Tuesday, December 31, 2013

नागालैंड – यानी लैंड ऑफ फेस्टिवल्स

फोटो सौ - http://www.hornbillfestival.com/
नागालैंड राज्य की टैगलाइन ही नागालैंड लैंड आफ फेस्टिवल्स। इस राज्य की खास बात है कि यहां सालों बर हर महीने कोई कोई उत्सव मनाया जाता है। इनमे दिसंबर प्रथम सप्ताह में मनाया जाने वाला हार्नबिल फेस्टिवल सबसे बड़ा उत्सव है। ये एक अंतरराष्ट्रीय उत्सव है जिसमें नागालैंड की संस्कृति का हर रंग देखने को मिलता है। इस मौके पर सिर्फ देश से बल्कि बांग्लादेश, म्यामांर, तिब्बत और चीन से लोग भी उत्सव में हिस्सा लेने कोहिमा पहुंचते हैं।
साल 2013 के हार्निबल फेस्टिवल का उदघाटन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने किया। कोहिमा शहर से 12 किलोमीटर आगे इंफाल रोड पर किसमा गांव में हार्नबिल उत्सव का आयोजन हर साल एक से 7 दिसंबर तक होता है। पर इसकी तैयारी काफी पहले से आरंभ हो जाती है। हार्नबिल नागालैंड राज्य का राजकीय पक्षी है जो अब विलुप्त हो चुका है। वैसे हार्नबिल यानी धनेश कर्नाटक राज्य का भी राजकीय पक्षी है। हार्नबिल को कुछ लोग हिंदी में धनेश भी कहते हैं। इस उत्सव के मौके पर यहां नागा संस्कृति के हर रंग देखने को मिलते हैं।

हार्नबिल फेस्टिवल की नवंबर माह से कोहिमा उत्सव की शुरूआत हो जाती है। जो दिसंबर में हार्नबिल फेस्ट और उसके बाद क्रिससम और नए साल तक चलती रहती है। हार्नबिल उत्सव के दौरान कोहिमा शहर के सभी होटल बुक रहते हैं। अगर आप इस दौरान जाने की योजना बना रहे हैं तो होटलों की बुकिंग पहले ही करा लें। हार्नबिल के आयोजन स्थल किसमा में नागा हेरिटेज विलेज भी बना हुआ है। जहां आप किसी नागा का परंपरागत गांव देख सकते हैं।

हार्नबिल फेस्टिवल में नागालैंड के प्रमुख 16 आदिवासी समुदाय के लोग हिस्सा लेते हैं। इस दौरान पारंपरिक नागा नृत्य, कई तरह की पारंपरिक प्रतियोगिताओं का आयोजन होता है। इस उत्सव में अब आधुनिकता का रंग भी मिलता जा रहा है। अब इस उत्सव के मौके पर इसमें कार रेस बाइक रेस जैसी प्रतियोगिताएं भी देखने को मिलती हैं। जाहिर है यहां आप नागा फूड का भी आनंद उठा सकते हैं। उत्सव स्थल सारी रात गुलजार रहता है। इस दौरान नागा संस्कृति के अनुरूप मेला स्थल पर रहने के लिए आवास भी तैयार किए जाते हैं।
कोहिमा शहर का नजारा। 

वहीं दिसंबर के अंतिम सप्ताह में पेरेन में नगा नगी उत्सव का आयोजन होता है तो जनवरी के अंतिम सप्ताह में डिमापुर में बुशु उत्सव का आयोजन होता है।
वैसे राज्य के अलग अलग जिलों में सालों भर हर महीने में किसी न किसी उत्सव का आयोजन होता ही रहता है।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य 

Monday, December 30, 2013

नागालैंड – मिथ और हकीकत

मेरा नागालैंड का दौरा अच्छी और यादगार स्मृतियां लिए हुए समाप्त हुआ। जब मैंने दिल्ली से चलने से पहले एक संस्थान के निदेशक के सामने नागालैंड जाने की इच्छा जताई थी तो उन्होंने मुझे इस राज्य में जाने की सलाह देते हुए कहा था कि मैंने सुना है वहां इंसानों का भी शिकार होता है। (मैन हंटिग)। वे पढ़े लिखे सख्श हैं और ऐसा विचार रखते हैं तो आम आदमी की बिसात। लेकिन नागालैंड काफी बदल चुका है और तेजी से बदल रहा है। हालांकि 1963 में बने इस राज्य की कई राजनैतिक समस्याएं हैं जिसका हल नहीं निकाला जा सकता है। पर पिछले दो दशक से नागालैंड में युद्ध विराम के हालात हैं। इसलिए राज्य में आमतौर पर शांति है। आप एक सैलानी के तौर पर यहां घूम सकते हैं।
जरूरत है कि हम भी पूर्वोत्तर के इस राज्य के बारे में अपना नजरिया बदलें। नागालैंड के लोग खुद्दार हैं। खुद सम्मान पाना चाहते हैं और सामने वाले का सम्मान करते हैं। महिलाओं के सम्मान के मामले में तो ये राज्य दिल्ली से काफी आगे है। यहां कोई अकेली महिला दिन या रात में घूमे उसके साथ छेड़छाड़ या बलात्कार जैसी घटनाएं सुनने को नहीं मिलेंगी।
अब बात करते हैं नागालैंड के मुख्यमंत्री रियो के एक बयान की जो मुझे एक अखबार में पढने को मिला था।
नेफियो रियो, मुख्यमंत्री ( फोटो सौ - लाइव मिंट) 
पूर्वोत्तर के बारे में बहुत कम जानते हैं देशवासी : रियो
नागालैंड के मुख्यमंत्री नेईफुई रियो ने कहते हैं कि देश के बाकी हिस्से के लोग पूर्वोत्तर के राज्यों के बारे में कम जानते हैं। उन्हें पूर्वोत्तर को समझने तथा यहां के लोगों को यह जताने की आवश्यकता है कि वे भारत के हिस्सा हैं। नागालैंड की राजधानी कोहिमा के नजदीक किसामा गांव में इलेक्ट्रिक यंग लीडर्स कनेक्ट-2 सम्मेलन को शनिवार को सम्बोधित करते हुए रियो ने कहा,  यह सच है कि देश के बाकी हिस्से के लोग इस क्षेत्र के बारे में बहुत कम जानते हैं, जोकि निश्चित तौर पर भारत ही है, लेकिन दुर्भाग्यवश एक असमान भारत है।
उन्होंने कहा, "इस क्षेत्र के केवल एक प्रतिशत लोग ही देश की मुख्यधारा से जुड़े हैं, जबकि हमारी 99 प्रतिशत भौगोलिक सीमा अंतर्राष्ट्रीय है। इस क्षेत्र के लोग शेष भारत से जुड़ने में जिस दूरी, विलगाव तथा उपेक्षा का अनुभव कर रहे हैं, वह राष्ट्रीय चिंता का विषय है।  (21 अक्तूबर 2012 देशबंधु से साभार )

इसके साथ ही अब नागालैंड को अलविदा, इस वादे के साथ फिर फिर यहां आने की इच्छा बनी रहेगी। आप भी कुछ दिन गुजारें पूर्वोत्तर के इस स्वीटरजरलैंड में।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य

( NAGALAND, KOHIMA, TOURISM, STATE ) 


Sunday, December 29, 2013

नागालैंड - अंडरग्राउंड टैक्स के बिना कारोबार नहीं

नागालैंड में अंडरग्राउंड टैक्स दिए बिना किसी भी तरह का कारोबार संभव नहीं है। कोहिमा या डिमापुर शहर में दुकानदारों को सरकार को दिए जाने वाले कर के अलावा अंडरग्राउंड संगठनों को भी टैक्स देना पड़ता है। जिस इलाके में जिस संगठन का वर्चस्व है वहां वे टैक्स की वसूली करते हैं। कोई दुकानदार इस टैक्स का विरोध नहीं कर सकता। 
विरोध करने पर हत्या - अगर विरोध किया तो जान से हाथ धोना पड़ सकता है। इन संगठनों से जुडे़ हुए लोग दुकानदारों के पास आकर एक पर्ची थमा जाते हैं, जिसमें दी जाने वाली राशि लिखी होती है साथ ही कब किसे देना है इसका भी जिक्र होता है। टैक्स आमतौर पर साल भर के लिए होता है। टैक्स की राशि संगठन के लोग दुकानदार का व्यापारी की हैसियत देखकर तय करते हैं। आप इस राशि में कोई रियायत नहीं करा सकते हैं। ऐसी कई घटनाएं हुई हैं कि टैक्स देने से आनाकानी करने पर दुकानदार की हत्या हो गई। हां टैक्स अदा कर देने के बाद आप बेधड़क होकर व्यापार कर सकते हैं। आमतौर पर नागा दुकानदार या व्यापारियों से ये टैक्स नहीं वसूला जाता। पर बिहार या यूपी के व्यापारी या मारवाड़ियों को ये टैक्स देना ही पड़ता है। इस टैक्स के अलावा कई बार छात्र संगठन के लोग भी चंदा मांगने आ धमकते हैं। 
जाहिर है इस तरह के टैक्स के कारण दुकानदारों को अपने कारोबार में मार्जिन भी ज्यादा रखना पड़ता है। इस कारण से नागालैंड में दुकान उपभोक्ता वस्तुओं को महंगा बेचने पर मजबूर हैं। इसलिए नागालैंड की दुकानों में अन्य राज्यों की अपेक्षा महंगाई ज्यादा है। चाहे आपकी दुकान फुटपाथ पर हो या फिर कोई बड़ा बिजनेस बिना अंडरग्राउंड टैक्स के यहां गुजारा नहीं है। इन हालातों के बीच भी यहां व्यापार करने में यूपी बिहार के लोग या फिर मारवाड़ी लोग ही सफल हैं। 


कहीं कहीं दक्षिण भारत के लोग भी व्यापार कर रहे हैं। नागा लोगों की प्रवृति दुकानदार बनने के लायक नहीं हैं। वे वीर बहादुर और लड़ाके लोग हैं। तिजारत के लिए वांक्षित व्यवहार कौशल और सहज माधुर्य उनकी व्यक्तित्व का हिस्सा नहीं है। इसलिए वे अगर व्यापार करें भी तो उन्हें उतनी सफलता नहीं मिल पाती। वे बिहार यूपी के दुकानदारों की तरह मोलभाव करने की शैली में निपुण नहीं होते। अक्सर नागा लोग जब किसी बिहार यूपी के दुकानदार के यहां खरीदारी करने पहुंचते हैं तो मोल भाव करते हैं। खरीददारी के साथ वे दुकानदार से बख्शिश भी मांगते हैं। इन 
सारी परिस्थितियों के बीच देसवालिया लोग यहां सफलतापूर्वक व्यापार कर रहे हैं।  क्या उम्मीद की जा सकती है कभी नागालैंड जैसे राज्य में अंडरग्राउंड टैक्स का वातावरण खत्म हो सकेगा। आशा की किरण दिखाई दे रही है। 
नागालैंड पोस्ट के 17 दिसंबर 2013 के अंक में एक खबर प्रकाशित है। राज्य के सबसे बड़े त्यूनसांग जिले के शामाटोर शहर के लोगों ने रैली निकालकर अंडरग्राउंड संगठनों को शहर से बाहर जाने के कहा। हो सकता है आने वाले दिनों में बाकी शहरों में भी इस तरह का बेहतर वातावरण बने। 

राज्य में सक्रिय नागा अंडरग्राउंड संगठन
- नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैण्ड (इसाक-मुईवा ) - एनएससीएन आईएम। इसके प्रमुख टी. मुइवा हैं। 
- एनएससीएन खापलौंग 
- नागा स्टूडेन्ट्स फेडरेशन (एन.एस.एफ.) नागालैंड
- यूनाइटेड नागा काउंसिल (यू.एन.सी.) मणिपुर
- आल नागा स्टूडेन्ट्स एसोसिएशन, मणिपुर (ए.एन.एस.ए.-एम.)


नागालैंड के प्रमुख क्षेत्रीय अखबार - 
मोरूंग एक्सप्रेस www.morungexpress.com/ 
नागालैंड पोस्ट www.nagalandpost.com/
इस्टर्न मिरर - www.easternmirrornagaland.com/
-    विद्युत प्रकाश मौर्य

Saturday, December 28, 2013

शाम के पांच बजते ही बंद हो जाता है कोहिमा शहर

कोहिमा - शाम 5 बजे के बाद खाना नहीं ...
कोहिमा के रेस्टोरेंट में दोपहर का खाना खाने के बाद निकलते हुए मैंने रेस्टोरेंट वाले से पूछ लिया कि आपके यहां रात को कितने बजे तक खाना मिल जाता है। उसने कहा पांज बजे। मैंने अचरज किया। इतनी जल्दी। उसने कहा हां भाई साहब यहां शाम को पांच बजे सारी दुकाने बंद हो जाती हैं। ये सच्चाई है। कोहिमा में आज भी शाम को 5 बजे सारी दुकानों के शटर गिर जाते है। फुटपाथी दुकानें स्टाल आदि भी बंद हो जाते हैं। वैसे यहां 5 बजे सूरज भी ढल जाता है। 
इसके साथ ही सड़क पर सिटी बस टैक्सी और वाहनों की आवाजाही भी बंद हो जाती है। अगर आप शाम को 5 बजे के बाद सड़क पर निकलते हैं तो यह आपके रिस्क पर है। पुलिस से भी किसी सुरक्षा की उम्मीद मत किजिए। लोगों ने अपने आदत में शुमार कर लिया है पांच बजे सब कुछ बंद कर घर में बंद हो जाने को। ऐसा क्यों है। कई साल पहले से यहां शाम को 5 बजे के बाद अलग अलग अंडरग्राउंड संगठनों से जुड़े कार्यकर्ता आ जाते हैं। आते जाते लोगों को लूट लेते हैं। विरोध करने पर मार सकते हैं। इसलिए लोग सारा कारोबार बंद कर देना ही बेहतर समझते हैं। हांलाकि अब कोहिमा शहर की फिजां काफी बदली है लेकिन लोगों का 5 बजे सब कुछ बंद कर देने का अनुशासन नहीं बदला है।
कोहिमा बस स्टैड के पास बोनांजा लॉज...

 अगर आप किसी अच्छे होटल में हैं तो अपने मैनेजर को कमरे में रात का खाना भिजवाने का निर्देश दे सकते हैं। वर्ना आप रात के खाने पीने का सामान दिन में ही पैक कराकर अपने कमरे में ले जाएं। या दूसरा विकल्प है कि भूखे पेट ही सो जाएं। 
हालांकि नागालैंड में सुबह भी शेष भारत से 40 मिनट पहले ही हो जाती है। मैं नवंबर के आखिरी महीने में वहां पहुंचा था। सुबह 5 बजे उजाला हो जाता था। और सवा पांच बजे तक तो सूरज की लालिमा नजर आने लगती है। तो कोहिमा शहर की दुकानें भी सुबह 5 बजे ही खुल जाती हैं। सुबह छह बजे तक सभी होटलों में सुबह का नास्ता और खाना मिलना भी शुरू हो जाता है। अगर आप 5 बजे जग जाते हैं तो शाम 5 बजे तक भी दिन काफी बड़ा लगता है। यहां घरों में रहने वाले भी ज्यादातर लोग शाम 7 बजे तक भोजन करके रात 9 बजे तक जरूर सो जाते हैं। 
- विद्युत प्रकाश मौर्य 
( KOHIMA, ALL SHOP CLOSED AT 5PM ) 


Friday, December 27, 2013

कोहिमा में भी है यूपी और बिहार

मैं कोहिमा के बस स्टैंड पर जैसे ही पहुंचा तो सुनता हूं, अखबार बेचने वाला हॉकर मोबाइल पर भोजपुरी में बातें कर रहा था। बड़े प्रेम से घर का कुशल क्षेम पूछ रहा था। पूछने पर पता चला भाई मोतिहारी का रहने वाले हैं। यहां कई सालों से अखबार का काम कर रहे हैं। आगे बढ़ने पर जूता बनाने वाले मोची बाबू बलिया निवासी मिले।वहीं स्टेशनरी दुकान वाले बिहारी बाबू। तो यहां के यूपी  राइस  होटल वाले बलिया के निवासी हैं।


पूरे कोहिमा शहर में हार्डवेयर, कपड़े, सौंदर्य प्रसाधन, राशन से लेकर सब्जी बेचने वाले ज्यादातर लोग भोजपुरी इलाके के हैं। पूरे कोहिमा शहर की बात करें तो 70 फीसदी दुकानदार बिहार यूपी के हैं। वे कई दशकों से कोहिमा में पहुंच गए हैं और यहां कारोबार कर रहे हैं। यहां लोग परिवार के साथ रहते हैं। साल में एक या दो बार अपने गांव का भी चक्कर लगा आते हैं। लेकिन तमाम मुश्किलात के बीच नागालैंड के न होकर भी नागालैंड के हो गए हैं। नागालैंड के नहीं हुए हैं क्योंकि यहां वे जमीन खरीद कर स्थायी तौर पर बस नहीं  सकते। यहां की  मतदाता  सूची  में  नाम  नहीं  जुड़  सकता। अपने पूजा स्थल मंदिर आदि नहीं बना सकते। अगर पूजा पाठ करना है तो घर के अंदर ही करना पड़ता है। 


कोहिमा शहर में घूमते हुए लगता है कि पूरा यूपी बिहार यहां बसता है। सड़कों पर बेधड़क अपनी जुबान बोलते हुए मिल गए ये लोग, अगर कोई बिहार यूपी से घूमने यहां पहुंच गया तो अपने जवार के लोगों के साथ बड़े प्रेम से पेश आते हैं। सिर्फ कोहिमा ही नहीं नागालैंड के कई छोटे कस्बों और शहरों तक भी भाई लोग पहुंच गए हैं तिजारत करने। अब यहां की ठंडी आबोहवा में सालों से जम गए हैं तो फिर रम भी गए हैं। हालांकि कई तरह की मुश्किले हैं।


भले यूपी बिहार से आए लोगों ने कोहिमा को  इन्होंने अपना  लिया है  पर कोहिमा  ने  इन्हें  पूरी  तरह नहीं अपनाया। एक तरह से दोयम दर्जे का जीवन है यहां पर। कोहिमा में रहने वाले बिहार यूपी के लोगों अपना व्यापारिक इनर लाइन परमिट साथ रखना पड़ता है। इस परमिट को ही वे लोग समय सीमा खत्म होने पर नवीकृत कराते रहते हैं। कभी यहां की स्थायी नागरिक नहीं हो सकते। अंडर ग्राउंड टैक्स जैसी कई और परेशानियां हैं। पर यूपी बिहार के लोग कारोबार करना जानते हैं। दुकानदारी करना नागा लोगों के खून में नहीं है। इसलिए बिहार यूपी के लोग यहां कारोबार में सफल हैं। पर बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिनका मानाना है कि नागरिकता नहीं मिली तो क्या हुआ, अब इनका यहां से जाने का भी दिल भी  नहीं करता। भला जो बात कोहिमा में है वह बलिया गाजीपुर में कहां।

-    विद्युत प्रकाश मौर्य  

  ( UP AND BIHAR PEOPLE, NO TEMPLE IN KOHIMA  ) 

Thursday, December 26, 2013

कोहिमा के वे दो यादगार भोज

कोहिमा के दो भोज हमेशा याद रहेंगे। हमारे स्थानीय मित्र अमित गुप्ता ने मुलाकात के साथ ही बताया कि आज शनिवार है और कोहिमा के हाई स्कूल जंक्शन इलाके के सभी बिहार यूपी के दुकानदारों की ओर से एक वनभोज यानी पिकनिक का आयोजन किया गया है। ये पिकनिक हाईस्कूल के पीछे के जंगलों में आयोजित था। मैं अपने दोस्तों के साथ इस पिकनिक में पहुंचा। इसमें बिहार यूपी दुकानदारों के साथ नागा साथी भी शामिल थे।

भैंसे का मांस चिकेन और चावल - पिकनिक के मीनू में भैंसे का मांसचिकेन और चावल प्रमुख था। हां अल्पसंख्यक शाकाहारियों के लिए दाल और सलाद भी बनाई गई थी। सलाद का मतलब हरी पत्तेदार सब्जियों को उबाल दिया गया था। हालांकि ये सेहत के लिए काफी अच्छी हैं भले ही बेस्वाद लगती हों। पिकनिक के मुख्य द्वार पर शहीद हुए भैंसे के सिर को पेड़ से लटका दिया गया था। नागा महिलाएं भोज की सूत्रधार थीं। अस्थायी चूल्हों में जंगल की लकड़ी से आंच दी जा रही थी। बड़े बडे़ भगोने में मांस पक रहा था। इस चलाने के लिए बांस के बने बेलचों का इस्तेमाल किया जा रहा था। लेकिन महिलाएं उसी बेलचे से भैंसे का मांस और उसी चिकेन भी चला रही थीं। हालांकि मैं चिकेन उदरस्थ कर लेता हूं लेकिन यहां खाने को दिल नहीं माना। फिर भी दोस्त साथ देने के लिए कुछ कौर खा लिया। कई बिहार यूपी के भाई लोग पिकनिक में आए जरूर थे पर उन्हें भी खाने से गुरेज था। वे लोग घर में चिकेन और मछली खाते हैं पर बाजार और भोज में खाने से बचते हैं। अमित के घर पहुंचने पर भाभी जी ने राजफाश किया - यहां पर आकर न कई ठो बिहारी लोग अनजाने में गड़बड़सड़बड़ खाकर अपना धर्म भ्रष्ट कर लिया है। मुझे लगा अच्छा हुआ मैं अपना धर्म भ्रष्ट करने से बच गया। 

 दूसरे दिन दोपहर में एक और भोज में जाने का मौका मिला। यहां बीआरटीएफ ( बार्डर रोड टास्क फोर्स) के शिविर में गुरुनानक जयंती मनाई जा रही थी। इस मौके पर कैंप के गुरुद्वारे में विशेष गुरू के लंगर का आयोजन था। जब कैंप के प्रशासनिक अधिकारी को मेरे आने की सूचना मिली तो उन्होंने बड़ी आत्मीयता से मुझे भी आमंत्रित किया। इस लंगर के भोज में बासमती चावल का पुलाव, दाल, सब्जी, रायता, खीर, सलाद, रसगुल्ले सब कुछ थे। खाना इतना स्वादु था और लोग इतने आत्मीयता से परोस रहे थे कि अपना पंजाब याद आ गया।

मैंने तो कोहिमा में ऐसे किसी भोज की उम्मीद नहीं की थी। लंगर के बाद यादव जी ने जो वाराणसी के पास के शिवपुर के रहने वाले थे ने पूर्वोत्तर में बीआरटीएफ के काम काज के बारे में बताया। दुरुह इलाकों के नेशनल हाईवे के निर्माण और रखरखाव और सुरक्षा की जिम्मेवारी इधर बीआरटीएफ के हवाले है।

- विद्युत प्रकाश मौर्य


( NAGALAND, KOHIMA, BHOJ, BRTF ) 

Wednesday, December 25, 2013

शाकाहारी क्या खाएं नागालैंड में

अगर आप शाकाहारी हैं तो आपको नागालैंड में दिक्कत हो सकती है। लेकिन आपके लिए यहां खाने के विकल्प मौजूद है। कीडा़ बाजार में बिक रहे सैकड़ों किस्म के कीड़ों के अलावा यहां सब्जियां भी बिकती हैं। महंगाई का आलम तो है। शेष हिंदुस्तान से यहां महंगाई और ज्यादा है। सेब और प्याज दूर से आता है इसलिए महंगा है पर स्थानीय सब्जियां सस्ती हैं। फलों में पाइनएपल और संतरे इधर सस्ते मिलते हैं क्योंकि इनकी उपज पूर्वोत्तर में खूब होती है। अगर आप शाकाहारी हैं तो बाजार से अलग अलग तरह के जूस के बोतल भी खरीद सकते हैं। यहां न सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि म्यामार और थाइलैंड के बने जूस भी मिल जाते हैं।
बेकरी उत्पाद  एक और विकल्प है बिस्कुट और बेकरी खाना। कोहिमा शहर में कई प्रसिद्ध बेकरी की दुकाने हैं। इसके लिए आप पापुलर बेकरी (पीआर हिल्स) जा सकते हैं। इसके प्रोपराइटर शशि कुमार हैं। अपने गुणवत्ता और स्वाद के लिए ये बेकरी कोहिमा में लोकप्रिय है। वैसे आप बेक्स एंड केक्स, रुस्ता बेकरी जा सकते हैं। इन बेकरी में मिठाइयां जूस और बिस्कुट आदि भी मिल जाते हैं।



डिमलू और कोमूल - नागालैंड के दो प्रमुख दूध के ब्रांड है डिमूल और कोमूल। दूध यहां थोड़ा महंगा है पर डिमूल की मिठी लस्सी मिल जाती है पैकिंग में महज 10 रुपये में। स्वाद भी अच्छा है। कोहिमा या डिमापुर में इसका स्वाद जरूर लें।

शराब पर है पूरी पाबंदी  - नागालैंड में वैसे तो शराब पर पाबंदी है। गुजरात के बाद ऐसा दूसरा राज्य है जहां शराबबंदी है। 1989 के नागालैंड ल्यूकर टोटल प्रोबिटेशन एक्ट ( एनएलटीपी) के तहत यहां शराब नहीं बेचने का कानून है। चर्च के प्रभाव में लंबे संघर्ष के बाद यहां शराबबंदी का कानून आया। नागालैंड बेपटिस्ट चर्च काउंसिल ( एनबीसीसी) के प्रयासों से यहां शराबबंदी लागू हो सकी थी। पर व्यवहार में नागालैंड में हर जगह शराब मिल जाती है। गांवों देसी शराब बनाई जाती है शहर के तमाम दुकानों में शराब अवैध तरीके से बिकती है। खरीदने वाले इशारों में मांग करते हैं और बोतलों को लिफाफे में छिपाकर ले जाते हैं। पर यहां सार्वजनिक स्थलों पर कोई पीता हुआ नजर नहीं आएगा। 

- विद्युत प्रकाश मौर्य 
(NAGALAND, FOOD, WINE, MILK BRAND DIMUL ) 

Tuesday, December 24, 2013

ये कोहिमा का कीड़ा बाजार है...

नागालैंड में जगह जगह मांस की दुकानें तो मिल ही जाएंगी। इसके साथ ही यहां लोगों में कई तरह के कीड़े खाने का भी चलन है। इन कीड़ों को वैसे ही खाया जाता है जैसे हम अपने घरों में सब्जी और भुजिया बनाकर खाते हैं। राजधानी कोहिमा में सब्जी बाजार की तरह ही कीडा बाजार भी है। यहां तक की बस स्टैंड के आसपास सड़कों पर महिलाएं टोकरी में कई तरह की कीडे़ बेचती नजर आती हैं। ये कीड़े जीवित होते हैं। वे टोकरी में रेंकते रहते हैं। ऐसे कीड़े सिर्फ नागालैंड में ही नहीं बल्कि पड़ोसी राज्य अरुणाचल प्रदेश में भी खाया जाता है।
कोहिमा में सिल्क वर्म खाएंगे क्या...

अभी तक हमने सिल्क वर्म के बारे में जाना था कि यह एक आर्थिक तौर पर उपयोगी कीड़ा है जो रेशम बनाने में प्रमुख कारक है। पर सिल्क वर्म भोजन भी हो सकता है, यहीं आकर पता चला। हमने अपने गांव में कुछ जातियों के बारे में सुना था कि वे चूहा और घोंघा जैसी चीजों को मारकर खाते हैं। पर नागालैंड में तमाम तरह के कीड़ों को मार कर चाव से खाया जाता है। इन कीड़ों में सिल्क वर्म लोगों में काफी लोकप्रिय है। नागा लोगों की इन कीड़ों को पकाने की अपनी विधि है। काफी लोग इसे डिप फ्राई करके खाते हैं। चीन में भी लोग बड़ी संख्या में सिल्क वर्म खाते हैं। आप कोहिमा के कुछ रेस्त्रां में भी सिल्क वर्म की डिश खा सकते हैं। इन पानी देर तक उबालने के बाद प्याज,अदरक, लहसुन, मिर्च आदि के साथ फ्राई करके खाया जाता है।

अगर आप पूर्ण शाकाहारी हैं तो आपको कोहिमा के बाजार में खाने पीने में दिक्कत आ सकती है। हमने बस स्टैंड से आगे बढ़ने के बाद किसी शाकाहारी होटल के बारे में जानकारी लेने की कोशिश की। वहां एक जूता बनाने वाले मोची और एक अखबार बेचने वाले भाई मिल गए जो अपने भोजपुरी इलाके के थे। इन लोगों ने हमें जानकारी दी आप आगे राइजू जंक्सन पर जाएं वहां यूपी राइस होटल है जहां आपको शाकाहारी खाने का विकल्प मिल जाएगा। उनकी सलाह पर मैं यूपी राइस होटल ढूंढता हुआ आगे बढ़ा। होटल का बोर्ड देखकर खुशी हुई। इस होटल को चलाने वाले यूपी के गाजीपुर के हैं। पर इस होटल के मीनू में भी मांस मछली के सारे विकल्प मौजूद थे। 

कोहिमा का एकमात्र होटल जहां चावल, दाल सब्जी और पूरी भी मिल जाती है। 
यहां पर शाकाहारी के नाम पर नास्ते में पूरी सब्जी और खाने में चावल दाल और सब्जी का विकल्प था। मैंने पूरी सब्जी खाना तय किया। सब्जी के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति थी। दाल भी थी काम चलाउ सी थी। पर पूरे कोहिमा में यही एक यूपी राइस होटल है जहां पर शाकाहारी के नाम पर कुछ मिल जाता है। पर उनके बरतनों से भी अंडे की गंध आती रहती है। खाने के बाद मन नहीं भरा, क्योंकि मुझे अंडे से एलर्जी है।



खैर खाने से संतोष तो नहीं हो सका। यहां से आगे बाजार में बढ़ने पर एक मेला लगा हुआ था। इस मेले में अपने देस के लोगों की कुछ दुकानें सजी थीं, जहां पापड़, जलेबियां और समोसे बनाए जा रहे थे। यहां पर हमने कुछ पापड़ खाकर दिल को तसल्ली पहुंचाई।  पर यहां भी अंडे के गंध ने साथ नहीं छोड़ा। अगर आप कुछ दिनों के लिए कोहिमा में हैं और आप शाकाहारी हैं तो आपको दिक्कतें आ सकती हैं।

आगे पढ़िए - शाकाहारी क्या खाएं कोहिमा में... ) 

 - विद्युत प्रकाश मौर्य



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