Tuesday, March 26, 2013

आखिर क्यों खाते हो इतनी मिर्ची


आखिर हम मिर्ची क्यों खाते हैं। भोजन में मिर्ची खाना कितना जरूरी है। जर्मनी के माइकेल को भारत से बहुत लगाव है। वे 23 साल से भारत रहे हैं। पर दिल्ली में मिर्ची वाले खाने से बहुत परेशान हैं। कहते हैं मिर्ची खाने के स्वाद को बिगाड़ देती है। तेज मिर्ची वाला खाना खाकर पेट खराब हो जाता है। वे कहते हैं हिंदुस्तान में मिर्ची को पुर्तगाली लेकर आए थे 15वीं सदी में। उससे पहले तो देश में सिर्फ काली मिर्च की खेती होती थी। 
 माइकल पूर्वोत्तर को छोड़कर देश का कोना कोना घूम चुके हैं। उन्हें दक्षिण भारत का खाना खूब पसंद आता है। खास तौर पर कर्नाटक का समुद्र तटीय इलाका खूब पसंद आया। वहां वे महीनों कमरे किराए पर लेकर रहे। हिमाचल प्रदेश के ठंडा वातावरण भी खूब पसंद आया। माइकेल ने सस्ते ढाबों और अच्छे होटलों में भी खूब स्वाद लिया है। लेकिन वे दिल्ली के होटल रेस्टोरेंट और ढाबों के खाने से बहुत परेशान है। खाने में इतने मसाले होते हैं कि आप रोज नहीं खा सकते। लिहाजा वे दिल्ली में होते हैं तो अक्सर खुद बनाने का उपक्रम करते हैं। वे कहते हैं दिल्ली में बीच के लोगों के लिए खाने के विकल्प कम हैं।अमीरों के लिए रेस्टोरेंट हैं। 
गरीबों के लिए फुटपाथ है पर बीच के लोगों के लिए अच्छे विकल्प मौजूद नहीं हैं। उनका कहना है कि थोड़े पैसे में अच्छा खा लेना अब महंगा हो गया है। 
माइकेल बहुत अच्छी हिंदी बोलते हैं। पूछा कैसे सीखी इतनी अच्छी हिंदी। वे कहते हैं लोगों से बातें करते करते। हिंदी में बातें करके वे हिंदी प्रदेशों में काम चला लेते हैं। जर्मनी में जंगलों में काम करते हैं। वहां से जब थोड़ी कमाई हो जाती है, तब वे योजना बनाते हैं और भारत घूमने  जाते हैं। पिछले 23 साल से आम आदमी की तरह भारत मेंघूमने का नशा छाया है। हर जगह जहां जाते हैं देशी चीजों की तलाश में रहते हैं। खास तौर पर खाने पीने की रेसिपी। वे बड़ी रोचक बातें बताते हैं। अपनी एक यात्रा के बारे में बताते हैं कि जब कर्नाटक में था तो पत्थर की ओखली में खुद चटनी बनाकर खाया करता था। 
- vidyutp@gmail.com
( RED CHILLI, SPICES OF INDIA, DELHI ) 

Sunday, March 10, 2013

आम आदमी की पहली उडान

आसमान में उड़ना भला किसे अच्छा नहीं लगता। हर कोई सोचता है कि काश उसके पास भी पंछियों की तरह परवाज होते और उड़ पाता। पर देश की आबादी के 2 फीसदी लोग भी जीवन में उड़ पाते हैं। शायद नहीं। आप उड़कर दिल्ली से हैदराबाद दो घंटे में पहुंच सकते हैं पर ट्रेन से 20 घंटे में। पर उड़ना हमेशा महंगा सौदा रहा है। पर हम उस आदमी को कैसे भूल सकते हैं जिसने मध्य वर्ग के लोगों को उड़ने का सपना दिखाया। 


कैप्टन जी आर गोपीनाथ ने जब एयर डेक्कन शुरू की तो कई लोगों को अचरज हुआ। पर सस्ती विमान सेवा एयर डेक्कन खूब हिट रही। साल 2003 में एयर डेक्कन की सेवा शुरू हुई तो लोगों ने हाथों हाथ लिया। ए 320 की 21 विमानों की खेप के साथ शुरू हुई सेवा 2011 तक अनवरत चलती रही। एयर डेक्कन के विमान पर आरके लक्ष्मण के प्रसिद्ध कार्टून चरित्र आम आदमी की तस्वीर भी लगी थी। बाद में एयर डेक्कन की विमान सेवा किंगफिशर में समाहित हो गई।

एयर डेक्कन ही वह कंपनी थी जिसके साथ ही मुझे पहली बार हवा में उडने का मौका मिला। मैं ही क्या हजारों लोग की पहली बार उड़ने की तमन्ना एयर डेक्कन ने पूरी की होगी। साल 2007 के अगस्त महीने के आखिरी दिनों की बात है। तब में हैदराबाद में ईटीवी के मध्य प्रदेश चैनल में कार्यरत था। अचानक एक दिन लाईव इंडिया में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार उदय चंद्र सिंह से बात हुई, उन्होने तुरंत दिल्ली आकर इंटरव्यू देने को कहा। तुरंत पहुंचने के लिए फ्लाइट ही विकल्प हो सकता था। मैं एक साइबर कैफे में गया हैदराबाद दिल्ली फ्लाइट सर्च किया। इसके बाद कंपनी के कॉल सेंटर पर फोन किया। तब ऑनलाइन बुकिंग तो मुश्किल थी। पर कॉल सेंटर के एग्जक्यूटिव ने कहा, आपका टिकट क्रेडिट कार्ड से मैं फोन पर ही बुक कर देता हूं। टिकट की साफ्ट कॉपी तुरंत ईमेल पर भेज दूंगा। मेरे पास आईसीआईसीआई बैंक का क्रेडिट कार्ड था। टिकट पांच मिनट में बन गया।

 अगले दिन सुबह 5 बजे की फ्लाइट थी दिल्ली के लिए। हैदराबाद का पुराना हवाईअड्डा बेगमपेट में था। अब तो नया विशाल हवाई अड्डा शमशाबाद में बन गया है। मैं रात को 12 बजे ही एयरपोर्ट पहुंच गया। पर वहां पता चला कि बोर्डिंग पास एक घंटा पहले मिलेगा। तब एयरपोर्ट के अंदर नहीं जा सकते। बाहर बैठने की जगह नहीं थी। यूं ही सड़कों पर घूमते हुए 4 घंटे गुजारे। वहां काफी मच्छर भी काट रहे थे। खैर चार बजे सुबह हमारे लिए एयरपोर्ट के दरवाजे खुले। बोर्डिंग पास प्राप्त करने के बाद थोडा इंतजार। फिर हमें एक बस में बिठाकर दिल्ली के लिए उडान भरने वाली ए-320 विमान के पास भेजा गया। विमान के अंदर सीटें किसी लग्जरी बस जैसी ही थीं। ज्यादा मोटा आदमी हो तो उसे ए 320 विमान की सीटों पर बैठने में दिक्कत ही होगी। 

नियत समय पर विमान रनवे पर कुलांचे भरने लगा। कुछ किलोमीटर आगा पीछा करने के बाद हवा में उपर ऊठने लगा। और हमारे कानों खदकने जैसी आवाजें होने लगी। मैं परेशान साथी लोगों ने बताया कि ऐसा किसी किसी को होता है। कई लोगों को उल्टियां भी होती हैं। पर मुझे नहीं हुई। एयर होस्टस ने सुरक्षा को लेकर प्रस्तुति दी। कुछ घंटे बाद पायलट ने बताया कि हम भोपाल के आसमान पर हैं। फिर पता चला कि ग्वालियर के आसमान हैं। दो घंटे बाद हमें दिल्ली विमान की खिड़की से दिल्ली शहर दिखाई देने लगा था। उसके बाद कई बार उड़ने का मौका मिला,  पर पहले प्यार और पहली बरसात की तरह पहली उड़ान नहीं भूलती।

Friday, March 1, 2013

यात्रा पर निकलने से पहले जरूरी टिप्स

जब आप कभी यात्रा पर निकलें तो कुछ बातों का ज़रूर ध्यान रखें। अगर आप कुछ दिनों के लिए छुट्टी बिताने जा रहें हैं तो इसके लिए पैकिंग की एक चेक लिस्ट तैयार करें। नहीं तो आपको सफ़र में छोटी-छोटी बातों के लिए बड़ी राशि ख़र्च करनी पड़ सकती है या पछताना पड़ सकता है।

यात्रा पर जिस मार्ग में जाना हो उसका मानचित्र, गाइड, रेलवे टाइम टेबल, उसके इलाके के पूछ-ताछ संबंधी फ़ोन नंबरों की सूची हमेशा अपने साथ रखें। ऐसी जानकारी पर कई पुस्तकें आप बाज़ार से ख़रीद सकते हैं या फिर पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाले यात्रा विशेषांकों को अपने साथ रखें। आजकल आप इंटरनेट पर जाकर संबंधित राज्य या देश की वेबसाइट देखकर भी अपनी जानकारी मज़बूत कर सकते हैं।

अगर आपके पास मोबाइल फ़ोन हो तो अपना फ़ोन साथ रखें साथ ही उसका स्पेस लोकेटर ऑन रखें। इससे आपका मोबाइल भी आपको जानकारी देगा कि आप कहां से गुज़र रहे हैं। यात्रा पर जाने से पहले अपने किसी ख़ास दोस्त, परिचित या रिश्तेदार को अपने कार्यक्रम की जानकारी देकर रखें। यह भी बेहतर होगा कि यात्रा के दौरान हर रोज अपने किसी खास दोस्त मित्र या रिश्तेदार को अपनी लोकेशन और कुशल क्षेम अपडेट करते रहें। जिस राज्य में हों वहां का टूरिस्ट हेल्पलाइन नंबर, पुलिस हेल्पलाइन नंबर आदि याद रखें।
यात्रा का ज़रूरी सामानः  यात्रा में कभी भी बारिश आ सकती है। ख़ासकर मुंबई या शिमला, मनाली जैसे हिल स्टेशनों में। इसलिए छोटा-सा रेनकोट या छाता हमेशा अपने पास रखें। कई लोगों को अक्सर छोटी-मोटी बीमारियां होती हैं। आप अपनी संबद्ध दवाएं भी अपने साथ रखें। हिल स्टेशनों पर जाने वाले लोग स्वेटर, शॉल आदि भी घर से लेकर चलें अन्यथा वहां पर ये चीज़ें महंगे दामों पर ख़रीदनी पड़ सकती हैं। टॉर्च, कैमरे की बैटरी, बच्चों के कपड़े आदि साथ रखें। हमारे साथ दो बार ऐसा हुआ कि घर में छाता रहते हुए टूरिस्ट लोकेशन पर पहुंच कर बारिश के कारण हमें छाता खरीदना पड़ा।

होटल की शर्तों को समझें - होटल में ठहरने से पहले उसकी शर्तों को ठीक तरह से समझ लें। भीड़-भाड़ के दिनों में पहले से ही होटल में आरक्षण कराकर चलें तो अच्छा होगा। अगर किसी हिल स्टेशन पर आपके विभाग की ओर से होटल या गेस्ट हाउस बनाया गया हो तो उसी में ठहरें।

खाने का मीनू चेक करें - किसी नई जगह में रेस्टोरेंट में खाने से पहले उसका मेन्यू पहले ही चेक कर लें। कहीं ऐसा न हो खाने के बाद बिल को लेकर आप ठगे जाएं। आपसे पहले संबंधित स्थान की अगर किसी ने यात्रा की हो तो उसकी सलाह ले लें। यह आपके बहुत काम आएगी। अगर आप सीज़न में यात्रा कर रहें हैं तो रेलगाड़ी में या विमान में वापसी का भी आरक्षण करा कर ही चलें।

ऑफ सीजन का लाभ उठाएं- कई टूरिस्ट प्लेसों की ऑफ़ सीज़न यात्रा भी आनंददायक होती है। अगर आप भीड़-भाड़ से बचना चाहते हैं तो ऑफ़ सीज़न में यात्रा करें। हिल स्टेशनों पर आम तौर पर ऑफ़ सीज़न में होटलों का किराया आधा हो जाता है। अगर आप दलालों से बच कर सीधे होटल वालों से बात कर लें तो अच्छा रहेगा।

-विद्युत प्रकाश मौर्य

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