Friday, August 31, 2012

सौ साल पुरानी स्पेशल गेज पर सफर (2)

क्या करें मजबूरी है..जाना जरूरी है...
साक्षरता कार्यक्रम के लिए हमें पहुंचना था श्योपुर। जौरा के महात्मा गांधी सेवा आश्रम से मैं और दिग्विजय भाई अपने अगले सफर के लिए चल पड़े। साल 1992 में श्योपुर तब एक तहसील हुआ करता था, मुरैना जिले का, पर अब जिला बन चुका है। ग्वालियर से 200 किलोमीटर से ज्यादा दूर। ग्वालियर से श्योपुर के बीच चलती है छोटी लाइन की ट्रेन। ये ट्रेन मीटर गेज नहीं, नैरो गेज नहीं बल्कि स्पेशल गेज की है।
पटरियों के बीच चौड़ाई 61 सेंटीमीटर (610 एमएम) यानी कालका शिमला से भी छोटे हैं इसके डिब्बे। ट्रेन ग्वालियर से चलती है लेकिन हमने इसमें सफर शुरू किया जौरा अलापुर रेलवे स्टेशन से। ग्वालियर से श्योपुर कलां तक का रेल मार्ग 198 किलोमीटर लंबा है। अपने स्पेशल गेज में ये दुनिया की सबसे लंबी और सबसे पुरानी रेल सेवा है जो चालू है। 


ग्वालियर श्योपुर मार्ग पर जौरा रेलवे स्टेशन। 
ग्वालियर के महाराजा माधव राव सिंधिया ने इस रेल परियोजना पर काम 1879 में शुरू कराया था। 1904 में इस रेल सेवा को ग्वालियर लाइट रेलवे के नाम से शुरू कराया था। ग्वालियर से जौरा तक का मार्ग 1904 में चालू हो गया था। इसका श्योपुर कलां तक पूरा मार्ग 1909 में आरंभ हो सका।

 यानी सौ साल से ज्यादा पुरानी हो चुकी है ये रेल। ग्वालियर से चल कर 28 स्टेशनों से होकर गुजरने वाली ये ट्रेन इलाके 250 से ज्यादा गांवों के लिए लाइफलाइन है। यानी चंबल घाटी के लोगों के लिए ये ट्रेन कोई टॉय ट्रेन नहीं है। जंगल और गांव से होकर इस ट्रेन से सफर करना लोगों की मजबूरी भी है। कई इस ट्रेन के छत पर भी लोग सफर करते दिख जाते हैं।


कभी भाप इंजन चलता था। 
ग्वालियर से सुबह छह बजे खुलने वाली पहली ट्रेन शाम चार बजे श्योपुर पहुंचाती है। अब ट्रेन में डीजल इंजन लग गया है। अधिकतम स्पीड 50 किलोमीटर घंटा है। इंजन डिब्बे सब कुछ अलग हैं। कई बार बिगड़ जाए या पटरी से उतर जाए तो रेल मार्ग बंद भी जाता है।
भले ही इसके मार्ग में 28 स्टेशन हैं लेकिन कई बार गांव के लोगों के आग्रह पर जरूरत पड़ने पर इस ट्रेन को ग्रामीण कहीं भी रोकवा लेते हैं। कई दशकों से इस लाइट रेलवे को बड़ी लाइन में बदलवाने की मांग चल रही है। सुबह-सुबह जौरा रेलवे स्टेशन पर हम टिकट लेकर श्योपुर कलां जाने वाली ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। पर ट्रेन आई तो पहले से ही खचाखच भरी हुई थी।



vidyutp@gmail.com

Thursday, August 30, 2012

चंबल के आंचल में (1)

मई और जून 1992 का महीना। काशी हिंदू विश्वविद्यालय में ग्रीष्मावकाश की घोषणा होने के साथ हमने तय किया कि इस बार घर नहीं जाकर कहीं घूमने जाना है। इसी दौरान हमारे पास महात्मा गांधी सेवा आश्रम, जौरा मुरैना से संपूर्ण साक्षरता अभियान में बतौर शिक्षक पढ़ाने का आमंत्रण आया। हमने एक महीने से कुछ ज्यादा वक्त वहां बीताने का तय किया। वाराणसी से बुंदेलखंड एक्सप्रेस में मैं और दिग्विजय नाथ सिंह सवार हुए। हमारी ट्रेन, इलाहाबाद के बाद चित्रकूट, बांदा, कालांजर, महोबाओरछाझांसी होती हुई ग्वालियर पहुंची। ग्वालियर में हम युवा साथी आनंद पंडित से उनके घर जाकर मिले। ग्वालियर का जय विलास पैलेस किला देखा। उसके बाद हम ग्वालियर से बस से महात्मा गांधी सेवा आश्रम, जौरा पहुंचे।

ये वही आश्रम है जहां 1972  में  जय प्रकाश नारायण के सानिध्य में चंबल के डाकूओं के सरेंडर हुए। ये आश्रम अब डाकूओं के परिवारों के पुनर्वास के लिए कई तरह के प्रोजेक्ट चलाता है। जौरा आश्रम में कई तरह के खादी ग्रामोद्योग की वस्तुओं का उत्पादन होता है लेकिन आश्रम की बनी हुई दरी उत्कृष्ट गुणवत्ता वाली मानी जाती है। 

जाने माने गांधीवादी कार्यकर्ता पीवी राजगोपाल ने इस आश्रम में लंबा वक्त गुजारा है। यहां के लोग उन्हें बड़े सम्मान से राजू भाई के नाम से याद करते हैं। इस आश्रम में मैं लगातार कई बार जा चुका हूं। राजू भाई के बाद अब रणसिंह परमार इस आश्रम की व्यवस्था देखते हैं। राष्ट्रीय युवा योजना के निदेशक एस एन सुब्बराव ने 1970 में इस आश्रम की स्थापना की थी।


चंबल नदी पर मुरैना और धौलपुर के मध्य पुल। 

सालों इस इलाके में रहकर डाकुओं से संपर्क कर उन्हें सरेंडर के लिए तैयार करने में उनकी बड़ी भूमिका रही। कभी चंबल घाटी में आतंक का पर्याय रहे ये डाकू सरेंडर के बाद इस आश्रम को अपना घर मानते है। वे साल में कई बार होने वाले कार्यक्रमों में इस आश्रम में आते भी हैं। जौरा और आसपास के गांवों में लोगों में जागरूकता लाने के लिए सुब्बराव जी ने 20 से ज्यादा शिविर 70 के दशक में लगाए जिसमें देश के कोने कोने से युवाओं ने आकर श्रमदान किया। ऐसा ही एक गांव है बागचीनी जहां कई शिविर लगाए गए।
 - विद्युत प्रकाश मौर्य  - vidyutp@gmail.com

(CHAMBAL, JOURA, MORENA, MP, SHEOPUR, SUBBARAO, DIGVIJAY NATH ) 

Wednesday, August 29, 2012

लुंबिनी पार्क में हैदराबाद की एक शाम

हैदराबाद के लुंबिनी पार्क में  ( 2007 )
हैदराबाद के हुसैन सागर लेक के एक हिस्से में बना है लुंबिनी पार्क। लुंबिनी पार्क हैदराबाद के लोगों की शाम गुजारने की हसीन जगह है। इटिंग आउट झरने, झूले सब कुछ हैं यहां। 

लुंबिनी पार्क हैदराबाद का एक हैपनिंग सेंटर है। तभी दहशत गर्दों ने जब हैदराबाद शहर में सीरियल ब्लॉस्ट किए तब उसमें लुंबिनी को भी चुना था। लेकिन वक्त सबसे बड़ा मरहम है काफी कुछ भुला देता है। जिंदगी फिर उसी रफ्तार से चल पड़ती है।

लुंबिनी के बगल में ही स्थित है एनटीआर गार्डन। इसे आंध्र के लोकप्रिय मुख्यमंत्री एनटीरमाराव की याद में बनवाया गया है। एनटीआर गार्डन के मुक्ताकाश मंच पर अक्सर कोई रंगारंग आयोजन भी चलता रहता है। 


लुंबिनी पार्क में प्रवेश के लिए टिकट 10 रुपये का है। बच्चों के लिए टिकट 5 रुपये का है। यह हैदराबाद के आम आदमी के मनोरंजन के लिए सबसे सस्ती जगह है। इस टिकट में बच्चों के लिए कई झूले तो मुफ्त में उपलब्ध हैं। वहीं कई झूलों के लिए टिकट लेना पड़ता है। एक बार लुंबिनी पार्क पहुंचने के बाद बच्चे वहां से वापस जाने का नाम ही नहीं लेते। पार्क में पानी का एक सुंदर झरना है। इस झरने के अंदर से होकर आप आर पार गुजर सकते हैं। आपके आगे से पानी गिरता रहता है और अंदर के बरामदे से पानी के छिंटे के साथ इस पार से उस पार हो जाते हैं। पर बच्चों का तो मन नहीं मानता।
वे गिरते हुए पानी में नहाने के लिए कूद पड़ते हैं। बच्चों के लिए नहाने की यहां पर छूट है। बड़ों के लिए मनाही है। पार्क में बच्चों के लिए छोटी सी रेलगाड़ी भी है। अगर घूमते हुए थक गए हैं तो खाने पीने का भी शानदार इंतजाम है यहां पर। 


इसके अलावा लुंबिनी पार्क से स्टीमर लांच पर सफर के और भी कई पैकेज हैं। ठहरे हुए पानी में हलचल मचाती लांच और उसपर चलता धीमा संगीत। साथ में कुछ खाना पीना भी। भला इससे अच्छी शाम क्या हो सकती है। रामोजी फिल्म सिटी में नौकरी के दौरान नन्हें अनादि को लेकर हमलोग कई बार लुंबिनी पार्क के इलाके मे गए। नन्हें अनादि को लुंबिनी नाम जुंबा पर चढ़ गया था। 

-    विद्युत प्रकाश  मौर्य 
( HYDRABAD, HUSAIN SAGAR LAKE, BUDDHA, LUMBINI PARK ) 

Tuesday, August 28, 2012

हैदराबाद की हुसैन सागर झील में बुद्ध

देश की सबसे बड़ी झील है हुसैन सागर, इस मायने में कि ये इंसान की बनवाई हुई है। प्राकृतिक नहीं है। इस झील के बीचों बीच खडे हैं विशाल गौतम बुद्ध। यह देश की सबसे बड़ी अखंड बुद्ध प्रतिमा है। इसकी स्थापना इस झील में एक दिसंबर 1992 को की गई थी। इस 200 शिल्पियों ने गणपति सतपथी की अगुवाई में तकरीबन दो साल के समय में तैयार किया था। 

इस प्रतिमा को हैदराबाद से 60 किलोमीटर दूर रायगीर की पहाड़ियों के पास निर्मित किया गया था। प्रतिमा की ऊंचाई 17 मीटर है और इसका वजन 320 टन है। इसे रायगीर से यहां तक लाने के लिए बड़ी जुगत लगाई गई थी। कुल 192 पहियों वाले विशेष वाहन से इसे रायगीर से यहां तक लाया गया था। रात में इस बुद्ध प्रतिमा को देखने का अपना अलग आनंद है। रोशनी में नहाई बुद्ध प्रतिमा और भी सुंदर लगती है।  बुद्ध प्रतिमा के पास बुद्ध वंदना और त्रिशरण मंत्र लिखे गए हैं। यहां आने वाले सैलानी बुद्ध को हर कोण से निहार लेना चाहते हैं। 


सबसे बड़ी मानव निर्मित झील -  हुसैन सागर झील का निर्माण एक समय में जल संकट के दौरान शहर को पानी उपलब्ध कराने के लिए कराया गया था। 1562 में इस झील का निर्माण हजरत हुसैन शाह वली ने करवाया था। झील का विस्तार 5.7 वर्ग किलोमीटर में है। वहीं झील की गहराई 32 फीट तक है। इसमें मूसी नदी से नहर बनाकर पानी लाने के इंतजाम किया गया था। तब यह जल संरक्षण का अदभुत नमूना था। अब इस झील के किनारे से होकर खूबसूरत सी सड़क गुजरती है। इस वलयाकार सड़क को नेकलेस रोड कहते हैं जिसका सौंदर्य रात में निखर उठता है। ये नेकलेस रोड मुंबई के मरीन ड्राइव की याद दिलाती है लेकिन कई बार उससे भी ज्यादा खूबसूरत है। ये सड़क हैदराबाद और सिकंदराबाद शहर को जोड़ती भी है।

हुसैन सागर थोड़ी दूरी पर ही हैदराबाद का प्रसिद्ध बिड़ला मंदिर है। इस मंदिर से शहर का बड़ा ही खूबसूरत नजारा दिखता है। कुछ साम्यता हैदराबाद और भोपाल में नजर आती हैं। वहां भी ऊंचाई पर बिड़ला मंदिर और ताल तलैया है। भोपाल की बड़ी झील में हाल में राजा भोज की विशाल प्रतिमा लगी है। तो हैदराबाद के हुसैन सागर लेक में बीचों बीच गौतम बुद्ध की ग्रेनाइट की बनी विशाल प्रतिमा स्थापित की गई है।


कैसे पहुंचे - हुसैन सागर झील में स्थित  गौतम बुद्ध की इस प्रतिमा तक जाने के लिए लुंबिनी पार्क से मोटर बोट, स्टीमर लाउंज चलते हैं। इसमें आप आने और जाने का एक साथ टिकट लेकर बुद्ध मूर्ति तक जा सकते हैं। तेलंगाना टूरिज्म की ओर से गौतम बुद्ध प्रतिमा तक आने और जाने का टिकट 55 रुपये का है। इसमें आप प्रतिमा के पास अपनी मन मुताबिक समय तक ठहर सकते हैं। आने जाने के लिए लगातार फेरी सेवा चलती रहती है। वहां पर फोटोग्राफर प्रतिमा के साथ आपकी इंस्टैंट तस्वीर भी उतारने के लिए प्रस्तुत रहते हैं। आप चाहें तो यादगारी फोटो भी बनवा सकते है।
- vidyutp@gmail.com
( HYDRABAD, HUSAIN SAGAR LAKE, BUDDHA, LUMBINI PARK ) 

Monday, August 27, 2012

देश का सबसे पुराना मॉल एबिड्स

अलबर्ट एबिड (सौ नरेंद्र लूथर की पुस्तक)
देश के तमाम महानगरों में तेजी से शापिंग माल्स खुल रहे हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि हैदराबाद शहर में काफी पहले से एक व्यवस्थित शापिंग माल मौजूद है। हैदराबाद के लोग इसे एबिड्स के नाम से जानते हैं। ये नामपल्ली रेलवे स्टेशन के पास ही है।

एबिड्स का मतलब है हैदराबाद का दिल। एबिड्स का नाम अलबर्ट एबिड के नाम पर है। हैदराबाद के छठे निजाम के समय जेविश मूल के अलबर्ट एबिड ने यहां पहली दुकान खोली। कहा जाता है जेविश धर्म भारत में बाहर से आने वाले सबसे पुराने धर्मों में से एक है। अलबर्ट एबिड छठे निजाम महबूब अली शाह आसफ जह (1869-1911) का खास सेवक और प्रबंधक था। अलबर्ट एबिड ने एनी इवान्स से विवाह किया था जो निजाम के बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाती थी। शादी के बाद उसने अपना नाम अलबर्ट एबिड इवान्स रख लिया था। यानी पत्नी का नाम अपने नाम के  साथ जोड़ा। भारत में अक्सर पत्नियां जोड़ती हैं पति का नाम। बाद में दोनों ब्रिटेन चले गए थे। कहा जाता है कि कई शहरों के शोध के बाद यहां एबिड्स में ऐसे अनूठे बाजार का निर्माण कराया गया जहां एक ही छत के नीचे सब कुछ मिलता हो। यह था देश का पहला डिपार्टमेंटल स्टोर।

एबिड्स से पहले ये जगह मुस्तफा बाजार के नाम से जानी जाती थी। छठे निजाम की मुलाकात एबिड से कोलकाता में हुई। उनके आमंत्रण पर वह हैदराबाद आया और उसने अपना स्टोर खोला।
एक ऐसा मार्केटिंग कांप्लेक्स जहां जूते  चप्पल, गहने, कपड़े, खानेपीने से लेकर और वह सब कुछ जो आप ढूंढने निकले हों मिलता है। आजादी से पहले से हैदराबाद के लोगों का महत्वपूर्ण शापिंग प्वाइंट रहा है एबिड्स।
एबिड्स के पास ही स्थित है हैदराबाद का आइकोनिक ताजमहल होटल जो 1903 में बना था। यहां स्थित है 1867 का बना प्रोटेस्टेंट मतावलंबियों का सेंट जार्ज चर्च। एबिड्स में आज भी हर तरह का बाजार है। हैदराबाद की सबसे प्रसिद्ध जी पुल्ला रेड्डी की मिठाइयों की दुकान भी है।  हालांकि बदलते वक्त के साथ अब एबिड्स भी बदल रहा है। यहां बिग बाजार खुल गया है। ब्रांड फैक्ट्री भी खुल गई है। भीड़ बढ़ गई है पार्किंग की समस्या होने लगी है।
- विद्युत प्रकाश 


Sunday, August 26, 2012

हैदराबाद का मोतियों वाला बाजार

चारमीनार की मुंडेर पर, पीछे मक्का मस्जिद। 
गले में खूबसूरत मोतियों की माला भला किसे अच्छी नहीं लगती। हैदराबाद में लंबा सा बाजार है मोतियों वाला। ये बाजार पुराने हैदराबाद में ऐतिहासिक चारमीनार से शुरू होता है। वही चार मीनार जो हैदराबाद शहर का लैंडमार्क माना जाता है। इस चार मीनार के पीछे है मक्का मस्जिद और सामने है मोतियों का बाजार। जब कभी आप हैदराबाद जाएं तो चारमीनार जरूर देखना चाहेंगे। भले आप दिल्ली के कुतुबमीनार पर नहीं चढ़ सकते हों लेकिन हैदराबाद में चारमीनार पर चढ़ सकते हैं। चढ़ने के लिए अलग सीढ़ियां हैं तो उतरने के लिए अलग। चार मीनार की मुंडेर से दिखाई देती है ऐतिहासिक मक्का मस्जिद।
 जब चार मीनार से उतरे तो वहां से मदीना बिल्डिंग तक एक किलोमीटर लंबा बाजार है इसमें कई सौ दुकानें है मोतियों की। यहां आप एक मोती से लेकर किस्म किस्म की मोतियों की माला, टाप्स, झुमके और दूसरे गहने खरीद सकते हैं। हैदराबाद में मोतियों का लंबा चौड़ा कारोबार है। यहां से खरीदे गए मोतियों के गहने बाकी शहरों से 50 फीसदी तक सस्ते हो सकते है।
हालांकि हैदराबाद के इस मोतियों के बाजार में तमाम दुकानदार सरकार से मान्यता प्राप्त होने का दावा करते हैं तो कई पुराने दुकानदार निजाम के ज्वेलर होने का दावा करते हैं। चारमीनार के आसपास आपको मोतियों की दुकान  तक पहुंचाने वाले दलाल भी मिल सकते हैं। थोड़ा सा मोल भाव करके आप यहां से अच्छे और सस्ते में मोतियों के गहने खरीद सकते हैं। 


मोतियों के खरीदने में ये सावधानी जरुर बरतें कि मोती जितना अधिक गोल होगा और आकार उसका जितना बड़ा होगा उतना ही अच्छा माना जाता है। तरासे जाने के आधार पर मोतियों की ग्रेडिंग होती है। ए, ए ए और ए ए ए। हमारे हैदराबाद प्रवास में हमारी पसंदीदा दुकान थी मोतीलाल ज्वेलर्स, मदीना बिल्डिंग के पास। जहां से हमने वाजिब कीमत पर मोतियों की माला खरीदी। पूरे देश में हैदराबादी मोती के नाम पर मोतियों का कारोबार होता है लेकिन हैदराबाद तो मोतियों का शहर ही है।
निजाम के शाही ज्वेलर -  असफ जहा राजवंश के निजाम को मोतियों से बहुत प्यार था। इसलिए चारमीनार के आसपास मोतियों का बाजार विकसित हुआ। मोतियों से पहले हैदराबाद हीरों का बड़ा केंद्र था। किसी जमाने में विश्व प्रसिद्ध कोहीनूर हीरा गोलकुंडा के खदानों से ही निकला था। साल 1906 में रामदत्त मल ने हैदराबाद में मोतियों की पहली दुकान खोली। तब रामदत्त मल को निजाम ने अपने शाही ज्वेलर का दर्जा दिया। हालांकि हैदराबाद में मोतियों का उत्पादन नहीं होता, पर यह बिक्री का बड़ा केंद्र बन गया है। बाजार में आने वाले मोती श्रीलंका, चीन और जापान से आता है। हालांकि कई जगह भारत में भी कल्चर्ड मोतियों का निर्माण होने लगा है। 
-   ----  विद्युत प्रकाश मौर्य

((HYDRABAD, PEARL MARKET, MADINA BUILDING, CHARMINAR, NIZAM )

Motilal Jewellers & Pearls, Shop.No.22-7-195, Opposite Madina Building,, Charminar, Hyderabad, Telangana 500002 Tel.: 040 2456 5211

Saturday, August 25, 2012

अलग स्वाद है हैदराबादी बिरयानी का..

बिरयानी मतलब हैदराबाद की। वैसे तो बिरयानी पूरे देश में मिलती है लेकिन जो स्वाद, सफाई, वेराइटी खाने का अंदाज हैदराबाद में वह कहीं नहीं। बिरयानी हैदराबाद की संस्कृति में रची बसी है। न सिर्फ हैदराबाद आने वाले सैलानी बल्कि यहां के लोग भी बिरयानी खूब खाते हैं। मजे की बात की हैदराबाद की बिरयानी सबसे सस्ती भी है। दिल्ली में हैदरबादी बिरयानी के नाम पर वहां से तीन गुने कीमत पर बिरयानी बेची जाती है।

हैदराबाद में सिकंदराबाद रेलवे स्टेशन पर उतरते ही आपको रेलवे के कैफेटेरिया में भी बिरयानी मिल जाएगी। वैसे आप पूरे हैदराबाद में बिरयानी कहीं भी खाएं रेट करीब करीब एक ही जैसा है। एक प्लेट बिरयानी मतलब 800 ग्राम राइस, चिकेन के कुछ टुकड़े और उसके साथ खाने के लिए मसाले और चटनी आदि। एक बिरयानी दो लोग आराम से खा सकते हैं। अगर आपकी डायट कम है तो तीन लोग भी खा सकते हैं।

पाराडाइज की बिरयानी-

वैसे आप हैदराबाद में हैं तो बिरयानी का मतलब है पाराडाइज की बिरयानी। पाराडाइज सिकंदराबाद के कंप्यूटर हब में एक बड़े रेस्टोरेंट का नाम है। लेकिन यह इतना प्रसिद्ध हो चुका है पाराडाइज के नाम से ये चौराहा, बस स्टॉप और इलाका जाना जाता है। आप हैदराबाद में कहीं से पूछ सकते हैं कि मुझे पाराडाइज जाना है लोग रास्ता बता देंगे।

पाराडाइज की बिरयानी बैठ कर खाएं या पैक कराएं। अगर आप पार्सल लेना चाहते हैं तो एक काउंटर पर पैसे दें और दूसरे काउंटर पर रसीद दिखाकर बिरयानी ले जाएं। इतनी तेज डिलेवरी की सर्विस कहीं नहीं दिखी। है भी इसलिए क्योंकि बिक्री काफी तेज है। वैसे अब पाराडाइज का अपना बहुत बड़ा रेस्टोरेंट भी है और आप वहां दर्जनों तरह की बिरयानी का लुत्फ उठा सकते हैं। चिकेन, एग, मटन या फिर शाकाहारी बिरयानी जैसी हो पसंद आपकी।


दम बिरयानी -  वैसे तो बिरयानी लखनऊ की भी प्रसिद्ध है लेकिन दोनों शहरों के बनाने के तौर तरीके अलग-अलग हैं। हैदराबादी बिरयानी चावल को मेरीनेट करके बनाई जाती है यानी दम बिरयानी। इसमें चिकेन के छोटे छोटे पीस डाले जाते हैं जिन्हें अच्छी तरह मसालों के साथ पकाया जाता है।इसलिए इसका स्वाद नवाबों के शहर के बिरयानी से अलग होता है।

सचिन और शोएब भी आ चुके हैं यहां - पाराडाइज की मशहूर बिरयानी का स्वाद लेने के लिए बड़ी बड़ी हस्तियां पहुंचती हैं। सचिन तेंदुलकर और शोएब अख्तर जैसे क्रिकेटर भी यहां आ चुके हैं। सानिया मिर्जा का तो शहर ही है हैदराबाद। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी यहां की बिरयानी का स्वाद ले चुके हैंं। पाराडाइज बिरयानी की वेबसाइट पर जाएं-www.paradisefoodcourt.com

ऐसे हुआ हैदराबादी बिरयानी का आविष्कार - 
हैदराबाद के शासक निज़ाम के जमाने में जब फ़ौज लडाई या किसी अभियान पर कूच करती थी तो हज़ारों फ़ौज़ियों का खाना बनाने के लिए रसोइयों की फ़ौज भी साथ चलती थी। ढेर सारे बरतन लेकर चलना पड़ता था। फ़ौज का कुछ हिस्सा तो रसोईयों और खाने के सामान के हिफ़ाजत में ही लगे रहते थे। एक बार दुश्मनों ने निज़ाम फ़ौज पर जबरदस्त धावा बोल दिया। अचानक हमले से घबराए फ़ौज़ियों ने रसोइयों को जान बचाने के लिए जंगल में भाग जाने को कहा, जल्दबाज़ी में रसोइयों ने सारी खाद्य सामग्री चूल्हे पर चढ़े बरतन में डाल दी।

निज़ाम की फ़ौज द्वारा शाम तक दुश्मन को मार भगाने के बाद जब रसोइयों ने वापस आ कर देखा तो रसोई से भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी, थके फ़ौज़ियों को रसोइयों ने वही चावल परोसे। उन्हें यह नया व्यंजन बड़ा लज़ीज़ लगा। इसकी खबर निज़ाम तक भी गई। जब निज़ाम ने इसे खाया तो उन्हें इतना पसन्द आया की उसने तुरंत हुक्म दिया की आज से यह शाही बिरयानी फ़ौज़ियों के लिए पकायी जाएगी। इसमें बहुत बरतन और ढेर सारे खानसामों की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। इस तरह हो गया हैदराबादी बिरयानी का आविष्कार जिसकी खुशबू दुनिया भर में फैली है। 

हैदराबादी चिकन बिरयानी
वास्तव में हैदराबादी बिरयानी एक रिच डाइट है। चिकेन मे बहुत ज्यादा कैलोरी होती है। यदि आपको डिनर में बिरयानी खानी हो तो सोने से कम से कम दो घंटे पहले खाएं ताकि यह आसानी से पच सके।
ऐसे बनाएं चिकन बिरयानी
सामग्री- चिकन 1 किलो चावल 2 किलो
बड़ी इलायची 2 कटा हुआ धनिया पत्ता 2 चम्मच
दालचीनी 2 लौंग और हरी इलायची   2-2
ज़ीरा और धनिया पत्ता         आधा चम्मच
लहसुन (कटा हुआ) 2 चम्मच अदरक (कटा हुआ) 2 चम्मच
हरी मिर्च2 जावित्री 1 चम्मच,  नींबू का रस 1 चम्मच, 
प्याज़ (कटा हुआ) 4 घी 2 चम्मच
ब्राउन प्याज़ 2 बड़ा पुदीना (कटा हुआ) 2 चम्मच
साबुत काली मिर्च 6 जाफरान आधा चम्मच
नमक और हल्दी - स्वादानुसार, दही 2 कप

बनाने का तरीका
एक बर्तन में चिकन लें और अदरक लहसुन पेस्ट, पुदीना, दही, हरी मिर्च, धनिया पत्ता,  काली मिर्च, ज़ीरा, हरी मिर्च, हल्दी, नमक, धनिया पाउडर और साबुत गरम मसाला,  पीसा हुआ प्याज़ और तेल डालकर अच्छे से सबको मिलाएं। चावल में पानी और नमक डालकर पकाएं। चावल के लगभग आधा गल जाने के बाद पानी निकाल लें। अब एक बड़े बर्तन में मैरिनेटेड चिकन को फैला दें और आधा पका चावल डालें उपर से पुदीना पत्ता, फ्राई किया हुआ प्याज़ और ज़ाफरान डालें और धीमी आंच पर लगभग दो घंटे के लिए पकने छोड़ दें।

- vidyutp@gmail.com

Friday, August 24, 2012

एक शहर के कितने नाम

एक शहर के नए पुराने दो नाम को लेकर काफी लोग भ्रम में रहते हैं। कई बार एक शहर में कई प्रमुख रेलवे स्टेशन के कारण भी भ्रम की स्थिति बनती है। तो आइए बात करते हैं कुछ ऐसे ही शहरों की।

हैदराबाद और सिकंदराबाद यानी टिवन सिटी। दोनों रेलवे स्टेशन के बीच की दूरी 10 किलोमीटर। वैसे हैदराबाद के लोग हैदराबाद जंक्शन रेलवे स्टेशन के नामपल्ली नाम से बुलाते हैं। वैसे हैदराबाद में एक और रेलवे स्टेशन है काचीगुडा जहां कई लंबी दूरी की ट्रेनें रुकती हैं।

केरल में पुराने ऐतिहासिक कालीकट शहर का नया नाम है कोझिकोड। इसी तरह कोचीन का नाम है कोच्चि। लेकिन एरनाकुलम और कोच्चि करीब करीब एक ही शहर हैं। यहां रेलवे स्टेशन का नाम एरनाकुलम साउथ और एरनाकुलम नार्थ है। कोचीन नाम का कोई रेलवे स्टेशन नहीं है। इसी तरह त्रिवेंद्रम का नया नाम थिरुवनंतपुरम है। साथ कोचिवेली रेलवे स्टेशन भी इसी शहर का हिस्सा है। इसी तरह कन्याकुमारी और नगरकोइल आसपास हैं।

तमिलनाडु के लोकप्रिय पर्यटन स्थल उटी का एक और नाम उदघमंडलम भी है। मद्रास का नया नाम चेन्नई हो गया। पर तमाम लोग अभी भी मद्रा ही बोलते हैं। कई रेलगाड़ियां चेन्नई के इगमोर स्टेशन से खुलती हैं।

गुजरात में अहमदाबाद और गांधीनगर आसपास के शहर हैं। दोनों शहरों के बीच में 40 किलोमीटर की दूरी है जो लगातार बन रही कालोनियों के कारण खत्म हो चुकी है। इसी तरह गुजरात के लोकप्रिय शहर बड़ौदा का नया नाम वडोदरा है।

बंबई का नाम मुंबई हो गया। जैसे दिल्ली में कनाट प्लेस का नया नाम राजीव चौक है लेकिन काफी लोग उसे संक्षेप में अभी भी सीपी बोलते हैं। चंडीगढ़, पंचकूला और मोहाली बिल्कुल मिले हुए शहर हैं। पंजाब में वाघा बार्डर और अटारी एक ही बात है।

गोवा में मडगांव ओर मरगाओ एक ही शहर के नाम हैं। राजधानी दिल्ली से आपको ट्रेन पकड़ी हो तो नई दिल्ली, दिल्ली, सराय रोहिल्ला, हजरत निजामुद्दीन, आनंद विहार जैसे चार टर्मिनल हैं जहां से अलग अलग दिशाओं की ट्रेन खुलती है। यूपी की राजधानी लखनऊ। यहां का रेलवे स्टेशन है लखनऊ जंक्शन पर यहां लोक इसे चार बाग कहते हैं। किसी जमाने में लखनऊ जंक्शन के पास खूबसूरत चारबाग हुआ करता था। अब उसकी स्मृति मात्र है। 

बिहार की राजधानी पटना में पटना जंक्शन, राजेंद्रनगर, दानापुर, पटना साहिब जैसे स्टेशन हैं तो अब आने वाले दिनों में पाटलिपुत्र नामक नया रेलवे स्टेशन बन रहा है जो उत्तर बिहार के लिए बनने वाले रेल पुल से जुड़ेगा। उत्तर बिहार के प्रसिद्ध सोनपुर रेलवे स्टेशन और हाजीपुर के बीच महज छह किलोमीटर का ही अंतर है। अंत में वरुणा और असी नदियों के बीच बसे शहर वाराणसी का नाम तो लेना ही चाहिए जिसे काशी नाम से भी जाना जाता है।
-    ---विद्युत प्रकाश मौर्य

Thursday, August 23, 2012

एक एसएमएस करें 98730-52666 पर फ्री में पाएं गीता


गीता ज्ञान प्रसार का अभिनव कार्य 

श्रीमदभागवतगीता, हिंदू धर्म का महान ग्रंथ। लेकिन कितने हिंदुओं ने पढ़ी है गीता। हो सकता है 50 फीसदी आबादी ने भी कभी नहीं पढ़ी हो। लेकिन अगर आप गीता पढ़ना चाहते हैं तो आप ये महान पुस्तक पा सकते हैं बिना कोई कीमत चुकाए सिर्फ आपको करना होगा एक एसएमएस। इस नंबर पर – 98730-52666 या 98733-57727 इन नंबरों पर एसएमएस में आप अपना पूरा पता भेजें। चंद रोज में आपको गीता की हार्ड बाउंड वाली ( सजिल्द ) प्रति कूरियर या डाक से आपके पते पर निःशुल्क मिल जाएगी।

दिल्ली के यमुना पार इलाके के दिलशाद गार्डन के एक सज्जन पिछले कई सालों से गीता के प्रसार का ये अनूठा अभियान चला रहे हैं। वे नहीं चाहते कि उनका नाम कहीं जाना जाए। फौज से अवकाश प्राप्त और अब अपना फोटोस्टेट का कारोबार चलाने वाले इस श्रद्धालु ने गीता के प्रसार को अपने जीवन का मकसद बना लिया है। अब तक वे देश के अलग अलग राज्यों में कई हजार लोगों को गीता की प्रति भेज चुके हैं। गांवों में जहां कूरियर की सुविधा नहीं है वहां डाक से भेजी जाती है गीता।

एसएमएस करने वालों को गीता की जो प्रति भेजी जाती है उसका हिंदी भाष्य महान संत श्री स्वामी सत्यानंद जी महाराज ने लिखा है। वैसे तो गीता की भाषा-टीका सैकड़ों संतों ने समय समय पर लिखी है लेकिन सत्यानंद जी महाराज अत्यंत सरल हिंदी में गीता प्रस्तुत की है जो कम पढ़े लिखे लोगों को भी आसानी से समझ में आ जाती है। गीता अभियान चलाने वाले ये श्रद्धालु बताते हैं कि वे गीता पढ़कर नास्तिक से आस्तिक हुए। आज से 5000 साल पहले भगवान कृष्ण ने अर्जुन को जो परम ज्ञान दिया वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। गीता अद्भुत आध्यात्मिक ज्ञान वाली पुस्तक है जो लोगों में निराशा का भाव खत्म कर आशा का भाव जगाती है। अगर हमारी ओर से भेजी गीता को पढ़कर किसी के जीवन में सार्थक बदलाव आता है तो यही सच्ची मानवता की सेवा है।

-    - माधवी रंजना 
 ( FREE GEETA, DILSHAD GARDEN, DELHI )

Wednesday, August 22, 2012

रामोजी फिल्म सिटी की सपनीली दुनिया..


रामोजी फिल्म सिटी एक सपनीली दुनिया है..मुझे यहां ज्यादा समय रहने का मौका नहीं मिल सका...दैनिक भास्कर पानीपत में काम करता था सीनियर सब एडीटर के पद पर..तभी एक दिन फोन आया कि आपका ईटीवी हैदराबाद में इंटरव्यू है...आने जाने का एसी 3 का किराया दिया जाएगा....मैं तैयार हो गया..इंटरव्यू के लिए। दस साल प्रिंट मीडिया में काम करने के बाद इलेक्ट्रानिक मीडिया में जाने के बारे में सोचता भी था...आईआईएमसी से निकला था तो बहुत से दोस्त तुरंत ही इलेक्ट्रानिक मीडिया में चले गए थे..
खैर वह जनवरी की बड़ी ही सर्द सुबह थी जब मैं दक्षिण के शहर हैदराबाद के लिए चला...सिकदंराबाद स्टेशन पर रामोजी फिल्म सिटी( आरएफसी) की गाड़ी हमारा इंतजार कर रही थी...आरएफसी में गया तो शांति निकेतन गेस्ट हाउस में ठहराया गया....इंटरव्यू के दौरान ही तीन दिनों तक रामोजी फिल्म सिटी के गेस्ट हाउस में रहा...ईटीवी के एमपी चैनल में मेरा मिड्ल लेवल जर्नलिस्ट के पद पर चयन हो गया...उसके बाद सात महीने मैंने ईटीवी में गुजारे...एमपी चैनल में....हमारे चैनल के इंचार्ज योगेश जोशी और रुपेश श्रोती से सानिध्य में...
आठ महीने के अनुभव बड़े अच्छे रहे...यहां आने पर पता चला कि यहां चार सौ हिंदी पत्रकारों की जमात रहती है....इसमें ज्यादातर लोग वनस्थली पुरम में रहते हैं....खैर बात करते हैं रामोजी फिल्म सिटी की जिसे दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म सिटी होने का गौरव प्राप्त है...हैदराबाद शहर से बाहर विजयवाड़ा रोड पर इसका विशाल कैंपस है....हर रोज कई हजार टूरिस्ट इस फिल्म सिटी को देखने आते हैं...यहां दर्जनों हिंदी फिल्मों की भी शूटिंग हुई है...

रामोजी फिल्म सिटी में ही ईटीवी समूह के 12 भारतीय भाषाओं के चैनलों के हेड आफिस हैं...इनमें से चार हिंदी के चैनल भी हैं...इसका मतलब की पत्रकारों की एक बड़ी बिरादरी यहां काम करती है...ईटीवी इलेक्ट्रानिक मीडिया की बड़ी नर्सरी बन चुकी है...सभी बड़े चैनलों में भी ईटीवी के लोग पहुंच चुके हैं...
हरी भरी पहाड़ियों के बीच रामोजी फिल्म सिटी का नजारा बड़ा सुहावना है....विशाल दफ्तर...लंबी चौड़ी कैंटीन और संपन्न रेफरेंस लाइब्रेरी...ईटीवी की खास बातों में से एक है...ईटीवी में काम करने वाले कई लोग बहुत सी बातों को लेकर कुंठित भी रहते हैं पर मैं यहां उनकी चर्चा नहीं करना चाहूंगा.... एक अनुशासन है जिसके बदौलत रामोजी फिल्म सिटी में सारी व्यवस्था चलती है....कई दर्जन बसें रोज कर्मचारियों को लेकर फिल्म सिटी में आती हैं....फिर उन्हें छोड़ने के लिए घर भी जाती हैं....पहाड़ों के बीच जब सूरज की पहली किरण फिल्म सिटी में पड़ती है तो सुबह देखने लायक होती है....विशाल हरे भरे पार्क और एक से बढ़कर एक शूटिंग लोकेशन्स रामोजी फिल्म सिटी की विशेषता है....हमेशा यहां किसी न किसी फिल्म की शूटिंग चलती रहती है....रामोजी फिल्म सिटी के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए आप उनकी आफिशियल वेबसाइट पर जा सकते हैं....


-विद्युत प्रकाश मौर्य
( RAMOJI FILM CITY, HYDRABAD, TELNGANA) 

Tuesday, August 21, 2012

आखिर कौन है असली चोटीवाला

हर की पौड़ी के पास चोटीवाला बजाते हैं घंटी।
कई दशकों से जो लोग हरिद्वार या ऋषिकेश घूमने जा रहे हैं वे अक्सर चोटीवाला के रेस्टोरेंट में खाने जरूर जाते हैं। लेकिन हरिद्वार जाने के बाद यह समझ पाना मुश्किल है कि असली चोटीवाला कौन है। हरिद्वार में चोटीवाला नाम के तीन रेस्टोरेंट हैं और ऋषिकेश में दो।

ऋषिकेश से आगे बढ़ने पर मुनि की रेती में रामझूला या शिवानंद झूला को पार करके जैसे ही आप स्वर्गाश्रम की ओर बढ़ते हैं तो वहां चोटीवाला का शानदार रेस्टोरेंट दिखाई देता है। किसी जमाने में ढाबेनुमा रेस्टोरेंट अब हाई फाई रेस्टोरेंट की शक्ल ले चुका है। इसकी अपनी वेबसाइट भी है। चोटीवाला की खास बात है रेस्टोरेंट के बाहर एक लंबी चोटीवाला आदमी ग्राहकों का मुस्कुराकर स्वागत करता रहता है। चेहरे पर खास किस्म का पेंट लगाकर यह आदमी दिन भर बैठा रहता है। रेस्टोरेंट के साइनबोर्ड पोस्टर बैनर पर भी चोटीवाले को खास जगह दी गई है। हरिद्वार ऋषिकेश आने वाले लोग चोटीवाला जाकर जरूर जीमना चाहते हैं। पर मुश्किल है कि अब स्वर्गाश्रम में ही दो चोटीवाला हो गए हैं। बिल्कुल अगल बगल में। दोनों असली होने के दावा करते हैं।
हर की पौड़ी के पास चोटीवाला 

1958 में स्थापित ये रेस्टोरेंट देश भर में जाना जाता है अपने नाम से। नाम ही कुछ ऐसा है जो नहीं भूलता है। खाने की बात करें तो इसकी अलग पहचान है। जब बंगाल का कोई आदमी पहली बार हरिद्वार तीर्थ के लिए चलता है तो पिता पुत्र को कहता है कि चोटीवाला में जरूर खाकर आना। समय के अनुसार चोटीवाला ने अपना रंग ढंग भी बदला है। चोटीवाला के मेनू कार्ड में अब उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय, बंगाली, गुजराती और चायनीज डिश भी हैं। इसके अलावा चोटीवाला का अपना स्पेशल मेनू भी है।

मैं पहली बार 1991 में ऋषिकेश गया था तब चोटीवाला में और अब डेकोर में काफी बदलाव आ चुका है। कहते हैं कि चोटीवाला की अगली पीढी़ आ गई है इसलिए यहां एक साथ दो चोटीवाला हो गए हैं। मजे की बात दोनों के आगे एक चोटीवाला आदमी ग्राहकों का स्वागत मुस्कान के साथ करता है। लोग उसके साथ फोटो खिंचवाते नजर आते हैं। स्वर्गाश्रम के चोटीवाला के आगे लिखा है कि हमारी हरिद्वार में कोई ब्रांच नहीं है। अब चोटीवाला का नाम बिकने लगा है यहां खाना पीना कुछ महंगा हो गया है...इसलिए रौनक कुछ कम हो गई है। ठीक उसी तरह जैसे दिल्ली के चांदनी चौक में घंटेवाला की।
हर की पौड़ी के पास चोटीवाला 

खैर जब आप हरिद्वार हर की पौड़ी में जाएंगे तो वहां भी दो चोटीवाला के रेस्टोरेंट मिलते हैं। एक गंगा जी के घाट की तरफ है तो दूसरा बड़ा बाजार की गली में। दोनों ही असली चोटीवाला होने का दावा करते हैं। हालांकि इनके यहां कोई आदमी लंबी चुटिया लगाकर नहीं बैठा होता है लेकिन खाने पीने वालों की खूब भीड़ रहती है। यहां का मसाला डोसा या फिर पंजाबी खाना मस्त है। हरिद्वार मे रेलवे रोड पर एक और चोटीवाला नाम का रेस्टोरेंट है। हालांकि अगर आप चोटीवाला से अलग हटकर कुछ खाना चाहते हैं तो अपर रोड पर होशियारपुरी होटल में भी खाने जा सकते हैं।

असली चोटीवाला की वेबसाइट- 
http://www.chotiwalarestaurant.com

( HARIDWAR, RISHIKESH, CHOTIWALA) 


Monday, August 20, 2012

और हम विद्या अध्ययन के लिए निकल पड़े काशी

बचपन में जब यज्ञोपवीत संस्कार होता है तो पुरोहित बालक पूछता है- कहां जा रहे हो तो वह बोलता है काशी...काशी क्यों तो पढ़ाई करने....काशी यानी विद्या अध्ययन का पर्याय....विद्वानों की नगरी...

संयोग कुछ ऐसा बना की इंटर की परीक्षा पास करने के बाद मेरी भी इच्छा बनारस में पढ़ाई करने की हुई...मैंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में शामिल होने के लिए मन बनाया...

मार्च का महीना था...प्रवेश की तारीखों के बारे में कुछ नहीं पता था। यह 1990 का साल था। महीना था जून का। मैं और मेरे मित्र विष्णु वैभव दोनों एक शाम सोनपुर से वाराणसी पैसेंजर में सवार हुए... यह मीटर गेज रेलवे लाइन थी। सुबह चार बजे ट्रेन छोटे छोटे दर्जनों स्टेशनों को पार करती हुई बनारस पहुंच गई...तब वाराणसी सोनपुर के बीच छोटी लाइन थी जो अब ब्राड गेज में बदल चुकी है। बनारस रेलवे स्टेशन का आकार भी बाहर से मंदिर जैसा ही है....

हमारे पास संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर का पता था। वे वहां बीएड विभाग के हेड थे...कुछ नाम था शायद वाचस्पति द्विदेदी....संपूर्णानंद यूनीवर्सिटी वाराणसी जंक्शन रेलवे स्टेशन के पास ही है। सुबह सुबह हमने उनका दरवाजा खटखटाया...

उन्होंने समान्य शिष्टाचार के बाद सलाह दी... पहली बार बनारस आए हो तो दोनों यहां से सीधे दश्वाश्वमेध घाट चले जाओ वहां गंगा जी में स्नान कर लेना उसके बाद वहीं से बीएचयू चले जाना...तब तक नौ बज जाएंगे और यूनीवर्सिटी खुल भी जाएगी....हमने विद्वान पुरूष की राय पर अमल किया...
हमलोग सुबह सुबह दशाश्वमेध घाट पहुंच गए... वहां देखा हजारों लोग गंगा स्नान कर रहे हैं। गंगा जी बनारस में उत्तर-दक्षिण बहती हैं। इसलिए सुबह के सूरज की पहली किरण दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों पर आकर पड़ती है। उसके बाद वाराणसी के घाटों का सौंदर्य कई गुना बढ़ जाता है। तभी बनारस की सुबह का कई कविओं ने अपने अपने तरीके से गुणगान किया है।



 बनारस में गंगा स्नान करने के बाद हमने बाबा विश्वनाथ के दर्शन की सोची... बाहर निकल कर एक गली में घुस गए...कई घंटे चक्कर लगाने के बाद भी भोले बाबा का दरबार नहीं मिला...तब जाकर याद आया कि बनारस की गलियों के बारे में भी कितने तरह के किस्से मशहूर हैं। खैर हमने किसी से बाहर सड़क पर निकलने का रास्ता पूछा और आटो रिक्शा पर बैठकर पहुंच गए काशी हिंदू विश्वविद्यालय के गेट पर....


विशाल सिंह द्वार और उसके बाहर महामना पंडित मदन मोहन मालवीय की विशाल मूर्ति....खैर हम गेट के अंदर घुसे... हमारे पास बीएचयू के मेडिकल कालेज की कैंटीन में काम करने वाले बीएन तिवारी जी का पता था...

मेडिकल कालेज की तीसरी मंजिल पर स्थित कैंटीन में तिवारी जी मिले...उन्होंने बातें करने से पहले चाय नास्ता कराया....फिर हमने उन्हें अपने आने का उद्देश्य बताया....उन्होंने सेंट्रल आफिस जाने को कहा... 

इस दौरान हमें बीएचयू के भव्य परिसर का साक्षात्कार हुआ। फार्म खरीदने के साथ तय किया किसी भी तरह यहीं पढ़ाई करने आना है। इसके बाद अगले दो दिन हमलोग महामनापुरी कालोनी में अपने पिताजी के एक मित्र गजेंद्रनाथ शुक्ला के घर रुके। शुक्ला जी वैशाली जिले के कन्हौली एस्टेट परिवार से आते हैं। वे बीएचयू में कर्मचारी के तौर पर कार्यरत थे।



प्रवेश परीक्षा के लिए आवेदन करने के बाद हमने लंका पर आकर बीएचयू प्रवेश परीक्षा की गाइड खरीदी...दुबारा प्रवेश परीक्षा देने बनारस आना हुआ...। मेरा परीक्षा केंद्र सांख्यिकी विभाग में था। 
प्रवेश परीक्षा यानी इंट्रेस के रिजल्ट में 1990 में मैं सेकेंड टाप पोजीशन पर आया था....इसके बाद में सामाजिक विज्ञान संकाय में इतिहास (प्रतिष्ठा) में नामांकन लिया। उसके बाद पांच साल बीएचयू कैंपस में गुजारे। जिसके सैकड़ो खट्टे-मीठे अनुभव हैं। कभी मौका मिला तो सुनाउंगा। 


-विद्युत प्रकाश मौर्य  

( BHU, VARANASI, UTTAR PRADESH, RAIL, DASHASHWAMEDH GHAT  ) 

Sunday, August 19, 2012

जयपुर - गुलाबी शहर का अदभुत नजारा

किसी के लिए घूमना नशे की तरह है तो किसी के लिए संगीत की तरह...आजकल छोटी-मोटी छुट्टियों का दौर चला है....ऐसे में दिल्ली की भागमभाग भरी जिंदगी से निजात पाने के लिए कुछ दिन छुट्टी मनाने की सोची तो जयपुर जाने का दिल हुआ...

जयपुर में अब वैसे तो दिल्ली जैसी भीड़भाड़ हो गई है...पर जयपुर शहर की अलग संस्कृति है और वहां घूमने का भी अपना एक अलग मजा है...सो अपनी पत्नी माधवी और ढाई साल के बेटे वंश के साथ मैं जयपुर के लिए चला गया...दिल्ली से पूजा एक्सप्रेस का तेज सफर...जयपुर मे एक होटल में कमरा लेने के बाद हमलोग निकले चांदपोल गेट की तऱफ....मैं एक बार पहले भी जयपुर घूम चुका था...पत्नी और बेटे के लिए सब कुछ नया था.. गुलाबी शहर में....चांद पोल गेट से जयपुर शहर की कई किलोमीटर सड़कें आप नंगी आंखों से देख सकते हैं....सभी दुकाने गुलाबी रंग कीं....समकोण पर काटते चौराहे...दुनिया के तीन सबसे खूबसूरत शहरों में शुमार जयपुर खासियत है...( बाकी दो शहर हैं फ्रांस का पेरिस और इटली का वेनिस)


कई सौ साल पुराना शहर अपने मूल स्वरूप में आज भी दिखाई देता है....अंदर भले मोबाइल और कंप्यूटर की दुकाने खुल गई हों पर बाहर लुक वही पुराना है....सारी दुकानों के साइन बोर्ड एक ही जैसे हैं....हां बाजार में थोडी भीड़ जरूर बढ़ गई है....
हमने तय किया कि गुलाबी शहर को हम बग्घी पर बैठकर देखेंगे...एक बग्घी वाले से मोलजोल की....मेरे राजकुमार यानी ढाई साल के वंश आगे बैठे और मैं और मेरी माधवी पीछे...और घोड़ा सड़क पर टिकटिक टिक टिक दौड़ता रहा....सचमुच धीरे-धीरे चलती घोड़ा गाड़ी पर पुराना जयपुर शहर देखने का मजा कुछ अलग था...वैसे भी अब बहुत कम ही शहरों में घोड़ागाडी दिखाई देती है....थोड़ी देर बाद हमारे घोड़ा गाड़ी वाले ने कहा कि हवा महल आ गया है...

पिछली बार टूरिस्ट बस वाले ने हवा महल को बाहर से ही दिखा दिया था..बस में चलते चलते...पर इस बार हम हवा महल में अंदर गए टिकट खऱीदकर ....रैंप पर चलते हुए हवा महल उपरी सिरे तक जाने का अनुभव बड़ा रोमांचक है...और जगह जगह हवा महल में बने झरोखे से जयपुर शहर का बाजार दिखाई देता है...कभी महारानियां इन्ही झरोखों से बाजार का नजारा करती थीं....आज हमने भी उसका लुत्फ उठाया...हवा महल के उपरी छत से पूरा जयपुर शहर दिखाई देता है....

हवा महल के बाद शहर कई हिस्से घूमते रहे....उसके बाद अपने एक दोस्त को फोन किया जो राजस्थान पत्रिका में काम करते हैं...चंद्रभान ने बताया कि आप बिड़ला मंदिर भी देख लें...बिडला जी ने देश कई शहरों में मंदिर बनवाया है...दिल्ली में बिड़ला मंदिर, हैदराबाद में बिड़ला मंदिर भोपाल में भी बिड़ला मंदिर...खैर जयपुर का बिड़ला मंदिर भी बड़ा खूबसूरत है...मोती डूंगरी फोर्ट के ठीक नीचे है बिड़ला मंदिर। 

अगर आप जयपुर जाएं तो बिडला मंदिर के निकट चौराहे पर पावभाजी खाना नहीं भूलें...एक साथ कई पावभाजी की दुकाने हैं....पाव भाजी इतनी अच्छी बनाते हैं कि आपका बार बार खाने को दिल करेगा..जयपुर शहर के अलग अलग कोने से पावभाजी खाने आते हैं यहां लोग...हालांकि जयपुर शहर का अपना खाना पानी तो दाल बाटी चूरमा है....राजस्थान का मशहूर कहावत है....दाल बाटी चूरमा...राजस्थानी सूरमा....पर बिड़ला मंदिर के पास पावभाजी खाने का भी अपना अलग आनंद है....


- विद्युत प्रकाश मौर्य

(JAIPUR, PINK CITY, RAJSTHAN, CHANDPOLE ) 

Saturday, August 18, 2012

वास्तुकला का अदभुत नमूना - शेरशाह का मकबरा - सासाराम

बिहार का ऐतिहासिक शहर सासाराम। मुझे गर्व है कि इसी धरती पर मेरा जन्म हुआ। पर शहर की पहचान उस महान शासक से जुडी है जिसने देश को कई नायाब चीजें दीं और इतिहास के पन्नों पर अमर शासक बन गया। 
सासाराम शहर अपने शेरशाह के मकबरे के लिए जाना जाता है जो बिहार का प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है। ये मकबरा सासाराम रेलवे स्टेशन से महज दो किलोमीटर दूर है। अब तो शहर के बीचोंबीच ही आ चुका है। जी टी रोड पर मकबरा जाने के लिए प्रवेश द्वार भी बना है। इस द्वार से मकबरे की दूरी आधा किलोमीटर है। शहर के लोग मकबरे को रौजा भी कहते हैं। यह रौजा भारतीय पुरात्तव विभाग के संरक्षण में है। प्रवेश का टिकट 15 रुपये का है। ये सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता है। 


शेरशाह का मकबरा एक विशाल सरोवर के बीचोंबीच बनाया गया है। मकबरे का निर्माण 16 अगस्त 1545 को पूरा हुआ।

बीच सरोवर में बने मकबरे में जाने का रास्ता बिल्कुल सामने से है जहां से इसका सौंदर्य निहारते हुए अप्रतिम आनंद आता है।  शेरशाह के मकबरे की सबसे बड़ी विशेषता इसकी वास्तु कला है। ये अष्टकोणीय बनावट का है। आमतौर पर मकानों में चार दीवारें होती हैं लेकिन इसमें आठ दीवारे हैं। इसका डिजाइन अलाइवाल खान ने तैयार किया था। मकबरा इंडो इस्लामिक वास्तुकला का बेहतरीन नमूना है। मकबरे का मुख्य गुंबद 122 फीट ऊंचा है। हर रोज देशी विदेशी सैलानी इस मकबरे को देखने के लिए आते हैं। मुख्य भवन के अंदर शेरशाह और उसके परिवार के सदस्यों के मकबरे हैं।

शेरशाह के पिता का नाम हसन शाह था। वैसे तो उसके बचपन का नाम फऱीद था। उसका जन्म हरियाणा के नारनौल शहर में हुआ था। फरीद बाल्यकाल से ही अत्यंत बहादुर था। कहते हैं बचपन में ही उसने बहादुरी दिखाते हुए एक शेर के तलवार से दो टुकड़े कर डाले। तब से उसका नाम शेरशाह पड़ गया।


महान अफगान शासक शेरशाह ने महज पांच साल दिल्ली से देश पर शासन किया लेकिन देश को अदभुत चीजें दीं। आज हम जिस इनफ्रास्ट्रक्चर के विकास की बात करते हैं शेरशाह ने पूरे देश को एक करने के लिए पंजाब के पेशावार ( अब पाकिस्तान में) से लेकर कोलकाता तक देश की सबसे लंबी पक्की सड़क बनवाई। लोग कहते हैं कि ये सड़क सम्राट अशोक ने बनवाई थी लेकिन शेरशाह ने उसे पक्की कराया। अंग्रेजों ने उसकी मरम्मत कराई तो नाम दे दिया ग्रैंड ट्रंक रोड। लेकिन आजाद भारत में फिर इसका नाम रखा गया है शेरशाह सूरी पथ जिसे आप नेशनल हाईवे नंबर 2 के नाम से भी जानते हैं।
शेरशाह का नाम देश में पहली बार डाक व्यवस्था शुरु करने के लिए भी जाना जाता है। शेरशाह के जमाने के डाक पोस्ट का आज भी कई जगह अस्तित्व दिखाई देता है। उसने मुद्रा व्यवस्था भी शुरू की। आज रुपया शब्द शेरशाह के समय की देन है। शेरशाह के राज में  कानून इतना सख्त था कि चोर चोरी करने से कांपते थे। चोरी पर हाथ काटने की सजा होती थी। जिस गांव में चोरी हो वहां के लोगों पर किया जाता था सामूहिक जुर्माना।


कालांजर के किले में 13 मई 1545 को अपनी मौत से पहले शेरशाह ने अपने लिए मकबरे का इंतजाम कर लिया था जो सासाराम का बड़ा दर्शनीय स्थल बन गया। मकबरा उसके जीवन काल में बनना आरंभ हो गया था जो उसके मृत्यु के तीन महीने बाद पूरा हो गया। शेरशाह के मकबरे के सामने शेरगंज मुहल्ले में उसके पिता हसन शाह सूरी का भी मकबरा है। स्थानीय लोग इसे सूखा हुआ रौजा भी कहते हैं। 
शेरगंज स्थित हसनशाह सूरी का मकबरा। 

कहा जाता है कि दिल्ली का पुराना किला शेरशाह का बनवाया हुआ है। मध्य प्रदेश में एक जिला है श्योपुर। इस श्योपुर का किला भी शेरशाह का बनवाया हुआ है। हालांकि इस किले पर कब्जा करके लोगों ने अब आवासीय बनवा दिया है। 

कहां ठहरें - सासाराम में ठहरने के लिए बिहार पर्यटन ने होटल शेरशाह विहार बनवाया है जो फजलगंज में जीटी रोड पर ही स्थित है। आप जीटी रोड पर रोहित इंटरनेशनल समेत कई और होटलों में ठहर कर सासाराम और आसपास घूम सकते हैं। 

और क्या देखें -  शेरशाह के मकबरा के अलावा, गुरुद्वारा चाचा फग्गूमल, ताराचंडी देवी का मंदिर, रोहतासगढ़ का किला, भबुआ के पास मुंडेश्वरी देवी का मंदिर सासाराम में रहकर देखा जा सकता है। 

-    - विद्युत प्रकाश मौर्य  ( vidyutp@gmail.com )

((SASARAM, SHERSHAH TOMB, FARID, HASAN SHAH SURI, GT ROAD, ROHTAS, BIHAR )

Friday, August 17, 2012

वह ‘फिर’ लौट कर नहीं आया

पटना में गंगा में स्टीमर 
तब उत्तर बिहार और पटना के मध्य स्टीमर चलती थी गंगा में। एक स्टीमर यात्रा के क्रम में पिताजी के एक मित्र मिल गए। उनके साथ उनकी पुत्री थी श्वेता। ( ऐसा ही कुछ नाम था उसका ) पिताजी के दोस्त ने कहा, चलिए कैंटीन में चाय पीते हैं...मैं गांव से नया नया आया था..चीनी मिट्टी की प्लेट और प्याली में चाय पीने का अभ्यस्त नहीं था। लिहाजा पहली चुस्की में ही मुंह जल गया। श्वेता मेरी ओर देखकर मुस्कराई। मैं विचलित हो अपने स्थान से हिला और चाय की बूंदे गिरीं मेरे कपड़ों पर।

आगे बढ़कर उसने मेरे कपड़ों से चाय की बूंदों को साफ करते हुए कहा  गरम चाय ऐसे नहीं पीते। पहले थोड़ी सी चाय प्याली में ढ़लकाते हैं, फिर उसे ठंडा करके पीते हैं। मैं मंत्रमुग्ध सा कभी उसका चेहरा देखता कभी उसका चाय पीना। बहरहाल हमलोग चाय पीते पीते स्टीमर के लाउंज पर आ गए। मैं अचानक बोल उठा- ‘देखो देखो पानी पीछे भाग रहा है।श्वेता बोल पड़ी - ‘नहीं बुद्धूजहाज आगे जा रहा है।

स्टीमर से पटना उतरने तक हमलोग अच्छे दोस्त बन चुके थे। यह सुखद संयोग ही रहा है कि आगे की रेलयात्रा में भी हमलोग साथ साथ चलने वाले थे। श्वेता अपनी उम्र के अनुसार बहुत तेज तर्रार और चालक थी बार बार मेरी भोली भाली बातों और सहज अज्ञानता पर हंस पड़ती। मेरे समान्य ज्ञान में अभिवृद्धि के प्रयास में लग जाती। उसके खिलखिलाने के साथ उसकी मुखमुद्रा में विराजमान श्वेत, धवल दंत पंक्तियां, विद्युत रश्मि बिखेरते प्रतीत होते। मेरे उपर तो जादू सा होता चला जा रहा था।

रेलगाड़ी में हमने खिड़की के पास आमने सामने की जगह चुनी। रेल की छुक छुक पीछे भागते पेडों के मध्य हमारा परिचय और प्रगाढ़ होता रहा।
कौन से वर्ग में पढते होक्या खाना अच्छा लगता है...क्या तुम्हारे टीचर जी ने कभी तुम्हें मुर्गा बनाया... मैं बोल पड़ा- मुर्गा...हमारे टीचर जी को हमें गधा कहते हैं। पिता जी गुस्से में होते हैं तो बैल तक कह डालते हैं। फिर वह खिलखिलाकर हंस पड़ी। अचानक रेल एक पुल से गुजरी। देखो ये फल्गु नदी है। इसको न राजा दशरथ जी का शाप लगा हुआ है। साल भर नदी सूखी रहती है। लेकिन इसके अंदर अंदर पानी बहता रहता है। अगर इसको खोदोगे न, तो पानी निकलेगा। ये शब्द मेरे मानस पटल में हमेशा के लिए अंकित हो जाते हैं - देखो ये फल्गु नदी है। अगर इसको खोदोगे न, तो पानी निकलेगा। 

अचानक अगले स्टेशन पर रेलगाड़ी धीमी होकर रूकती चली गई। गया जंक्शन आ गया था। श्वेता अपने पिताजी के साथ उतर गई। उतरते हुए एक चाकलेट थमा गई। प्यार की मिठास भरी। उसके आखिरी शब्द थे...गुड बाय... फिर मिलेंगे। श्वेता की यादें आज भी जेहन में रची बसी हैं। परंतु वह ‘फिर’ कभी लौटकर नहीं आया।

-     -विद्युत प्रकाश मौर्य ( प्रकाशित - नवभारत टाइम्स, 20 दिसंबर 1995 ) 



(( TRAVEL, BIHAR, RAIL, GAYA, FALGU RIVER, SHORT STORY ))