Friday, February 28, 2014

नेरल से माथेरन का सफर खिलौना ट्रेन से

दिल्ली के रेल म्युजियम में माथेरन रेल का लोकोमोटिव।
महाराष्ट्र में एक प्यारी सी लाइट रेलवे चलती है। मुंबई के पास नेरल से माथेरन का सफर कराती है एनएमआर यानी नेरल माथेरन रेलवे। कुल सफर मात्र 21 किलोमीटर का है। यानी कालका शिमला, दार्जिलिंग या फिर ऊटी-मेटुपालियम से काफी छोटा सफर है। पर ये सफर है बड़ा मनभावन।


मुंबई
 की भीड़ भाड़ से जब भी जी उचटने लगे चल पड़िए माथेरन। मुंबई से नेरल के लिए लोकल ट्रेनें चलती हैं। नेरल तक बड़ी लाइन है। वहां से लाइट रेलवे का 21 किलोमीटर का ये सफर पहाड़ों पर सर्पिले वलय खाता हुआ चलता है। ये सफर कुल दो घंटे 20 मिनट का होता है। माथेरन की आबोहवा पूरी तरह प्रदूषण मुक्त है। मुंबई के कोलाहल से बिल्कुल अलग। माथेरन महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में पड़ता है। इस इलाके में दुनिया भर में अपने सुंदरता के लिए प्रसिद्ध पश्चिमी घाट के सहयाद्रि रेंज की पहाड़ियां हैं।
नेरल माथेरन के बीच अभी भी चलते हैं गत्ते वाले टिकट 
नेरल माथेरन रेलवे अब सेंट्रल रेलवे के अधीन है लेकिन इसका निर्माण निजी क्षेत्र में हुआ था। इस रेलवे लाइन का सफर 1907 में शुरू हुआ। यानी सौ साल से अधिक हो गए सफर अभी जारी है। 

सन 1850 में हुई माथेरन की खोज- साल 1850 में थाणे जिले के कलेक्टर ह्यूज माले ने माथेरन जैसे हिल स्टेशन की खोज की। माथेरन का माराठी में मतलब है सिर पर जंगल। यानी ऊंचाई पर जंगल। वाकई 2400 फीट से ज्यादा की ऊंचाई ( 803.98 मीटर ) पर जंगलों का होना काफी सुखकर लगता है।



दो घंटे का आनंददायक सफर - 

लाइट
 रेलवे से नेरल से माथेरन का सफऱ दो घंटे का है। सफर छोटा है पर है आनंददायक। इस सफर में कभी ट्रेन के डिब्बे में खाना पीना बेचने वाले आते हैं तो कभी कभी बंदर घुस आते हैं। सफर शुरू होने के साथ ही आप आनंद की अनुभूति में खोने लगते हैं कि सफऱ खत्म भी हो जाता है।


नेरल से माथेरन का ये खूबसूरत रेल मार्ग भारतीय रेलवे की धरोहर है। साथ ही ये यूनेस्को की सूची में विश्व धरोहर बनने का प्रमुख दावेदार है। ये नैरो गेज रेलवे लाइन भी दो फीट चौड़ाई वाला है। इस मार्ग पर एक छोटे सुरंग के अलावा कोई और सुरंग नहीं है।

मुंबई से 87 किलोमीटर आगे पुणे मार्ग पर नेरल इसका पहला स्टेशन है। वैसे नेरल बड़ी लाइन का भी रेलवे स्टेशन है। नेरल और माथेरन के बीच तीन रेलवे स्टेशन हैं। इस मार्ग पर दूसरा स्टेशन जुम्मा पटी पांचवे किलोमीटर पर आता है। इसके बाद आता है वाटर पाइप  स्टेशन 11वें किलोमीटर पर। आखिर में आता है अमन लॉज स्टेशन जो 18वें किलोमीटर पर है। माथेरन 21वें किलोमीटर पर आखिरी रेलवे स्टेशन है।
माथेरन के लिए नेरल  से जब खिलौना रेल चलती है तो हारडाल हिल तक तक ब्राड गेज लाइन के समांतर चलती पर वहां पर अचानक तीखा मोड लेती है और पहाड़ की ओर चढाई शुरू कर देती है। नेरल (NRL)  और माथेरन (MAE) के बीच दोनों तरफ दोनों तरफ से सुबह शाम ट्रेने चलाई जाती हैं। आप अगर इस खिलौना ट्रेन से सफर की योजना बनाएं तो भारतीय रेलवे के टाइम टेबल पर इनका समय देख सकते हैं।  


-    विद्युत प्रकाश मौर्य

( NERAL MATHERAN RAIL-1 )
विरासत - माथेरन में संरक्षित की गया लोकोमोटिव । 

Thursday, February 27, 2014

दक्षिणेश्वर की काली और बेलुर मठ

कोलकाता के काली घाट में मां काली का प्रचीन मंदिर है तो शहर के उत्तरी हिस्से दक्षिणेश्वर में मां काली का भव्य मंदिर है। स्वामी विवेकानंद के गुरू रामकृष्म परमहंस इस मंदिर में मां काली की उपासना किया करते थे। इस मंदिर की काफी मान्यता है, क्योंकि मंदिर से विवेकानंद के गुरु से इस मंदिर का नाता है। दक्षिणेश्वर में हुगली नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित काली के इस मंदिर को सारी दुनिया रामकृष्ण परमहंस की वजह से ज्यादा जानती है। यहां काली का भवतरणी के स्वरूप में विराजती हैं।


काली मां का मंदिर 46 फुट चौड़ा तथा 100 फुट ऊंचा है। इस मंदिर में 12 गुंबद हैं जिनका संयुक्त सौंदर्य दूर से भी विलक्षण प्रतीत होता है। दक्षिण की ओर स्थित यह मंदिर तीन मंजिला है। ऊपर की दो मंजिलों पर नौ गुंबद समान रूप से फैले हुए हैं। गुंबदों की छत पर सुंदर आकृतियां बनाई गई हैं।
मंदिर के गर्भगृह में शिव की छाती पर पांव रखकर खड़ी काली की प्रतिमा चांदी के हजार पंखुडि़यों वाले कमल पर स्थापित है। मुख्य मंदिर के चारों तरफ 12 एक जैसे शिव मंदिर बने हैं। गंगा के किनारे बने शिव मंदिर छह और छह की दो श्रंखला में हैं। मंदिर परिसर में एक विष्णु मंदिर और एक राधाकृष्ण मंदिर भी है। इस मंदिर के पास पवित्र हुगली नदी जो बहती है। इन नदी में खिले कमल के पुष्प से मां काली की पूजा की जाती है।

मंदिर का इतिहास -  मंदिर का निर्माण सन 1847 में प्रारम्भ हुआ था। जान बाजार की महारानी रासमणि ने स्वप्न देखा था, जिसके अनुसार मां काली ने उन्हें निर्देश दिया कि मंदिर का निर्माण किया जाए। सन 1855 में मंदिर का निर्माण पूरा हुआ। यह मंदिर 25 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। कहा जाता है कि रानी रासमणि चूंकि निम्न जाति से आती थीं, इसलिए मंदिर में देवी की स्थापना के समय काफी विवाद हुआ। 

इस मंदिर के पहले पुजारी रामकुमार चट्टोपाध्याय बने। बाद में उनके छोटे भाई गदई या गदाधर भी उनके साथ रहने लगे। ये गदाधर ही बाद में रामकृष्ण परमहंस बने। एक साल बाद रामकुमार की मृत्यु हो जाने पर रामकृष्ण यहां के मुख्य पुजारी बन गए। तब से तीस साल बाद 1886 में अपनी मृत्यु तक रामकृष्ण इसी मंदिर में बने रहे। प्रसिद्ध विचारक रामकृष्ण परमहंस ने मां काली के मंदिर में देवी की आध्यात्मिक दृष्टि प्राप्त की थी। इसी स्थल पर बैठ कर उन्होंने धर्म-एकता के लिए प्रवचन दिए थे।

कैसे पहुंचे  दक्षिणेश्वर की काली मां के दर्शन के लिए आपको कोलकाता के मुख्य बस स्टैंड धर्मतल्ला या हावड़ा से स्थानीय बसें मिल जाएंगी। लोकल ट्रेन से भी आप बेलुर स्टेशन आकर वहां से पुल से हुगली नदी पार कर दक्षिणेश्वर पहुंच सकते हैं। बेलुर मठ से दक्षिणेश्वर के लिए लगातार फेरी सेवा भी चलती है जिससे दक्षिणेश्वर पहुंचा जा सकता है। आप कोलकाता के किसी भी कोने से टैक्सी बुक करके भी यहां तक पहुंच सकते हैं। सियालदह डानकुनी रेल मार्ग पर दक्षिणेश्वर रेलवे स्टेशन भी है। यहां सियालदह रेलवे स्टेशन से भी पहुंचा जा सकता है। यह रेलवे स्टेशन हुगली नदी पर बने विवेकानंद ब्रिज से ठीक पहले आता है। 

दक्षिणेश्वर काली मंदिर परिसर में स्वामी विवेकानंद की मूर्ति ( मार्च 2014 ) 
मंदिर खुलने का समय- मंदिर सुबह 6.30 बजे से दोपहर 12.30 बजे तक खुला रहता है। इसके बाद मंदिर दुबारा दोपहर 3.30 बजे खुलता है। मंदिर शाम को 8.30 बजे तक ही खुला रहता है। वहीं अप्रैल से सितंबर तक मंदिर रात्रि 9 बजे तक खुला रहता है।  

- विद्युत प्रकाश मौर्य
( KALI, KOLKATA, DEVI, VIVEKANAND, RAM KRISHNA PARAMHANS ) 



Wednesday, February 26, 2014

कालीघाट – देवी का प्रचंड रूप देखें

कोलकाता का कालीघाट क्षेत्र अपने काली माता के मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। कालीघाट काली मंदिर देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है। हिन्दू धर्म के पुराणों के अनुसार जहां-जहां सती के अंग के टुकड़े, धारण किए वस्त्र या आभूषण गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ अस्तित्व में आए। ये अत्यंत पावन तीर्थस्थान कहलाए।

सती के पांव की उंगली गिरी थी यहां - कालीघाट में देवी काली के प्रचंड रुप की प्रतिमा स्थापित है। इस प्रतिमा में देवी काली भगवान शिव के छाती पर पैर रखी हुई हैं। उनके गले में नरमुण्डों  की माला है। उनके हाथ में कुल्हाड़ी है। सुंदर मंदिर के अंदर माता काली की लाल-काली रंग की कास्टिक पत्थर की मूर्ति स्थापित है। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव के ताण्डव के समय सती के दाहिने पैर की ऊंगली इसी जगह पर गिरी थी।


एक अनुश्रुति के अनुसार देवी किसी बात पर गुस्‍सा हो गई थीं। इसके बाद उन्‍होंने नरसंहार शुरू कर दिया। उनके मार्ग में जो भी आता‍ वह मारा जाता। उनके क्रोध को शांत करने के लिए भगवान शिव उनके रास्‍ते में लेट गए। देवी ने गुस्‍से में उनकी छाती पर भी पांव रख दिया। इसी दौरान उन्‍होंने शिव को पहचान लिया। इसके बाद ही उनका गुस्‍सा शांत हुआ और उन्‍होंने नरसंहार बंद कर दिया।

ये मंदिर 1809 का बना हुआ बताया जाता है। कालीघाट शक्तिपीठ में स्थित प्रतिमा की प्रतिष्ठा कामदेव ब्रह्मचारी (संन्यास पूर्व नाम जिया गंगोपाध्याय) ने की थी। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक दस महाविद्याओं में प्रमुख और शक्ति-प्रभाव की अधिष्ठात्री देवी काली का प्रभाव लाखों कोलकाता वासियों के मन पर है। 

मां काली का मुख काले पत्थरों से निर्मित है। जिह्वा, हाथ और दांत सोने से मढ़े हुए हैं। जय काली कलकत्तेवाली तेरा वचन न जाए खाली..... कलकत्ता में काली की दया से आदमी भूखा नहीं सोता, जैसे मुहावरे और शक्ति की देवी की इसी सोने की जीभ के कारण ही पैदा हुई हैं। गर्भगृह के ठीक सामने बने नाट्य मंदिर से देवी की प्रतिमा का भव्य दर्शन मिलता है। 1836 में धार्मिक आस्था संपन्न जमींदार काशीनाथ राय ने इसका निर्माण कराया था। मंदिर में ही बने जोर बंगला में देवी पूजन का कर्मकांड होता है। यहां काली के अलावा शीतला, षष्ठी और मंगलाचंडी के भी स्थान है।


सचिन तेंदुलकर ने की थी पूजा - महानगर के दक्षिणी हिस्से में गंगा के तट पर बसे कालीघाट में न सिर्फ कोलकाता वासी बल्कि दूर दूर से श्रद्धालु यहां पूजा अर्चना करने आते हैं। 99 शतक लगाने के बाद क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर ने भी यहां आकर मां की पूजा की थी।

अघोर साधना और तांत्रिक साधना के लिए प्रसिद्ध- कालीघाट का मंदिर अघोर साधना और तांत्रिक साधना के लिए भी प्रसिद्ध है। कालीघाट परिसर में मां शीतला का मंदिर भी है। मां शीतला को भोग में समिष भोज चढ़ाया जाता है। यानी मांस, मछली अंडा सब कुछ।  मंदिर में मंगलवार और शनिवार को श्रद्धालुओं की भीड़ ज्यादा होती है। 

खुलने का समय -  कालीघाट मां का मंदिर सुबह 5 बजे खुल जाता है।  दोपहर 12 से 3.30 बजे तक बंद रहता है। शाम को 5 बजे से रात्रि 10 बजे तक फिर मंदिर खुला रहता है। अगर आप मंदिर दर्शन करने आए हैं तो यहां पंडों से सावधान रहें। विजयादशमी और बंगला नव वर्ष के दिन यहां अपार भीड़ उमड़ती है।
काली घाट स्थित मिशनरीज ऑफ चैरिटी का कार्यालय। 

कैसे पहुंचे - धर्मतल्ला से बस मेट्रो और ट्राम से कालीघाट पहुंचा जा कता है। कालीघाट में कोलकाता मेट्रो का स्टेशन भी है। कालीघाट ट्राम से भी पहुंचा जा सकता है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का पुश्तैनी घर काली घाट इलाके में ही है।
मुख्य सड़क जहां आप ट्राम से उतरते हैं, कालीघाट मंदिर का विशाल प्रवेश द्वार बना हुआ है। इस सड़क पर आधा किलोमीटर चलने के बाद मां काली का मंदिर आ जाता है।

मिशनरीज ऑफ चेरिटी का मुख्यालय बगल में -  काली घाट की ही सड़क पर मदर टेरेसा की संस्था मिशनरीज आफ चेरिटी यानी निर्मल हृदय का मुख्यालय भी है। एक ओर प्रचंड रुप में कालीघाट में देवी मां यहां विराज रही हैं पर कालीघाट के मंदिर के मार्ग पर कोलकाता का सबसे पुराना रेडलाइट एरिया भी है। यहां भरी दोपहरी में भी महिलाएं अपने ग्राहकों का इंतजार करती नजर आती हैं। शक्ति की अधिष्ठात्री देवी के मंदिर के पास नारी शक्ति की ये कैसी विवशता है मां... 
 -    विद्युत प्रकाश मौर्य 
( KOLKATA, KALIGHAT, DEVI ) 

Tuesday, February 25, 2014

मन की इच्छा पूरी करती हैं मां मनसा देवी

मां मनसा देवी नौ देवियों में से एक हैं। यह 51 शक्तिपीठों में से भी एक है। कहा जाता है कि यहां मां का मस्तक गिरा था। मां का मंदिर चंडीगढ़ शहर के पास पंचकूला में है। मंदिर के आसपास का वातावरण बड़ा मनोरम है। इस मंदिर की व्यवस्था एक सरकारी ट्रस्ट देखता है। यह ट्रस्ट हरियाणा सरकार के अधीन है।


कैसे पहुंचे - आप चंडीगढ़ शहर से पंचकूला की ओर जाने वाली बसों से मनसा देवी पहुंच सकते हैं। मनसा देवी का मंदिर मनी माजरा की पहाड़ियों पर स्थित है। ये चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन से भी काफी करीब है। चंडीगढ शहर और पंचकूला के किसी भी हिस्से से मनसा देवी आसानी से पहुंचा जा सकता है। चैत्र नवरात्र के समय यहां विशाल मेला लगता है।
मनसा देवी मंदिर का निर्माण 1811-1815 के बीच मनीमाजरा के राजा गोपाल सिंह ने कराया था। मंदिर परिसर में मुख्य मंदिर से 200 मीटर की दूरी पर पटियाला के महाराजा करम सिंह ने 1840 में एक और मंदिर बनवाया जिसे पटियाला मंदिर कहा जाता है। कहा जाता है कि एक बार महाराजा को देवी सपने में आईं। उनके आदेश पर ही महाराज ने यहां भव्य मंदिर बनवाया। मंदिर में मनसा देवी की प्रतिमा तीन सिर और पांच भुजाओं वाली है। मंदिर परिसर में चामुंडा और लक्ष्मीनारायण का मंदिर है। मंदिर के परिक्रमा में भी विभिन्न देवी देवताओं की मूर्तियां बनाई गई हैं।

मनसा देवी मंदिर में संस्थाओं की ओर से सालों भर भंडारा चलाया जाता है। मंदिर में श्रद्धालुओं के रहने के लिए निशुल्क आवास की सुविधा भी उपलब्ध है। इसके अलावा 200 रुपये प्रतिदिन पर सुविधायुक्त आवास भी उपलब्ध है। मंदिर प्रबंधन की ओर से श्रद्धालुओं के लिए चिकित्सालय तथा कई और सेवाएं भी संचालित की जाती हैं।


हरिद्वार में भी मनसा देवी मंदिर - मनसा देवी नाम का एक मंदिर हरिद्वार में भी है। हालांकि ये शक्तिपीठ में नहीं गिना जाता पर इस मंदिर की लोकप्रियता काफी है। हर की पैड़ी के पास से मनसा देवी के मंदिर के लिए रोपवे संचालित होता है। वैसे आप 20 मिनट की पैदल चढ़ाई करके भी हरिद्वार के मनसा देवी मंदिर में जा सकते हैं। 
-    विद्युत प्रकाश मौर्य
MANSA DEVI,  TEMPLE, HARYANA, SHAKTIPEETH)