Saturday, August 31, 2013

गालिब की मजार और अमीर खुसरो

गालिब की मजार पर। 
हजरत निजामुद्दीन स्टेशन से मुख्य सड़क पर आने के बाद सड़क पार कर इस पार आएंगे तो सामने गली में महान सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह है। लेकिन ठीक उसके पहले उर्दू के महान शायर और दार्शनिक मिर्जा गालिब और उनके परिवार की मजार है। गालिब की मजार के पास उनका प्रसिद्ध शेर लिखा गया है। हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी में---
था कुछ तो खुदा था होता कुछ तो खुदा होता
डुबोया मुझको होने ने, होता तो मैं क्या होता।

आगरा से आने के बाद जीवन भर गालिब रहे बल्लीमरान की गलियों में। पर चिर निद्रा में सोना पसंद किया हजरत निजामुद्दीन के करीब। हमेशा ताजा गुलाबों की पंखुड़ियों से गुलजार इस गली में आगे बढ़ने पर आता है सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया का दरगाह। यहां हमेशा उनकी शान में कव्वालियों का दौर जारी रहता है। पर इस महान सूफी संत के साथ ही उनके प्रिय शिष्य और हिंदी उर्दू के महान कवि शायर, संगीत साधक अमीर खुसरो की मजार। अमीर खुसरो यहां हमेशा अपने गुरू से मिलने आते थे। आखिरी बार आए तो गुरू से मुलाकात नहीं हुई। गुरू दूसरी दुनिया के लिए कूचकर चुके थे। खुसरो ने ये शेर पढ़ा-

गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केश
चल खुसरो घर आपने सांझ भई चहूं देश....


अमीर खुसरो ने बड़ी संख्या मुकरियां लिखीं। वे जन भाषा के कवि थे।

रात समय वह मेरे आवे। भोर भये वह घर उठि जावे॥

यह अचरज है सबसे न्यारा। ऐ सखि साजन? ना सखि तारा॥



नंगे पांव फिरन नहिं देत। पांव से मिट्टी लगन नहिं देत॥
पांव का चूमा लेत निपूता। ऐ सखि साजन? ना सखि जूता॥

वह आवे तब शादी होय। उस बिन दूजा और न कोय॥
मीठे लागें वाके बोल। ऐ सखि साजन? ना सखि ढोल॥

जब मांगू तब जल भरि लावे। मेरे मन की तपन बुझावे॥
मन का भारी तन का छोटा। ऐ सखि साजन? ना सखि लोटा॥

बेर-बेर सोवतहिं जगावे। ना जागूं तो काटे खावे॥
व्याकुल हुई मैं हक्की बक्की। ऐ सखि साजन? ना सखि मक्खी॥

अति सुरंग है रंग रंगीलो। है गुणवंत बहुत चटकीलो॥
राम भजन बिन कभी न सोता। क्यों सखि साजन? ना सखि तोता॥

अर्ध निशा वह आया भौन। सुंदरता बरने कवि कौन॥
निरखत ही मन भयो अनंद। क्यों सखि साजन? ना सखि चंद॥

शोभा सदा बढ़ावन हारा। आंखिन से छिन होत न न्यारा॥
आठ पहर मेरो मनरंजन। क्यों सखि साजन? ना सखि अंजन॥

जीवन सब जग जासों कहै। वा बिनु नेक न धीरज रहे॥
हरे छिनक में हिय की पीर। क्यों सखि साजन? ना सखि नीर॥

बिन आये सबहीं सुख भूले। आये ते अंग-अंग सब फूले॥
सीरी भई लगावत छाती। क्यों सखि साजन? ना सखि पाती॥

-    विद्युत प्रकाश मौर्य - Email - vidyutp@gmail.com

( MIRJA GALIB, AMIR KHUSRO, NIJAMUDDIN, DELHI )


Friday, August 30, 2013

देश के तीन महान शायर सो रहे हैं आसपास

दिल्ली के निजामुद्दीन में स्थित अब्दुल रहीम खान खाना का मकबरा।
तीन महान कवि और शायरों ने जो अपने देश की शान हैं, ने अपने लिए आखिरी जगह आसपास ही चुनी। महान शायर कवि अब्दुल रहीम खान खाना, मिर्जा गालिब और अमीर खुसरो की मजारें महज आधे किलोमीटर के क्षेत्र में स्थित है।


दिल्ली के निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन पास स्थित है रहीम की मजार। मजार का वास्तु शानदार है। पर देखने वाले कम ही पहुंचते हैं। रहीम सांप्रदायिक सौहार्द के कवि और अपने दोहों के लिए जाने जाते हैं। वे अकबर के नौ रत्नों में से थे। उनका जन्म 17 दिसंबर 1556 को हुआ। वे अकबर के संरक्षक बैरम खां के बेटे थे। बैरम खां के गुजरात के पाटन में हत्या के बाद अकबर ने बैरम खां की पत्नी से विवाह कर लिया। इस तरह रहीम के अकबर सौतेले पिता भी हो गए। रहीम कवि के साथ संस्कृत और ज्योतिष के बड़े विद्वान थे। जन्म से मुस्लिम होने के बावजूद उनका हिंदू संस्कृति पर अध्ययन गहन था। पर कवि होने के साथ वे बड़े योद्धा भी थे। उनके नाम पर पंजाब के नवांशहर जिले में खान खाना नामक गांव है।
इस मकबरे का निर्माण रहीम ने अपनी पत्नी के निधन पर 1598 में करवाया था। पर 1627 में रहीम की मृत्यु पर उनकी मजार भी उनकी पत्नी के बगल में बना दी गई। 



रहीम खान खाना का मकबरा। 
उनका एक दोहा-रहिमन वे नर मर चुके जे कहूं मांगन जाहीं।
उनते पहले वे मुए जिन मुख निकसत नाही।।
रहीम का मकबरा हुमायूं के मकबरे के थोड़ी दूरी पर ही स्थित है। हुमायूं के मकबरे के परिसर में शेरशाह के अमीर रहे इसा खान का अष्टकोणीय शैली में बना मकबरा है। ठीक उसी शैली में जैसा सासाराम में शेरशाह का मकबरा है।

हुमायूं
 के मकबरे के आसपास कई ऐतिहासिक इमारते हैं। नीला गुंबद, गुरुद्वारा दमदमा साहिब आदि। पर जब आप हुमायूं के मकबरे जाएं तो इस महान कवि रहीम खान खाना के मकबरे को भी जरूर देखें। हालांकि रहीम की मजार खंडित अवस्था में है। बाद में इसकी ही ईंटे निकाल कर सफदरजंग के मजार में लगा दी गईं।   रहीम के मकबरे के ऊपर से अबबारापुला फ्लाइवे गुजरता है।

पेश है रहीम के कुछ और दोहे

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय
टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े गांठ पड़ जाए।।

ऐसी देनी देंन ज्यूं कित सीखे हो सैन।
ज्यों ज्यों कर ऊंच्यो करो, त्यों त्यों नीचे नैन।।

देनहार कोई और है, भेजत जो दिन रैन।
लोग भरम हम पर करे, तासो नीचे नैन।।

बड़े बड़ाई न करें, बड़े न बोले बोल
रहिमन हीरा कब कहे, लख टका मेरो मोल।।

रहिमन देखि बडेन को, लघु न दीजे डारी।
जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारी।।


खीरा मुख ते काटिए, मलियत लों लगाए।
रहिमन कडवे मुख कों, चहियत इही सजाए।।

जे रहीम उत्तम प्रकृति, का करी सकत कुसुंग।
चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटात रहत भुजंग।।


-    विद्युत प्रकाश मौर्य
(RAHIM KHAN KHANA, GALIB, AMIR KHUSRO, NIJAMUDDIN, DELHI )