Tuesday, September 30, 2014

लगा जैसे कि ये हमारी आखिरी रात हो....((15))

( जन्नत में जल प्रलय - 15 )

सात सितंबर की रात होटल रिट्ज में देश भर से आए 250 से अधिक लोग अपने अपने कमरे में सो रहे थे। अचानक रात 12 को बजे महिलाओं के चीखने की आवाजें आने लगीं, झेलम का पानी सड़क पार कर हमारे होटल में तेज शोर के साथ घुस रहा था। हमें लगा कि हम टाइटेनिक जहाज पर सवार हैं और यह हमारी आखिरी रात है।


रात 12 बजे से शुरू होने वाला पानी अगले दिन यानी 8 सितंबर को शाम को पांच बजे तक सड़क से ऊपर होकर हमारे रिट्ज होटल के परिसर में भरता रहा। शाम को पांच बजे पानी सड़क के ऊपर से निकलकर आना बंद हो गया। हम सबने थोड़ी राहत की सांस ली। इससे ये अनुमान लगाया गया कि झेलम का गुस्सा अब कम हो रहा है। यानी झेलम दरिया का जल स्तर घट रहा है तभी पानी का स्तर हमारे इलाके में भी कम हो रहा है। पर खतरा टला नहीं था।

आठ तारीख की सारी रात भी जागते हुए गुजरी। जिन्होंने पिछली रात खौफ में जगते हुए गुजारी थी उनकी आंखों में नींद कहां थी। सभी 250 लोग अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर सोने से कतरा रहे थे।

हमने अनादि को सुलाने के लिए थोड़ी देर सोने का नाटक किया। इस खौफ की घड़ी में बेटे ने धैर्य नहीं खोया था। देश भर से आए लोगों के बीच वह घुलमिल कर हंसता खिलखिलाता नजर आ रहा था। पर दिन भर लोगों की तरह तरह की बातें सुनने वाले अनादि के मन भी आशंकाएं भर गई थी। रात को सोते समय बेटे ने पूछा पापा क्या हमलोग इस होटल में सेफ( सुरक्षित) हैं। मैंने कहा- हां बेटा बिल्कुल सुरक्षित हैं। मैं जानता हूं कि मेरा उत्तर बिल्कुल झूठा था। सिर्फ ये तसल्ली देने के लिए था कि बेटे को नींद आ जाए। उसके मन में मेरी तरह कोई खौफ न हो। वह लगातार जगने के कारण बीमार न पड़े। बेटे से ज्यादा हम खौफजदा थे। बेटे के सो जाने के बाद हम फिर सारी रात होटल की लॉबी में घूमते हुए रहे। अंधेरे में एक दूसरे से बातें करते हुए। बीच  बीच में कमरे में जाकर बेटे को देख आते थे कि वह ठीक से सो रहा है।

इस रात को सामने से पानी तो नहीं आ रहा था पर पानी पीछे से यानी डल झील की तरफ से हमारे होटल में आने लगा। धीरे धीरे डल झील का जल स्तर बढ़ता जा रहा था। हमारी नजर आसपास के होटलों की सीढ़ियों दीवारों और पेड़ पौधों पर थी जो धीरे धीरे जल स्तर बढ़ने के कारण डूबते जा रहे थे। सबके चेहरे पर खौफ था। चार मंजिलों वाले होटल का आधार तल खाली करा लिया गया था। पर सारा इलाका जलमग्न हो चुका था।

खतरा अभी टला नहीं था...
लगातार बढ़ रहे पानी के बीच डल झील के दायरे में अवैध कब्जा कर बनाए गए कच्ची नींव वाले होटलों के कभी भी जमींदोज हो जाने का खतरा था। देश भर से जुटे 250 लोगों की जान सांसत में थी। सबके मन में डर समाया हुआ था, मानो हम किसी टायटेनिक जहाज पर सवार हों, और कहीं ये हमारी आखिरी रात न साबित हो। सुनने में आ रहा था सारा शहर डूब चुका है। लेकिन सबके मन में एक ही सवाल था कि आखिर यहां से निकल कर जाएं तो कहां। रामपुर के मोहम्मद मसूद भाई तो आठ तारीख की सुबह ही होटल खालीकर कहीं और चलने की सलाह दे रहे थे। पर उनकी सलाह किसी ने नहीं मानी।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य vidyutp@gmail.com

(HOTEL RITZ, KASHMIR, FLOOD )

Sunday, September 28, 2014

जब दरिया झेलम ने दिखाया अपना गुस्सा ((14))

( जन्नत में जल प्रलय - 14)

श्रीनगर शहर के लोग शनिवार छह सितंबर की रात इस उम्मीद के साथ सोए थे कि इतवार की सुबह खुशनुमा होगी। कई दिनों से लगातार हो रही बारिश रुक गई थी। अब उम्मीद थी मौसम खुशगवार होगा। आसपास के शहरों के रास्ते खुल जाएंगे और
बाग सैलानियों से गुलजार होंगे। पर रविवार के सुबह साढ़े तीन बजे का वक्त था जब सारा शहर गहरी नींद में था पर शहर के बीचों बीच गुजरती झेलम नदी के पानी में भंयकर शोर था। कई दिनों से कश्मीर के तमाम इलाकों में हुई बारिश के पानी को संभाल पाना महज 30 मीटर चौड़ाई वाली दरिया के लिए अब मुश्किल हो चुका था।

दरिया पर बना बांध तेज बहाव का दबाव नहीं सह सका। बांध टूटने के साथ ही तेज गति के साथ पानी शहर में घुसा। छह फीट ऊंची पानी की धारा तेज गति से शहर में घुसी। जिसकी भी नींद खुली उसने इस जल प्रलय का भयावह मंजर अपनी आंखों से देखा और चीखते हुए बिस्तर छोड़ उपरी मंजिलों की ओर भागने लगे। सैकड़ो लोग तो सोते सोते ही बह गए। पानी इतना तेज था कि दो घंटे में दो मंजिला इमारतें डूबा चुकी थीं। लोग तीसरी मंजिल की ओर भाग रहे थे। काफी लोगों ने छत पर शरण ली । कई लोग पेड़ पर चढ़ गए। साठ साल में किसी ने झेलम का ऐसा रौद्र रूप नहीं देखा था। सालों भर किसी नाले सी दिखाई देने वाली झेलम पूरे शहर पर अपना गुस्सा दिखा रही थी।


रविवार की दोपहर तक लाल चौक, टूरिस्ट रिसेप्शन सेंटर, जम्मू एंड कश्मीर बैंक की मुख्य इमारत सब डूब चुके थे। शहर का सबसे लोकप्रिय इटिंग प्वाइंट कृष्णा ढाबा शनिवार की रात को गुलजार था। पर अगली दोपहर तक कृष्णा ढाबा उसके आसपास के हिंदुस्तान पेट्रोलियम के दो पेट्रोल पंप डूब गए थे। दोपहर तक पूरे शहर की बिजली गुल हो गई। मोबाइल और टेलीफोन सेवाएं बंद हो गईं। धरती का स्वर्ग कहा जाने वाला शहर कुछ ही घंटे में तबाह हो चुका था। रविवार की शाम शहर के सबसे चहलपहल वाले इलाके डल गेट में पानी उफान मारने लगा। पानी का बहाव इतना तेज था कि डल झील के कई शिकारे टूट कर दो टुकडे हो गए।

अब तक यह होता था कि डल झील में पानी बढ़ने पर उसे डल गेट नंबर एक से चैनल द्वारा झेलम में छोड़ा जाता था। अब उल्टा हो रहा था झेलम का पानी डल झील में आ रहा था और डल झील का स्तर बढ़ता जा रहा था। डल के किनारे के सभी होटल पानी में डूब चुके थे। पूरे शहर में कोहराम मचा था। लोग सुरक्षित जगहों पर जाने के लिए नावें ढूंढ रहे थे तो बड़ी संख्या में लोग जान बचाने के लिए डल झील के पास स्थित शंकराचार्य पर्वत पर चढ़ने लगे।
Email- vidyutp@gmail.com

Friday, September 26, 2014

रात 12 बजे जब पानी हमारे होटल में घुसा ((13))

( जन्नत में जल प्रलय - 13 )
7 सितंबर की रात खाने का कोई प्रबंधन नहीं था। आसपास के सभी होटल रेस्टोरेंट बंद हो चुके थे। सरस मेला में हिस्सा लेने आए लोगों को एक शाम का भोजन मेला आयोजकों की ओर से उपलब्ध कराया जाता था। पर आयोजकों का फोन नहीं लग रहा था। वे हमसे भी बड़े संकट मे घिरे थे। हमारे होटल के प्रबंधक एजाज भाई ने कहा कि मैं सभी 250 लोगों को भोजन उपलब्ध कराउंगा। पास के किसी रेस्टोरेंट से बात कर उन्होंने फूड पैकेट बनवाए। होटल के हर कमरे में मौजूद लोगों को गिनती के हिसाब से फूड पैकेट उपलब्ध करा दिए गए। खाने के बाद सभी लोग अपने अपने अपने कमरे में जाकर सो गए। पर ज्यादा लोगों के आंखों में नींद नहीं थी। सभी दिल में किसी आने वाले खतरे का खौफ था।



बड़ी मुश्किल से सभी लोग अपने अपने कमरे में सोने की कोशिश कर रहे थे। अचानक रात के 12 बजे कई महिलाओं के चीखने चिल्लाने की आवाजें आने लगीं। मैं शोर सुनकर कमरे का दरवाजा खोल लॉबी में पहुंचा। श्रीनगर के पास कुपवाड़ा से आई बहने ऊंची आवाज में रो रही थीं। हमारे होटल के समाने वाली सड़क जो बांध के ऊपर की सड़क यानी पुश्ता है उसके ऊपर से पानी ओवर फ्लो कर हमारे होटल को डुबा रहा था। दरअसल झेलम दरिया का पानी दिन भर पूरे शहर को डुबोने के बाद डल झील के पास पहुंच चुका था। चैनल गेट से ओवर फ्लो होने के बाद पानी सड़क के ऊपर से गुजरता हुआ डल झील में जा रहा था। डल झील के जद में स्थित होटल रिट्ज चारों तरफ से डूबने लगा था।
पानी की धार देखते रामपुर के मसूद भाई। 


होटल में रह रहे कश्मीर, पंजाब, हरियणा, हिमाचल, दिल्ली, यूपी, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, ओडिशा, नागालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा समेत देश के दूसरे राज्यों के तमाम लोग होटल की छत पर पहुंच कर पानी का ये कहर देखने लगे। अब सारी रात अंधेरे में जागते हुए कटी। पानी का शोर बढ़ता जा रहा था। हमारे होटल के आधार तल में पानी था जिसका स्तर धीरे धीरे बढ़ता जा रहा था। हमलोग चारों तरफ से पानी से घिर चुके थे। सुबह होने पर देखा होटल की पहली मंजिल पानी में थी।

मुझे अपने गांव के नहर का पुल याद आया जहां पानी ऊंचाई से बड़े वेग से नीचे गिरता था। वैसी ऊंची आवाज सड़क से गिर करह हमारे होटल की ओर आ रहा था। पेसफिक होटल की दीवार को पानी धीरे धीरे जख्मी कर रहा था। हमारे होटल के समाने वाली सड़क नहर में तब्दील हो गई थी। समाने खड़े आटो रिक्शा और कार पानी में डूब रहे थे।

सुबह होने पर उजाला तो हुआ पर पानी का कहर जारी रहा। होटल में मौजूद सारे लोग बुरी तरह डरे हुए थे। सड़क के ऊपर से आ रहे पानी का बहाव कम होने का नाम नहीं ले रहा था। हमारे होटल के आसपास के सभी होटल भी डूब रहे थे। हमारा होटल भी धीरे-धीरे डूबता जा रहा था। महिलाएं बच्चे और बुजुर्ग सभी खौफजदा थे।


-    विद्युत प्रकाश मौर्य  
FLOOD, KASHMIR SRINAGAR, CAPART, SARAS MELA ) 

Wednesday, September 24, 2014

जब बारह लाख की आबादी का दुनिया से संपर्क टूटा ((12))

( जन्नत में जल प्रलय - 12 )
-    श्रीनगर एयरपोर्ट जाने के तीनों रास्ते बंद

-    जम्मू श्रीनगर हाइवे पहले से ही है बंद

-    और पूरी तरह डूब गया मेराजुद्दीन नगर

अपना वैष्णो ढाबा की रविवार 7 सितंबर की सुबह। हम कहवा पी रहे थे। तभी एक सरदार जी आए। श्रीनगर में व्यापार करते हैं। मेराजुद्दीन नगर में उनका घर है। उन्होंने बताया कि बताया कि रात में अचानक आए पानी से उनके घर की दो मंजिले डूब गई हैं। वे जान बचाने के लिए परिवार के साथ छत पर खड़े थे। कुछ घंटे पहले नाव से रेस्कयू करके उन्हे निकाला गया। डल गेट इलाका ऊंचाई पर इसलिए यहां उन्होंने शरण ली है। वे अपने परिवार के लिए पराठे पैक करा रहे थे। सरदार जी रूआंसे हो रहे थे। बताया कि सारा सामान घर में छोड़ कर आया हूं। पता नहीं सब कुछ सुरक्षित वापस मिलेगा या नहीं। उन्हें डर था कि पानी में डूबे हुए घर में लोग नाव से चोरियां भी कर रहे हैं। उनके मुहल्ले में पानी बढ़ता जा रहा है। दो मंजिले पूरी तरह डूब चुकी हैं। तीसरी मंजिल भी डूबती जा रही है। मुहल्ले के तमाम लोग अपना आशियाना छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर भाग रहे हैं।


सरदार जी बता रहे हैं कि हमने अपने जीवन में ऐसी आपदा कभी नहीं देखी। अब तक हमें यही जानकारी मिल रही थी श्रीनगर शहर के निचले इलाके पानी में डूब रहे हैं।  हालांकि खतरा इससे कहीं ज्यादा बढ़ चुका था जिसका हमें एहसास नहीं था।
आफताब वानी सड़क पर जाकर हालात की जानकारी लेने गए। थोड़ी देर बाद हमें पता चला कि श्रीनगर शहर से एयरपोर्ट जाने के तीनों रास्ते बंद हो चुके हैं। जम्मू श्रीनगर हाइवे तो पहले से ही बंद है। श्रीनगर के आसपास पहलगाम, गुलमर्ग, सोनमर्ग, कुपवाड़ा, सोपियन के रास्ते भी बंद हो चुके हैं। यानी शहर की साढ़े 12 लाख आबादी का संपर्क अब बाकी दुनिया से कट चुका है।
हम एक बड़े खतरे में फंस चुके थे। सबके मन में चिंता थी यहां से निकलेंगे कैसे। और इस दौर में खाएंगे क्या...जिंदगी हमें कौन सा रंग दिखा रही है...चिंता में दोपहर हो गई। 

खाने का स्टाक खत्म हुआ -  पेट में चूहे कूद रहे थे। खोनाखान रोड पर पेसफिक होटल के ठीक बगल से हमारे होटल का रास्ता नीचे आता था। वहां एक ढाबा था तुआम फूड सर्विसेज। जहां सौ रुपये की थाली थी। वहां दोपहर का खाना मिल रहा था। हमने वहां दो थाली आर्डर की। हरी सब्जियां नहीं थीं। स्टाक खत्म हो चुका था। दाल चावल और रोटी खाने में मिली। श्रीनगर के किसी ढाबे में हमारा वह आखिरी भोजन था। ढाबे वाले को मालूम था कि बड़ा खतरा आ चुका है। पर उसने खाने की दरें नहीं बढ़ाई थीं। उसने बताया कि हमारे पास शाम के लिए कोई स्टाक नहीं है इसलिए वह लोगों को रात का डिनर नहीं उपलब्ध करा पाएगा।

सारा दिन आसन्न संकट को लेकर आपस में चिंता करते हुए गुजरा। शाम हुई तो अंधेरा छा गया था। पूरे शहर की बिजली गुल थी। वानी साहब कहीं से तीन मोमबत्तियां लेकर आए थे। उनमें से एक उन्होंने हमें दीं। माधवी का नोकिया टार्च मोबाइल अंधेरे में डूबे धरती के स्वर्ग में हमारा बड़ा सहारा था।

-    ---  विद्युत प्रकाश मौर्य   


(FLOOD, KASHMIR ) 

Tuesday, September 23, 2014

प्रलय की आहट...पूरे शहर की बिजली हुई गुल ((11))

( जन्नत में जल प्रलय - 11 )

रविवार 7 सितंबर सुबह के 10 बजे का समय। अचानक बिजली चली गई। थोड़ी देर बाद पता चला कि पूरे शहर की बिजली जा चुकी है। अब बिजली चली गई तो मोबाइल सेवाएं और लैंडलाइन टेलीफोन सेवाएं भी बंद हो गईं। हम पूरी तरह संचार नेटवर्क से कट चुके थे। जिनके फोन चार्ज थे उससे बातें नहीं हो सकती थीं, जो डिस्चार्ज थे उन्हें चार्ज करने का विकल्प खत्म था। हमें अंदेशा होने लगा था कि हम किसी बड़े संकट में फंसने जा रहे हैं।


सुबह हम अपना वैष्णो ढाबा से कहवा पीकर आ चुके थे। दुबारा होटल से हमलोग सुबह का नास्ता करने के लिए सड़क पर निकले। पर अपना वैष्णो ढाबा बंद हो चुका था। हम खाने के लिए कोई दूसरा विकल्प ढूंढ रहे थे। तभी सड़क पर सैकड़ो लोगों को हुजुम दौड़ता हुआ आया  भागो भागो सैलाब आ रहा है....हम उस भीड़ के साथ भागने लगे। बच्चे का हाथ तेजी से पकड़ा हुआ था। भागने वाले लोग कह रहे थे। टीआरसी पानी में डूब गया है। जम्मू एंड कश्मीर बैंक की इमारत में पानी घुस रहा है। पास के दो हिंदुस्तान पेट्रोलियम के पेट्रोल पंप भी पानी में डूब रहे हैं। कृष्णा ढाबा वाली सड़क पर भी कई फीट पानी है। शहर के प्रसिद्ध मौलाना आजाद रोड पर भी झेलम का पानी आ चुका था। संचार व्यवस्था ठप्प थी इसलिए लोगों से सुनी सुनाई खबरें ही आ रही थीं। हालांकि तब हमें एहसास नहीं था कि श्रीनगर शहर का एक बड़ा हिस्सा कितने बड़े खतरे में आ चुका है।


हमने नास्ते के लिए डल गेट नंबर एक पर एक फल बेचने वाले से कुछ केले खरीदने चाहे पर भागती हुई भीड़ ने खरीदने का मौका ही नहीं दिया। हम अपने होटल में वापस आ गए। एक घंटे बाद मैं एक बार फिर मुख्य सड़क पर निकला। हम सब भूखे थे, खाने का कोई इंतजाम करना था। फिर फल वाले स्टाल पहुंचा। 100 रुपये के केले और अंगूर खरीदा। हमें एहसास हो चुका था बड़ा संकट आ रहा है। हमारे पास जिंदा रहने के लिए कुछ रिजर्व फूड ( आरक्षित स्टॉक) होना चाहिए। होटल के बगल में बिस्मिल्लाह टी स्टाल के पास एक शिकारे में चलती फिरती दुकान दिखी। उनके पास बिसलरी की पानी की बोतलें थीं। हमने कुछ बोतलें खरीद लीं। भलमानुस दुकानदार ने बिना एक रुपये फालतू लिए छपे हुए दाम पर भी संकटकाल में हमें पानी की बोतलें दीं। अल्लाह उन्हें खुश रखे। वर्ना लोग मजबूरी का लाभ तुरंत उठाना शुरू कर देते हैं।

होटल में मौजूद थे सरस मेला में हिस्सा लेने आए देश भर के 22 राज्यों के 250 से ज्यादा लोग। सबके मन में एक डर समा गया। लोग अलग अलग तरह की बातें करने लगे। मेले की आयोजकों में से एक न्यूट्रीशन आफिसर प्रमिला गुप्ता का फोन नहीं लग रहा था। दोपहर में हमने काफी कोशिश की तो आफताब वानी भाई के मोबाइल से पटना में रहने वाले मेरे के बेटे मामा जी आनंद रंजन जी से छोटी सी बात हुई। हमने उन्हें बताया कि हम डल गेट के पास रिट्ज होटल के कमरा नंबर 10 में हैं। संकट बढ़ता जा रहा है, पता नहीं आगे आपसे संवाद बन पाए या नहीं... 
( DAL GATE, MOBILE SHUT DOWN )


-    विद्युत प्रकाश मौर्य   

Monday, September 22, 2014

जब श्रीनगर शहर की मोबाइल सेवाएं हो गईं बंद ((10))

चिनार बाग में सुबह टहलने निकले थे....
( जन्नत में जल प्रलय – 10 )

रविवार सात सितंबर सुबह के छह बजे थे। मेरी नींद खुली। अनादि भी जग गए। माधवी अलसाई हुई थीं। हमने और अनादि ने सुबह की सैर पर जाने को तय किया। जैसा की हम हर शहर में करते हैं। होटल से बाहर निकलने पर सामने चिनार बाग था। बाग में हरियाली के बीच कुछ इलाकों में थोड़ा थोड़ा पानी आ गया था। ऐसा डल झील के जल स्तर में बढ़ोत्तरी के कारण हुआ था। चिनार बाग के प्रवेश द्वार पर बोर्ड लगा था प्रवेश टिकट 10 रुपये। पर काउंटर पर कोई नहीं था। लंबे लंबे चिनार के पेड़ों के कारण इस बाग का नाम चिनार बाग है। 

श्रीनगर स्थित बाबा धर्मदास मंदिर, जहां भारी सुरक्षा थी। 
बाग के किनारे किनारे बने डल गेट चैनल में कई हाउस बोट लगे हैं। पर इन हाउस में वीरानगी है। बाग में बैठने के लिए कुछ बेंच बनी हैं। बच्चों के लिए कुछ झूले भी बने हैं। आनदि बाग में चहल कदमी करते रहे। हमने खुशनुमा माहौल में बाग में कई तस्वीरें खिंचवाई। यहां एक सज्जन मिले जो कश्मीर क सीमांत जिले के रहने वाले हैं। वे लकड़ियों की खरीददारी का काम करते हैं। इसलिए वे सूखे पेड़ की तलाश कर रहे थे। पर शायद उन्हें कोई पेड़ नजर नहीं आया।

बाग से निकल कर हम लोग आगे बढ़े। सीआरपीएफ के 21 बटालियन का मुख्यालय आया। यहां सड़क पर बैरियर लगे हैं। आते जाते वाहनों की चेकिंग होती है। पास में होटल ममता की विशाल बिल्डिंग है। जम्मू कश्मीर हैंडीक्राफ्ट इंपोरियम का शोरूम है।

 आगे विश्वंभर नगर चौक आया। यहां पर बाबा धर्मदास ट्रस्ट का बोर्ड और एक मंदिर नजर आया। मंदिर देखकर हमने वहां जाकर दर्शन करने की सोची। मंदिर के छोटे प्रवेश द्वार पर सेना का कड़ा पहरा था। संगीनों के साए में भगवान। पता चला श्रीनगर के सभी मंदिरों के आगे कड़ी सुरक्षा है। प्रवेश करने वालों की भी जांच पड़ताल की जाती है। हमलोग मंदिर के अंदर पहुंचे। वहां कुछ भोजपुरी बोलने वाले लोग मिले। उन्होंने हमसे मुलाकात कर खुशी जताई। भगवान के सामने मत्था टेकने के बाद कुछ देर हमलोग वहां बैठे रहे। पता चला पुजारी जी एक घंटे बाद आएंगे तब प्रसाद मिलेगा। हमने वापस लौटने की सोची। 

खोनाखोन रोड पर रोटियों की एक दुकान 
बाहर निकलने पर कश्मीरी रोटियों की दुकान मिली। पांच रुपये की एक खमीरी रोटी। कश्मीर का सुबह का नास्ता। इन रेडीमेड रोटियों के साथ चाय या कॉफी पीकर लोग चल पड़ते हैं काम पर। एक नौजवान सज्जन रोटी खरीदकर जा रहे थे। हमने उनसे जानकारी ली रोटियों के बारे में। पता चला हमारे ही होटल में ठहरे हैं नाम है आफताब वानी। बाद में वे हमारे पक्के दोस्त बन गए। संकट के साथी। उनके साथ एक दर्द का रिश्ता बन गया। जो शायद लंबे समय तक चले।

खैर चिनार बाग में हमने मोबाइल में फेसबुक ऑन किया और तीन तस्वीरें अपलोड की। एक श्रीनगर के आसमान में इंद्रधनुष की। अनादि ने जीवन में पहली बार इंद्रधनुष देखा था। एक माधवी और वंश की दुआ करते हुए, तीसरी तस्वीर मेरी थी बाग में बैठे हुए। इसके आधे घंटे बाद पूरे श्रीनगर शहर की मोबाइल सेवाएं बंद हो गईं और हम पूरी दुनिया से कट चुके थे।


-    विद्युत प्रकाश मौर्य   ( FLOOD, KASHMIR )

Sunday, September 21, 2014

खुशबू सी आ रही है जाफरान की...((09))

( जन्नत में जल प्रलय - 9 )
खुशबू सी आ रही है जाफरान की,
खिड़की फिर कोई खुली है उनके मकान की...

ज्यों लूट ले कहार कोई दुल्हन की पालकी
कुछ ऐसी ही हालत है अपने हिंदुस्तान की...

कश्मीर में बड़े पैमाने पर जाफरान की खेती होती है। जाफरान को हिंदी में केशर और अंग्रेजी में सेफ्रॉन कहते हैं। श्रीनगर से आगे पांपोर में जाफरान की बडे पैमाने पर खेती होती है और यहां का जाफरान सबसे बेहतरीन माना जाता है। जाफरान कई तरह की बीमारियों में कारगर है। बच्चों को दूध में जाफरान मिलाकर देने से बच्चे सेहतमंद रहते हैं। असली जाफरान काफी महंगा बिकता है। श्रीनगर के तमाम दुकानदार जाफरान बेचते हैं। इसका भाव यहां 225 से 250 रुपये प्रति ग्राम का है। दिल्ली आकर ये जाफरान और महंगा हो जाता है। एक ग्राम में काफी पत्तियां आ जाती हैं, जिनका इस्तेमाल आप कई दिनों तक कर सकते हैं।

खोनाखान रोड पर मुश्ताक भाई की दुकान है। कश्मीरी शाल सूट और हेंडीक्राफ्ट के वस्तुओं की। हालांकि पूरे श्रीनगर में हर इलाके में इस तरह की दुकाने हैं। जहां से श्रीनगर आने वाले सैलानी शापिंग करते हैं। रात के 9.30 बज चुके थे। मुश्ताक भाई की दुकान खुली थी। होटल में जाकर सोने से पहले हमारी इच्छा हुई कि क्यों  कुछ सूट देख लिए जाएं। इससे पहले हम मीना बाजार में कश्मीरी गर्म सूट की कीमत आजमा चुके थे। मुश्ताक भाई की दुकान में स्टाक अच्छा लगा और कीमतें भी वाजिब। माधवी को एक गर्म सूट पसंद आ गया। थोड़ी मोलजोल हुई हमने एक कश्मीरी गर्म सूट खरीद लिया। मुश्ताक भाई ने बताया कि उनका एक बेटा भी पत्रकारिता का कोर्स कर रहा है। हालांकि वे उसके भविष्य को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं थे। मैंने कहा कि बेटे को पूरा अनुभव लेने दें और आप आने वाले वक्त को लेकर निश्चिंत रहें। उनसे काफी अच्छी बातचीत हुई। उन्होंने अपना कार्ड दिया औऱ मेरा कार्ड लिया।

मुश्ताक भाई की दुकान पर हमने जाफरान देखा। उन्होंने जाफरान के बारे में बताया और असली जाफरान की पहचान बताई। हमने सोचा था कि श्रीनगर छोड़ने से पहले थोड़ा सा जाफरान खरीदते हुए चलेंगे। साथ ही मुश्ताक भाई की दुकान से कुछ हैंडीक्राफ्ट वाले बैग भी खरीदेंगे।
पर अगले दिन मुश्ताक भी की दुकान नहीं खुली। जिस सड़क पर उनकी दुकान थी वहां झेलम दरिया से आने वाले खतरे को लेकर शोर था। हम न दुबारा मुश्ताक भाई से मिल सके ऩ कुछ और खरीददारी कर सके। कई दिनों बाद दिल्ली से फोन मिलाया तो मुश्ताक भाई से बात हुई। उन्होंने बताया कि उंचाई पर होने के कारण उनकी दुकान तो नहीं डूबी है, पर अब न जाने कितने महीने बाद फिर से डल गेट सैलानियों से गुलजार होगा और कुछ बिक्री होगी। मुश्ताक भाई का घर भी ऊंचाई पर होने के कारण बच गया। वे उन चंद खुशकिस्मत लोगों में से हैं जिनका इस सैलाब में कुछ भी नुकसान नहीं हुआ। पर वादिए कश्मीर में हर किसी की किस्मत मुश्ताक भाई जैसी नहीं है।


-    विद्युत प्रकाश मौर्य   

Saturday, September 20, 2014

और कृष्णा ढाबा डूब गया...((08))

( जन्नत में जल प्रलय - 8 )
श्रीनगर में अगर आप शाकाहारी खाना के आकांक्षी हैं तो इसके लिए सबसे लोकप्रिय जगह है कृष्णा ढाबा। मौलाना आजाद रोड के पास कृष्णा ढाबा सुबह, दोपहर हो या देर शाम हमेशा सैलानियों से गुलजार रहता है। हालांकि कृष्णा ढाबा के अगल बगल में तीन और पंजाबी स्टाइल में खाना परोसने वाले ढाबे हैं, पर कृष्णा ढाबा की कुरसियां भरी होती हैं। लोग खड़े खड़े भी पेट पूजा कर रहे होते हैं पर आसपास के ढाबों की कुरसियां खाली रहती हैं। हमें अपना वैष्णो ढाबा के यशपाल भाई ने भी दिन में बताया था कि आप कृष्णा ढाबा में खाने जरूर जाएं वहां का खाना अच्छा है। उन्ही से पता चला कि ये ढाबा एक मंदिर की जमीन पर किराए पर चलता है।

डल झील से शिकारे की सैर से लौटन पर रात के आठ बज गए थे। हम चल पड़े लोगों से पूछते हुए कृष्णा ढाबा की ओर। पहले हिंदुस्तान पेट्रोलियम का एक पंप आया। वहां से बाएं मुड़े। सामने जम्मू एंड कश्मीर बैंक की सुंदर इमारत थी। उसके पास ही टूरिस्ट रिसेप्शन सेंटर। थोड़ी दूर चलने पर दूसरा एचपी का पेट्रोल पंप आया। लोगों की भारी चहल पहल देखकर लगा कि कृष्णा ढाबा आ गया है। बाहर फुटपाथ पर गरम कपड़ों और हैंडीक्राफ्ट के बाजार लगे थे। पर हमें भूख लगी थी। मीनू देखने के बाद काउंटर पर पहले पूरा भुगतान कर आर्डर किया। भीड़ थी इसलिए वेटर ग्राहकों के लिए बैठने की जगह का इंतजाम कर रहे थे। हमने आर्डर किया.. कश्मीरी दम आलू, शाही पनीर और आठ रोटियां। कुल 207 रुपये। 

खाने की दरें बिल्कुल वाजिब। सर्विस भी काफी तेज। अनादि को कश्मीरी दम आलू पसंद आया। शाही पनीर बनाने का उनका स्टाइल कुछ अलग था। हमने तेजी से खाना खत्म किया। काफी लोग अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। दिल्ली मुंबई के खाते पीते घरों के लोगों की भीड़ थी। सब ये योजना बनाने में लगे थे कि कल रविवार को कहां घूमने जाएंगे।
पर किसी को नहीं मालूम था कि कल इसी कृष्णा ढाबा में कोई चहल पहल नहीं होगी। इस खुशनुमा माहौल में वे अपने इस दौरे में आखिरी बार डिनर कर रहे हैं। हम खाने के बाद पैदल चलते हुए अपने होटल की ओर बढ़ चले। रास्ते में दवाओं की दुकानें और दूसरी तमाम तरह की दुकानें खुली थीं। सारा शहर जगमग कर रहा था। पर ये आखिरी जगमगाहट भरी शाम थी। देश भर से जो भी सैलानी श्रीनगर घूमने जाते हैं उनके जेहन में कृष्णा ढाबा की खुशनुमा यादें होती हैं।

पर रविवार 7 सितंबर की दोपहर हमें सुनने को मिला कि कृष्णा ढाबा के आसपास कई फीट पानी आ चुका है। होटल बंद हो गया है। आसपास के दोनों पेट्रोल पंप डूब चुके हैं। जम्मू एंड कश्मीर बैंक की इमारत में भी पानी घुस चुका है। हमारे दिमाग में बार बार शनिवार की रात की कृष्णा ढाबा के बाहर की चहल पहल की तस्वीर घूम रही थी। वहां भोजन करके तृप्त हो रहे चेहरेके भाव नजर आ रहे थे। पर अब कृष्णा ढाबा के आसपास के मौहाल के जल्द गुलजार होने की दूर दूर तक कोई उम्मीद नहीं नजर आ रही थी।  

-    vidyutp@gmail.com  

KRISHNA VASHNO DHABA Durganagh, Srinagar - 190001
+(91)-194-2454775+(91)-9419113849

Friday, September 19, 2014

पानी में तैरते खेत और मीना बाजार ((07)

( जन्नत में जल प्रलय - 7 )
डल झील में सैर करते हुए हमें अली भाई ने जल में तैरते हुए खेत दिखाए। पानी में तैरता हुए एक मिट्टी का स्तर है जिसपर हरियाली लगी है। कई तरह की घास। इस तैरती हुई मिट्टी पर डल में खेती होती है। कई तरह की सब्जियां पानी में तैरती हुई मिट्टी पर उगा ली जाती है। डल के सीने पर खेती। ये हमारे लिए कौतूहल का विषय था। पर है ये सच। इंसान ने प्रकृति के दोहन के जितने तरीके हो सकते हैं,, निकाल लिए हैं। 

श्रीनगर शहर में आबादी का बोझ बढ़ा है तो काफी लोग स्थायी तौर पर डल झील में ही चलते फिरते घर में अपना आशियाना बना चुके हैं। झील में अस्थायी पोल गाड़कर बिजली भी बुला ली है। यानी झील में पूरी कालोनी बस गई है जनाब। इससे झील का स्वाभाविक विस्तार नजर नहीं आता। झील में हमारा शिकारा यूं आगे बढ़ रहा है मानो हम शहर की किसी गली से गुजर रहे हों।

अब किसी शहर की गली जैसी हो गई है झील तो गंदगी का आलम भी होगा। झील में रहने वाले लोग और हाउस बोट झील में खूब गंदगी फैलाते हैं। झील का पानी बिल्कुल गंदला हो चुका है। पानी बोतलें और घर से निकलने वाला टनों कचरा झील की सूरत को बदरंग बना रहा है। हमने भोपाल शहर की झीलें देखी हैं। 

हैदराबाद की हुसैन सागर लेक देखी है। मणिपुर के लोकटक लेक का भी नजारा किया है। पर डल झील के बारे में बचपन से सुनते आए थे, पर इस झील को देखकर भारी निराशा होती है। क्या इंसान इतना स्वार्थी हो सकता है। वह सिर्फ इन जलाशयों से लेना जानता है। उनकी रखरखाव की रत्ती मात्र भी चिंता नहीं है उसे। सुनने में आया कि हर साल डल झील की सफाई के नाम पर जम्मू एंड कश्मीर सरकार बजट जारी करती है। पर दिन में डल झील का कचरा निकाला जाता है, रात में उस कचरे को वापस उसी डल झील में फेंक दिया जाता है। इस तरह हो जाती है सफाई अभियान की इतीश्री।

झील में मीना बाजार 
हमारा शिकारा घूमते घूमते मीना बाजार पहुंच चुका है। डल के अंदर बड़े बड़े हाउस बोट पर बने हैं स्थायी बाजार। जिन्हें कहते हैं मीना बाजार। हम एक शो रुम में पहुंचे।यहां कश्मीर के बने शॉल, गर्म महिलाओं के लिए सलवार सूट, रेडिमेड कुर्ता जैसी तमाम चीजों का भारी स्टाक था। हमने दो हाउस बोट पर बाजारों पर काफी कपड़े देखे। पर माधवी को कोई खास पसंद नहीं आया। दरअसल जो भी शिकारे वाले अपने शिकार पर घूम रहे सैलानियों इन मीना बाजार में लेकर आते हैं उन्हें खरीददारी हो जाने पर बाद में अच्छा कमीशन मिलता है। 

बिल्कुल लखनऊ के चिकेनकारी वर्कशाप की तरह। इन मीना बाजार के दुकानदारों के पास क्रेडिट कार्ड से भुगतान, थोड़े पैसे देकर बाकी का भुगतान पार्सल से सामान भेजने के बाद करने का भी विकल्प मौजूद है। हमने कोई खरीददारी नहीं की। पर हमारे शिकारा चालक इससे दुखी नहीं हुए। रास्ते में सैर कराते हुए उन्होंने हमें घाट नंबर एक पर वापस छोड़ दिया। उतरते समय माधवी से पूछा मैडम आप बेकार डर रही थीं, कहीं झील में सैलाब आया क्या...हम डल की सैर कर चुके थे...पर हमें या अली भाई को शायद ये एहसास नहीं था कल सचमुच सैलाब आने वाला है और डल झील का नजारा बदल जाएगा...

-    विद्युत प्रकाश मौर्य   

Thursday, September 18, 2014

अली भाई का शिकारा....((06))

( जन्नत में जल प्रलय - 6 )
खाने के बाद इच्छा हुई कि आधा दिन है थोड़ा सा घूम लिया जाए। हमलोग डल गेट नंबर एक के पास से झील की ओर उतरती पगडंडी पर आगे बढ़े। एक तरफ दुकानें थीं तो दूसरी तरफ डल झील में लगे हुए शिकारे और हाउस बोट। अनादि तो सालों से यही देखने की तमन्ना रखते थे। तभी एक बुजुर्ग हमारे पास आए। उन्होंने शिकारे में डल झील घूमने का प्रस्ताव दिया। अपना नाम अली भाई बताया उम्र होगी कोई 70 के पार। सैलानी कम हैं, मंदी का माहौल है। वे चाहते थे हम उनके शिकारे पर डल की सैर करें। 

अली भाई अपनी बातों में उलझा कर हमें अपना शिकारा दिखाने ले गए। घाट नंबर एक पर रहने वाले खूबसूरती से संवारे गए उनके शिकारे पर हैवन सेवन लिखा था। 1980 का रजिस्ट्रेशन नंबर। पर माधवी डल में शिकारे पर सैर को तैयार नहीं हुई। यशपाल भाई की पत्नी से मिली जानकारी से माधवी खौफ में थी। डल झील के पानी स्तर बढ़ रहा है। कोई खतरा हो सकता है। आसमान में बादल थे। फिर से बारिश आ गई तो क्या होगा। हालांकि हमारे पास छाता था। हमने अली भाई को कहा, कल सुबह आपके शिकारे पर घूमेंगे। 

थोड़ी देर और घूमने के बाद हमारा इरादा बना कि डल में आज ही सैर कर लिया जाए। हमने अली भाई को ढूंढना शुरू किया। एक दूसरे शिकारे वाले मिले बताया कि ग्राहक नहीं मिलने पर अली भाई निराश होकर अपने घर चले गए हैं। मैं उनका भाई हूं आप हमारे शिकारे पर घूम लो। हमलोग शिकारे पर सवार हो गए। दो लोग मिल कर चप्पू चला रहे थे। डल में शिकारे पर सैर करना एक शाही एहसास दिलाता है। सैर में आनंद तो आ रहा था पर हमें नहीं मालूम था कि कल यहां कितना बड़ा खतरा आने वाला है।

डल में हमारा शिकारा आगे बढ़ता जा रहा था। मामला 300 रुपये में तय हुआ था। मुझे लगता है उन्होंने शिकारे पर हमें कम से कम आठ किलोमीटर की सैर कराई। दो लोग चप्पू चला रहे थे। मेरे हिसाब से ये सस्ता सौदा था। शिकारे के आसपास अनगिनत हाउस बोट डल में दिखाई दिए। कुछ सजे संवरे तो कुछ वीरान। हाउस बोट पर डिश टीवी छतरियां लगी थीं।
बातों बातों में पता चला कि कई हाउस बोट कश्मीरी लोगों के स्थायी निवास बन गए हैं। इन हाउस बोट में आने के लिए परिवार के लोग छोटी नाव का इस्तेमाल करते हैं। हमें दो महिलाएं ऐसी ही एक छोटी नाव से अपने हाउस बोट की ओर जाती दिखाई दीं।

डल में घूमते हुए अली भाई ने बताया कि सामने ऊंचाई पर जो पहाड़ी दिखाई दे रही है वह शंकराचार्य मंदिर है। पहुंचने के लिए 250 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। इसी मंदिर में राजेश खन्ना का गीत – जय जय शिव शंकर ..कांटा लगे ना कंकर की शूटिंग हुई थी। अली भाई को ये भी मालूम है कि वो हीरो अब इस दुनिया में नहीं रहा।
हमें शिकारे में घूमते हुए फिल्म आरजू के राजेंद्र कुमार और मेहमूद याद आए जो  हाउस बोट में मस्ती किया करते थे। जब जब फूल खिले... के शशि कपूर याद आए, जो फिल्म में डल में शिकारा चलाते हैं और गाते हैं – बागों में जब जब फूल खिलेंगे...तब तब हम तुम हरजाई मिलेंगे। पर डल झील आज हमें बदरंग लग रही थी...

-    विद्युत प्रकाश मौर्य   

Wednesday, September 17, 2014

अपना वैष्णो ढाबा की दाल रोटी... ((05 ))

( जन्नत में जल प्रलय - 5 )
दोपहर में अपने होटल के कमरे में सामान जमा लेने के बाद हमें भूख लगी थी। हमलोग खोना खान रोड पर पेट पूजा के लिए कोई होटल ढूंढने निकले। थोड़ी दूर चलने पर मुख्य सड़क पर अपना वैष्णो ढाबा का बोर्ड नजर आया। ढाबा सीढ़िया चढ़कर पहली मंजिल पर था। हमने मीनू कार्ड देखा। 120 रुपये की थाली। इस थाली में दाल, रोटी, चावल, सब्जियां आदि थीं। तेज भूख लगी थी इसलिए और तलाश का कोई विकल्प नहीं था। हमने यहीं पर दो थाली आर्डर दे दिया और खाने का इंतजार करने लगे। इस बीच होटल के मालिक यशपाल शर्मा से परिचय हुआ। वे श्रीनगर में रहने वाले चंद हिंदू परिवारों में से एक हैं। वैसे वे जम्मू क्षेत्र के हैं। उनकी ज्यादातर रिश्तेदारियां पंजाब में हैं।



ढाबे में उनकी पत्नी और दो साल का नन्हा बच्चा भी मौजूद था। पता चला कि वे ढाबे से नीचे कुछ दूरी पर किराए के मकान में रहते हैं। पर डल झील का स्तर बढ़ जाने के कारण उनके घर में पानी आ गया है। इसलिए वे पत्नी और बच्चे के साथ घर के जरूरी सामान को लेकर ढाबे में ही आ गए हैं। ढाबा पहली मंजिल पर है। इसलिए ये जगह महफूज है। थोड़ी देर बाद उनकी पत्नी बच्चों के संग आई। उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं। कई साल से श्रीनगर में हैं। पर डल झील का पानी इस तरह बढ़ते नहीं देखा। हमारा घर डूब गया। कार को भी सुरक्षित जगह पर रखने के लिए यहां लाकर सड़क पर खड़ा किया है। उनकी चिंता थी...कब पानी कम होगा और हम वापस अपने घर में जाएंगे।

कहां से आएगा खाना...

बातों बातों में हमारा खाना खत्म हो चुका था। तवे की रोटी और दाल तो बिल्कुल हमारे घर के जैसी बनी थी। पंजाबी तड़का नहीं बल्कि हमारे यूपी और बिहार के जैसी। माधवी तो अपना वैष्णो ढाबा के खाने का स्वाद नहीं भूली। उसका कहना था जब तक श्रीनगर में हैं। यहीं पर जीमने आया करेंगे। पर अपना वैष्णो ढाबा में खाने का दूसरा मौका नहीं मिला। यशपाल शर्मा जी ने हमें शहर के बारे में कई जानकारियां दीं। बिल्कुल किसी अपने दोस्त या भाई की तरह। यशपाल भाई की पत्नी की चिंता थी कि होलसेल बाजार में पानी घुस गया है, सब्जियां नहीं मिलेंगी तो आगे ढाबा कैसे चलेगा। मैंने पहली बार उनके चेहरे पर आने वाले खतरे का डर देखा।

अगली सुबह माधवी होटल के कमरे में सो रही थी। मैं और अनादि सुबह उठकर टहलने निकले। मेरी आदत है जिस नए शहर में घूमने जाता हूं वहां की सुबह देखने की इच्छा होती है। सो मैं और अनादि 7 तारीख की सुबह एक बार फिर अपना वैष्णो ढाबा में थे। अनादि को कहवा पीनी थी। हम दोनों ने कश्मीरी कहवा का स्वाद लिया। इसमें कई जड़ी बुटियां डाली जाती हैं जो सेहत के लिए फायदेमंद है।

कहवा पीने के बाद यशपाल भाई को पैसे देने के लिए पर्स निकाला तो खुले पैसे नहीं थे। यशपाल भाई ने कहा, कोई बात नहीं जब भाभी जी के साथ नास्ता करने आएंगे तब पैसे दे दिजिएगा। लेकिन अपना वैष्णो ढाबा में दुबारा जाने का मौका नहीं मिला। दोपहर के बाद बाढ़ का खतरा और सड़कों पर शोर था। अपना वैष्णो ढाबा का शटर गिर चुका था। श्रीनगर छोड़ने तक हमारी यशपाल भाई से मुलाकात नहीं हो सकी। दिल्ली पहुंचने पर उनका फोन लगातार बंद मिलता रहा। न जाने किस हाल में होंगे यशपाल भाई और उनका परिवार।   

-    विद्युत प्रकाश मौर्य   
(APNA DHABA, SRINAGAR, DAL GATE , FLOOD ) 

Tuesday, September 16, 2014

डल गेट ...भाई गेट कहां है ... ((04 ))

डल झील का गेट नंबर एक यानी डल गेट। 
( जन्नत में जल प्रलय - 4 )
डल गेट यानी डल झील का दरवाजा। अनादि पूछ रहे हैं पापा ये दरवाजा किधर है.. तो हमें दिखाई दे गया इसका दरवाजा। डल गेट नंबर एक पर एक चैनल बना है. जब भी डल झील में बारिश का पानी बढ़ जाता है तो इस चैनल को खोल दिया जाता है। इससे होकर पानी झेलम दरिया में चला जाता है। वैसा ही गेट है जैसे हमारे गांव से गुजरने वाली नहर के पुल में दरवाजा लगा होता था पानी को रोकने या फिर छोड़ने के लिए।

डल गेट का इलाका लाल चौक के बाद ये श्रीनगर की सबसे चहल पहल वाली जगह है। इसके आसपास टूरिस्ट रिसेप्शन सेंटर, जम्मू एंड कश्मीर बैंक का मुख्यालय, कृष्णा ढाबा, शंकराचार्य मंदिर की पहाड़ी कुछ किलोमीटर आगे हरि पर्वत, चिनार बाग, बाबा धर्मदास मंदिर जैसे लोकप्रिय स्थल हैं। डल झील से जुड़े कई और भी गेट हैं जिन्हे गेट नंबर एक, दो, तीन से जाना जाता है। डल गेट सैलानियों के बीच लोकप्रिय इलाका है, क्योंकि यहां शाकाहारी खाने के कई विकल्प हैं। टूरिस्ट रिसेप्शन सेंटर जिसे टीआरसी नाम से पुकारा जाता है वहां से एयरपोर्ट के लिए बस सेवा और श्रीनगर शहर और आसपास स्थलों तक जाने के लिए टैक्सी, बस आदि की बुकिंग की सुविधा उपलब्ध रहती थी।
डल गेट  पर बना पुल और नया रास्ता। 

सालों भर ये इलाका सैलानियों से गुलजार रहता है। रात को 10 बजे के बाद तक यहां दुकानें खुली रहती हैं। श्रीनदर शहर का अपेक्षाकृत खुला हुआ इलाका है। इसलिए इधर कभी आतंकी वारदातें नहीं होतीं। हमारे दोस्त जीवन प्रकाश शर्मा बताते हैं कि इस इलाके में छुपने की जगह नहीं होने के कारण कभी यहां संवदेनशील घटनाएं नहीं सुनने में आती हैं। हम श्रीनगर शहर की बात करें तो ज्यादातर इलाके डाउन टाउन हैं। यानी शहर के ज्यादातर मुहल्ले नीचले स्तर पर हैं। श्रीनगर शहर में डल गेट का इलाका अपेक्षाकृत ऊंचा है। इसलिए ये बारिश के मौसम में बाकी शहर की तुलना में सुरक्षित है।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य   

Monday, September 15, 2014

मुनीर भाई...तुम कहां हो... ((03 ))

( जन्नत में जल प्रलय -3)
झेलम दरिया पर बना बादशाह पुल। 
हमारी स्विफ्ट डिजायर टैक्सी श्रीनगर शहर के रास्ते पर सरपट आगे बढ़ रही थी। पर हमारे ड्राइवर जहूर भाई ने कहा मुख्य मार्ग बंद है आपको दूसरे रास्ते से डल गेट लेकर जा रहे हैं। हमने पहले से ही जानकारी ले ली थी एयरपोर्ट से प्री पेड टैक्सी लेकर श्रीनगर शहर में कहीं भी जाना अच्छा रहेगा। पर आज प्रीपेड काउंटर पर डल गेट के लिए 450 रुपये की जगह मुझसे 700 रुपये मांगे गए। जानकारी मिली थी मुख्य पानी भरा होने के कारण रास्ता बंद है आपको लंबे रास्ते ले जाया जाएगा।

थोड़ी देर बाद टैक्सी रावलपुरा की गलियों में थी। कहीं सड़कों पर थोड़ा पानी था। 
कालोनी में कहीं मकान तो कहीं धान के खेत नजर आ रहे थे। ऐसा लग रहा था कि ये तकरीबन 10 लाख आबादी वाले शहर श्रीनगर शहर का बाहरी इलाका है। थोडी देर में हम सनत नगर चौक पर थे। वहां से बारामूला हाईवे गुजर रहा था। हम बटमालू बाइपास पहुंचे। यहां मोटरपार्ट्स और हार्डवेयर का बड़ा बाजार नजर आ रहा था पर ज्यादातर दुकानों के शटर गिरे हुए थे। टैक्सी वाले जहूर भाई ने अपना कार्ड दिया। उसमें तीन मोबाइल नंबर थे। वे पूरी टूर एंड ट्रैवल एजेंसी चलाते हैं। उन्होंने बताया कि श्रीनगर से बाहर गुलमर्ग, सोनमर्ग, पहलगाम जाने के रास्ते बंद हैं। मौसम साफ होने पर कल परसों खुल भी सकते हैं। पर आप शहर में डल झील, शालीमार बाग, निशात बाग, शंकराचार्य मंदिर आदि तो घूम ही सकते हैं। टैक्सी की जरूरत हो तो मुझे फोन कर लेना।

लाल चौक स्थित होटल ताज जो एक दिन बाद डूब गया।
लाल चौक से पहले झेलम दरिया पर पुल आया। झेलम की चौड़ाई महज 30 मीटर थी। ये श्रीनगर शहर में किसी नहर जैसी लग रही थी। दरिया के दोनों तरफ ऊंचे मकान बने हुए थे। रास्ते में जहूर भाई ने दो फ्लड चैनल ( नहरें ) दिखाई। ये झेलम के पानी को वितरित करने के लिए बनाए गए हैं।

हम शहर के ऐतिहासिक लाल चौक से गुजर रहे थे। ये श्रीनगर शहर का बिजनेस हब है। हमने श्रीनगर की यात्रा प्लान करने से पहले पर लाल चौक और राजबाग के दो होटलों से भी बुकिंग के लिए बात की थी। पर मेरे हिंदुस्तान टाइम्स के साथी जीवन प्रकाश शर्मा जो दो साल श्रीनगर में गुजार चुके थे, उन्होंने नेक सलाह दी थी। लाल चौक में मत ठहरना। संवेदनशील जगह है। कई बार आतंकी और सेना के आपरेशन में चौक बंद हो जाता है सैलानी फंस जाते हैं। उनकी सलाह पर ही मैंने फिर डल गेट इलाके में होटल बुक किया था। ये बाद में मेरे लिए बड़ा बुद्धिमता भरा फैसला साबित हुआ।

सैलाब के बाद पानी में डूबा होटल ताज ( फोटो - ट्रिब्यून)

कहां हो मुनीर भाई...

आनलाइन बुकिंग वेबसाइट स्टेजिला डाट काम से हमने श्रीनगर का होटल मुनीर बुक किया था डल गेट इलाके में कोनाखान रोड पर। इसके मालिक मुनीर अहमद से हमारी बात भी हुई थी। पर टैक्सी वाले ने जब इन नंबरों पर बात की तो उन्होंने हमें होटल मुनीर न बुलाकर डलगेट इलाके में ही होटल रिट्ज बुला लिया। एकबारगी मुझे कुछ गड़बड़ लगा, पर हमें वहां मुनीर अहमद मिले, जिन्होंने स्टेजिला डाट काम से मेरी बुकिंग को स्वीकार करते हुए होटल रिट्ज के तीसरी मंजिल के एक बेहतरीन कमरे में ठहराया। पर बाद में मेरी मुनीर अहमद से दुबारा कभी मुलाकात नहीं हो सकी। होटल के दूसरे कर्मचारियों से  पता चला कि बाढ़ में उनका घर डूब गया है। वे अपने परिवार को महफूज जगह पर पहुंचाने में व्यस्त रहे। इसलिए अपना होटल बंद कर मुझे अपने दोस्त के होटल में शिफ्ट किया था। बाद में दिल्ली लौटने पर कई बार मैं मुनीर अहमद को फोन लगाता रहा। पर उनका फोन कभी नहीं मिला। नहीं मालूम मुनीर भाई किस हाल में हैं...

-    विद्युत प्रकाश मौर्य

Sunday, September 14, 2014

चल छलिया कश्मीर ((02 ))

( जन्नत में जल प्रलय -2)
अनादि के लिए फ्लाइट में चढ़ने का पहला मौका था इसलिए वह हर चीज को बारीकी से देख और समझ रहे थे। नई दिल्ली डोमेस्टिक ( प्रस्थान) का वेटिंग लांज उन्हें काफी अच्छा लगा। खाने पीने के लिए फूड कोर्ट में उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय खाना पीना मिल जाता है। यहां एक फेब इंडिया की स्टाल भी है। हमारा चेक इन हो चुका था। बोर्डिंग पास ले लेने के बाद अभी इंट्री करने में समय था। 6 सितंबर 2014 को फ्लाइट का समय 10.20 था और हमारी इंट्री 9.40 में होनी थी। सो अनादि फुदकते हुए वेटिंग लांज के हर कोने का नजारा करना चाहते थे। कभी टायलेट तो कभी फूडकोर्ट तो कभी दूसरे विमान से जाने वाले यात्रियों के लिए उदघोषणा लेट होने वाले यात्रियों के नाम पुकारे जा रहे थे, अत्यंत शुद्ध हिंदी में।

हालांकि पिछले कुछ दिनों से कश्मीर के कई हिस्सों में बारिश हो रही थी। पर मैंने पता कर लिया था कि श्रीनगर शहर में कोई परेशानी नहीं है। एक दिन पहले होटल वाले से भी बात हुई थी। उसने कहा था कि श्रीनगर आने में कोई दिक्कत नहीं है। मौसम विभाग की भविष्यवाणी थी कि शनिवार दोपहर के बाद कश्मीर में बारिश रुक जाएगी। इसलिए अपनी यात्रा को लेकर मैं आश्वश्त था। गो एयर की 181 फ्लाइट तक हमें बसों से ले जाया गया। गो एयर की इस फ्लाइट पर वाडिया समूह का नाम, उनकी कंपनी बांबे डाइंग और ब्रिटानिया समूह का विज्ञापन लगा था। पर फ्लाइट में अंदर जाने पर कोई सीट नंबर नहीं था। खूबसूरत व्योम बाला प्रिया एस ने कहा जहां मर्जी वहां की सीट लूट लो। ए 320 फ्लाइट में 180 लोगों के बैठने की जगह होती है। एक पंक्ति में छह सीटें बीच से रास्ता। हमें एक साथ तीन सीटें मिल गई।
विमान से श्रीनगर शहर ( 6 सितंबर 2014) 

अनादि ने खिड़की पास वाली सीट झटक ली क्योंकि वे बाहर का नजारा लगातार देखना चाहते थे। कई किलोमीटर रनवे पर कुलांचे भरने के बाद बाद विमान उपर उठ गया। थोड़ी देर में बादलों के भी उपर। विमान को कैप्टन पीएस अरोड़ा उड़ा रहे थे। व्योम बालाओं ने खाने की बिक्री शुरू कर दी। अनादि जानना चाहते थे कि इस विमान में टायलेट है या नहीं। उन्होंने पीछे जाकर देखा एक लेडिज और एक जेंट्स टायलेट मौजूद था। थोड़ी देर में विमान पठानकोट शहर के उपर था। जम्मू में जब विमान उतरा तो हल्की बारिश हो रही थी बाहर। लोग छाता लेकर लांज तक जा रहे थे। यहां बड़ी संख्या में लोग उतरे तो काफी लोग चढ़े भी। 20 मिनट बाद विमान फिर हवा में था। बातों ही बातों में हम श्रीनगर के शहर के ऊपर पहुंच चुके थे। श्रीनगर जम्मू से 40 मिनट का रास्ता है हवाई मार्ग से तो सड़क मार्ग से 7 से 11 घंटे लगते हैं।

श्रीनगर का शेख उल आलम अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट। 2009 से यहां अंतराष्ट्रीय उड़ाने भी जारी हैं। यहां हम विमान से एयरब्रिज के द्वारा सीधे लांज में पहुंच गए। कोई बस की जरूरत नहीं। न ज्यादा चलना पड़ा।

थोड़ी देर बेल्ट नंबर दो पर इंतजार करने के बाद हमारा लगेज भी बाहर आ गया। आसमान में बादल थे पर बारिश नहीं हो रही थी। छाता खोलने की कोई जरूरत नहीं थी। वह एक खुशनुमा दोपहर थी जब हमने श्रीनगर की धरती पर कदम रखे।  

-    विद्युत प्रकाश मौर्य 

Saturday, September 13, 2014

चलें कश्मीर...गर फिरदौश जमीं अश्त... (( कश्मीर- 01))

( जन्नत में जल प्रलय -1)
उत्तर से लेकर दक्षिण तक पूरब से लेकर पश्चिम तक देश का कोना कोना घूम लेने के बाद मेरे आठ साल के बेटे अनादि की तमन्ना थी कि पापा हमें कभी श्रीनगर चलना है। अनादि फरमाते थे – वहां चलकर गुश्तवा खाना है, कहवा पीनी है और डल झील में शिकारे में सैर करनी है। जब मैं अगली छुट्टियों की योजना बना रहा था तो अनादि और माधवी से बिना सलाह लिए मैंने श्रीनगर की योजना बना डाली, क्योंकि मैं उन्हें ये पैकेज सरप्राइज देना चाहता था। दो दिन पहले जब मैंने अनादि को बताया कि हम श्रीनगर जा रहे हैं तो अनादि की खुशी देखने लायक थी। उसकी बड़ी तमन्ना पूरी होने जा रही थी। मैं भी कई बार माता वैष्णो देवी के दर्शन करने जा चुका था पर 1993 से 2003 के दौर में श्रीनगर का माहौल बेहतर नहीं होने के कारण पंजाब में रहते हुए भी श्रीनगर जाने की योजना नहीं बना पाया था। पर दिल इच्छा मेरी भी थी एक दिन उस शहर के लिए जाना है जिसके बारे में मुगल सुल्तान जहांगीर ने कहा था –गर फिरदौस जमीं अश्त, हमीं अश्त, हमीं अश्त... ( अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है...यहीं है) 

तो वह दिन आ गया जब 6 सितंबर 2014 को हमने पहली बार एयरपोर्ट मेट्रो सेवा का इस्तेमाल किया। नई दिल्ली से स्टेशन पर बना एयरपोर्ट मेट्रो स्टेशन भव्य है। लिफ्ट, गाइडेड कुली, पूरी तरह से बंद प्लेटफार्म, मेट्रो ट्रेन आने पर दरवाजे के अलावा बाकी हिस्से पूरी तरह से बंद हैं। यानी पटरी पर गिर कर हादसे होने की संभावना बिल्कुल नहीं। एयरपोर्ट मेट्रो की सीटें किसी फ्लाइट की तरह लगती हैं। लगेज रखने के लिए पर्याप्त जगह है। अगर आपको डोमेस्टिक टर्मिनल जाना है तो एयरोसिटी मेट्रो स्टेशन उतरना होगा। नई दिल्ली से एयरोसिटी का किराया 80 रुपये है आजकल। एयरोसिटी से बाहर निकलने पर मेट्रो की चाटर्ड बसें मिलती हैं जो 30 रुपये में चार किलोमीटर का सफर तय कराकर आपको एक डी- यानी डोमेस्टिक डिपारचर टर्मिनल पहुंचाती हैं।
नई दिल्ली एयरपोर्ट पर  प्रसिद्ध कवि श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी के साथ। ( खतरे से पहले) 


एयरपोर्ट मेट्रो में हमारी आगे वाली सीट पर एक सज्जन बैठे मिले जिनका चेहरा जाना पहचाना लग रहा था। मैंने पूछ डाला आप बुद्धिनाथ मिश्र तो नहीं हैं...मेरा अंदाजा सही निकला। बुद्धिनाथ जी से मेरी कभी मुलाकात नहीं हुई थी पर वे मेरे फेसबुक फ्रेंडलिस्ट में हैं। एक बार फिर जाल फेंक रे मछेरे.... कविता से प्रसिद्ध हुए कवि बुद्धिनाथ जी ओएनजीसी से रिटायरमेंट के बाद देहरादून में रहते हैं। वे देहरादून की फ्लाइट पकड़ने वाले थे। एयरपोर्ट पहुंचने तक घंटो उनका साथ रहा।

बातों-बातों उन्होंने बताया कि वे बनारस आज में काम कर चुके हैं। इस दौरान उन्होंने राम मोहन पाठक जी और शशि शेखर ( हिन्दुस्तान के समूह संपादक) के साथ भी काम किया है। बुद्धिनाथ जी से बहुत सारी ज्ञान की बातें सुनने के साथ चेकइऩ और फ्लाइट के इंतजार का वक्त कट गया। मेरे बेटे अनादि को उन्होंने अपने बैग से निकालकर एक सेब देते हुए कहा- तुम तो सेब के देश में जा रहे हो फिर भी मेरी ओर से ये सेब रख लो। तब हमें ये अंदेशा नहीं था कि हम किसी गंभीर संकट में फंसने वाले हैं जहां ये सेब भी बहुत काम आएगा।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य 
( KASHMIR, SRINAGAR, FLOOD ) 
आगे 62 कड़ियों में पढ़िए कश्मीर के श्रीनगर में 2014 के सितंबर में आए बाढ़ और उसमें फंसने और निकलने की कहानी....