Monday, June 30, 2014

महान सेनानी बिरसा मुंडा का शहर - रांची

रांची शहर की कई पहचान है, उसमें एक महान क्रांतिकारी बिरसा मुंडा की यादें भी हैं। झारखंड के लोग उन्हें सम्मान से बिरसा भगवान कहते हैं। कौन थे बिरसा मुंडा जो 25 साल से कम उम्र में भगवान कहे जाने लगे थे। बिहार झारखंड के छात्र तो स्कूली पुस्तकों में उनके बारे में पढ़ चुके हैं, पर पूरे देश बिरसा जैसे क्रांतिकारियों के बारे में कम ही मालूम है।
रांची शहर के एयरपोर्ट का नाम बिरसा के नाम पर बिरसा मुंडा एयरपोर्ट रखा गया है। वहीं रांची के कांके स्थित प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय का नाम बिरसा कृषि विश्वविद्यालय है। पर बिरसा सिर्फ झारखंड के ही नहीं देश स्वतंत्रता आंदोलन के उन महान क्रांतिकारियों में शुमार हैं जिन्होंने महज 25 साल की उम्र में अपने प्राण भारत मां के चरणों में न्योछावर कर दिए। बिरसा उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में देश के क्रांतिकारियों की फेहरिस्त में सबसे ज्यादा चमकते हुए सितारे थे।  
उलगुलान को अंजाम दिया - बिरसा मुंडा 19वीं सदी के प्रमुख आदिवासी जननायकों में से थे। उनके नेतृत्‍व में मुंडा आदिवासियों ने 19वीं सदी के आखिरी वर्षों में के महान आन्दोलन उलगुलान को अंजाम दिया। इसीलिए बिरसा को मुंडा समाज के लोग भगवान के रूप में पूजा करते हैं।
सुगना मुंडा का सपूत - बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को रांची जिले के उलिहतु गांव में हुआ था। बिरसा के पिता का नाम सुगना मुंडा और माता का नाम करमी हटू था। मुंडा रीति रिवाज के अनुसार उनका नाम गुरुवार के हिसाब से बिरसा रखा गया था। गांव में प्रारंभिक पढ़ाई के बाद बिरसा चाईबासा इंग्लिश मिडिल स्कूल में पढने गए। बिरसा मुंडा के मन में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बचपन से ही विद्रोह का भाव भर गया था।
रांची में बिरसा भगवान की समाधि पर। 
 
बिरसा को अपनी जमीन और संस्कृति से गहरा लगाव था। जब वह अपने स्कूल में पढ़ते थे तभी से उन्हें मुंडाओं की छिनी गई भूमि पर उन्हें दुख था। वे वाद-विवाद में हमेशा प्रखर तरीके से  आदिवासियों की जल, जंगल और जमीन पर हक की वकालत करते थे।
बगावती बिरसा स्कूल से निकाले गए - उन्हीं दिनों एक पादरी डॉक्टर नोट्रेट ने लोगों को लालच दिया कि अगर वह ईसाई बनें और उनके अनुदेशों का पालन करते रहें तो वे मुंडा सरदारों की छीनी हुई भूमि को वापस करा देंगे। पर 1886-87 में मुंडा सरदारों ने जब भूमि वापसी का आंदोलन किया तो इस आंदोलन को न केवल दबा दिया गया बलिक ईसाई मिशनरियों द्वारा इसकी भर्त्सना भी की गई जिससे बिरसा मुंडा को गहरा आघात लगा। उनकी बगावत को देखते हुए उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया। वे 1890 में पिता के साथ चाईबासा से वापस आ गए।
धरती बाबा और महापुरुष - बिरसा की गतिविधियां अंग्रेज सरकार को रास नहीं आई और उन्हें 1895 में गिरफ्तार कर लिया गया। बिरसा को हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में दो साल के लिए जेल की सजा दी गई।  पर बिरसा और उनके समर्थकों ने तो अकाल पीड़ित जनता की सहायता करने की ठान रखी थी। उनके सेवा भाव के कारण युवा काल में ही उन्हें महापुरुष का दर्जा मिल गया।  उन्हें इलाके के लोग धरती बाबा के नाम से पुकारने लगे। 
बिरसा कृषि विश्वविद्यालय रांची में बिरसा भगवान की प्रतिमा। 
अंग्रेजी फौज से तीर कमान लेकर भिड़े - साल 1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच कई युद्ध हुए।  बिरसा और उसके चाहने वालों अंग्रेजों को नाको चने चबाने को मजबूर कर दिया। अगस्त 1897 में बिरसा और उसके 400 सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूंटी थाने पर धावा बोला। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेना से हुई जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गयी लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं की गिरफ़्तार किया गया। जनवरी 1900 में जहां बिरसा अपनी जनसभा संबोधित कर रहे थे, डोमबाड़ी पहाड़ी पर एक और संघर्ष हुआ, जिसमें बहुत सी औरतें और बच्चे मारे गए। बाद में बिरसा के कुछ समर्थकों की भी गिरफ्तारी हुई।  बिरसा भी 3 फरवरी, 1900 को चक्रधरपुर में गिरफ्तार किए गए।


रांची में बिरसा की समाधि - 9 जून 1900 को रांची जेल में बिरसा की मौत हो गई। रांची शहर में बिरसा की समाधि बनाई गई है। मैं इस समाधि स्थल पर पहुंचता हूं। उस महान क्रांतिकारी को याद करके श्रद्धा से सिर झुक जाता है, जो कांग्रेस पार्टी की स्थापना के 15 साल बाद ही इस दुनिया को अलविदा कह गया। ब्रिटिश सरकार का जैसा उग्र विरोध कांग्रेस और दूसरे नेताओं ने 1930-40 के दशक में शुरू किया, बिरसा वैसा विद्रोह काफी पहले कर चुके थे। अपने पच्चीस साल के छोटे जीवन में ही बिरसा ने जैसी क्रांति की लौ जलाई , उसकी नजीर कहीं और नहीं मिलती।
-         विद्युत प्रकाश मौर्य- vidyutp@gmail.com
-         (BIRSA MUNDA, RANCHI, JHARKHAND )



Saturday, June 28, 2014

पटना से रांची जनशताब्दी एक्सप्रेस से

झारखंड के जंगल।  
संयुक्त बिहार में के जमाने में रांची बिहार के गर्मियों की राजधानी हुआ करता था। लेकिन सन 2000 में झारखंड बनने के बाद ये खूबसूरत शहर नए राज्य की राजधानी बन गया। पर पटना से रांची का रिश्ता आज भी खूशबूदार बना हुआ है। रोज रात्रि सेवा की दर्जनों लग्जरी बसें रांची के लिए प्रस्थान करती हैं तो कई रेलगाड़ियां भी हैं। पर मेरा सफर शुरू हुआ रांची जनशताब्दी एक्सप्रेस से। ट्रेन पटना जंक्शन के प्लेटफार्म नंबर से ठीक सुबह 6.00 बजे खुल गई।
झारखंड की स्वर्णरेखा नदी। इसमें मिलता है सोना। 
पटना गया लाइन का सफर कभी नारकीय हुआ करता था। पर अब डबल लाइनविद्युतीकृत ट्रैक पर दिन भर दौड़ती ट्रेनों के कारण हालात बदल गए हैं। चेन पुलिंग बीते दिनों की बात हो गई है। कई नए हाल्ट बन गए हैं। सो जन शताब्दी तय समय से पहले  ही गया पहुंच गई। स्टेशन पर अनानास और पपीता बेचने वाले नजर आए. ठहराव 20 मिनट का था। हमने फलाहार किया। ट्रेन आगे बढ़ी। फल्गू नदी को पारकर मानपुर आया बुनकरों का मोहल्ला। 
थोडी देर बाद मोबाइल नेटवर्क खत्म। जंगल शुरू। हरियाली को पार कर आ गए अबरख के पहाड। कोडरमा, झारखंड का पहला बड़ा रेलवे स्टेशन। भाजपा के सांसद रीतलाल प्रसाद वर्मा की याद आई। वे दिल्ली में मिलने पर कई बार मुझे कोडरमा चलने को कहते थे। पर मैं कभी उनके साथ नहीं जा सका। वे इस दुनिया से चले गए। 

हजारीबाग रोड, पारसनाथ के बाद गोमो जंक्शन। गोमो का नया नाम नेताजी सुभाष चंद्र बोस जंक्शन हैं। इसी रेलवे स्टेशन से 1941 में नेताजी वेश बदलकर पलायन कर गए थे। उनकी याद में स्टेशन पर स्मृति पट्टिका लगी है। 
चंद्रपुरा जंक्शन से पहले दामोदर नदी। दामोदर यानी झारखंड की जीवन रेखा। इस नदी के नाम पर दामोदर वैली कारपोरेशन का गठन हुआ है। नदी पेयजल के साथ विद्युत उत्पादन का बड़ा स्रोत है। तुपकाडीह से पहले दामोदर पर रेल पुल आता है। इसके बाद बोकारो स्टील सिटी। कई साल पहले में एक परीक्षा देने आया था इस शहर में। ट्रेन सरपट आगे भागती है एक बार फिर मोबाइल नेटवर्क खत्म हो जाता है। मूरी जंक्शन से पहले स्वर्णरेखा नदी आती है। कहते हैं इस नदी के बालू से सोना निकलता है। जंगलों के  बीच गौतमधारा, गंगाघाट जैसे स्टेशन आते हैं। टाटी सिलवे और नामकुम रांची से पहले के स्टेशन हैं।

अब रांची शहर का विस्तार टाटी तक होने लगा है। रांची रेलवे स्टेशन की सफेद इमारत कुछ कुछ अगरतला स्टेशन की याद दिलाती है। स्टेशन के बाहर शहर में चलने वाले रिक्शा दिखाई देते हैं जिनकी ऊंचाई पटना के रिक्शा की तुलना में काफी कम है। पटना के रिक्शा से गिरने का डर बना रहता है। पर रांची का रिक्शा अपनेपन का एहसास करता है। तो अब चलते हैं शहर में। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य
(RANCHI, JHARKHAND, RAIL, JAN SHATABDI EXPRESS ) 


Thursday, June 26, 2014

कोई नहीं आता फूल चढ़ाने देशरत्न की समाधि पर

पटना के बांसघाट के पास देशरत्न की समाधि। फोटो- विद्युत
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की समाधि दिल्ली में यमुना तट पर है। इसके साथ कई किलोमीटर लंबी हरित पट्टी है जहां दूसरे प्रधानमंत्रियों की भी समाधि है। इस क्षेत्र में कई सौ एकड़ जमीन संरक्षित रखी गई है। हजारों लोग रोज इन समाधियों को देखने आते हैं। पर देश के महान सपूत और पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद की समाधि कहां है।


ये समाधि पटना में गंगा तट पर बांसघाट के बगल में है। समाधि के आसपास कोई भव्यता नहीं है। सड़क की चौड़ाई भी ज्यादा नहीं है। समाधि स्थल के ठीक बगल में बांस घाट में अनवरत शवदाह चलता रहता है जिसका धुआं देशरत्न डाक्टर राजेंद्र प्रसाद की समाधि के पास आता रहता है। आप पर्यटक के तौर पर समाधि को देखने जाएं तो समाधि के द्वार पर ताला लगा दिखाई देता है। अंदर जाकर देश रत्न को नमन करना भी मुश्किल है।

डाक्टर राजेंद्र प्रसाद 10 साल देश के सर्वोच्च पद पर रहने के बाद अवकाश प्राप्त करने के बाद 14 मई 1962 को पटना लौट आए। उन्होंने कोई सरकारी आवास नहीं लिया और बाकी के दिन सदाकत आश्रम में बिहार विद्यापीठ में गुजारना पसंद किया।  28 फरवरी 1963 को उन्होंने अंतिम सांस ली। 

उनका अंतिम संस्कार पास के ही बांसघाट के पास किया गया। कई साल बाद यहां पर उनकी पक्की समाधि जरूर बना दी गई। पर समाधि के ररखाव का हाल बुरा है। हर साल 3 दिसंबर को देशरत्न की जयंती पर नेतागण पर पुष्पांजलि देने जरूर आते हैं। पर शेष 364 दिन कोई नहीं पूछता। गांधी नेहरु की समाधि पर फूल चढ़ाने लोग हजारों लोग पहुंचते हैं पर देशरत्न की समाधि के बारे में पटना में भी जागरूकता की भारी कमी है। जरूरत है कि समाधि स्थल को ऐसा बनाया जाए जिससे नई पीढ़ी इस महान व्यक्तित्व से प्रेरणा ले सके।




बिहार की राजनीति में सक्रिय युवा नेता राघवेंद्र सिंह कुशवाह समाधि के कायाकल्प की मांग कर रहे हैं। उनकी मांग है कि समाधि के बगल से शवदाह गृह को दूर हटाया जाए। समाधि के पास राजघाट की तरह अखंड ज्योति प्रज्जवलित की जाए। समाधि स्थल के आसपास का सौंदर्यीकरण किया जाए। साथ ही यहां पर राजेंद्र प्रसाद से जुड़े हुए साहित्य के बिक्री और वितरण का इंतजाम किया जाए। इन कदमों से आने वाली पीढ़ी को देशरत्न से प्रेरणा मिल सकेगी।


( समाधि के सौंदर्यीकरण के लिए 6 जुलाई 2014 को पटना में समाधि स्थल पर धरना  देंगे सर्वजन समाज के लोग)


- विद्युत प्रकाश मौर्य

 ( PATNA, DESHRATNA DR RAJENDRA PRASAD ) 

Sunday, June 8, 2014

वास्तुकला का सुंदर नमूना चोपड़ा शिव मंदिर


चंबल क्षेत्र के मंदिरों में प्रमुख नाम है चोपड़ा शिवमंदिर का जिसकी वास्तुकला अद्भुत है। राजस्थान के धौलपुर शहर में यह अनूठा शिव मंदिर है जिसे चोपड़ा शिव मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर का निर्माण धौलपुर के महारावल भगवंत सिंह के मामा राजधर कन्हैयालाल ने 1856 ई. में करवाया था। 

कन्हैया लाल जी धौलपुर राजघराने के दीवान थे। मंदिर में उनका कलाप्रेम बखूबी दिखाई देता है। इस मंदिर की ऊंचाई 150 फीट (45 मीटर) है। मंदिर वास्तुकला की नजरिए से अनूठा है। इसका का गर्भ गृह अष्ट कोणीय है। इसके आठो दीवार में आठ दरवाजे भी हैं। 

मंदिर के हर दरवाजे पर भी आकर्षक मूर्तियां उकेरी गई हैं। मंदिर का उन्नत शिखर भी अत्यंत आकर्षक है। बाहर की ओ से इसकी नक्कासी बहुत ही खूबसूरत है। मंदिर के निर्माण में इस्तेमाल किए गए पत्थर के टुकडों पर नक्काशी का काम अत्यंत बारीक और आकर्षक है। ये शिवमंदिर 19वीं शताब्दी के वास्तुकला का सुंदर नमूना है।

मंदिर के बगल में एक कुंड भी बना हुआ है जिसका निर्माण भी दीवान कन्हैया लाल जी ने ही करवाया था। हालांकि इस कुंड की स्थिति खराब रख रखाव के कारण दयनीय हो गई है।  मंदिर मुख्य परिसर के बीच एक बड़े से आंगन में स्थित है। मंदिर के गर्भगृह में जाने के लिए 25 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। चंबल क्षेत्र के लोग इस मंदिर को सिद्ध मानते हैं।


जगदगुरु शंकराचार्य श्री श्री 1008 स्वामी श्री जयेन्द्र सरस्वती भी इस मंदिर में पधारकर अभिषेक कर चुके हैं। चोपड़ा शिव मंदिर धौलपुरशहर का सबसे प्राचीन शिव मंदिर है। हर साल महाशिवरात्रि के समय यहां श्रद्धालुओँ की बड़ी भीड़ उमड़ती है।

कैसे पहुंचे - चोपड़ा शिव मंदिर राजस्थान के धौलपुर शहर में आगरा ग्वालियर मार्ग पर स्थितहै। धौलपुर शहर के मुख्य बस स्टैंड से 500 मीटर की दूरी पर स्थित है। बस स्टैंड से पैदल मंदिर तक पहुंचा जा सकता है। मंदिर प्रातः सात बजे से दोपहर 12 बजे तक और सांय 4 से 7 बजे तक लोगों को दर्शन के लिए खुला रहता है।

-         - अनादि अनत


( CHOPRA SHIVA TEMPLE, DHAULPUR RAJSTHAN ) 
धौलपुर में चोपड़ा शिव मंदिर के बगल में बदहाल कुंड । 


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Saturday, June 7, 2014

ग्वालियर का विवस्वान सूर्य मंदिर

वैसे तो देश में कई सूर्य मंदिर हैं पर ग्वालियर के सूर्य मंदिर की भव्यता अनूठी है। शहर के मुरार इलाके में स्थित विवस्वान सूर्य मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा 23 जनवरी 1988 को की गई। मंदिर का उदघाटन बसंत कुमार बिड़ला द्वारा किया गया। इस पूरब रूख के मंदिर में सात घोड़ों पर सवार सूर्य के दर्शन किए जा सकते हैं। मंदिर का रूख पूरब की ओर होने के कारण सुबह के सूर्य की पहली किरणें जब मंदिर के प्रवेश द्वार को चूमती हैं मंदिर का अनूठा सौंदर्य दिखाई देता है।

बाहर से बलुआ पत्थर ( रेड स्टोन) से बने पूरे मंदिर की आकृति किसी भव्य रथ के जैसी है जिसमें दोनों तरफ 16 पहिए लगे हुए हैं। मंदिर की प्रतिकृति ओडिशा के कोणार्क में स्थित सूर्य मंदिर से काफी कुछ मिलती जुलती है। मंदिर के मुख्य द्वार पर साथ घोड़ों की आकृति बनी हुई है जो सूर्य के रथ को खींचते हुए प्रतीत होते हैं। कहा जाता है कि सूर्य हर सुबह सात घोड़ों पर सवार होकर जगत को देदीप्यमान करने के लिए निकलते हैं। मंदिर के आंतरिक सज्जा में सफेद संगमरमर का इस्तेमाल किया गया है। अंदर जगह जगह कई देवी देवताओं की मूर्तियां भी दीवारों पर उकेरी गई है।
सूर्य मंदिर अब ग्वालियर शहर के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में शामिल हो चुका है। आम श्रद्धालुओं के लिए मंदिर सूर्योदय लेकर सूर्यास्त तक खुला रहता है। दोपहर 12 से 1 बजे तक मंदिर बंद होता है। जबकि शनिवार और रविवार को सूर्य मंदिर शाम 7.30 बजे तक खुला रहता है।
कई एकड़ में फैले इस मंदिर परिसर में हरियाली ऐसी है कि यहां से जल्दी बाहर निकलने का दिल ही नहीं करता। मंदिर परिसर में घनश्याम दास बिड़ला का लोगों के लिए संदेश लिखा गया है – मैं यही कहना चाहता हूंकि सत्कर्म कीजिए और भगवान का नाम लीजिए। ईश्वर आपका मंगल करेगा।


कैसे पहुंचे - ग्वालियर शहर के प्रसिद्ध गोला का मंदिर चौराहा से सूर्य मंदिर की दूरी 10 मिनट पैदल चलने भर की है। यह शहर का बाइपास इलाका है जहां से मुरैना और शिवपुरी के लिए रास्ते बदलते हैं। सूर्य मंदिर रेसीडेंसी क्षेत्र में है। मंदिर के पास महाराजपुर एयर स्टेशन स्थित है।
  -    माधवी रंजना

Thursday, June 5, 2014

नहीं भूलता बनारस की लस्सी का स्वाद

भीषण गर्मी में तरावट के लिए लस्सी पीना किसे अच्छा नहीं लगता. लस्सी अगर मिट्टी के करूए (ग्लास) में पी जाए तो उसका स्वाद और  ही बढ़ जाता है। वह लस्सी बनारस की हो तो बात ही क्या। बनारस में भी घुघरानी गली के लस्सी का स्वाद और बढ़ जाता है।

वैसे तो उत्तर भारत के अधिकांश शहरों में लस्सी मिलती है। कई दुकानदार लस्सी बनाकर फ्रीज में रख देते हैं। मांग के हिसाब से दिन भर ग्राहकों को पेश करते हैं। पर लस्सी ताजी बनी हुई ही अच्छी लगती है। अब राजधानी दिल्ली के कई दुकानों में भी मिट्टी के ग्लास में लस्सी मिल जाती है। पर दिल्ली में लस्सी जरा महंगी है। दिल्ली में लस्सी 25 से 40 रुपये की ग्लास मिलती है। पर बनारस में अभी भी लस्सी 10, 15 और 20 में बिकती है।
बनारस में पांच साल गुजराने के दौरान हम लंका पर लस्सी और मैंगो शेक के मजे लेते थे। कभी कभी साइकिल दौड़ाई और बांस फाटक के पास घुघरानी गली पहुंच गए। 2014 के मई की दोपहरी में भी घुघरानी गली की लस्सी की स्वाद राहत देता है।

छोटा, मध्यम या बड़ा जो आर्डर करें लस्सी बनारसी अंदाज में तैयार होकर मिलेगी। बनारसी बाबू अपने अंदाज में लस्सी घोंटते हैं। दही, चीनी, बर्फ तो हर जगह होती है पर उसके ऊपर मलाई की परत उसका स्वाद और बढ़ा देती है। महानगरों में प्लास्टिक के डिस्पोजेबल ग्लास आ गए हैं। पर बनारस में लस्सी पेश करने का अंदाज वही है। कई शहरों में लस्सी के साथ रूह अफजा का स्वाद मिलाया जाता है। पर बनारसी अंदाज इनसे जुदा है। वैसे बनारस के हर चौक चौराहे पर लस्सी की दुकानें मिल जाएंगी। पर अगर आप बनारस में गौदौलिया चौराहे की तरफ से गुजर रहे हों तो लस्सी का स्वाद लेना नहीं भूलें।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य  
(VARANASI, LASSI, GHUGHRANI GALI ) 

Wednesday, June 4, 2014

गुणकारी बेल का शरबत

गर्मी की तपिश से बचने के लिए आपने बेल का शर्बत तो जरूर पिया होगा। इसकी तासीर ठंडी होती है। बेल के पत्तों की तासीर भी ठंडी होती है इसलिए भगवान शिव को बेल और बेल के पत्ते अर्पित किए जाते हैं। 

पूरे देश में मिलता है बेल - सारे भारत में खासकर हिमालय की तराई मेंसूखे पहाड़ी क्षेत्रों में हजार फीट की ऊंचाई तक पाया जाता है । मध्य व दक्षिण भारत में बेल जंगल के रूप में फैला पाया जाता है । मध्य व दक्षिण भारत में बेल जंगल में फैला पाया जाता है । आध्यात्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण इसे मंदिरों के पास लगाया जाता है। उष्ण कटिबंधीय फल बेल के वृक्ष हिमालय की तराईमध्य एवं दक्षिण भारत बिहारतथा बंगाल में घने जंगलों में अधिकता से पाए जाते हैं। चूर्ण आदि औषधीय प्रयोग में बेल का कच्चा फलमुरब्बे के लिए अधपक्का फल और शर्बत के लिए पका फल काम में लाया जाता है।


बाजार में दो प्रकार के बेल मिलते हैं- छोटे जंगली और बड़े उगाए हुए । दोनों के गुण समान हैं। बिल्व (इगल मार्मेलोज). बिल्व (बेलकहा गया है- 'रोगान बिलत्ति-भिनत्ति इति बिल्व ।अर्थात् रोगों को नष्ट करने की क्षमता के कारण बेल को बिल्व कहा गया है। बेल के पत्तों से भगवान शिव की पूजा होती है।

बीमारियों में लाभकारी - बेल की पत्तियों को पीसकर उसके रस का दिन में दो बार सेवन करने से डायबिटीज की बीमारी में काफी राहत मिलती है। रक्ताल्पता में पके हुए सूखे बेल की गिरी का चूर्ण बनाकर गर्म दूध में मिश्री के साथ एक चम्मच पावडर प्रतिदिन देने से शरीर में नया रक्त बनता है

गैस्ट्रोएण्टेटाइटिस एवं हैजे के ऐपीडेमिक प्रकोपो (महामारी) में अत्यंत उपयोगी अचूक औषधि माना है । विषाणु को परास्त करने की इसमें क्षमता है। कच्चा या अधपका फल गुण में कषाय (एस्ट्रोन्जेण्ट) होता है। यह टैनिन एवं श्लेष्म (म्यूसीलेज) के कारण दस्त में लाभ करता है। पुरानी पेचिसअल्सरेटिव कोलाइटिस जैसे जीर्ण असाध्य रोग में भी यह लाभ करता है। बेल में म्यूसिलेज की मात्रा अधिक होती है। यह डायरिया के तुरंत बाद वह घावों को भरकर आंतों को स्वस्थ बनाने में समर्थ है। मल संचित नहीं हो पाता और आंतें कमजोर होने से बच जाती हैं।

होम्योपैथी में बेल के फल व पत्र दोनों को समान गुण का मानते हैं। खूनी बवासीर व पुरानी पेचिश में इसका प्रयोग बहुत लाभदायक होता है । अलग-अलग पोटेन्सी में बिल्व टिंक्चर का प्रयोग कर आशातीत लाभ देखे गए हैं। यूनानी मतानुसार इसका नाम है- सफरजले हिन्द। यह दूसरे दर्जे में सर्द और तीसरे में खुश्क है।

- विद्युत प्रकाश मौर्य 

Tuesday, June 3, 2014

तेलंगाना - भारत का 29वां पूर्ण राज्य

दो जून 2014 को देश के 29वें पूर्ण राज्य के तौर पर तेलंगाना का जन्म हुआ। आंध्र प्रदेश से अलग होकर बने इस राज्य की राजधानी हैदराबाद होगी। 17 फरवरी 1954 को जन्मे कलवकुंतला चंद्रशेखर राव तेलंगाना के पहले मुख्यमंत्री बने। तेलंगाना शब्द का अर्थ है - तेलुगूभाषियों की भूमि। नया राज्य तेलंगाना पिछले चार दशकों से यहां लोगों के संघर्ष और बलिदान की परिणाम है।

संघर्ष गाथा - तेलंगाना मूल रूप से हैदराबाद के निजाम की रियासत का हिस्सा था। वर्ष 1948 में भारत ने निजाम की रियासत को खत्म करके हैदराबाद राज्य की नींव रखी।
1948 में पहली बार कामरेड वासुपुन्यया ने अलग तेलंगाना राज्य की मुहिम शुरू की। वासुपुन्यया का सपना भूमिहीन किसानों को जमींदार बनाना था। मगर कुछ साल बाद इस आंदोलन की कमान नक्सलियों के हाथों में चली गई। इसी बीच 1956 में तेलंगाना के एक बड़े हिस्से को आंध्र प्रदेश में शामिल कर लिया गया, जबकि कुछ हिस्से कर्नाटक और महाराष्ट्र में मिला दिए गए।
1969 में तेलंगाना आंदोलन फिर शुरू हुआ। इस बार इसका मकसद इलाके का विकास था और इसमें बड़ी तादाद में छात्र आंदोलन में सक्रिय थे। उस्मानिया विश्वविद्यालय इस आंदोलन का प्रमुख केंद्र था। इस आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग और लाठीचार्ज में मारे गए सैकड़ों छात्रों की कुर्बानी ने इसे ऐतिहासिक बना दिया।

1971 में कांग्रेस पार्टी ने तेलंगाना क्षेत्र के पीवी नरसिंह राव को भी आंध्र प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाकर तेलंगाना आंदोलन को कमजोर किया।
2001 में के चंद्रशेखर राव की अगुवाई में अलग तेलंगाना राज्य की मांग फिर तेज हुई। नाराज केसीआर ने तेलुगु देशम पार्टी को अलविदा कह नई पार्टी बनाई।
27 अप्रैल 2001 को केसीआर तेलंगाना राष्ट्र समिति नामक दल का गठन किया जिसका मुख्य मांग की अलग तेलंगाना राज्य बनाने की थी।
2004 में कांग्रेस ने अलग तेलंगाना राज्य के गठन को समर्थन देते हुए केसीआर से गठबंधन किया मगर इस बार भी वादाखिलाफी हुई। आंध्र के मुख्यमंत्री रहे वाईएसआर ने भी अलग तेलंगाना राज्य के गठन को तरजीह नहीं दी।

ऐसा है राज्य
- 10 जिले हैं तेलंगाना में। हैदराबाद, रंगारेड्डी, अदिलाबाद, खम्मम, करीमनगर, महबूबनगर, मेडक, नलगोंडा, निजामाबाद और वारंगल।
- 119 विधानसभा सीटें और लोकसभा 17 सीटें हैं नए राज्य में। 
- 30 अप्रैल को हुए विधान सभा चुनाव में 63 सीटें जीतकर बहुमत में है टीआरएस।
- 84% हिंदू, 12.4% मुस्लिम और 3.2% सिख, ईसाई और अन्य धर्म के लोग हैं राज्य में।
- 76% लोग तेलुगु 12% उर्दू तथा 12% लोग अन्य भाषाएं बोलते हैं तेलंगाना में।


राज्य का निर्माण : कदम दर कदम
30 जुलाई 2013 : यूपीए ने तेलंगाना के गठन पर सर्वसम्मति से सहमति दी।
05 दिसंबर 2013 : मंत्रिसमूह द्वारा बनाए ड्राफ्ट बिल को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी।
18 फरवरी 2014 : आंध्र प्रदेश पुर्नगठन बिल 2014 को लोकसभा ने भाजपा के समर्थन से पास किया।
21 फरवरी 2014 : तेलंगाना पर संसद की मुहर, कर्मचारियों के आवंटन के लिए समितियां बनीं।

01 मार्च 2014 : तेलंगाना बिल पर राष्ट्रपति की मुहर।

--vidyutp@gmail.com   ( TELANGANA, NEW STATE, HYDRABAD ) 

Monday, June 2, 2014

मेरी पहली रेल यात्रा - कुदरा से सोनपुर वाया पटना

( कुदरा- गया - पटना- पहलेजाघाट सोनपुर )
परिंदो से रफाकत सी हो गई है। सफर की आदत सी हो गई है। अब तो 40 पार करने के बाद देश के 27 राज्यों को नाप चुका हूं। पर पहली रेल यात्रा की यादें हमेशा खुशनुमा होती हैं। तो चलिए याद करते हैं पहली यात्रा के साथ अपने छुटपन को।

दशहरे का रावण जल चुका था। मौसम में गुनगुनी सी ठंड आ गई थी। पिताजी छुट्टियों में गांव आए थे। उनकी इच्छा थी अब बड़े बेटे विकास को अपने साथ ले जाऊंगा। चार भाई बहनों में मैं सबसे बड़ा पुलकित होकर मां का आंचल छोड़ पिता के साथ रह कर पढ़ाई करने के लिए जाने के तैयार हो गया। ( तब चार ही थे दो बाद में आए) 1978 का साल था तब मैं दूसरी कक्षा में था। गांव के तीन स्कूलों से देश निकाला करार दिया जा चुका था। ( कारण फिर कभी बताउंगा) गांव से निकतम रेलवे स्टेशन कुदरा पहुंचने के लिए बसही पुल से घोड़ागाड़ी का सहारा था। बसहीं तक मेरे गांव से खेतों की मेड से होकर 4 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। एक सुबह पिता की ऊंगली पकड़कर हम चल पड़े। बसही पुल पर घंटों इंतजार के बाद को तांगा नहीं आया। एक आया तो बोला अब जाउंगा नहीं। उस तांगे से जागा बाबा उतरे। वे मेरी छोटी फुआ के ससुर थे। बड़े बातूनी। उनके साथ गप्पे लड़ाते पिता जी गांव वापस लौट आए। अगले दिन फिर से बोरिया बिस्तर बांधा। इस बार तांगा मिल गया। 

कुदरा रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का घंटों इंतजार। फिर एक ट्रेन आई। उसका नाम याद नहीं। पर वह गया जाने वाली ट्रेन थी। हमलोग उस ट्रेन से गया पहुंच गए। बीच में शिवसागर रोड, कुम्हऊं, सासाराम, करवंदिया, डेहरी आन सोन , अनुग्रह नारायण रोड, फेसर जैसे स्टेशन आ। फेसर नाम सुनकर मुझे खूब हंसी आई। क्या नाम है। गया का रेलवे स्टेशन बहुत बड़ा था। कई प्लेटफार्म। रात की रोशनी में मेरी आंखे चौंधियां गईं। पिताजी ने बताया यहां से रांची पटना एक्सप्रेस पकड़ेंगे पटना के लिए। रात 9 बजे ट्रेन आई। बहुत भीड़ थी। किसी तरह जनरल डिब्बे में घुस पाए। पिताजी को जगह नहीं मिली। मुझे बिठा दिया सीट के ऊपर वाली बर्थ पर। जो अमूमन सामान रखने के लिए होता है। ये सफर मुश्किलों भरा रहा। खैर पीजी लाइन पर से होकर हमलोग पटना पहुंच गए। राजधानी का रेलवे स्टेशन तो और भी बड़ा था। रेलवे स्टेशन का नाम रंग बिरंगी रोशनी में जगमगा रहा था। मैंने पहली बार बिजली के बल्ब देखे थे। रात को मुझे नींद आ रही थी। पर आधी रात में हमलोग टमटम पर सवार होकर महेंद्रू घाट पहुंचे। यहां से रेलवे की स्टीमर सेवा चलती थी।
पटना में गंगा में जहाज। 
 रात्रि सेवा से गंगा पार कर सुबह 4 बजे हमलोग पहलेजा घाट पहुंच चुके थे। अचानक लाल लाल वर्दी में ढेर सारे लोग हमारे जहाज में कूदने लगे और हमारे सूटकेस पर टूट पड़े। पिता जी ने समझाया घबराओ मत ये कुली हैं। सामान ढोने वाले। हमने कुली पहली बार देखे थे। मुझे रतजगा करने की आदत नहीं थी। पर मैं मां से दूर पिता की उंगली पकड़ उत्तर बिहार की धरती में आ चुका था। गंगाजी के रेतीले तट पर नन्हे नन्हे पांव से पदयात्रा करते हुए हमलोग पहलेजा घाट रेलवे स्टेशन पहुंचे। यहां से पैसेंजर ट्रेन में सवार हुए। पिताजी मुझे डिब्बे में बिठाकर प्लेटफार्म पर कुछ देखने चले गए। थोड़ी देर में ट्रेन से सिटी बजा दी। पिताजी नहीं आए थे। मैं भोंकार पार कर रोने लगा। सहयात्रियों ने पूछा कहां जाना है। मुझे इतना तो मालूम था कन्हौली जहां पिताजी ग्रामीण बैंक में मैनेजर हैं। पर कैसे पहुंचना है नहीं मालूम था। खैर ट्रेन चलने से पहले पिताजी आ गए। मेरी जान में जान आई। बाद में यात्रियों ने कहा, सर हम बेटे को महुआ तक तो छोड़ देते। मुझे नहीं मालूम था ये महुआ कहां है।

खैर ट्रेन ने सोनपुर छोड़ दिया। तब यहां संसार का सबसे लबां प्लेटफार्म था। यहां से तीन पहिया वाले आटो रिक्शा में बैठकर हमलोग हाजीपुर बस स्टैंड पहुंचे। उत्तर बिहार में आटो रिक्शा को टेंपू कहते हैं। मैं पहली बार इस तीन पहिए में चढ़ा था। सोनपुर से से हाजीपुर के बीच गंडकर नदी का पुल आया। जगह जगह पोस्टर लगे थे। शुभारंभ सोनपुर मेले का दो नवंबर से। हाजीपुर में हम लाल रंग की सरकारी बस में चढ़े उस पर लिखा था- बिहार राज्य पथ परिवहन निगम। सुबह के सात बजे थे बस ने हमें कन्हौली जो महुआ से पांच किलोमीटर पहले एक गांव है वहां उतारा। पिताजी के बैंक के सहकर्मी सियाराम जी ने हमारा स्वागत किया। मैं भोजपुरी माटी को छोडकर वज्जिका बोले जाने वाले प्रदेश में आ चुका था। जहां त का मतलब हं ( YES)  होता है। यहां सब कुछ मेरे लिए कौतूहल भरा था। दो मंजिले घर के पीछे खेतों में हरी हरी फसल लहलहा रही थी। लोगों ने बताया तंबाकू (खैनी) है।   
- विद्युत प्रकाश मौर्य  
( BIHAR, RAIL, SOHWALIA, ROHTAS, KUDRA, KANHAULI, VAISHALI )     

Sunday, June 1, 2014

कालका शिमला रेल – इतिहास और बदलती तकनीक ((05 ))

साल 1884-85 के दौरान ब्रिटिश सरकार ने शिमला को रेल से जोड़ने की योजना पर काम शुरू किया। पहाड़ों के प्राकृतिक वातावरण को बचाए रखने के लिए इस क्षेत्र में नैरोगेज लाइन बिछाने का प्रस्ताव दिया गया। 1891 तक कालका रेलवे लिंक से जुड़ चुका था। अंबाला कालका रेलवे कंपनी और सरकार के बीच कालका शिमला रेल लाइन बिछाने के लिए 1899 में अनुबंध होने के बाद काम प्रारंभ हुआ।


पहले इस मार्ग पर 2 फीट चौड़ाई वाली पटरी बिछाने पर सहमति बनी पर बाद में उसे सेना के आग्रह पर 2 फीट 6 इंच कर दिया गया। रेल पटरियों के लिए लेमिनेटेड स्टील का इस्तेमाल किया गया जबकि स्लीपर के लिए लकड़ियों का इस्तेमाल हुआ। 9 नवंबर 1903 को इस मार्ग पर ट्रैफिक आरंभ हो गया पर इसी साल हुई भारी बर्फबारी और भूस्खलन से इस मार्ग को अस्थायी तौर पर बंद करना पड़ा। 

पहले लोको के तौर पर 4 पहियों वाले इंजन इस्तेमाल में लाए गए। बाद में 6 पहिए वाले और फिर 10 पहियों वाले इंजन इस मार्ग पर प्रयोग में लाए गए। ये इंजन ग्लासगो के स्टीवर्ट एंड कंपनी ने बनाए थे। ये लोको बिना ज्यादा बदलाव के 1953 तक संचालन में थे। बाद में इन लोको को जर्मन कंपनी हंसेल ने परिस्कृत किया और इसमें कोयला और पानी डालने की क्षमता बढ़ाई। 

1952 के बाद कालका शिमला मार्ग पर भाप इंजन की जगह डीजल लोको का इस्तेमाल शुरू किया गया। 1980 में इस मार्ग पर आखिरी भाप इंजन का प्रयोग किया गया। पर साल 2001 में पुरानी परंपरा को याद करते हुए एक स्टीम इंजन को इस मार्ग पर फिर से लाया गया। सैलानियों के लिए आज भी प्रसिद्ध बी क्लास स्टीम इंजन मौजूद है जिसे खास मौकों पर चलाया जाता है। चार पहियों वाले बोगी भी अभी भी इस मार्ग पर इस्तेमाल में हैं।

कालका शिमला रेल पर कभी भाप इंजन से चलने वाली ट्रेनें अब डीजल इंजन से चलती है। लेकिन ये एक मात्र रेलवे मार्ग है जिस पर कभी पेट्रोल से चलने वाले लोको भी चलाए गए। 1911 में इस रेल मार्ग पर पेट्रोल चलित पार्सल वैनों का संचालन किया गया। इस इंजन का निर्माण ड्रेवरी कार कंपनी लंदन ने किया था। इसमें 17 हार्स पावर का इंजन लगा था। इस रेल इंजन को राष्ट्रीय रेल संग्रहालय दिल्ली में रखा गया है।

शुरूआत में केएसआर के मार्ग पर दार्जिलिंग हिमालयन रेल से परिस्कृत किए गए लोको (इंजन) को लाकर चलाया गया। डीजल इलेक्ट्रिक मोटर कार इस मार्ग पर 1932 में इस्तेमाल में लाया गया। इस मोटर कार की खिड़कियां चौड़ी हैं जिससे नजारे देखने का आनंद बढ़ जाता है। ये रेल मोटरकार अभी भी इस्तेमाल में है।

- विद्युत प्रकाश मौर्य 

(  KSR, KALKA SHIMLA RAIL, NARROW GAUGE )