Saturday, November 30, 2013

तंत्र साधना के लिए विख्यात कामरूप कामाख्या

मां कामाख्या मंदिर का प्रवेश द्वार 
बचपन में कोर्स की किताबों में कंवरू कामख्या के बारे में पढ़ा था। खासकर भोजपुरी इलाके में कामाख्या मंदिर में की जाने वाले तंत्र मंत्र साधना के बारे में खूब कहानियां सुनी थी। इस मंदिर को लेकर भोजपुरी समाज में कई तरह के मिथक और गल्प प्रचलित हैं। कहा जाता है कि यहां खास तौर पर नवरात्र में लोग तंत्र सिद्धी के लिए जाते हैं। यहां से सिद्ध होकर लोग तरह तरह के चमत्कार करते हैं। जितने मुंह उतनी बातें। पर हिंदी पट्टी के गांव-गांव में कंवरू कामाख्या का बड़ा नाम है। इसलिए गुवाहाटी पहुंचने के साथ ही मां कामाख्या के दरबार में हाजिरी लगानी जरूरी थी। 

तांत्रिकों की सबसे महत्वपूर्ण देवी - काली और त्रिपुर सुंदरी देवी के बाद कामाख्या माता तांत्रिकों की सबसे महत्वपूर्ण देवी है। मंदिर के गर्भगृह में कोई प्रतिमा स्थापित नहीं की गई है। इसकी जगह एक समतल चट्टान के बीच बना विभाजन देवी की योनि का दर्शाता है। एक प्रकृतिक झरने के कारण यह जगह हमेशा गीला रहता है। इस झरने के जल को काफी प्रभावकारी और शक्तिशाली माना जाता है। तांत्रिकों की देवी कामाख्या देवी की पूजा भगवान शिव के नववधू के रूप में की जाती है। देवी मुक्ति को स्वीकार करती हैं और सभी इच्छाएं पूर्ण करती है। यह पीठ माता के सभी शक्तिपीठों के बीच पीठों में से माहापीठ माना जाता है।

गुवाहाटी से ठीक पहले ब्रह्मपुत्र नद पर रेल पुल आता है। इसे सरायघाट का पुल कहते हैं। इस रेल पुल के साथ ही सड़क पुल भी है। नीचे नीचे रेल तो ऊपर से सड़क। ये पुल नेशनल हाईवे नंबर 31 पर है। न्यू जलपाईगुड़ी की ओर आ रही ये सड़क गुवाहाटी को शेष भारत से जोड़ती है। ब्रह्मपुत्र नदी पर पुल से पहले चांगसारी नामक रेलवे स्टेशन आता है। कई बार रेलगाड़ियां देर तक इस स्टेशन पर रूक जाती हैं क्योंकि पुल पर सिंगल रेल लाइन है, आगे जाने का सिग्नल नहीं मिलता। 
अब ब्रह्मपुत्र पर एक नए रेल पुल का निर्माण जारी है। अब गुवाहाटी शहर के काफी उद्योग धंधे पुल के इस पार चांगसारी की तरफ शिफ्ट हो रहे हैं। आईआईटी गुवाहाटी भी पुल से पहले ही स्थित है। यानी पूर्वोत्तर के सबसे बडे शहर के आने से पहले उसकी आहट शुरू हो जाती है।

लोहित यानी ब्रह्मपुत्र नद ( नदी नहीं, क्योंकि ब्रह्मपुत्र तो पुलिंग है ना ) पर बने इस रेल पुल को पार करने के बाद आता है कामाख्या रेलवे स्टेशन। ये कामरूप जिले में पड़ता है। मां कामाख्या के नाम पर बने इस रेलवे स्टेशन से अब कई ट्रेनें बनकर चलती हैं। कामाख्या को गुवाहाटी के बाद एक रेल टर्मिनल के तौर पर विकसित किया जा रहा है। पूर्वोत्तर में कहीं जाने से पहले मैं मां कामाख्या के आशीर्वाद लेना चाहता था इसलिए मैं ब्रह्मपुत्र मेल से कामाख्या में ही उतर गया। कामाख्या रेलवे स्टेशन का नूतन भवन भी मंदिर की शक्ल में बनाया गया है।
असम में महिलाएं करती थीं काला जादू 
कामाख्या देवी मंदिर परिसर में नवरात्रा में तंत्र साधना में जुटे लोग। 
असम को ही पुराने समय में कामरूप प्रदेश के रूप में जाना जाता था। कामरुप प्रदेश को तन्त्र साधना के गढ़ के रुप में दुनियाभर में बहुत नाम रहा है। पुराने समय में इस प्रदेश में मातृ सत्तात्मक समाज व्यवस्था प्रचलित थीयानि कि यंहा बसने वाले परिवारों में महिला ही घर की मुखिया होती थी। कामरुप की स्त्रियाँ तन्त्र साधना में बड़ी ही प्रवीण होती थीं। 
भेड़ बकरा बना कर रख लेती थीं महिलाएं

कामरुप में श्मशान साधना व्यापक रुप से प्रचलित रहा है। इस प्रदेश के विषय में तमाम आश्चर्यजनक कथाएं कही सुनी जाती हैं। पुरानी किताबों में यहां के काले जादू के विषय में बड़ी अद्भुत बातें पढने को मिलती हैं। कहा जाता है कि बाहर से आए लोगों को यहां की महिलाओं द्वारा भेड़बकरी बनाकर रख लिया करती थीं। इसलिए लोग असम जाने से डरते थे। खास तौर पर महिलाएं नहीं चाहती थीं कि उनका पति असम की ओर जाए। असम यानी कामरूप प्रदेश की तरह बंगाल को भी तांत्रिक साधनाओं और चमत्कारों का गढ़ माना जाता रहा है।

कैसे पहुंचे - मां कामाख्या के मंदिर के लिए आप गुवाहाटी रेलवे स्टेशन या फिर कामाख्या रेलवे स्टेशन कहीं से भी उतर कर जा सकते है। यह मंदिर दोनों स्टेशनों के बीच में स्थित है। गुवाहाटी रेलवे स्टेशन के पलटन बाजार से आप बस या आटो से जुलाकबाड़ी की तरफ जाते हैं कामाख्या मंदिर के प्रवेश द्वार के पास उतरें। यहां से मंदिर 3 किलोमीटर दूर पहाडी पर  स्थित है। प्रवेश द्वार से मंदिर तकजाने के लिए बसें और शेयरिंग टैक्सियां चलती हैं। बस में 10 रुपये तो टैक्सी वाले चढ़ाई के समय 20 रुपये किराया लेते हैं। वहीं उतरते समय 10 रुपये में भी लेकर आते हैं। आप पदयात्रा करके भी मां के मंदिर तक पहुंच सकते हैं। अगर आप अपने वाहन से पहुंचे हैं तो मंदिर के प्रवेश द्वार से पहले विशाल पार्किंग का भी इंतजाम है। 

--- विद्युत प्रकाश मौर्य

( MAA KAMAKHYA TEMPLE, SHAKTIPEETH, GUWAHATI, ASSAM ) 

Friday, November 29, 2013

सिलिगु़डी से गुवाहाटी - रेलगाड़ी में चलता है बाजार

वैसे तो भारतीय रेल में आप कहीं सफर करें रेलगाड़ी के डिब्बे के अंदर सामान बेचने वाले जरूर आ धमकते हैं, लेकिन न्यू जलपाईगुड़ी से गुवाहाटी के बीच की बात ही निराली है। यहां वो सब कुछ आप रेलगाडी के अंदर की खरीद सकते हैं जो आप बाजार में जाकर खरीदेंगे।

न्यू जलपाईगुड़ी में दार्जिलिंग की चाय बेचने वाले पहुंच जाते हैं। वो चायपत्ती जिसके लिए आपको 90 किलोमीटर आगे दार्जिलिंग के बाजार में या सिलिगुड़ी मार्केट जाने की कोई जरूरत नहीं है। ट्रेन आगे बढ़ती है इसके साथ ही बच्चों के खिलौने, महिलाओं के लिए साड़ियां, सलवार सूट के कपड़े, आर्टिफिशियल से लेकर चांदी की ज्वेलरी, शाल, रजाई, कंबल यानी सब कुछ आप रेलगाड़ी के डिब्बे में ही खरीद सकते हैं।

इतना ही नहीं शूटिंग, शर्टिंग और पैंट कोट के कपड़े बेचने वाले भी डिब्बे में आ धमकते हैं। मोबाइल फोन, पेन ड्राइव, मेमोरी कार्ड, बैटरी क्या कुछ चाहिए जनाब। सब कुछ हाजिर है। यहां तक की मल्टी मीडिया फोन और स्मार्ट फोन बेचने वाले भी डिब्बे में पहुंच जाते हैं।

सामानों के रेट की बार्गेनिंग भी खूब होती है। आप को समान की परख तो खरीदिए नहीं तो किनारे हो लिजिए। आप घर जा रहे हैं और घर वालों के लिए कुछ लेना भूल गए हैं तो ट्रेन में ही खरीद लिजिए। एसी कोच में भी जनरल डिब्बों में भी। कूचबिहार और अलीपुर दुआर के साथ असम में प्रवेश तक ये बाजार चलता रहता है। हमने भी अपने सफर के दौरान लकड़ी के खिलौने रेलगाड़ी में ही खरीदा। पर रेलगाड़ी में बिकने वाले इलेक्ट्रानिक सामानों की कोई गारंटी नहीं रहती।


कामतापुर राज्य की मांग - कूच बिहार से गुजरते हुए याद आया। ये वही इलाका है जहां अलग कामतापुर राज्य की मांग हो रही है। दार्जिलिंग वाले गोरखालैंड मांग रहे हैं तो पश्चिम बंगाल के दुआर्स क्षेत्र और असम के कोकराझार आदि इलाकों को मिलाकर अलग कामतापुर राज्य की भी मांग की जा रही है। इसके लिए ऐतिहासिक कामतापुर राज्य के सीमाओं की दुहाई दी जा रही है।
कई बार कामतपुर राज्य की मांग का आंदोलन उग्र हो उठता है। अगर कोलकाता से दूरी की बात करें तो दुआर्स और दार्जिलिंग के इलाके काफी दूर हैं। यहां के लोगों की जन आकंक्षा बार बार अलग राज्य की मांग को लेकर हिलोरें मारने लगती है।  

-    विद्युत प्रकाश मौर्य
( TRAIN, COACH, MOBILE MARKET, TOWARDS GUWAHATI ) 

Thursday, November 28, 2013

चाय और अनानास के देश में

पूर्वोत्तर यानी सात बहनों वाला राज्य। उसका एक भाई भी है सिक्किम। सात बहनें यानी अरुणाचल प्रदेश, असम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरमनागालैंड और त्रिपुरा। इनमें असम सबसे बड़ी बहन है। हम सबके अंदर थोड़ा पूर्वोत्तर जरूर है। भारत का पूर्वोत्तर हिस्सा जिसे हम नार्थ ईस्ट कहते हैं। हरा भरा प्रदेश हमारी प्याली की चाय प्रदान करता है तो हमारे वाहनों के लिए पेट्रोल डीजल पूर्वोत्तर से आता है। सागवान और बांस के फर्नीचर का भी बड़ा स्रोत पूर्वोत्तर है। पू्र्वोत्तर अनानास (पाइनएपल) का भी बड़ा उत्पादक है।

देश के कई राज्यों घूमने का मौका मिला है पर पूर्वोत्तर जाने की लालसा पुरानी थी। राष्ट्रीय युवा योजना के शिविरों में पूर्वोत्तर के हर राज्य के लोगों से मुलाकात होती थी, तो जाने का एक मौका और बहाना मिल ही गया। साल 2013 महीना नवंबर। सफर की शुरूआत बिहार के पटना जंक्शन से हुई। कुछ दिन पहले ही मैं दिल्ली से पटना पहुंचा था। दिल्ली से पूर्वोत्तर को जोड़ने वाली रेलगाड़ियां हैं नार्थ ईस्ट, अवध आसाम एक्सप्रेस, लोहित एक्सप्रेस, ब्रह्मपुत्र मेल आदि। अब असम के आखिरी छोर न्यू तिनसुकिया तक ब्राडगेज लाइन है। मैं ब्रह्मपुत्र मेल के एसी-2 कोच में हूं। ट्रेन पटना जंक्शन पर दो घंटे देर से पहुंची है।
न्यू जलपाईगुड़ी रेलवे स्टेशन ...
मेरे सामने वाली बर्थ पर पटना से चढ़े सहयात्री असम राइफल्स में अधिकारी हैं। वे भी पटना से ही बैठे हैं। वे 1984 से पूर्वोत्तर के अलग राज्यों में तबादलों के साथ घूम रहे हैं। आजकल उनकी पोस्टिंग डिमापुर में है। वे बताते हैं पहले बरौनी से छोटी लाइन ( मीटर गेज) से गुवाहाटी जाया करता था। तब काफी समय लग जाता था। अब पटना से बरौनी, फिर बेगुसराय, मानसी, खगड़िया, कटिहार, किशनगंज, बारसोई जैसे स्टेशनों से गुजरते हुए पाया कि ब्राडगेज लाइन का दोहरीकरण और विद्युतीकरण काम तेजी से जारी है।

पटना से न्यू जलपाईगुड़ी (एनजेपी) तक जाने के दो मार्ग हैं एक जमालपुर, भागलपुर, साहेबगंज मालदा टाउन होते हुए तो दूसरा बरौनी, कटिहार होते हुए है। हमारी ब्रह्मपुत्र मेल का मार्ग भागलपुर, मालदा टाउन होकर है। ट्रेन का आखिरी पड़ाव ढिब्रूगढ़ है।
हमारी सुबह न्यू जलपाईगुडी स्टेशन पर होती है। यहां प्लेटफार्म नंबर एक पर बहुत अच्छी कैंटीन है, जहां नास्ते में सुस्वादु इडली और डोसा मिल रहा है। यहां रोटी सब्जी अभी सस्ती मिल रही है। साल 2013 में 20 रुपये में आठ रोटियां सब्जी के साथ।

न्यू जलपाईगुडी (एनजेपी) बंगाल में पड़ने वाला रेलवे का बड़ा स्टेशन है। यहां से दार्जिलिंग और सिक्किम की राजधानी गंगटोक और भूटान के शहर फुटशिलांग जाने के लिए सड़क मार्ग जाता है। एनजेपी से गुवाहाटी के रेलमार्ग का भी दोहरीकरण जारी है। इस मार्ग पर बंगाल के अलीपुर दुआर और कूच बिहार जैसे रेलवे स्टेशन आते हैं। न्यू जलपाईगुड़ी मैं 2010 में दार्जिलिंग यात्रा के क्रम में आ चुका हूं। यहां से गुवाहाटी की ओर मेरी पहली यात्रा है।

ट्रेन आगे चलती हुई श्रीरामपुर नामक स्टेशन के बाद असम में प्रवेश कर जाती है। गुवाहाटी से पहले बोंगाइगांव, कोकराझार, रंगिया जैसे प्रमुख शहर आते हैं। रंगिया जंक्शन है जहां से हारामुती के लिए रेलमार्ग जाता है। ये मार्ग अरूणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर ( नाहरालागुन ) को रेलवे नेटवर्क से जोड़ता है।

रेलगाड़ी में अनानास बेचने वाले भी आ रहे हैं। यह मेरा प्रिय फल है। दिल्ली में भी जहां मिले खाता हूं तो भला यहां क्यों नहीं... असम में प्रवेश के साथ ही रेलगाड़ी की खिड़की से तांबुल के पेड़ और चाय के बगान दिखाई देने लगते हैं। तांबुल ( सुपारी या कसैली) पूर्वोत्तर में ज्यादातर लोग खाते हैं। हमारे साथ वाले फौजी भाई बताते हैं कि घर आने वाले मेहमानों को लोग तांबुल पेश करके स्वागत करते हैं।
-    विद्युत प्रकाश मौर्य

( RAIL, BRAHMPUTRA MAIL, ASSAM, NORTH EAST, PINEAPPLE, TEA, GUWAHATI ) 

Wednesday, November 27, 2013

पहले गुरु की स्मृतियां हैं यहां - राजगीर में गुरुद्वारा शीतल कुंड

राजगीर अपने ऐतिहासिक कारणों से प्रसिद्ध है। पर बहुत कम लोगों को ही जानकारी होगी कि राजगीर में सिखों के पहले गुरु गुरुनानक जी ने प्रवास किया था। यहां उनकी स्मृति में एक गुरुद्वारा भी है। पहले गुरु ने इस ऐतिहासिक स्थल पर 1506 ई. विक्रम संवत में प्रवास कर इस जगह को धार्मिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण बना दिया। गुरुनानक ने अपने प्रवास के दौरान गर्म कुंड को अपने यश से शीतल किया जिसे आज हमलोग गुरुनानक शीतल कुंड के नाम से जानते हैं।  गुरुद्वारे में एक कुंड है जिसके बारे में कहा जाता है कि गुरुनानक देव जी ने धरती पर तीर मारकर यहां से पानी की धार निकाली थी। बड़ी संख्या में सिख श्रद्धालु भी राजगीर पहुंचते हैं और शीतल कुंड गुरुद्वारा में मत्था टेकते हैं। राजगीर में गर्म जलकुंड के पास ही स्थित है गुरुद्वारा शीतल कुंड।

 कहा जाता है कि रजौली से भागलपुर जाने के क्रम में गुरु जी राजगीर में रुके थे। ऐसा माना जाता है कि बौद्ध और जैन संतों के साथ चर्चा के लिए गुरुनानक देव जी यहां रुके थे। पिछले 40 सालों में भाई अजायब सिंह के प्रयासो से इस गुरुद्वारे का सौंदर्यीकरण किया गया है। यहां श्रद्धालुओं के लिए 10 आवासीय कमरे भी बनवाए गए हैं।

सिख धर्म के संस्थापक एवं प्रवर्तक गुरु नानक जी ने अपनी उदासियों ( यात्राओं)  के क्रम में बिहार के कई शहरों में प्रवास किया था। कहा जाता है कि प्रथम गुरु नानक देव जी ने 20 साल में 40 हजार मील से ज्यादा यात्राएं की थी।   1506 में वे पहली उदासी के क्रम में बिहार में पहुंचे। सिख इतिहास के लेखक डाक्टर  त्रिलोचन सिंह के मुताबिक प्रथम गुरु वाराणसी से गया पहुंचे। अलग अलग सिख इतिहासकारों के मुताबिक वे बिहार में गया, रजौली ( नवादा) राजगीर, पटना, मुंगेर, भागलपुर, कहलगांव आदि स्थानों पर रुके थे।

बिहार में सिख इतिहास से जुडे गुरुद्वारे
-          तख्त श्री हरिमंदिर साहिब, गायघाट गुरुद्वारा, पटना। गुरु का बाग, मालसलामी ( कभी नवाब करीमबक्श रहीम बक्श का बाग हुआ करता था)  कंगन घाट गुरुद्वारा। बाल लीला गुरुद्वारा, पटना।
-          हांडी साहिब, दानापुर ( पंजाब जाने के क्रम में पहली बार गुरु गोबिंद सिंह जी यहां रुके थे)
-          नानकशाही गुरुद्वारा, लालगंज (वैशाली)
-          फतुहा गुरुद्वारा ( गुरुनानक देव जी और कबीर की यहां हुई थी मुलाकात)

-          सासाराम – गुरुद्वारा चाचा फग्गू मल,  गुरुद्वारा गुरु का बाग और  गुरुद्वारा टकसाली संगत।
-           नानकशाही संगत अकबरपुर, रजौली संगत, नवादा
-          राज्य के भागलपुर, कटिहार, गया और मुंगेर में भी हैं ऐतिहासिक गुरुद्वारे।

- vidyutp@gmail.com
(BIHAR, RAJGIR, NALANDA, SIKH TEMPLE )

Tuesday, November 26, 2013

स्वर्ण भंडार का रहस्य - जो पढ़ ले वो ले जाए सोना

राजगीर में बिंबिसार की जेल और जरासंध के अखाड़ा, मनियार मठ जैसे स्थलों के पास ही स्वर्ण भंडार की गुफाएं हैं। मनियार मठ से आगे बढ़ने पर पहाड़ की ओर दो गुफाएं हैं। इस स्वर्ण भंडार को लेकर कई तरह के गल्प प्रचलित हैं। ऐसा माना जाता है कि यहां अभी भी बड़ी मात्रा में सोना छिपा हुआ है। कहा जाता है कि गुफा के द्वार पर लिखे शिलालेखों के संकेतों को जो समझ जाएगा वह सोने के खजाने के दरवाजे को खोल सकेगा।   

इन गुफाओं का पता वैभर पहाड़ की खुदाई के बाद पता चला। मैं बचपन से स्वर्ण भंडार की कहानियां सुनता रहा हूं। जितने मुंह उतनी बातें। मेरे पिताजी के दोस्त अरविंद कुमार सिंह जो नालंदा के पास जुआफर नामक गांव के रहने वाले थे बचपन में राजगीर के बारे में फंतासी वाली कथाएं सुनाते थे। वे कहते थे मगध के राजा बिंबिसार का स्वर्ण भंडार था यहां। लेकिन उसके ताले की चाबी झील में फेंक दी गई है।

सोन भंडार के पश्चिमी गुफा के दक्षिणी दीवार पर एक दरवाजा और एक खिड़की है। दरवाजे का निचला भाग उपरी भाग से 15 सेंटीमीटर से अधिक चौड़ा है। गुफा की दीवारें पौने दो मीटर तक सीधी हैं। उसके बाद अंदर की तरफ जाती हैं। यहां तहखाने जैसी संरचना नजर आती है। यहां दरवाजे किनारे और सामने की दीवार पर कुछ शिलालेख उत्कीर्ण हैं। इनमें से ज्यादातर की भाषा अस्पष्ट है। इसे पढ़ा नहीं जा सका है।

इस गुफा की खोज सबसे पहले इतिहासकार जेएस कनिंघम ने की थी। गुफा के अंदर दाहिनी दीवार पर छह छोटी छोटी जैन तीर्थंकरों की मूर्तियां हैं। इससे प्रतीत होता है कि इन गुफाओं का निर्माण जैन संन्यासियों ने करवाया होगा। यहां एक विष्णु की प्रतिमा भी मिली थी जो गुप्त कालीन लगती है जिसे नालंदा म्यूजिम में रखा गया है।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य

( RAJGIR, GOLD, BIHAR )