Thursday, July 31, 2014

लोहा मंडी यानी मंडी गोबिंद गढ़ ((15))


( पहियों पर जिंदगी 15) 
13 अक्तूबर 1993 दोपहर के भोजन के बाद हमारी ट्रेन नंगल से आगे बढ़ गई। ट्रेन दिन में एक शहर से दूसरे शहर का सफर कम ही करती है। पर आज थोड़ी सी यात्रा दिन में ही है। शाम के 6 बजे हैं सर्वधर्म प्रार्थना का समय हो चला है हमारी ट्रेन पंजाब के शहर मंडी गोबिंदगढ़ पहुंच चुकी है। लुधियाना से पहले ये छोटा सा शहर स्टील के कारोबार के लिए जाना जाता है। यहां के स्टील कारोबारी सीताराम गुप्ता जो सुब्बाराव जी से काफी प्रभावित हैं उनके आग्रह पर ट्रेन का छोटा सा ठहराव यहां रखा गया है। हमारी पैदल रैली रेलवे स्टेशन से बाहर निकली जीटी रोड पर श्रीराम भवन में सभा और उसके बाद भोजन का इंतजाम था।


मंडीगोबिंदगढ़ दोराहा के बीच सतलुज नहर। 
नंगल में रैली के दौरान रास्ते में सेब और केले बांटे जा रहे थे तब कार्यकर्ताओं ने बताया कि ये यूथ कांग्रेस की ओर से है। मेरे मन में ये विचार आता है कि सदभावना रेल का स्वागत सिर्फ गैर राजनीतिक लोग ही करें। इसलिए मैं यूथ कांग्रेस की ओर से दिए सेब को लेने से इनकार कर देता हूं।  मंडी गोबिंदगढ़ के कार्यक्रम में भी शाम को कांग्रेस पार्टी नेताओं ने हमारा स्वागत किया। मुझे और आनंद पंडित को इस बात से शिकायत है कि सदभावना यात्रा का स्वागत किसी राजनीतिक दल की और से न होकर सामाजिक और प्रशासनिक संस्थाओं द्वारा ही हो। ताकि लोगों को ये कहने का मौका न मिले कि ये कांग्रेस समर्थित यात्रा है। हमने अपनी शिकायत से सुब्बाराव जी को अवगत करा दिया। 
यहां सुब्बाराव जी कहते हैं- इतिहास एयरकंडीशनर में बैठे लोग नहीं लिखेंगे। बल्कि इतिहास तो सड़कों पर चलने वाला नौजवान ही लिखेगा। पैसा कमाना परिवार चलाने के लिए आवश्यक है, पर इतना पैसा ठीक नहीं जो मनुष्य को भ्रष्टाचार की ओर ले जाए। मैं अमेरिका में देखता हूं वहां रोज हत्या की खबरें आती हैं। हत्यारे अपनी सफाई में कहते हैं कि हमने ये हत्या पैसे के लिए नहीं बल्कि वनली फॉर फन यानी मस्ती के लिए की। वास्तव में हमारी आज की मस्ती देश के नवनिर्माण की धुन होनी चाहिए।
सुब्बराव हर शहर में कहते हैं कि एक सदभावना समिति का निर्माण होना चाहिए। समिति हर माह सर्वधर्म प्रार्थना सभा का आयोजन करे। एक धर्म को मानने वाले लोग दूसरे धर्म के मानने वाले लोगों के कार्यक्रमों में शऱीक हों। सदभावना समिति में हर राजनीतिक दल और धर्मों के लोगों को शामिल किया जाए। लेकिन यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि सदभावना के कार्यक्रम राजनीतिक दलों के कार्यक्रम न बन जाएं।
हमारी सदभावना रेल यात्रा में देश के 20 राज्यों के 150 से ज्यादा यात्री हैं। अलग अलग शहरों की सभाओं में भाई जी इन राज्यों से आए नौजवानों का परिचय कराते हैं। हम बिहार के लोग खड़े होकर नारे लगाते हैं – 
आए हम बिहार से...
नफरत मिटाने प्यार से...

बुद्ध हो या गांधी
लाए प्यार की आंधी। 
हमारा ये नारा खूब हिट हो रहा है।




Wednesday, July 30, 2014

राष्ट्र का नवीन मंदिर – भाखड़ा डैम ((14))


( पहियों पर जिंदगी 14) 
13 अक्तूबर 1993  सुबह के छह बजे हैं। हमारी ट्रेन नंगल रेलवे स्टेशन पर पहुंच चुकी है। नंगल पंजाब के रोपड़ (रूपनगर) जिले का एक छोटा सा स्टेशन है। यहां से आनंदपुर साहिब, भाखड़ा डैम और हिमाचल प्रदेश का तीर्थ नैना देवी काफी निकट हैं।
रेलवे स्टेशन पर उत्साही टीम ने हमारा भव्य स्वागत किया। लायंस क्लब के प्रधान जीत रमण सिंह और अन्य लोग मिलने आए। यात्रियों को बेहतरीन नास्ता स्टेशन पर ही मिला। यहां से हमारी पैदल रैली निकली जो ब्याज स्पेशल स्कूल पहुंची। 
  


नंगल के स्कूल में गिद्दा पेश करती छात्राएं। 
 रास्ते में यात्रियों को एक जगह सेब बांटा जा रहा था। मैंने पूछा सेब किसकी ओर से है तो मेजबान ने जवाब दिया यूथ कांग्रेस की ओर से। दरअसल सदभावना यात्रा का स्वागत हर तरह के लोग कर रहे हैं। स्वयंसेवी संस्थाएं, राजनीतिक विंग या कोई और संगठन जो हमारे संदेश के साथ समझ रखते हों। स्कूल में स्वागत समारोह हुआ। स्कूल की छात्राओं ने बेहतरीन गिद्दा पेश किया।



नंगल से हमलोग बस में सवार होकर भाखड़ा डैम पहुंचे। वहां पर हम सबके कैमरे जमा करा लिए गए। हमें भाखड़ा डैम देखने के लिए विशेष अनुमति मिली है। हमारी यात्रा में चल रही दो जर्मन बहनों सेंड्रा और मारेन से डैम पर तैनात सुरक्षाकर्मियों ने विशेष पूछताछ की। उनके पासपोर्ट की जांच की। खैर हमलोग आगे बढ़े।

भाखड़ा हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में आता है। यहां 740 फीट की ऊंचाई पर सतलुज और व्यास नदी के पानी को रोककर विशाल जलाशय का निर्माण किया गया है। गोविंद सागर जलाशय देश का दूसरा सबसे बड़ा जलाशय है। सबसे बड़ा जलाशय मध्य प्रदेश का इंदिरा सागर है।

भाखड़ा नामक ग्राम में होने के कारण इसका नाम भाखड़ा डैम पड़ा। बांध पर जाने का रास्ता पहाड़ों की चढ़ाई वाला है। मार्ग मनोरम है। बांध बनने से विशाल कृत्रिम झील का निर्माण हुआ है जिसका नाम गोबिंद सागर रखा गया है। यहां थर्मल पावर प्लांट है जिससे 1300 मेगावाट बिजली बनती है। तब बांध के निर्माण में 280 करोड़ रुपये खर्च आया था।




स्वतंत्र भारत की इस पहली बड़ी परियोजना का उदघाटन पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने 1959 में किया था। तब उन्होंने इसे राष्ट्र के नवीन मंदिर की संज्ञा दी थी। भाखड़ा की दूरी नंगल टाउनशिप से 13 किलोमीटर है। नंगल पंजाब के रूपनगर जिले में आता है।पंजाब हरियाणा के बड़े हिस्से को सिंचाई की सुविधा देने वाला ये डैम सैलानियों का भी बड़ा आकर्षण बन चुका है।

बांध देखकर लौटने के बाद हमारा दोपहर का कार्यक्रम ब्याज स्पेशल स्कूल में हुआ। विद्यालय की बालिकाओं द्वारा शानदार गिद्दा पेश किया गया। यहां पर सुब्बाराव जी ने प्रेरक व्याख्यान दिया।
सुब्बाराव कहते हैं जब मैं लंबे सफर में रहता हूं तब भी अपना नियमित रूटीन नहीं तोड़ता। सुबह किसी रेलवे स्टेशन पर होती है तो प्लेटफार्म पर ही व्यायाम करने लगता हूं। तब कुछ लोगों को हंसी आती है। मैं कहता हूं जब स्टेशन पर बीड़ी पीने में नहीं है शर्म तो व्यायाम करने में कैसी शर्म। आजकल मैं देखता हूं शहर के हर नुक्कड़ पर नौजवानों की सभा होती है। बैठक घंटों चलती रहती है लेकिन एजेंडा क्या होता है नहीं मालूम। मेरे जैसा 65 साल का व्यक्ति निक्कर पहने हुए दोनों हाथ भांजते हुए सड़क पर चलता जाता है तो नौजवान लेफ्ट-राइट, लेफ्ट-राइट कहते हुए मजाक उड़ाते हैं। नौजवानों को अपनी उम्र में बिना किसी अनुशासन के टेढी कमर करके उल्टा सीधा चलते हुए और बिना अनुशासन के जीने में भला शर्म क्यों नहीं आती।
1957 में रूस की राजधानी मास्को में दुनिया भर के युवाओं का एक सम्मेलन हुआ था। मैं ( सुब्बाराव) समेत हिंदुस्तान से 10 लोगों का प्रतिनिधिमंडल यहां पहुंचा था। वहां के लेनिन स्टेडियम में मुख्य कार्यक्रम में एक लाख लोग पहुंचे थे। परंतु बिना सिटी बजाए सभी लोग पूरे अनुशासन से कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे थे। अचानक वाद्ययंत्रों की धुन बदलती है और एक एक कर लोग अपने अपने देश की राष्ट्रीय धुन गाने लगते हैं। इस कार्यक्रम में मेरी अगुवाई में जन गण मन अधिनायक...गाया गया।

सुब्बाराव जी कहते हैं- देश में सामूहिकता की भावना में कमी आई है। पचास साल बाद अगर आज का इतिहास लिखने बैठेंगे तो क्या यही लिखेंगे कहीं आतंकवाद, कहीं दहेज हत्या, कहीं दंगा और मारपीट का सिलसिला चल रहा था। देश के हर कोने में झगड़े का आलम था। आज देश को नव निर्माण में जुटे हुए युवाओं की आवश्यकता है, ताकि हम आने वाली पीढी को एक स्वस्थ और आगे बढता हुआ देश दे सकें। 
  
( http://bhakranangaldam.com/
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Tuesday, July 29, 2014

आओ चलें पिंजौर गार्डेन (( 13))


( पहियों पर जिंदगी 13) 
12 अक्तूबर 1993- चंडीगढ़ के अखबारों में सदभावना यात्रा की बडी बड़ी खबरें और तस्वीरें छप रही हैं। पंजाब केशरी, ट्रिब्यून जैसे अखबारों के अलावा खासकर एक्सप्रेस न्यूज लाइन में आधे पेज से ज्यादा की कवरेज है। हमारे कई साथियों की तस्वीरें अखबारों में छप गई हैं जिसे देखकर वे काफी खुश हैं। आज का कार्यक्रम पंचकूला शहर के ओर है। पंचकूला चंडीगढ़ से लगा हुआ हरियाणा का शहर है। सुबह रेलवे स्टेशन से साइकिल रैली सदभावना का अलख जगाती मनी माजरा होते हुए पंचकूला के सेक्टरों से गुजरती हुई पिंजौर की ओर चली। रास्ता थोड़ा पहाड़ी और चढाई वाला था। सो साइकिल चलाने वालों को पसीना आने लगा। लंबी साइकिल यात्रा के बाद थकान हो गई। पर पिंजौर पहुंचने पर सबको शीतल पेय और मिठाइयां मिलीं। थकान काफूर हो गया। 




पिंजौर में आम का बहुत बड़ा बाग है। यादवेंद्रा गार्डन महाराजा पटियाला द्वारा बनवाया गया बागीचा है। आधे घंटे रेलयात्री बाग में घूमते रहे। हर साल यहां आम के मौसम में विशाल मैंगो फेस्टिवल लगता है। पिंजौर गार्डन में ही कई किस्म के आम के पेड़ हैं। पिंजौर के बाद कालका शहर आता है। इसके बाद हिमाचल प्रदेश का इलाका आरंभ हो जाता है। इसके बाद का ठिकाना था पिंजौर हाई स्कूल का प्रांगण। यहां बच्चों के बीच दोपहर की सभा हुई।

पिंजौर गार्डन लगभग एक सौ एकड क्षेत्र पर बना हुआ है, चारों तरफ़ ऊंची दीवारें है। आकार में यह आयताकार है। हर दीवार की ओर एक दरवाज़ा है। हर कोने में एक सीढ़ियों वाला जीना बना हुआ है। मुग़ल गार्डन की तर्ज पर यह ढलान वाली भूमि पर बना हुआ है। गार्डन में कई महल जैसे शीश महल (कांच का महल), रंग महल (चित्र महल), जल महल (पानी का महल) बना है। 

पिंजौर से रेल यात्रियों के लिए शाम को चंडीगढ़ की और लौटना भी रोमांचकारी अनुभव रहा, क्योंकि साइकिल ढलान की ओर चलानी थी। पंचकूला शहर के एक गुरुद्वारे में रात का भोजन था। यहां पंजाब सरकार के परिवहन मंत्री और संगरूर के एमएलए जसबीर सिंह भी आए थे। यहां से रेल यात्रा में कुछ नए यात्री शामिल हुए। इनमें जसबीर सिंह एमएलए की बेटी अमनजोत कौर, पुनीत, गगनदीप, सुस्मिता शर्मा ( सहारनपुर)  और सतिंदर कौर आदि प्रमुख थीं। इनमें कुछ चंडीगढ आर्ट कालेज में बैचलर आफ फाइन आर्टस की छात्राएं हैं। रात को हमारी ट्रेन सबके सोने के बाद नई मंजिल के लिए प्रस्थान कर गई। कहां...अरे आगे भी तो पढिए। 


Monday, July 28, 2014

नेकचंद सैनी के साथ रॉक गार्डन में हम ((12))

( पहियों पर जिंदगी-12)
11 अक्तूबर 1993 -  हमारा दोपहर का पड़ाव सेक्टर 18 का गुरुद्वारा है। मैं इससे पहले साइकिल से चंडीगढ़ शहर को नापता हुआ सेक्टर 17 पहुंचा। सेक्टर 17 मतलब चंडीगढ़ का मुख्य बाजार। मुझे अब तक खींची गई तस्वीरों के फोटो प्रिंट बनवाने थे। कलर लैब में एक घंटे की सर्विस थी। हाथों फोटो लेकर मैं सेक्टर 18 के गुरूद्वारे पहुंच गया। यहां लंगर में भोजन के दौरान काफी मात्रा में खीर परोसी गई। हमलोग खाकर तृप्त हो गए। थोड़े आराम के बाद चाय मिली। इसके बाद यात्रा सदभावना का जोश भरती हुई चंडीगढ़ के अलग अलग सड़कों से होती हुई रॉक गार्डन पहुंची।



यहां चंडीगढ़ के पर्यटन अधिकारी डाक्टर कालिया ने हमें चंडीगढ़ शहर और रॉक गार्डन के बारे में रोचक जानकारियां दी। चंडीगढ़ पंजाब और हरियाणा की राजधानी है पर स्वंय एक केंद्रशासित शहर है। पंजाब और हरियाणा का विधानसभा भवन एक ही जगह पर स्थित है।

नेकचंद सैनी से मुलाकात - रॉक गार्डन शहर की अदभुत कलाकृति है जिसका निर्माण नेकचंद सैनी ने किया है। वे एक सड़क निरीक्षक थे। हर रोज शिवालिक पर्वत पर जाकर वहां से पत्थर इकट्टा कर लाते थे। पत्थरों और दूसरी बेकार की सामग्री को जुटाकर उन्होंने रॉक गार्डन जैसी अनुपम चीज बना डाली। ये प्रक्रिया 1958 में शुरू हुई। कुल 25 एकड़ में फैले इस रॉक गार्डन को हालांकि गैरकानूनी तरीके से बनाया गया पर बाद में यह कृति इतनी शानदार बन गई कि सरकार ने इसे सम्मान दिया। इसके निर्माता नेकचंद सैनी से हमारी मुलाकात और प्रत्यक्ष वार्ता हुई। उन्होंने हमारी ढेर सारी जिज्ञासाओं का निवारण भी किया। उन्हे अब दुनिया के कई और देशों से रॉक गार्डन जैसा ही बाग बनाने का आमंत्रण मिल रहा है।




सुकना लेक पर सुस्वादु भोज - हमारी आज की शाम सुकना झील के तट पर होती है। झील के किनारे ही सर्वधर्म प्रार्थना सभा हुई। रात्रि भोजन पंजाब सरकार के कृषि विभाग की ओर से है। झील के तट पर हरियाली के बीच डिनर। खाने का मीनू पांच सितारा जैसा है। केटरिंग का इंतजाम उम्दा है। नान, तंदूरी रोटी और सब्जी की कई किस्में, मानो किसी शादी की दावत उड़ा रहे हों। ऐसा भोजन यात्रा में आगे कहीं भी नहीं मिला। सभी यात्री खाकर मस्त हैं। चंडीगढ़ में तीन दिनों के पड़ाव में हमने तकरीबन शहर के हर सेक्टर को साइकिल से नाप डाला। इसके अलावा हमारे कार्यक्रम पड़ोस के शहर पंचकूला, मोहाली और पिंजौर में भी हुए।   

Sunday, July 27, 2014

शिवालिक पब्लिक स्कूल मोहाली में ((11))

( पहियों पर जिंदगी-11)
शाम को हमारी साइकिल रैली मोहाली पहुंची। मोहाली चंडीगढ़ से बिल्कुल सटा पंजाब के रोपड़ जिले का एक शहर है। हांलाकि अब मोहाली साहिबजादा अजीत सिंह नगर जिला बन चुका है। इसे चंडीगढ़ शहर का विस्तार माना जा सकता है। वहां हम शिवालिक पब्लिक स्कूल पहुंचे। ये मोहाली का सुंदर सा आवासीय विद्यालय है। यहां कक्षा एक लेकर 12वीं तक पढाई होती है। पहली से 12वीं के छात्र हास्टल में रहते हैं। काफी बेहतर अनुशान दिखा स्कूल में। विद्यालय के जिमनैजियम में छात्र कुश्ती और विभिन्न खेलों का अभ्यास करते हुए दिखाई दिए। 


शिवालिक पब्लिक स्कूल की कैंटीन
स्कूल के डाइनिंग हाल में मैंने एक साथ हजारों छात्रों को बड़े ही अनुशासन से भोजन करते और उसके बाद पंक्ति में अपने हास्टल की ओर जाते देखा। इसी डायनिंग हाल में हमारे रात्रि भोजन का भी इंतजाम था।ऐसा लग रहा था मानो हमलोग एक बार फिर से छात्र जीवन में हों।  


जर्मनी की बहन सेंड्रा को यहां का कड़ा अनुशासन देखकर अचरज हो रहा है। स्कूल के स्टेज पर विद्यालय के बच्चों और सदभावना यात्रियों का मिला जुला सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ। विद्यालय  की छात्राओं शैली और हरप्रीत द्वारा मंच संचालन के बाद पहला कार्यक्रम स्वागत गान पेश किया गया
स्वागत है सौ सौ बार आपका...स्वागत है बारंबार आपका...गीत के भाव काफी प्रेरणाप्रद हैं।

...और गरीब लगी भारी चोट
आनंद पंडित, विशाल, बाबा साहेब और मैंने मिलकर गरीब नामक लघु नाटक पेश किया। गरीब में में गरीब भिखारी की केंद्रीय भूमिका में था। नाटक के क्लाइमेक्स में मुझे भूख से बेहाल होकर गिर जाना था। मैं इतना वास्तविक गिरा कि मेरे सिर में तेज चोट लगी। आवाज आई ठक जिसे माइक ने कैच कर लिया। दर्शकों ने तालियां बजाईं पर मेरा सिर दर्द से बेहाल था। नाटक के बाद स्कूल की छात्राओं ने मुझे आयोडेक्स लगाकर राहत दिलाई।
स्कूली बच्चों के बीच सुब्बाराव ने अपना संदेश उनके समझ में आने जैसा ही दिया। भाई जी यही खास बात है कि वे जैसे श्रोता हों उनके अनुरूप बातें ही करते हैं।रात्रि भोजन के बाद सभी यात्री अपनी अपनी साइकिल से रेलवे स्टेशन वापस लौट आए। अपने अपने कोच में आशियाना है सबका। मैं भी कावेरी की ओर बढ़ चला।


- vidyutp@gmail.com    

Saturday, July 26, 2014

सिटी ब्यूटीफुल चंडीगढ़ में ((10))


( पहियों पर जिंदगी-10)
तारीख बदल गई है। 10 अक्तूबर 1993 रात के 12 से कुछ ज्यादा बजे हैं। ट्रेन अंबाला से चलकर कब चंडीगढ़ पहुंच गई पता ही नहीं चला। अंबाला चंडीगढ़ के बीच 50 किलोमीटर से भी कम की दूरी है। ट्रेन प्लेटफार्म नंबर एक पर रूकी। हमारी ट्रेन के साथ अंबाला से ही वायरलेस सिस्टम लग गया है। सिस्टम लगाने से पहले पुलिस के जवान मेरे पास आए और पूछा कि कौन से कोच में वायरलेस सिस्टम लगाए जाएं, मैंने उन्हें पेंट्री कार के उदघोषणा कक्ष के पास लगाने की सलाह दी। पुलिस के जवान की टुकड़ी ट्रेन में तैनात कर दी गई है। यह ट्रेन के अगले और पिछले कोच में तैनात रहते हैं। ये सब सुरक्षा इंतजाम पंजाब और जम्मू कश्मीर में खासतौर पर रहेंगे। लौटते समय अंबाला तक सिस्टम लगा रहेगा। 



चंडीगढ़ स्टेशन पर पंजाब सरकार के तत्कालीन खाद्य एंव आपूर्ति मंत्री सरदार लाल सिंह जी पंजाब सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर रेल यात्रा के स्वागत के लिए पहुंचे। हमने भाई जी को सोते हुए जगाया। कुछ यात्री भाई और जगकर बाहर आ गए। पर औपचारिक स्वागत के बाद सबको सुबह तक अपने अपने डिब्बों में सो जाने के लिए कहा गया।
चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन शहर के कोलाहल से दूर बना है। प्लेटफार्म काफी साफ सुथरा है। आसपास में पहाड़ियां नजर आ रही हैं। सुबह चटख धूप खिल रही है। रंग बिरंगे यात्री नास्ता के बाद अपनी साइकिलों को ठीककर सदभावना रैली के लिए निकल रहे हैं। स्टेशन से 5 किलोमीटर चलकर हमारी रैली सेक्टर 8सी के गुरुद्वारा के पास के स्कूल में पहुंची।
चंडीगढ़ की स्थानीय स्वागत  व्यवस्था श्री गुरुदेव सिंह सिद्दू, स्टेट लायसन आफिसर एनएसएस देख रहे हैं। वे बड़े ही सुलझे हुए और मितभाषी व्यक्ति हैं। उनके साथ निदेशक, यूथ सर्विसेज चंडीगढ़ श्री एसएम कांत साहब हैं। विद्यालय में ही नास्ता और आमसभा हुई।


चंडीगढ़ शहर काफी खूबसूरत है। 1949 में इस शहर का डिजाइन फ्रेंच आर्किटेक्ट ला कारबुजिए ने किया था। शहर की सभी सडके समकोण पर एक दूसरे को काटती हैं। सारे सेक्टर देखने में एक ही जैसे लगते हैं। शहर कुल 47 सेक्टरों में बंटा है। आजकल आबादी 6.5 लाख है। मुख्य  बाजार और सरकारी दफ्तर सेक्टर 17, 19 और 22 में है। सेक्टर 17 को पंजाबी दां लोग सतारा कहते हैं।


दोपहर का भोजन सेक्टर 34 के गुरुद्वारे में हुआ। वहां मैंने इंडियन एक्सप्रेस के स्थानीय संवाददाता को रेल यात्रा के बारे में जानकारी दी। मेरी भूमिका थोड़ी थोड़ी जन संपर्क अधिकारी जैसी भी है। हालांकि ये काम हमारी वरिष्ठ और आदरणीय कार्यकर्ता सुश्री लिसी भरूचा देखती हैं।
चंडीगढ़ - सेक्टर 34 का गुरुद्वारा 
खाने के बाद हमलोगों ने थोड़ी देर गुरूद्वारे के बेसमेंट में आराम फरमाया। रणसिंह भाई बोले चलो पास के पीसीओ से कुछ जरूरी फोन करने चलते हैं। रविवार होने के कारण चंडीगढ़ का बाजार बंद है। यहां गुरूद्वारे में डाक्टर जगदीश जग्गी मिले, जिन्होंने हमें दैनिक जरूरत की कई दवाएं मुफ्त में दीं। उन्होंने कहा कि मैंने एक ऐसी दवा इजाद की है जो हर बीमारी में काम करेगी। ऐसा हो सकता है भला। लेकिन डाक्टर जग्गी तो चुनौती दे रहे हैं।


- vidyutp@gmail.com
 ( CHANDIGARH, LAL SINGH, GURUDWARA) 


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Friday, July 25, 2014

कैंप में जन नन होय रे ... आ गया अंबाला ((9))


( पहियों पर जिंदगी-9)
नई दिल्ली से आगे बढ़ने के बाद हमारी सजी धजी ट्रेन रात के 10 बजे अंबाला में रुकी। ये स्पेशल ट्रेन का एक तरह से पहला पड़ाव है। रात्रि भोजन की व्वस्था रेलवे स्टेशन पर ही है। सुरक्षा के कड़े इंतजाम के बीच अच्छी खासी भीड़ ने स्टेशन पर हमारा स्वागत किया। मैं कावेरी में हूं, तड़ित प्रकाश सिंधू कोच में। 

अंबाला स्टेशन पर उतरने के बाद सदभावना यात्रियों का उत्साह देखने लायक था। भोजन के इंतजार के दौरान 200 के करीब यात्री अपने अपने अंदाज में नृत्य करने लगे। कभी राष्ट्रीय गीत तो कभी क्षेत्रीय भाषा की कोई लोक धुन। कैंपों का प्रसिद्ध मजाकिया गीत कैंप में जन जन जन होय रे ...गाया गया। नागराज का उत्साह और अदाएं देखने लायक हैं। वह झूम कर नाच रहा है और दूसरों को भी अपने साथ नचा रहा। नागराज के बारे में थोड़ा सा बता दूं। ये सज्जन बेंगलुरू के रहने वाले हैं। पिता का चलता फिरता कारोबार छोड़कर फिल्मों में किस्मत आजमाने गए। कोई बड़ा ब्रेक नहीं मिल पाया। पर कन्नड़ की फिल्मों में कुछ छोटी मोटी भूमिकाएं मिलीं।

नागराज का दावा है कि उसने फिल्म अंधा कानून में रजनीकांत के साथ भी छोटी सी भूमिका की है। फिर फिल्मों में कुछ दाल नहीं गली तो समाज सेवा करने आ गए हैं। जनवरी 1992 में बेंगलुरू शिविर में सुब्बाराव जी के संपर्क में आए। अब पूर्णकालिक कार्यकर्ता बन गए हैं। उन्हें रंग बिरंगे कपड़े पहनने का शौक है। इनके डिजाइन वे दर्जी को खुद देते हैं। खास तौर पर शर्ट में अलग अलग तरह की जेबें बनवाते हैं। मसलन कलम रखने के लिए डायरी के लिए आदि।

मैं दिल्ली आधार शिविर को थोड़ा मिस कर रहा हूं। वहां रेलवे स्टेडियम के बगल में रेलवे कर्मचारी शर्मा जी के चार बच्चे नीरज, धीरज, जलज और पंकज से दोस्ती हो गई थी। नीरज कहा था कि वह यात्रा में साथ चलेगा पर उसे छुट्टी नहीं मिल सकी। एक और दिल्ली का दोस्त बिट्टू जो करोलबाग के रहने वाले थे, कैंप में मुझसे मिलने आए। फिर अपने घर ले गए हरध्यान सिंह रोड पर। मैंने सदभावना यात्रा खादी का बना कुरता पहना हुआ था। उसे देखकर बिट्टू की बहनें खूब हंस रही थी।
09 अक्टूबर 1993
अंबाला शहर की सड़कों पर साइकिल रैली निकाली गई। कई स्थानों स्वागत और सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। आज की पहली रैली थी नीली नीली साइकिलों पर निकली। जब देश के कोने कोने से आए 200 नौजवान नारे लगाते हुए सड़कों पर चलते हैं तो लोग कौतूहल से देखते हैं। शाम की प्रार्थना सभा शहर के बाल भवन में हुई। यहां पर युवाशक्ति के संपादक आद्या प्रसाद उन्मत आए थे। हम इस पत्र को कई साल से पढ़ते आ रहे हैं।


अंबाला में आ गया दूसरा बैच - अंबाला में यात्रा के 10 दिन पूरे हो रहे हैं। यहां पर बैच नंबर 3 का आगमन और बैच नंबर एक की विदाई है। वैसे तो रेल यात्रा में हर किसी को कम से 20 दिनों का समय देना है पर बैच नंबर एक 10 दिनों का ही है। मैंने एक नंबर बैच वालों के लिए प्रमाण पत्र तैयार किए। इसके साथ ही नवागंतुक रेल यात्रियों का पंजीयन किया। दिन में अंबाला शहर के बाजार में जाकर दफ्तर के लिए जरूरी स्टेशनरी की खरीददारी भी की। रेल यात्रा में शामिल होने के लिए पंजीयन शुल्क 100 रुपये है। रेल यात्रियों के लेमिनेट फोटो लगा किया हुआ आई कार्ड दिया जाता है। लेमिनेट करने के लिए लेमिनेशन मशीन हमारे साथ है जो रवि नारायण जी ( ICYO ) खास तौर पर दे गए हैं। लेमिनेशन के लिए बिजली का प्वाइंट ढूंढने के लिए मैं स्टेशन मैनेजर के दफ्तर का इस्तेमाल करता हूं।




Thursday, July 24, 2014

तैयारी शिविर की दिनचर्या (( 8 ))

रेलवे स्टेशन पर ही सुबह सुबह व्यायाम करते हैं युवा 
( पहियों पर जिंदगी-8)
सद्भावना रेल यात्रा की तैयारी शिविर की दिनचर्या समान्य शिविरों की तरह ही है। पांच बजे सुबह जागरण गीत नव जवान आओ रे नव जवान गाओ रे से होती है।
शिविर में युवाओं को रेल यात्रा के अनुशासन और उसकी योजना के बारे में जानकारी दी जा रही। साथ ही
यात्रा की हर मोर्चे पर तैयारी भी चल रही है। 83 साल के अवकाशप्राप्त शारीरिक शिक्षक हरिभाउ बारपुटे भी शिविर में आए हैं। वे हमें रोज व्यायाम सीखाते हैं। छोटीकद के बारपुटे जी की जोश किसी नौजवान जैसा ही है। रोज दो घंटे स्टेडियम के आसपास ही श्रमदान का कार्य होता है। दोपहर में बौद्धिक चर्चा होती है। सद्भवाना यात्रा आखिर क्यों इस विषय पर शिविर में परिचर्चा का आयोजन किया गया। कई बार शिविर में ऐसी चर्चाओं के दौरान मैं मंच संचालन करता हूं। उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, आंध्र, महाराष्ट्र, केरल, बिहार  मध्य प्रदेश उत्तर प्रदेश के युवाओं ने अपने विचार रखे। 


दिल्ली के नरेला में सर्वधर्म प्रार्थना मई 1994 समापन के दौरान। 
युवाओं के विचारों पर आकाशवाणी ने एक रुपक का भी निर्माण किया। मैंने भी आकाशवाणी के इस रुपक में अपने विचार साझा किए। झांसी से एमबीए के छात्र देवेंद्र गौड़ आए हैं जो रेल यात्रा के दफ्तर को संभाल रहे हैं। वसंत रोड पर रेलवे कालोनी में रहने वाले पंकज शर्मा से दोस्ती हुई। वे यात्रा को लेकर काफी उत्साहित हैं लेकिन हमारे आमंत्रण पर यात्रा में शामिल होने के लिए समय नहीं निकाल पा रहे हैं। 

प्रारंभ के तीन दिन दिल्ली रेलवे स्टेशन के आसपास पोस्टर बैनर, स्टीकर के माध्यम से रेलयात्रा का प्रचार प्रसार किया गया। देशभर से आए युवाओं में यात्रा को लेकर बड़ा रोमांच और उत्साह है। उड़ीसा से आए भाई राम प्रसाद डलाई सद्भावना के लिए एक खास गीत बनाने में जुटे हुए हैं। वहीं साथी सद्भावना के नए नए नारे भी रचने में लगे हैं। बेंगलुरु के आर्ट कालेज के कुछ छात्र आए हैं जो रेलगाड़ी के कोच को डिजाइन करने में लगे हैं। कोच पर सदभावना के नारे और सभी धर्मों के प्रतीक चिन्ह बनाए जा रहे हैं।

करनैल सिंह रेलवे स्टेडियम के हाल में हमलोग रात को सोते हैं। यहां रेलवे का बहुत अच्छा स्वीमिंग पुल भी है। एक दिन हम सभी शिविरार्थियों को उस स्वीमिंग पुल में नहाने की भी अनुमति मिली। हालांकि मैं तैरना नहीं जानता लेकिन नहाकर मजा आ गया।

-विद्युत प्रकाश मौर्य


Wednesday, July 23, 2014

जब महाराष्ट्र के लातूर में आया भूकंप ((7))

( पहियों पर जिंदगी-7)
सद्भावना रेल यात्रा की तैयारी के दौरान ही महाराष्ट्र के लातूर जिले में 30 सितंबर को बड़ा भूकंप आ गया। विनाशकारी भूकंप के बाद देश में पांच दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया। इसके बाद सद्भवाना रेल यात्रा के शुभारंभ की तारीख टाल दी गई। पहले यह तय तारीख 2 अक्तूबर थी। कई लोगों को यह भी अंदेशा था की यात्रा भी स्थगित हो जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब रेलयात्रा के आरंभ की तारीख आठ अक्बतूर को शाम 4.50 बजे तय किया गया। इसी बीच अनूप कुमार भूतड़ा जैसे हमारे कुछ उत्साही साथी लातूर में भूकंप पीड़ितों की सहायता करने चले गए। 

अनूप कुमार भूतड़ा महाराष्ट्र के वर्धा शहर से आए हैं। उनकी किताबों की दुकान है भूतड़ा बुक डिपो। वे भूकंप को सुनकर काफी द्रवित हो गए। वे लातूर चले गए सेवा कार्य करने। हमलोगों ने भी दिल्ली में रहकर भूकंप पीड़ितों के लिए कुछ करने की सोची। शिविर में शाम की सर्वधर्म प्रार्थना के बाद होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम स्थगित कर दिए गए। प्रारंभ में शिविर में मुझे प्रदर्शनी का दायित्व और शाम के सांस्कृतिक कार्यक्रम के मंच संचालन का काम दिया गया था।
चार अक्टूबर को हमलोग भूकंप पीड़ितों के लिए सहायता राशि जुटाने दिल्ली की सड़कों पर निकले। मैं, रेणुका पाटंकर, हरविंदर, हरवंश कौर, गोपाल कपूर और चार और लोग टीम में। पहाड़गंज इलाके के बाजार से 2047 रुपये जुटाए। ये राशि बाकी लोगों द्वारा जुटाई गई राशि के साथ भूकंप राहत फंड में भेज दी गई।
दो अक्टूबर को सुबह 10 बजे राजघाट पर गांधी जी की समाधि के सामने विशेष प्रार्थना सभा हुई। इसके बाद मंडी हाउस में हमदर्द प्रेक्षागृह में झुग्गी झोपड़ी के बीच काम करने वाली संस्था आश्रय के कार्यक्रम में शामिल हुए। झुग्गी के बच्चों ने शानदार सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किए। यहां कवयित्री सरोजनी प्रीतम भी आई थीं।
साथी अनूप कुमार भूतड़ा ( अब की तस्वीर) 
तीन अक्टूबर को सभी शिविरार्थी राजनेताओं को रेलयात्रा के उदघाटन समारोह का आमंत्रण पत्र बांटने गए। मुझे इस दौरान रणसिंह परमार भाई साहब ने निजामुद्दीन स्टेशन से प्रदर्शनी की सामग्री लाने के लिए भेजा। मैं निजामुद्दीन के माल गोदाम से मिनी ट्रक किराये पर लेकर सामग्री को कैंप स्थल तक लेकर आया। निजामुद्दीन में ही सद्भावना यात्रा के लिए रेल की विशेष रैक का निर्माण किया जा रहा है।

रेलवे अस्पताल में भाई जी-  सुब्बराव जी जिन्हें हम प्यार से भाई जी कहते हैं उनकी तबीयत खराब चल रही है। उनका रेलवे हास्पीटल में इलाज चल रहा है। वे धीरे-धीरे स्वस्थ हो रहे हैं। सद्भावना यात्रा में आने से पहले एनवाईपी की अलीगढ़, उत्तरकाशी, बेंगलुरु, दिल्ली के शिविरों में हिस्सा ले चुका था। सुब्बराव जी मुझे निजी तौर पर पहचानने लगे हैं। रणसिंह परमार मुझे शिविर में बड़ी जिम्मेवारियां देना चाहते हैं। कई बार काम के दौरान मेरी रणसिंह जी से बहस हो जाती है, हालांकि वे इस बुरा नहीं मानते।

विनाशकारी भूकंप - लातूर में भूकंप 30 सितंबर 1993 को आया था। इसमें लगभग 10 हजार लोग मारे गए थे। सुबह सुबह आए भूकंप में 52 गांव पूरी तरह तबाह हो गए थे। इस प्राकृतिक आपदा में तकरीबन 30 हजार लोग घायल हुए थे। 
-       ----- विद्युत प्रकाश मौर्य 




Tuesday, July 22, 2014

कुरुक्षेत्र - यहां हुई थी महाभारत की लड़ाई ((6))


( पहियों पर जिंदगी-6)
सात अक्टूबर की सुबह पानीपत से हमलोग ट्रेन से ही कुरुक्षेत्र पहुंचे। रेलवे स्टेशन से ही सद्भावना मार्च निकाला गया। सद्भावना का अलख जगाते हमलोग पहुंचे शहर के जाट धर्मशाला। इसके पहले पड़ा था सैनी धर्मशाला। इससे लगता है कि कुरुक्षेत्र में बड़ी बड़ी धर्मशालाएं बनवाने का काम अलग अलग बिरादरी के लोगों ने किया है।


कुरुक्षेत्र का  ब्रह्मसरोवर 
सुबह का नास्ता जाट धर्मशाला में हुआ। यहां हमारा परिचय कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के राष्ट्रीय सेवा योजना के कार्यक्रम समन्वयक एपीएस लामा से हुआ। नास्ते के बाद हमारा सद्भावना मार्च आगे बढ़ा। शहर के एक प्रमुख चौराहे पर नुक्कड़ सभा हुई। वहां से आगे नगर के प्रमुख गुरुद्वारे में गए जहां दोपहर का भोजन हुआ। आज मैंने दिन भर मौन व्रत धारण कर रखा था। भोजन के बाद काफी लंबी दूरी पैदल चलने के बाद हमलोग कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय पहुंचे। यहां के बड़े आडिटोरियम के बाहर लॉन में सभा हुई। कुलपति भीमसेन दाहिया ने हमारा स्वागत किया। झांसी की बालिकाएं उस्मी उनियाल और विनीत शर्मा पैदल चलकर काफी थक गई हैं।

यहां से हमारा अगला पड़ाव था कुरूक्षेत्र का ब्रह्मसरोवर जिसके पास ही है श्रीकृष्ण संग्रहालय। गीता के उपदेश और श्रीकृष्ण के जीवन पर ये अद्भुत संग्राहलय है जिसका उदघाटन दो साल पहले ही राष्ट्रपति ने किया है। संग्राहलय में नटवर नागर के जीवन की झांकियों के अलावा उपर की मंजिल में मधुबनी पेंटिंग में श्रीकृष्ण की लीलाएं उकेरी गई हैं जो नयनाभिराम है।



थोड़ी देर आराम के पश्चात मैं और विशाल दूबे जर्मनी की सेंड्रा और मारेन के साथ कैंटीन में चाय पीने गए। शाम की सर्वधर्म प्रार्थना सभा आर्य कन्या विद्यालय में हुई। यहां स्थानीय उपस्थिति कम रही। नेहरु युवा केंद्र की स्वयंसेवक आदित्या सैनी ने सहयोग से होगा सर्वोदय..हे इन्सानों..हे प्रभु की संतानों सहयोग करो... गीत सुनाया। रात को हमलोग वापस जाट धर्मशाला पहुंचे। रास्ते में सुंदर मानसरोवर झील मिली। रात को ही एक ट्रेन से हमलोग दिल्ली वापस आ गए।


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Monday, July 21, 2014

रेल यात्रा का पहला पड़ाव- पानीपत (( 5 ))


(पहियों पर जिंदगी 5 )
शिविर में पांच अक्टूबर को यात्रियों को पैकिंग आदि के लिए आराम का समय दिया गया। लेकिन मेरे पास कुछ न कुछ काम तो था ही। इस दौरान मेरी कभी रवि नारायण जी तो कभी मेरी सुकुमारी (केरल) और के सुकुमारन से बहस हो गई। पर वे बड़े दिल वाले और अनुभवी लोग हैं बाद में इन बातों को भूला देते हैं।

रात को 12 बजे हमें पानीपत शटल ट्रेन से पानीपत चलने को कहा गया। सुबह पांच बजे हमारी ट्रेन पानीपत जंक्शन पहुंच गई। स्टेशन पर ही जागरण गीत हुआ। इसके बाद स्थानीय आयोजक राम मोहन राय सैनी एडवोकेट से मिलना हुआ। वे निर्मला देशपांडे के संगठन के साथ काम करते हैं। सद्भावना मार्च के साथ हमें आर्य सीनियर सेंकेडरी स्कूल ले जाया गया। यहां हमें नास्ता मिला। स्कूल में विशाल जनसभा थी। सभी युवाओं ने अपने अपने राज्य की भाषा में नारे लगातर राष्ट्रीय एकता का परिचय दिया। सबका मतलब होता है हम भारत देश को एक बनाकर रखेंगे। हमारे साथ जर्मनी की दो युवतियां भी हैं सेंड्रा और मारेन। वे जर्मन भाषा में कहती हैं। विए वाला फ्रीडन। ( वी वांट वर्ल्ड पीस)


मंच से सुब्बराव जी बता रहे हैं हिंदुस्तान में चार धर्मों का उदय हुआ। हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख। वहीं नागालैंड, मिजोरम, मेघालय की 90 फीसदी जनता ईसाई है। ऐसे में भारत को किसी एक धर्म का राष्ट्र कैसे कहा जा सकता है। देश को बड़े दिलवाले इंसान चाहिए। हर शहर में एक सद्भावना परिषद का निर्माण होना चाहिए जो हर माह कम से कम एक दिन सर्व धर्म प्रार्थना करे। हर धर्म के लोग एक दूसरे के त्योहारों में शामिल हों। 
कभी कभी मुझे सुब्बराव जी का व्याख्यान राजनैतिक लगने लगता है। लेकिन जल्द ही मेरा भ्रम दूर हो जाता है। उनका व्यक्ति वास्तव में एक सामाजिक कार्यकर्ता है जो सर्वधर्म मम भाव की बात करता है।
विद्यालय से हमलोग बसों से आगे बढ़े। कालाअबं। पानीपत वार मेमोरियल। यहां पानीपत की तीन ऐतिहासिक लड़ाइयां हुईं। ( 1526, 1556) सन 1761 में अंतिम लड़ाई में अंग्रेजों ने मराठाओं को पराजित किया। भारत पर अधिकांश विदेशी आक्रमण उत्तर पश्चिम से हुए। दिल्ली देश की राजधानी थी। पानीपत उसके उत्तर में लड़ाई के लिए उपयुक्त स्थल था। यहां युद्ध के लिए समतल भूमि और यमुना नदी के पानी की उपलब्धता थी। कालाआम में युद्ध स्मारक का निर्माण किया गया है। यहां एक काले आम का पेड़ है जो तीसरी लड़ाई के दौरान मराठों के सैन्य संचालन का केंद्र था।


दोपहर में हमलोग राजाखेड़ी गांव में गए। गांव में भोजन उम्दा मिला। स्कूल में एक सभा हुई। गांव के सरपंच ने सुब्बराव जी को पगड़ी और छड़ी भेंट की। खाने के बाद मैंने और आनंद भाई ने गांव के बच्चों को खेल सीखाए।

शाम को पानीपत के किला मैदान में सभा हुई। ये पानीपत का सबसे ऊंचा स्थल है। नगरपालिका अध्यक्ष सुरेंद्र कुमार लांबा मौजूद थे। एएल यादव राष्ट्रीय सेवा योजना के सहायक निदेशक, हरियाणा युवा शक्ति के सुरेश राठी, दरियाव सिंह मलिक जैसे लोगों ने आयोजन में भूमिका निभाई। हमारे साथी जयसिंह जादोन ने रेलगाड़ी की धुन में ताली बजाकर सबको आनंदित कर दिया।
- विद्युत प्रकाश मौर्य
(SADBHAWNA RAIL, PANIPAT ) 



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Sunday, July 20, 2014

और हम चल पड़े देश के सफर पर... ((4))

रेल यात्रा का उद्घाटन समारोह- रेलमंत्री सीके जाफर शरीफ, पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह,  अर्जुन सिंह व एसएन सुब्बाराव। 8-10-1993 
( पहियों पर जिंदगी-3)
कई दिनों के इंतजार के बाद आखिर वह वक्त आ ही गया जब हमें सदभावना यात्रा स्पेशल ट्रेन पर सवार होकर देश भर की यात्रा के लिए निकल जाना है। आठ अक्टूबर 1993 की सुबह। नई दिल्ली रेलवे स्टेशन दुल्हन की तरह सजी है। प्लेटफार्म नंबर एक पर समान्य यात्रियों का प्रवेश बिल्कुल बंद है। सुरक्षा व्यवस्था काफी कड़ी है। प्लेटफार्म से सटे समारोह स्थल पर रेलवे के बड़े अधिकारी चहलकदमी कर रहे हैं। रेलवे स्टेडियम के बेस कैंप में कई दिनों से रह रहे सदभावना यात्री अपनी पैकिंग करके यात्रा पर चलने के लिए तैयार हो चुके हैं। हालांकि हमने पानीपत और कुरुक्षेत्र का सफर पहले ही कर लिया है लेकिन अब यात्रा की औपचारिक शुरुआत हो रही है। 
शाम चार बजे सभा स्थल पर पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह पधारे। थोडी देर बाद मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह, रेल मंत्री सी के जाफरशरीफ भी पहुंचे। मंच संचालन उत्तर रेलवे के अधिकारी कर रहे हैं। ज्ञानी जैल सिंह ने अस्वस्था के कारण कोई संदेश नहीं दिया। अर्जुन सिंह ने सुब्बराव के इस अनूठे अभियान के लिए उनकी सराहना की ओर यात्रा को शुभकामनाएं दीं। सदभावना रेल यात्रा रेल मंत्रालय और मानव संसाधन विकास मंत्रालय के संयुक्त प्रयास से चलाई जा रही है। सुब्बराव जी ने मंच से युवा गीत - करना है निर्माण हमें नवभारत का निर्माण गाया...सारे सदभावना यात्रियों ने सुर मिलाया। 
रेलवे बोर्ड के चेयरमैन आनंद नारायण शुक्ल और अन्य सदस्य भी कार्यक्रम में मौजूद थे। सभा समाप्त होने के साथ ही सभी यात्री अपने अपने डिब्बों में चले गए। ठीक 4.50 बजे ज्ञानी जैल सिंह  जी ने ट्रेन को हरी झंडी दिखाई और ट्रेन नई दिल्ली स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक से चल पड़ी। मैं भी इस ट्रेन के कावेरी कोच में सवार हूं।

आगे दिल्ली के एक छोटे से स्टेशन पर ट्रेन रुक गई। पहले से तय कार्यक्रम था सभी यात्री देश के सफर पर रवाना होने से पहले  प्रधानमंत्री से मिलने जाएंगे। परंतु सूचना मिली की प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव दिल्ली वापस नहीं आ सके हैं। इसलिए गाड़ी फिर आगे की ओर बढ़ चली। रसोई यान में उदघोषणा सिस्टम से इस बारे में यात्रियों को जानकारी दी गई। सुबह यात्रियों को जगाने के लिए देशभक्ति के गीत बजाए जाते हैं। इस विशेष ट्रेन में सफर के शुरुआत की टीम के यात्री बने युवा अति उत्साहित हैं। मानो वे कोई इतिहास रचने चल पड़े हों।  


-vidyutp@gmail.com

(SADBHAWNA RAIL YATRA, NEW DELHI, NYP, SUBBARAO)     

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