग किसी ऑपरेशन के बाद लौटकर यहां आए थे। अगले कुछ दिनों तक ये लोग कुछ यहां काम करते नहीं दिखे। बल्कि ये लोग शरणार्थी तरह यहां पड़े रहे।
शाम गहराने लगी थी। हमें आने वाला वक्त खुले आसमान के नीचे गुजारना था क्योंकि यहां जो कुछ कमरे थे वे हेलीकाप्टर लिफ्टिंग का इंतजार कर रहे महिलाओं और बच्चों के लिए ही कम थे। किसी तरह माधवी, अनादि, वानी परिवार की महिलाओं और दिल्ली की रिचा ने अपने लिए बमुश्किल एक कमरे के बाहर बरामदे में इतनी जगह बनाई जिसमें वे बैठ सकें।

जम्मू कश्मीर के राज्यपाल का हेलीकाप्टर। 
शाम के 6 बज चुके थे। आज के लिए हेलीकाप्टर से लिफ्टिंग बंद हो गई थी। जम्मू कश्मीर के राज्यपाल एनएन वोरा की सेवा में तैनात रहने वाले सफेद रंग का 4 सीटर हेलीकाप्टर हैलीपैड पर लैंड हुआ। दिन भर लोगों को ढोने में यह भी अपनी सेवाएं दे रहा था। एक बीएसएफ के जवान ने बताया कि इसमें भी अधिकतम 7 लोगों को ठूंस दिया जाता है। हमें पता चला कि आज दिन भर में  यानी 9 सितंबर को 700 लोगों को राज निवास के हेलीपैड से लिफ्ट करके श्रीनगर के मुख्य एयरपोर्ट तक पहुंचाया गया है। हमें अब कल का इंतजार था।

Tuesday, October 21, 2014

सिर्फ राजभवन रोड ही बचा था महफूज ((36))

( जन्नत में जल प्रलय - 36)
सोनवारा। श्रीनगर का एक मुहल्ला। अपेक्षाकृत ऊंचाई पर है इसलिए यहां तक झेलम का पानी नहीं चढ़ पाया है। इस सड़क पर कई सरकारी भवन दिखाई दे रहे हैं। सड़क के आसपास के भवनों पर कड़ा पहरा है।

थोड़ी दूर चलने पर यूनाइटेड नेशंस का दफ्तर दिखाई देता है। यह यूनाइटेड नेशंस मिल्ट्री आब्जर्वर ग्रूप का श्रीनगर दफ्तर है। 24 जनवरी 1949 से ये दफ्तर यहां चल रहा है। ऐसा ही एक दफ्तर पाकिस्तान के इस्लामाबाद में भी है। दोनों तरफ के कश्मीर में होने वाली गतिविधियों की संयुक्त राष्ट्र निगरानी करता है। श्रीनगर का ये यूएन चौराहा प्रसिद्ध है। अक्सर इस दफ्तर के बाहर धरने प्रदर्शन होते रहते हैं। कभी यहां कश्मीरी अलगाववादी संगठन तो कभी मानवाधिकार संगठन के लोग बाहर पहुंचकर अपनी आवाज बुलंद करते हैं। पर आज ये दफ्तर शांत है। इसके आगे से बाढ़ पीड़ितों की बड़ी भीड़ गुजर रही है।

गुपकर रोड वास्तव में श्रीनगर शहर की सबसे ऊंची और वीआईपी रोड है। इस रोड पर कई प्रमुख राजनेताओं और मंत्रियों के बंगले हैं। ये बंगले बाढ़ में महफूज रहे। क्योंकि इस ऊंचाई तक झेलम का पानी नहीं आया। हमें थोड़ो दूर आगे चलने पर फारूक अब्दुल्ला का बंग्ला दिखाई देता है। इस बंग्ले पर उनकी नेमप्लेट लगी है। इस बंग्ले में श्रीनगर में मौजूद रहने पर फारूक अब्दुल्ला का परिवार रहता है। 

उनके बेटे और जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अपने फीडबैक के लिए ईमेल आईडी के तौर पर gupkar@gmail.com  का इस्तेमाल करते हैं। पर इस सैलाब में उनकी ईमेल आईडी भी लाचार है। थोड़ी दूर आगे चलने पर हमें हरिनिवास नामक विशाल बंग्ला दिखाई देता है। यह जम्मू कश्मीर के राजघराने के परिवार से आने वाले डाक्टर कर्ण सिंह का खानदानी बंग्ला है। मौसम सुहाना होता जा रहा है। साफ सुथरी सड़क पर हमलोग आगे बढ़ते जा रहे हैं। हमारे आगे पीछे हजारों की भीड़ है।

हालांकि माधवी के लिए पीट्ठू बैग लेकर आठ किलोमीटर पैदल चलना मुश्किल होता जा रहा है। हामिद रसूल वानी साहब माधवी की मदद करते हैं। उसका बैग उठा लेते हैं। कोई तेज चल रहा है तो कोई धीरे धीरे। हम सब लोग एक दूसरे को साथ लेकर चलने की कोशिश कर रहे हैं। पर कई दिन से भूखे लोग कितनी तेज चल सकते हैं।
गुपकर रोड पर स्थित होटल ललित ग्रैंड का प्रवेश द्वार। 

हमें आगे चलते हुए होटल ललित ग्रैंड दिखाई देता है। ललित समूह का ये होटल वास्तव में कश्मीर के महाराजा हरि सिंह का गेस्ट हाउस हुआ करता था। इस ऐतिहासिक भवन में 1947 महात्मा गांधी और लार्ड माऊंट बेटन की मुलाकात हो चुकी है। होटल में वह चिनार का पेड़ अभी भी मौजूद है जिसके नीचे गांधी जी महाराजा हरि सिंह बैठे थे। कभी गुलाब भवन के नाम से मशहूर इस इमारत को महाजा प्रताप सिंह और उनके भतीजे हरि सिंह ने 1910 में बड़े दिल से बनवाया था। देश आजाद होने के बाद महाराजा हरि सिंह मुंबई में जाकर रहने लगे। 1956 में इस भवन को होटल में तब्दील कर दिया गया। यह तब ग्रैंड पैलेस के नाम से श्रीनगर शहर का एक मात्र पांच सितारा होटल था। इस होटल में कई बड़े फिल्मी सितारे और देशी विदेशी मेहमान ठहर चुके हैं। कई साल तक इस होटल का संचालन ओबराय समूह करता रहा। बताया जाता है कि फिल्म कभी कभी की शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन और राखी इस होटल में ठहरे थे। आजकल 113 कमरों का यह होटल ललित सूरी के ललित समूह के स्वामित्व में है। कमरों का किराया 15 से 25 हजार रुपये प्रतिदिन के बीच है।

Monday, October 20, 2014

राजभवन की ओर...उम्मीदों का सफर

( जन्नत में जल प्रलय - 35)

09 सितंबर 2014 - डल गेट से राजभवन। आठ किलोमीटर की दूरी। मेरे लिए आठ किलोमीटर पैदल चलना पीट्ठू बैग लेकर समान्य सी बात थी। पर अनादि और माधवी के लिए थोडा मुश्किल था। उस दौर में जब कुछ दिन से पेट मेंठीक से अन्न का दाना भी नहीं गया हो। पर चलना तो था ही। झेलम नदी से लगातार आए पानी के कारण कोनाखान रोड में कई जगह बड़े-बड़े गड्ढे हो गए थे। एक आटो रिक्शा और एक कार इस गड्ढे में समा गए थे। कई पुराने मकानों की दीवारें दरक गई थीं। हमारे होटल के पास एक कश्मीरी परिवार का छोटा सा एक मंजिला घर था। उस परिवार ने जरूरी सामान के साथ अपने घर की छत पर शरण ली थी। वे उसी छत पर स्टोव जलाकर अपने परिवार का खाना बना रहे थे। वहीं सो रहे थे और पानी घटने का इंतजार कर रहे थे।


तीन दिन पहले जिस चिनार बाग में मैं और अनादि सैर करके आए थे वह चिनार बाग पूरी तरह से डूबा हुआ था। हमेशा गुलजार रहने वाले डल गेट की सारी दुकानें बंद थीं। डल झील में तैरने वाले रंग बिरंगे शिकारे शांत थे। एक अजीब सी वीरानगी छाई हुई थी। अली भाई का शिकारा इस भीड़ में कहां है नहीं पता है। अली भाई का घर और परिवार सुरक्षित है कि नहीं इसका भी नहीं पता। डल लॉक गेट से होकर अभी भी झेलम का पानी डल झील में जा रहा है। जब पानी जाना रूकेगा तब डल झील का स्तर कम होना शुरू होगा। डल गेट से निशात बाग जाने वाली सड़क पूरी तरह पानी में डूबी हुई नजर आ रही है। दूसरी तरफ जे एंड के बैंक की ओर जा रही सड़क, मौलाना आजाद रोड पर अभी भी पानी जमा हुआ है। वहां कश्तियां चल रही हैं। जाहिर है कृष्णा ढाबा वाली सड़क भी डूबी हुई है।
डल गेट से हमारा रास्ता बदल जाता है। हम एक संकरे रास्ते से बाजार से होकर आगे बढ़ रहे हैं। हमारे समूह में बड़ी संख्या में महिलाएं हैं इसलिए हमलोग धीरे-धीरे चल रहे हैं।

आगे एक मस्जिद आती है। बाहर भीड़ है। मस्जिद की ओर से लोगों को चाय और हल्का फुल्का नास्ता बांटा जा रहा है। पर हमारी चाय पीने की कोई इच्छा नहीं है इसलिए हम आगे बढ़ते जाते हैं। आफताब वानी के परिवार के लिए श्रीनगर शहर जाना पहचाना है। सड़क पर वानी साहब के मित्र स्थानीय पत्रकार मिल जाते हैं।

वे बताते हैं कि पूरा श्रीनगर शहर तबाह हो चुका है। उन्होंने खुद अपना घर छोड़कर किसी दोस्त के घर में शरण ले रखी है। जब हमने बताया कि हमलोग राजभवन के हेलीपैड जा रहे हैं तो उन्होंने कहा कि वहां बहुत बड़ी भीड़ जमा है कई दिनों तक आपका नंबर नहीं आने वाला है। उनकी बातें सुनकर हमारे मन में निराशा बढ़ गई। पर हमारे पास आगे बढ़ते जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। हमारे आगे पीछे बड़ी भीड़ थी। हम अनादि का हाथ मजबूती से पकड़ कर आगे बढ़ रहे थे। भीड़ में बिछुड़ जाने का खतरा बना हुआ था।  



Sunday, October 19, 2014

और छोड़ चले हम ये गलियां...

( जन्नत में जल प्रलय 34 )
09 सितंबर 2014 - चारों तरफ से पानी में घिरे रिट्ज होटल से निकल कर कहां जाएं से सोचते सोचते दोपहर हो गई थी। सरस मेले के 200 शिल्पी अभी होटल में बचे थे। 50 के करीब जा चुके थे। इस बीच कोनाखान रोड के होटल एसोसिएशन की बैठक हुई। इस बैठक में होटल मालिकों ने फैसला लिया कि सभी होटलों को पर्यटकों से खाली करा लेना चाहिए। ऐसा इसलिए कि होटल के भवन कई दिन से पानी में घिरे थे उनके किसी भी वक्त जमींदोज हो जाने का खतरा था। हमारे एजाज भाई होटल संगठन का संदेश लेकर आए कि हमें अब तो होटल खाली करना ही होगा।


अब अंतिम फैसला हो चुका था होटल खाली करने का। मैं और आफताब वानी होटल खाली करने को तैयार थे। हमने सारा सामान पैक कर लिया। अपने अपने बैग लेकर हम तीसरी मंजिल से दूसरी मंजिल स्थित वानी साहब के कमरे में आ गए। पर अभी भी सरस मेले के दर्जनों शिल्पी होटल छोड़ने को तैयार नहीं थे। अपना सामान बरबाद हो जाने से दुखी कुछ शिल्पी ने कहा, अगर इस होटल में दब कर मर भी गए तो परिवार के लोगों मुआवजा तो मिलेगा। मैंने कुछ शिल्पियों को सलाह दी कि अब सोचने का वक्त नहीं है होटल खतरे में है। हमें तुरंत होटल खाली कर ही देना चाहिए। पर होटल में जमे रहने को तैयार कुछ शिल्पी मेरी बात मानने को तैयार नहीं थे। पर थोड़ी देर बाद सहमति बन गई सभी लोग होटल छोड़ने को तैयार हो गए।

कच्चे चावल को दुबारा पका कर खाया - बच्चों ने सुबह से कुछ खाया नहीं था। एक दिन पहले रात को बने चावल कच्चे रह गए थे जिसे अनादि और माधवी ने नहीं खाया था। वानी साहब की पत्नी ने उन कच्चे चावल को बचा कर रख लिया था। आज दोपहर उन कच्चे चावल को दुबारा से पकाया गया। वानी परिवार के पास एक छोटा सा सिलेंडर था। इस दुबारा पकाए गए चावल को चलते चलते हमने चार चार कौर खाया। नौ सितंबर को हमारे शरीर में यही अन्न का दाना गया था।

अब एक एक करके सभी लोग नाव में बैठ बैठ कर रिट्ज होटल से बाहर सड़क तक निकलने लगे। हमें निकालने के लिए दो नावें लगी थी। एक नाव में 10 से 12 लोग आ सकते थे। एक नाव के चप्पू को एजाज भाई खुद चला रहे थे। पूरे होटल में 200 लोग बचे थे। हमें होटल को खाली करके सड़क पर आने में कुछ घंटे लग गए। कोनाखान रोड पर खड़े होकर हमने अपने होटल को बड़े भावुक होकर देखा जो तीन दिनों तक हमारा आसरा बना हुआ था। वानी साहब ने बताया कि होटल की पिछली दीवार से लगा हुआ एक नाला बहता है। मुझे ये बात मालूम थी पर मैंने किसी से चर्चा नहीं कि क्योंकि लोगों का डर और बढ़ जाता। वाकई हमने होटल छोड़कर सही फैसला किया था, क्योंकि हमारे होटल से आगे की एक इमारत टेढी हो चुकी थी। डल गेट के दायरे में आने वाली कई इमारतें खतरे में थीं। हालांकि कई दिनों बाद जब पानी उतर गया तो हमारी एजाज भाई से बात हुई तो पता चला कि होटल सुरक्षित है।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य

Saturday, October 18, 2014

नौ सितंबर की सुबह...एक और कोशिश

( जन्नत में जल प्रलय – 33)


नौ सितंबर 2014 की सुबह। होटल की पहली मंजिल डूबी हुई थी। पानी कम होने का संभावना नहीं नजर आ रही थी। पानी से घिरे होटल के बीच आज तीसरा दिन था। हमारे कुछ साथी नाव में बैठकर आज फिर बाहर सड़क पर गए। थोड़ा पानी घटने के बाद कोनाखान रोड पर आते जाते लोग दिखाई दे रहे थे। आफताब वानी भाई बाहर का माहौल पता करने के बाद लौटे। उन्होंने बताया कि ऐसा सुनने में आया है कि यहां से आठ किलोमीटर दूर स्थित राजभवन यानी राज्यपाल निवास से शहर में फंसे लोगों की हेलीकॉप्टर से लिफ्टिंग हो रही है। हम इस उधेड़ बुन में थे कि क्या इस होटल को छोड़कर जाना ठीक होगा। हेलीकॉप्टर से लिफ्टिंग में हमारी बारी कब आ सकेगी आदि मुद्दे पर विचार हो रहा था।

होटल में आज सुबह हमें नास्ता नहीं मिला। दोपहर में भी खाने का कोई इंतजाम नहीं था। दो दिन किसी तरह खाना बन पाया था 250 लोगों के लिए। पर अब गैस खत्म हो रही थी। एजाज भाई ने कहा हमारे पास कई सिलेंडर का स्टाक है पर वह जगह पानी से घिरी हुई है। वहां जाकर लाना मुश्किल है। एजाज भाई कह रहे हैं मैं किसी को भूखा नहीं रहने दूंगा। कोई न कोई इंतजाम जरूर करूंगा। वे बताने लगे श्रीनगर के लोग कई बार लंबे समय तक कर्फ्यू देखने के आदी हैं। इसलिए यहां लोगों के पास गैस सिलेंडर और राशन का स्टाक घरों में रहता है।  कर्फ्यू के दिनों में लोग राशन एक दूसरे से साझा करते हैं जिससे कोई परिवार भूखा न रहे। पानी थोड़ा उतरेगा तो मैं कहीं न कहीं से राशन और गैस का इंतजाम करके ले आउंगा। पर फिलहाल कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा था।

इसी बीच सरस मेले में शामिल होने आए लोगों में से पंजाब से आए एक समूह के लोगों ने बाहर से लौटकर आने के बाद होटल छोड़कर जाने का मन बना लिया। वानी साहब के कमरे की खिड़की से उतर कर सड़क पर पानी में खड़ी नाव पर सवार होकर वे लोग चल दिए। एजाज भाई उन्हें जाने से रोक रहे थे। सरस मेले के ज्यादातर शिल्पी होटल छोडने के पक्ष में नहीं थे। एजाज भाई ने जाने वाले लोगों से कहा कि हमारे रजिस्टर में अपना नाम लिख दो ताकि हमारे पास ये रिकार्ड रहे कि 250 लोगों में से कौन-कौन चला गया। पर वे लोग बिना नाम लिखे ही चले गए।

बाकी बचे सरस मेले के शिल्पी में से ज्यादातर होटल छोड़कर जाने के पक्ष में नहीं थे। रामपुर के मसूद भाई सबसे पहले होटल छोड़ने के पक्ष में थे। वे 9  तारीख की सुबह ही बाहर निकल गए। मेरे साथ पत्नी माधवी और 9 साल के अनादि थे। इसलिए मैं वानी साहब के परिवार के साथ था। क्योंकि उनके समूह में भी भाभी जी और दो बच्चे थे। वानी परिवार हमारे संकट के साथी थे। इसलिए हमने तय किया था कि हम जहां जाएंगे साथ-साथ ही जाएंगे। वानी साहब के पास एक टेंपो भी था। जो हमारे लिए सहारा था। सड़क पर रात गुजारनी पड़े तो महिलाएं और बच्चे टेंपों के अंदर सो सकते थे। वह टेंपो हमें बारिश से भी बचा सकता था।

Friday, October 17, 2014

त्रासदी से लें सबक – पहले से नहीं थे पुख्ता इंतजाम

( जन्नत में जल प्रलय – 32)
आपदा की घड़ी में सबसे बड़ी जरूरत होती है कि हमारी संचार प्रणाली सुचारू ढंग से काम कर रही हो। अगर संचार प्रणाली काम कर रही है तो हजारों लोगों की जान बचाई जा सकती है। किसी भी जगह फंसे हुए लोग अपने बारे में संदेश भिजवा सकते हैं। पर देश की सबसे खूबसूरत राजधानी में शुमार श्रीनगर जहां सालों भर विदेशी सैलानियों का भी जमावड़ा लगा रहता है, वहां का संचार तंत्र पूरी तरह सात सितंबर की सुबह में धारासायी हो गया। 


हमने देश में पिछले दो दशक में आए आपदा से कोई सबक नहीं लिया था। हमारे पास अब गांव गांव में मोबाइल फोन सेवा का शानदार नेटवर्क है। पर ये आपदा में ये नेटवर्क कैसे काम करता रहे इसके पुख्ता इंतजाम नहीं थे। गुजरात में 2001 में आए विनाशकारी भूकंप में संचार नेटवर्क फेल हो गया था। मुंबई में 2005 में आए बाढ़ में शहर में अलग अलग जगहों पर लोग फंस गए थे। उस वक्त भी कई इलाकों की बिजली चली गई थी और मोबाइल नेटवर्क ने कई जगह साथ छोड़ दिया था। बिहार में कोसी नदी के कहर से 2008 में विनाशकारी बाढ़ का प्रकोप लोगों ने झेला था। इस बार भी मोबाइल फोन का स्थैतिक नेटवर्क पंगु हो गया था। पर हमने इन सब घटनाओं से कोई सबक नहीं लिया।

आपदा की घड़ी में जिस क्षेत्र में संचार नेटवर्क फेल हो जाता है वहां पर इमरजेंसी जीएसएम तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इस घड़ी में मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियां इमरजेंसी जीएसएम सेटेलाइट पोर्टेबल टर्मिनल का इस्तेमाल कर संचार व्यवस्था को संचालित करती हैं। पर श्रीनगर में इस तरह के उपाय करने में कई दिनों की देर हो गई। जीएसएम  या सीडीएमए तकनीक की मोबाइल सेवा स्थैतिक नेटवर्क से काम करता है। आपका फोन सबसे निकट के स्थैतिक टावर को सिग्नल भेजता या प्राप्त करता है। अगर वह निकट का टावर पानी में डूब गया हो या फिर उसको संचालित करने के लिए मिलने वाली बिजली का स्रोत खत्म हो गया हो तो उस क्षेत्र के मोबाइल फोन में सिग्नल नहीं आएंगे, यानी बातचीत नहीं हो सकेगी। इसलिए आपदा की घड़ी में सेटेलाइट जीएसएम टर्मिनल का इस्तेमाल किया जाता है। आजकल कई देशों में समान्य स्थितियों में भी सेटेलाइट जीएसएम टर्मिनल का इस्तेमाल किया जाता है। इसके बदौलत ही काफी ऊंचाई पर आसमान में उड़ रहे विमान में मोबाइल फोन की सेवाएं दे पाना संभव हो सका है।


आपदा की घड़ी में एम्मारसेट सेटेलाइट फोन का इस्तेमाल किया जाता है। पर जम्मू एवं कश्मीर की राज्य सरकार के पास ऐसे कितने फोन थे और क्या वे काम कर रहे थे इसकी कोई जानकारी नहीं है।

एयरसेल कंपनी इन बातों को लेकर पहले से सचेत थी इसलिए उसने श्रीनगर शहर में ज्यादातर टावर ऊंचाई पर लगाए थे। पर बाकी कंपनियां इस मामले में फिसड्डी साबित हुईं। कुछ कंपनियों कादावा है कि उन्होंने जितनी जल्दी हो सके नेटवर्क ठीक करने की कोशिश की। पर सच्चाई इससे इतर है।

अखबारों का प्रकाशन रहा बंद – सात तारीख की सुबह से श्रीनगर शहर में समाचार पत्रों का प्रकाशन ठप्प हो गया था। शहर के प्रेस एरिया में अखबारों के दफ्तरों में पानी घुस आया था। यह पानी 10 दिनों के बाद निकल सका। बिजली व्यवस्था भी ठप्प थी।सारे पत्रकार और गैर पत्रकार कर्मचारी भी फंसे हुए थे। ऐसे में समाचार पत्रों का प्रकाशन संभव नहीं था। सरकारी प्रसारक आकाशवाणी और दूरदर्शन के श्रीनगर केंद्र का प्रसारण भी कई दिनों तक ठप्प रहा।
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